आप खुद ही बेस्ट हैं /Aap Khud Hi Best Hain PDF Download Free Hindi Book by Anupam Kher

पुस्तक का विवरण (Description of Book of आप खुद ही बेस्ट हैं / Aap Khud Hi Best Hain PDF Download) :-

नाम 📖आप खुद ही बेस्ट हैं / Aap Khud Hi Best Hain PDF Download
लेखक 🖊️
आकार 9.1 MB
कुल पृष्ठ164
भाषाHindi
श्रेणी,
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हमें सही मार्ग पर बढ़ने के लिए अपना क्रोध; अहं; असत्यता; छलावा—सब छोड़ना होगा। इन दुर्गुणों को छोड़ते हुए हम स्वयं के अधिक निकट आ जाते हैं। इस तरह हम उसे वापस जगाते और जलाते हैं जो हमारे अंदर था; लेकिन लंबे समय तक गलत बोझ एकत्रित करने से जो दफन हो गया था।
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हमारा मस्तिष्क भी एक सूटकेस की तरह ही है। कभी-न-कभी यह निर्णय लेना होगा कि आपको क्या आगे ले जाना है और क्या छोड़ना है। आपको अपने मन के सूटकेस से अतिरिक्‍त भार हटाने की जरूरत है। प्रतिशोध; कड़वी यादों; चिंताओं और नकारात्मक विचारों का बोझ त्यागने की आवश्यकता है और सामानवाले सूटकेस की तरह; आपके दिमाग में मौजूद विचार भी यह दरशाएँगे कि आपका व्यक्‍तित्व किस प्रकार का है।
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आशा हमें हमेशा आगे बढ़ते रहने के लिए प्रेरित करती है। यहाँ तक कि बुरे समय में भी आशा ही हमें जिलाए रखती है। आशा हमें एक बेहतर कल में विश्‍वास करने के लिए प्रेरित करती है और आशा ही हमें सभी मुश्किलों का सामना करने के लिए हिम्मत देती है।
—इसी पुस्तक से

प्रख्यात सिने कलाकार और रंगकर्मी अनुपम खेर के व्यापक अनुभव का निचोड़ है यह पुस्तक। कुल पचास अध्यायों में उन्होंने जीवन के सभी रंगों को समेट लिया है इस अमृतघट में। आपके भीतर छिपी आपकी अच्छाइयों; सद‍्गुण और सत्वृत्ति को उजागर करने का विनम्र प्रयास है यह पुस्तक; जिसे पढ़कर आपको लगेगा—आप खुद ही Best हैं।

 

पुस्तक का कुछ अंश

अनुक्रम
आमुख
आभार
1. हम सब दु:खी हैं
2. अपने आप को जानें, अपने व्यक्तित्व को स्वीकारें
3. क्रोध पर नियंत्रण
4. असंतोष एक बीमारी है
5. अपना विश्लेषण करें
6. तुलना दु:ख का कारण है
7. विचारों पर नियंत्रण
8. परिवर्तन का नियम
9. अधूरे रिश्ते
10. खुशी की तलाश
11. अनासक्त रहें
12. पुनर्विचार करें और सीखें
13. वर्तमान में जीएँ और अतीत को विस्मृत करें
14. मनन अपने आप को समझने में मदद करता है
15. प्रेरणा महत्वपूर्ण है
16. अहं को नष्ट करें
17. खुद पर भी हँसना सीखें
18. भीतरी शक्ति को उन्मुक्त करें
19. अपनी कद्र करें
20. जीवन को नया रूप दें
21. कहानियों में मौजूद ज्ञान
22. परिचित उदासियों से निपटना
23. कड़वाहट को मिटाती है क्षमा
24. क्या प्रेम और अनासक्ति एक साथ हो सकते हैं?
25. नए युग के गुरुओं से पुराना ज्ञान
26. अतिरिक्त बोझ को हटाएँ
27. मित्र जीवन को बेहतर बनाते हैं
28. डर का सामना करें और उससे लड़ें
29. वर्जनाओं से अपने आप को सीमित न होने दें
30. परिवर्तन से न डरें
31. बच्चों को दादा-दादी की जरूरत होती है
32. आशा का दामन न छोड़ें
33. एक अच्छी कहानी हमारा जीवन बदल सकती है
34. एक मुसकराहट तनाव को दूर कर सकती है
35. खुशियों के आड़े आतीं छोटी-छोटी बातें
36. अपनी असली ताकत पहचानें
37. परिवर्तन को स्वीकार करें, परंतु बुद्धिमजा और गरिमा के साथ
38. भय हमारी इंद्रियों को सुन्न कर देता है
39. भय को जाने दें
40. प्रसन्नता प्रेरणादायी है
41. अपने आप को खोजें
42. अपने रिश्तों का महत्व पहचानें
43. अलग-अलग लोक-संगीत के लिए अलग-अलग थाप
44. मोह-बंधन से मुक्त हों
45. विफलता में सफलता निहित है
46. मित्रता को समय और स्पेस दें
47. परिवर्तन को अपनाना
48. जो आप आज कर सकते हैं, उसे कल पर न टालें
49. जीवन के शुरुआती सबक स्थायी प्रभाव छोड़ते हैं
50. जीवन और मृत्यु से जूझते हुए
पुनश्च

आमुख

क अभिनेता के रूप में, जिसके खाते में 450 से अधिक फिल्में हैं, मुझे दुनिया की सैर करने और विविध प्रकार के कामों में लगे सैकड़ों व्यक्तियों से मिलने का अवसर मिला, जिनमें राष्ट्रपति से लेकर आम आदमी; खरबपति से लेकर दरिद्र तक शामिल थे। मेरे लिए यह बहुत मायने रखता है, क्योंकि मुझे लोगों से मिलनाजुलना पसंद है। उनका विश्लेषण करना भी मुझे बहुत रोचक काम लगता है।
असल में, मुझे लगता है कि मुझमें लोगों का विश्लेषण करने की क्षमता है। जब मैं उनसे बात करता हूँ, तो कभी-कभी सोचता हूँ कि वे कैसा जीवन जी रहे होंगे, किस प्रकार की पृष्ठभूमि से आए होंगे, उनका परिवार कैसा होगा और क्या चीज उन्हें कामयाबी दिलाती है? निश्चित रूप से एक पेशेवर अभिनेता के रूप में मेरे व्यवसाय ने मुझे इस प्रक्रिया ने स्वयं को माँजने में मदद की है, क्योंकि अपने चरित्र को समझना और उसके अंदर घुसना आपके प्रदर्शन को अधिक विश्वसनीय बनाता है?
परंतु मेरे लिए, दूसरों के विश्लेषण पर बात खत्म नहीं होती। मैंने लगातार खुद का विश्लेषण और अपने आप को नए रूