7 किरदार | 7 Kirdaar Book PDF Download Free : Hindi Novels by Nitish Ojha 

पुस्तक का विवरण (Description of Book) :-

नाम / Name 📥7 किरदार PDF । 7 Kirdaar
लेखक / Author 🖊️
आकार / Size 29 MB
कुल पृष्ठ / Pages 📖230
Last UpdatedJuly 24, 2022
भाषा / Language Hindi
श्रेणी / Category

कभी-कभी हमें एहसास होता है कि किसी और ने हमारे साथ जो किया वह गलत नहीं था जब हम वही काम किसी और के साथ करते हैं, कभी-कभी यह सही या गलत के बारे में नहीं होता है, यह सब सच को स्वीकार करने के बारे में होता है और सच्चाई यह है कि चाहे कुछ भी हो जाए, तमाशा जारी रहना चाहिए।

 

पुस्तक का कुछ अंश

Contents
 
1. दीवाना…
2. कुछ कुछ होता है…
3. दिल से…
4. पहेली…
5. डर…
6. कोयला…
7. बाज़ीगर…
8. जोश…
9. दिल तो पागल है…
10. कभी हाँ कभी ना…
11. मौहब्बतें…
12. दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे…
13. कभी ख़ुशी कभी ग़म…
14. कल हो ना हो…
15. परदेस…
16. कभी अलविदा ना कहना…
17. चलते चलते…
18. चक दे…
19. अंजाम…
तीन साल बाद…
20. आग़ाज़…
21. दीवाना…
थैंक यू
 
हिम्मत बढ़ जाती है गर इतना पता हो,
कि कोई साथ है मेरे चाहें चुप ही खड़ा हो
मुझे उम्मीद है कि जिनका जिनका नाम मैं लिख रहा हूँ कम से कम वो मेरी किताब खरीदकर पढ़ेंगे, मज़ाक कर रहा हूँ लेकिन सच कहूँ तो अगर हमें पता हो ना कि चाहें कुछ भी हो जाए, दुनिया इधर से उधर हो जाए पर कुछ लोग खड़े रहेंगे हमारे पीछे तो हिम्मत बढ़ जाती है और आज मैं ऐसे ही कुछ लोगों को थैंक यू कहना चाहता हूँ।
सबसे पहले तो मेरे नानाजी श्री कृष्णा मिश्रा, पापा श्री ओम प्रकाश ओझा, मम्मी श्रीमती संध्या ओझा और मेरी फैमिली के सभी लोग, सुधीश ओझा, शालिनी ओझा, पवन दीक्षित, पूजा ओझा, श्वेता ओझा, पान्या, पलाक्षी और शिवांश।
इसके बाद और सबसे पहले, शशांक, भाई अब क्या बोलूँ मैं मतलब मेरा भरोसा हो यार तुम, थैंक यू, इसके बाद अनुजा, शायद मेरे राईटर बनने की सबसे बड़ी मोटिवेशन यही दोनों लोग हैं। बाकी कुछ लोग हैं जो इस किताब में होने चाहिए थे पर एडिटिंग में उनके रोल कट गए, उसके लिए तो सबसे पहले सॉरी पर थैंक यू रतन, नितिन, अपूर्व, अंकित, सौरभ, संभव, संजीव, नवीन, सारिम, मुदित, यतिन, उत्कर्ष, साहिल, सनी, क्षितिज, गगन, चर्चित, धीरज और रितिका।
1. दीवाना…
 
वक़्त बदलता है सबका बस तू निशाना लगा,
जीत हौसले की होती है, अमर तो रावण भी था
तो ये कहानी शुरू होती है 2007 से, ये वो दौर था जब घर के राजू और गोलू आईआईटी की तैयारी करते थे, पूजा और नेहा मेडिकल की और ये जो कॉम्प्लिकेटेड सी ज़िन्दगी है ना, ये फ़ोन पे एक ही चीज़ बार बार देखने की बजाय रेडियो पे गाने सुना करती थी।
इन सालों में बहुत कुछ बदल गया जैसे आईआईटी, जेईई बन गया, मेडिकल के एग्जाम NEET बन गए, यूपीएससी में दो एटेम्पट भी बढ़ा दिये गए पर एक चीज़ नहीं बदली और वो है ये सवाल कि हमें खुशी कहाँ मिलेगी, मतलब घरवालों की expectation होती है कि अच्छे कॉलेज से पढ़ो, टाईम पे शादी करो, प्यार करो तो अपनी कास्ट में करो और ज़्यादा अच्छा है कि ना ही करो, अच्छे घर के बच्चे ये सब नहीं करते हैं ना, साला कभी कभी सबकुछ सही होता है फिर भी समझ में नहीं आता कि हम खुश ‘क्यों’ नहीं हैं और इस ‘क्यों’ का जवाब मुझे इस किताब के आखिर में मिलता है…
May 2007 लखनऊ
मेरी कोचिंग का पहला दिन था जब मेरे पापा ने मुझसे दो बातें कही थीं, पहली, अपनी साईकल में हवा भरवा लो, कल से उसी से आना और दूसरी, अपने दोस्त बहुत सोच समझकर चुनना। मैंने साईकल में हवा तो भरवा ली, काश उनकी दूसरी बात भी सुन ली होती, उस दिन जब मैं क्लास में घुसा तो पहली सीट पे दो लड़कियाँ बैठी हुईं थीं, एक चश्मे वाली, एक बिना चश्मे वाली, चश्मे वाली लड़कियों को मैं एक नंबर एक्स्ट्रा दे देता था, मैंने उसकी तरफ देखा, मुझे लगा उसने भी मेरी तरफ देखा और मैं खुश हो गया, जब तक आदमी ज़िंदगी में एक बार रिजेक्ट ना हो जाए तब तक उसे लगता है कि वो ह्रितिक रौशन है।
वैसे ये कहानी यहाँ से शुरू नहीं होती है, होती है मेरे 10th के रिजल्ट से, बोर्ड में मेरे ठीक ठाक नंबर आ गये तो मेरे घरवालों की उम्मीदें बहुत बढ़ गयीं थीं मुझसे, पापा सफ़ेद वाला रसगुल्ला लाये और बाँट दिये अपने ऑफिस में, अब देखो माँ बाप भले ही कभी कभी हमे कुछ बोल देते हैं, पर हमारी ख़ुशी में हमसे ज़्यादा खुश होते हैं, उन रसगुल्लों के बोझ तले मैंने इंजीनियरिंग को चुन तो लिया पर सच कहूँ तो मेरे अंदर वो थ्री इडियट्स के रेंचो वाली कोई फीलिंग नहीं थी कि मुझे इंजीनियरिंग करके कोई क्रान्ति लानी है, मैंने अपने घर में सिर्फ दो चीज़ें देखी थीं, इंजीनियरिंग और मेडिकल और मैंने इंजीनियरिंग को चुन लिया शायद बस इसलिए क्योंकि तब तक मैंने एम्स दिल्ली से ज़्यादा आईआईटी कानपुर का नाम सुना था।
खैर, इस इंजीनियरिंग के खेल में मज़ा तब आने लगा जब क्लास में एंट्री हुई दो नए लड़कों की, विक्की भाटिया और शाहिद हुसैन, आपने तनु वेड्स मनु देखी है, तो बस इतना समझ लीजिये कि शाहिद था अपने माधवन जैसा, हमेशा लॉजिकल बातें करता था और पर्सनालिटी ऐसी कि कभी देर से आ गया तो बच्चे टीचर समझ के गुड ईवनिंग बोल दें। दूसरा विक्की, उसके दो दाँत बाहर निकले हुए थे पर कॉन्फिडेंस इतना था कि कोई लड़की पलट के देख ले तो उसे लगता था कि वो उसे ही देख रही है, उसका एट्टीट्यूड एकदम तनु वेड्स मनु के जिमी शेरगिल वाला था कि दुनिया जाए भाड़ में हमको घंटा फ़रक नहीं पड़ता है, अगर एक लाईन में कहूँ तो विक्की बिलकुल ऐसा था कि…
वो तजुर्बा ही क्या जो खुद से ये नहीं कहता है,
कि इस वक़्त से ना डर, ये तो आता जाता रहता है
हम तीनों एक दूसरे से बहुत अलग थे, मैं ना तो शाहिद जितना सुशील था और ना ही विक्की जितना कूल पर फिर भी शाहिद के उस ‘हम’ से लेकर विक्की के उस ‘तुम’ तक हम तीनों की दोस्ती बड़ी सही हो गयी। हम अक्सर क्लास की दूसरी सीट पे बैठा करते थे, फ्रंट सीट पे सिर्फ लड़कियाँ बैठती थीं और कभी गलती से किसी लड़की ने मुझसे कुछ पूछ लिया तो मुझे लगता था कि अरे, इसने मुझसे बात की, दरअसल जो बच्चे coed से पढ़ते हैं ना, लड़का लड़की साथ में, उनके अंदर अमूमन ये हिचक नहीं होती है पर मैं क्लास 8th तक बॉयज स्कूल से पढ़ा था, घर से भी कभी निकला नहीं था तो ये नार्मल सी बातें भी मुझे सोचने पे मजबूर कर देती थीं कि इसने मुझसे ही क्यों पूछा, कहीं ये मुझसे प्यार तो नहीं, बहुत सी गलतफहमियां थीं मेरे दिमाग में और इसी के साथ इस दुनिया में recession आ गया और इस कहानी में इसका चौथा किरदार।
July 2007
उस दिन लखनऊ में बारिश हो रही थी और कोचिंग में एंट्री हुई रिया की, वो मेरे स्कूल में ही पढ़ती थी पर क्योंकि 10th तक हमारे सेक्शन अलग अलग थे इसलिए हम लोग एक दूसरे को जानते तो थे पर ऐसी कभी बात नहीं हुई थी, लड़कियों के मामले में तो आपको मेरा हाल पता ही है, वो अटेंडेंस शीट पे अपना नाम लिख रही थी और मैं उसे देख के बस ये सोच रहा था कि अगर मैंने इसे Hi किया और इसने मुझे पहचानने से इंकार कर दिया तो विक्की बहुत मज़ाक उड़ाएगा मेरा।
बहरहाल वो अपना साईन करके हमारी सीट की तरफ बढ़ी, मैंने हिचक के मारे उसकी तरफ देखा ही नहीं, वो अपना टीशर्ट एडजस्ट करते हुए मेरे आगे बैठ गयी और क्लास ख़त्म होते ही पलट के मुझसे बोली, अरे निहाल तुम। विक्की आँखें फाड़-फाड़ के उसे देखने लगा, विक्की को गुस्से में घूरने के बाद वो फिर से मुझे देखने लगी और आखिरकार मैंने भी मस्त ओवर एक्टिंग करते हुए उससे धीरे से कहा, अरे रिया तुम, यहाँ, what a surprise, रिया नाम था उसका, रिया वर्मा, उसने मुस्कुरा के कहा हाँ और फिर हमलोग उस कोचिंग के साईकल स्टैंड पे तब तक खड़े रहे जब तक लखनऊ की वो पहली बारिश भीगते हुए घर जाने लायक नहीं हो गयी, जुलाई 2007, गज़ब का दौर था यार वो भी।
पता है, रिया ऐसी लड़की थी ना कि अगर वो कभी पलट के पीछे देखती थी तो उसके चश्मे की वजह से आधे लड़कों को ऐसा लगता था कि वो हमें देख रही है, उन लड़कों में मैं और विक्की भी थे, शाहिद को खुद ही चश्मा लगा हुआ था तो उसने रिया को कभी हमारे एंगल से देखा ही नहीं। वैसे, मेरी और रिया की स्कूल में उतनी बात नहीं होती थी जितनी कोचिंग में होती थी पर जिस तरीके से वो बात करती थी ना, बहुत फ्रैंक थी यार वो मतलब एक बार उसकी मम्मी आयीं थीं कोचिंग में तो उसने कह दिया कि ये मेरा दोस्त है, मेरी मम्मी कोचिंग आयीं होतीं तो मैं रिया की तरफ देखता भी नहीं, एक्चुअली मुझे लगता था ना कि उन्हें लगता है कि ये सब गलत है, हो सकता है कि ऐसा ना हो पर मेरी उनसे कभी बात ही नहीं हुई प्यार, मौहब्बत, दोस्ती को लेकर।
खैर, रिया मैथ्स में अच्छी थी और मैं फिजिक्स में बस एक फ़र्क था हममें, मैं उससे कभी कोई सवाल नहीं पूछता था, मुझे लगता था कि उसे क्या लगेगा कि इसे इतना भी नहीं आता है पर वो मुझसे पूछा करती थी और जब भी वो मुझसे कुछ पूछती थी ना तो कसम से इतना अच्छा लगता था कि जैसे…
मैं तुम्हारे साथ इतना बेमतलब हो सकता हूँ,
कि सारी रात बैठ के तारे गिन सकता हूँ
वक़्त के साथ करीब आने लगे थे हम दोनों और इतने कि एक दिन विक्की ने मुझसे पूछ ही लिया, रिया तुम्हें अच्छी लगती है क्या। रिया अच्छी तो लगती थी मुझे पर विक्की जिस सेंस में पूछ रहा था ना उसमें नहीं, सोलह साल का था यार मैं, मुझे खुद नहीं पता था कि ये ‘प्यार’, ‘व्यार’ होता क्या है इसलिए मैंने विक्की को मना तो कर दिया पर वो फिर भी उसे ‘भाभी’ बुलाता था, उसके सामने नहीं, उसके सामने बुलाता तो वो बहुत मारती उसे, सिर्फ मेरे सामने बुलाता था और ये सुनते ही मेरे गालों पे डिम्पल आ जाते थे।
15 September 2007
रिया का बर्थडे था उस दिन, अब देखिये किसी लड़के का बर्थडे है ना तो आप अमूमन उसे देख के बता नहीं पाएँगे मतलब वो वही मुड़ी चुड़ी सी टीशर्ट पहना होगा, दाढ़ी आती है तो बढ़ी हुई होगी पर लड़कियों के लिए ये बर्थडे वर्थडे बहुत स्पेशल होता है, एकदम सज सँवर के आएँगी और इतनी फोटो खिचवाएंगी कि बगल गाँव में भी पता चल जाएगा कि आज इस तोता परी लड़की का हैप्पी बर्थडे है, सब लड़कियाँ तो नहीं पर रिया तो ऐसी ही थी…
बड़ी छोटी छोटी बातों पे खुश हो जाती थी वो,
कि बस उसकी कोई अच्छी सी फोटो खींच दो
वो पहली बार कोचिंग में सलवार सूट पहन के आयी थी, माथे पे एक पतली सी काले रंग की बिंदी और बदन से आती महंगे पाउडर की खुशबु, ये जो लफ्ज़ ‘खूबसूरत’ होता है ना, शायद उस दिन उसे अपना सही मतलब मिल गया था। मैंने पूरी कोशिश की कि उस दिन मैं रिया को देखकर रियेक्ट ना करूँ पर जब क्लास के बाद वो मेरे सामने से जा रही थी तो मुझे ऐसा लगा जैसे कि वो मेरे लिए ही इतना सज के आयी है, पहले तो मुझे लगा चलो जाने देते हैं पर फिर लगा कि शायद ये लम्हा फिर कभी नहीं आएगा तो मैं रिया के पीछे पीछे उसकी स्कूटी तक गया और जैसे ही वो मुड़ी, मैंने इंग्लिश में कह दिया, हैप्पी बर्थडे टू यू। रिया ने एक बड़ी सी स्माईल देते हुए कहा, निहाल ये तीसरी बार था आज, मैंने भी धीरे से कहा, यार आज मैं गिन नहीं रहा हूँ और मेरी इस बात पे वो ऐसे हँसने लगी कि मुझे शर्म आने लगी।
शाम के साढ़े सात बज रहे थे, हम दोनों इधर उधर देख के एक दूसरे को देख रहे थे और सिचुएशन थोड़ी ऑकवर्ड सी होने लगी थी मतलब अब क्या बात करें, मेरा जाने का मन नहीं था पर अगर घर पहुँचने में देर हो जाती तो मम्मी डाँटने लगतीं इसलिए मैंने उसे जाने दिया, वैसे भी बर्थडे था उसका, क्यों ही रूकती वो मेरे लिए। उस रात जब मैं घर पहुँचा तो देखा मोबाईल पे एक मैसेज आया है, “थैंक यू निहाल” और साथ में थे तीन मुस्कुराने वाले स्माईली, मैंने पलट के मैसेज किया, ये तीसरी बार था रिया और मेरे सोने से पहले उसका भी मैसेज आ गया, ‘आज मैं गिनना नहीं चाहती निहाल’।
किसी के लिए फील लाने में एक उम्र निकल जाती है,
किसी की एक छोटी सी बिंदी भी दिल ले जाती है
October 2007
ज़िन्दगी भी आर्गेनिक केमिस्ट्री की तरह होती जा रही थी, जैसे ही लगता था समझ में आने लगी है कुछ नया हो जाता था उसमें, एक दिन रिया कोचिंग नहीं आयी, मैं बार बार उसकी खाली सीट की तरफ देख ही रहा था कि इतने में हमारे मैथ्स टीचर बोले, ऐ काली टीशर्ट, ब्लैक बोर्ड पे आकर ये सवाल सॉल्व करो, मैंने और विक्की दोनों ने काली टीशर्ट पहनी थी, मेरी टीशर्ट ज़्यादा काली थी, मैं जैसे ही उसे सॉल्व करने के लिए अपनी सीट से उठा, एकदम से दरवाज़ा खुला, नीली कुर्ती, काली जीन्स, खुले बाल और चेहरे पे लेट आने का guilt, मुझे लगा इसको भी अभी आना था जब मेरी बेइज्जती होने वाली है।
सारे बच्चे मुझे देख रहे थे, डरे हुए थे वो, उन्हें डर था कि अगर मैं ये सवाल सॉल्व नहीं कर पाया तो सर हमें ना बुला लें, रिया मुझे देख रही थी, विक्की मुँह छुपा के मुझपे हँस रहा था और सर की आँखें मुझे ऐसे घूर रहीं थीं जैसे आज तो मैं गया, मैंने बहुत कोशिश की पर इतने प्रेशर में मुझसे कुछ हो ही नहीं पाया।
सर ने अपनी कमर पे हाथ रखते हुए कहा, माँ बाप इतना पैसा लगाते हैं अपने बच्चों की कोचिंग पे और ये बच्चे, मुझे उनकी इस बात पे उतनी गुस्सा नहीं आयी जितनी तब आयी जब उन्होंने रिया को बुला लिया, मुझे लगा कहीं इसने सॉल्व कर दिया तो क्या सोचेगी ये मेरे बारे में, कितना बड़ा गधा है ये, ऐसे तो बहुत डींगे हांकता है कि मुझे आईआईटी कानपुर जाना है और ये देखो, मैथ्स भी नहीं आती है इसे।
रिया अपनी सीट से उठी, सारे बच्चे साँसे थामकर अब रिया को देख रहे थे, वो सब भी उस दिन दुर्योधन की तरह सोच रहे थे कि ये सूर्यास्त क्यों नहीं हो रहा है, खैर रिया जैसे ही बोर्ड पे पहुँची सर के अंदर अपने आप ही ममता जाग गयी, बेटा बेटा कह कर वो उसकी हेल्प करने लगे और फिर वो हुआ जो नहीं होना चाहिए था, सेकंड लास्ट स्टेप पे ही उन्होंने उसकी ओर ऊँगली दिखाते हुए कहा, ये लड़की, ये लड़की निकालेगी आईआईटी, पूरी क्लास रिया के लिए ताली बजाने लगी और इसी के साथ जैसे मेरे सीने पे दुःख का पहाड़ टूट पड़ा।
मैं बहुत दुखी था, जब मैंने एक भी समोसा नहीं खाया तो शाहिद ने अपने चटनी वाले हाथों को मेरे कंधे पे रख कर कहा, भाई अगर रिया उस सवाल को सॉल्व नहीं कर पाती तो क्या तुम उसे judge करते कि वो बेवकूफ है, नहीं ना, तो फिर तुम खुद को क्यों judge कर रहे हो यार, समझदार आदमी तेज़ आदमी से चिढ़ता नहीं, सीखता है।
बड़ी सही बात कही थी शाहिद ने उस दिन, ‘समझदार आदमी तेज़ आदमी से चिढ़ता नहीं, सीखता है’, थोड़ा वक़्त लगा पर मैं फाईनली इस छोटी सी बात से आगे बढ़ गया, कुछ दिनों में स्कूल में exams शुरू होने वाले थे तो अब मेरे दिमाग में बस दो ही चीज़ें चलती थीं, एक तो उसमें नंबर अच्छे लाने हैं और दूसरा रिया के मैसेज का इंतज़ार, जब भी मेरा मोबाईल बजता था तो दिल में एक तरंग सी उठती थी कि ये उसका गुड नाईट वाला मैसेज होगा, पता नहीं क्यों पर अब ऐसा लग रहा था कि विक्की ने रिया को लेकर मुझसे जो सवाल पूछा था, वक़्र्त आ गया था उसका जवाब देने का……
एक सदी गुज़र गयी थी जिसको फ़र्क ना पड़ा,
फिर धड़क रहा है ज़ोर से, एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा
2. कुछ कुछ होता है…
 
कुछ ही दिनों में दीवाली आने वाली थी पर जब भी रिया मेरे सामने आती थी तो मुझे लगता था कि आलरेडी आ गयी है मतलब मैं जब भी क्लास में घुसता था ना तो सबसे पहले मेरी नज़र उसकी सीट पे जाती थी, वो दिख जाती थी तो लगता था कुछ पूरा हो गया, नहीं दिखती थी तो फिर इंतज़ार रहता था कि अब जब भी वो दरवाज़ा खुलेगा ना, तो वो आयी होगी।
खैर जब भी दीवाली आती थी तो हमारे घर में हमेशा बात चलती थी कि इस बार धनतेरस पे क्या लिया जाएगा, मम्मी सोने के झुमके कहती थीं, पापा कटोरी चम्मच ले के आ जाते थे, झुमके पापा अगली बार कह के टाल जाते थे, मम्मी भी मुँह फुला के मान जाती थीं और शायद ये भी प्यार है, समझना एक दूसरे को, एक दूसरे की परिस्थिति को, मुझे पता नहीं क्यों रिया भी अपनी मम्मी की तरह लगती थी, समझ जाती थी वो मेरी हर बात को इसलिए दीवाली वाली शाम मैंने उसे डरते डरते मैसेज कर ही दिया कि…
हम तो इंतज़ार में हैं कि आये तस्वीरें तुम्हारी,
वो किसी रंगोली के बगल में नीली साड़ी वाली
मैंने डर डर के इसलिए लिखा क्योंकि मुझे खुद नहीं पता था कि वो रियेक्ट कैसे करेगी मतलब एक ओर तो मैं इंतज़ार करता था कि वो आये पर वो जितना भी टाईम लगाती थी ना कोचिंग के उस दरवाज़े से अपनी सीट तक आने में मैं पूरे टाईम शाहिद से कुछ बेफिज़ूल की बात करने लगता था, मैं नहीं चाहता था कि मैं उससे नज़रें मिलाऊँ, रिया के साथ उसकी एक दोस्त सुनैना भी रहती थी तो उसकी वजह से थोड़ा और अजीब लगता था कि कहीं दोनों बहनें मिलकर मेरा मज़ाक ना उड़ाने लगें कि देखो फिर से आ गया मजनू, डर इस बात का लगता था कि कहीं ये सब एकतरफा तो नहीं है…
वो इश्क़ नहीं हमसे कारोबार कर रहे थे,
कि जब फुर्सत में थे तभी प्यार कर रहे थे
मैंने जब विक्की से ये सब कहा तो वो मुझसे कहने लगा अरे इतना डरते क्यों हो यार तुम, जाकर कह दो ना सीधे सीधे, विक्की की आजतक कोई गर्लफ्रेंड नहीं रही थी पर वो समझाता तो ऐसे था जैसे उसे सबकुछ पता है मतलब कभी कभी तो मुझे लगता था कि नहीं यार जाने देते हैं रिया को, फ़र्जी बवाल हो जाएगा पर साली ये जो उम्मीद होती है ना कि एक दिन आप एक फोटो लगाएँगे जिसमें वो लड़की आपके बगल में खड़ी होगी, पीछे आपके सारे कमीने दोस्त सूट पहन के ताली बजा रहे होंगे, मम्मी पापा गेंदे का फूल फेंक रहे होंगे और इन सबके बीच में आप उस शर्माती हुई लड़की के हाथ में अंगूठी पहना रहे होंगे, ये उम्मीद साली जैसे रोक रोक के कहती थी कि चलो कह देते हैं ना, पर कहें कैसे।
विक्की ने मुझसे कहा ऐसे सीधे सीधे मत कहना उससे, एक बार थोड़ी हिंट दे दो उसे, मैंने कहा वो कैसे तो वो बोला अब से जब भी तुम्हारी उससे बात होती है तो तुम सीधे उसकी आँखों में देखना, मैंने कहा ये क्या बेवकूफी है तो वो बोला लड़की चंट है, समझ जाएगी। शाहिद हम दोनों की बातें सुनकर बोला, अबे तुम दोनों आईआईटी की कोचिंग में पढ़ने आते हो कि प्यार करने पर उस दिन शाहिद के ज्ञान के लिए मेरे पास बस एक ही जवाब था, फिर कभी।
शाम के साढ़े छे बज रहे थे, विक्की की सारी बातें मेरे दिमाग में सेट हो चुकी थीं, उसने कहा था अब डरना नहीं है पर जब मैंने देखा कि वो फ़ोन पे किसी से बार बार सॉरी कह रहा है तो मुझे लगा मैंने गलत आदमी की बात तो नहीं सुन ली कि इतने में रिया पलटी, मुझे इस बार भी समझ में नहीं आया कि वो किसे देख रही है, कहीं वो शाहिद को तो नहीं देखती है, मनु शर्मा साला हर बार किसी और का प्यार ले जाता था पर मैं फिर भी उसे देखने लगा, मैं ही हर बार क्यों नज़रें झुकाऊं, हटाना है तो वो हटाए, मैं देख रहा था उसे, एक सेकंड, दो सेकंड, तीन सेकंड, दिल धड़कता भी है ये मैंने पढ़ा बहुत पहले था पर लग अब उसे देख के रहा था और इतने में पता नहीं क्या हुआ कि वो एकदम से सर झुका के वापस मुड़ गयी।
मैंने पलट के फिर उसकी तरफ नहीं देखा, मुझे अब शाहिद की बातें याद आने लगी थीं कि इतने में हमारे फिजिक्स सर क्लास में आ गए और गुटका खाते खाते बोले, बच्चों आज सरप्राइज टेस्ट, जब भी उनका पढ़ाने का मन नहीं करता था सरप्राइज टेस्ट ले लिया करते थे। उन्होंने पांच सवाल दिए, मैंने चालीस मिनट में कर दिए और बाहर जाकर विक्की का वेट करने लगा, बाहर थोड़ी ठंड थी, कुछ लोग अभी भी दीवाली वाले पटाखे फोड़ रहे थे, हवा में फूटते हुए रॉकेट को देखकर मुझे मज़ा आ ही रहा था कि इतने में रिया नीचे आ गयी और सिचुएशन इस बार सच में बड़ी ऑकवर्ड हो गयी थी, इतनी कि…
कोई कहता नहीं है पर चलो हम अपना बताते हैं,
कि उनसे बात भी करनी है पर हम भाव भी खाते हैं
वो अपनी स्कूटी के पास जाकर खड़ी हो गयी, शायद सुनैना का इंतज़ार कर रही थी, मुझे एक बार तो लगा जा के सॉरी बोल दूँ क्या पर फिर लगा, छोड़ो, अब ऐसा भी क्या कर दिया मैंने पर शायद वो पहली बार था जब मेरे और रिया के बीच में सबकुछ नार्मल नहीं था। मैं जानबूझ के इधर उधर देखने लगा और हर बार इधर से उधर करने के बीच में जल्दी से उसे देख लेता था, गर्दन में दर्द होने लगा था मेरे कि इतने में मैंने देखा कि वो भी देख रही है मुझे, लगातार…
बड़ा अजब सा था मगर ये तुमसे इश्क़ जो हुआ,
कि जब लगा था सब ख़तम, मुझे ये फिर से हो गया
पहली बार प्यार होने और पहली बार फेल होने की फीलिंग ही कुछ और होती है और वो फीलिंग अब मुझे आने लगी थी, मैं खुश था और इतने में बाकी बच्चे भी नीचे आ गए, मैंने ख़ुशी के मारे विक्की को गले लगा लिया, ख़ुशी के मारे मैं सुनैना को भी गले लगाना चाहता था पर तुम पागल हो क्या निहाल शर्मा कहते हुए वो रिया के साथ चली तो गयी, पर रिया जाते जाते भी मुस्कुरा रही थी। कुछ चीज़ें ना imperfect होती हैं फिर ही अच्छी लगती हैं मतलब मैं अपने मोहल्ले का सबसे गुड लुकिंग लड़का नहीं था, रिया मेरे स्कूल की सबसे तेज़ लड़की नहीं थी पर फिर भी जब उसकी आँखें मेरी बातों पे हँसती थीं ना तो कुछ होता था और ये जो ‘कुछ’ था ना, ये उस परफेक्शन से कहीं अच्छा था जो हम ज़िन्दगी भर खोजते रहते हैं।
उस रात मुझे नींद नहीं आयी, रात के दो बज रहे थे, मैं ये सब सोच ही रहा था कि इतने में मेरे पापा रूम में आ गए और बोले अभी तक सोये नहीं तुम, उनकी इस बात पे मुझे ‘कहो ना प्यार है’ का वो डायलॉग याद गया, Don’t ask me dad I am in love, पर मैंने ऐसा कहा नहीं, मिडिल क्लास फैमिलीज़ में लोग अपने प्यार के बारे में घर पर तब तक नहीं बताते हैं जब तक खुद पकड़े नहीं जाते हैं, पापा ने लाईट बंद कर दी और फिर मैं भी कम्बल में ये सोचते सोचते सो गया कि……
ये करवटें भी मेरी, ये बेवजह नहीं हैं,
कि कुछ है तो मेरे दिल में, जो अब तक कहा नहीं है
अगले दिन जब मैंने ये सारी बातें विक्की को बतायीं तो उसने कहा, देखना इसके बाद या तो वो खुद ही आ के तुमसे बात करेगी या फिर बात ही खत्म हो जाएगी। मैंने सहम के कहा, भाई अगर बात खत्म हो गयी तो, तो उसने मुझे घूरते हुए कहा, साले तुम आईआईटी की कोचिंग में पढ़ने आते हो कि प्यार करने और उसकी इस बात पे शाहिद और वो इतना हँसे होंगे ना मुझपर कि मेरी शक्ल देखने लायक हो गयी थी।
अगले कुछ दिन तक मैंने इतना एट्टीट्यूड दिखाया कि एक बार तो सुनैना भी सोचने लगी होगी कि क्या हो गया है इस शर्मा के बच्चे को, बहरहाल जब कुछ दिनों तक चीज़ें बड़ी फॉर्मल सी रहीं तो mid-term exams से ठीक चार दिन पहले रिया ने एकदम से कोचिंग के बाद मुझसे आकर कहा, निहाल मुझे तुमसे कुछ बात करनी है, थोड़ा टाईम है तुम्हारे पास, मैंने पूरे टशन में कहा, देर हो रही है लेकिन बताओ, उसने कहा देर हो रही है तो कोई बात नहीं तो मैंने भी जल्दी से कहा, अरे नहीं नहीं बताओ।
मैं और रिया साईकल स्टैंड के पास खड़े थे, रिया ने leather जैकेट पहनी हुई थी, असली थी या नकली पता नहीं पर सुन्दर लग रही थी वो, मैंने पूछा क्या हुआ तो उसने कहा, तुम्हें क्या हुआ है निहाल, मैंने धीरे से कहा, कुछ भी तो नहीं तो उसने जैसे मुझे डाँटते हुए कहा, नहीं कुछ तो हुआ है, क्या मैंने कुछ किया है और उसकी इस बात पे मैंने धीरे से कहा…
हमने 7 किरदार PDF । 7 Kirdaar PDF Book Free में डाउनलोड करने के लिए लिंक निचे दिया है , जहाँ से आप आसानी से PDF अपने मोबाइल और कंप्यूटर में Save कर सकते है। इस क़िताब का साइज 29 MB है और कुल पेजों की संख्या 230 है। इस PDF की भाषा हिंदी है। इस पुस्तक के लेखक   नितीश ओझा / Nitish Ojha   हैं। यह बिलकुल मुफ्त है और आपको इसे डाउनलोड करने के लिए कोई भी चार्ज नहीं देना होगा। यह किताब PDF में अच्छी quality में है जिससे आपको पढ़ने में कोई दिक्कत नहीं आएगी। आशा करते है कि आपको हमारी यह कोशिश पसंद आएगी और आप अपने परिवार और दोस्तों के साथ 7 किरदार PDF । 7 Kirdaar को जरूर शेयर करेंगे। धन्यवाद।।
Q. 7 किरदार PDF । 7 Kirdaar किताब के लेखक कौन है?
Answer.   नितीश ओझा / Nitish Ojha  
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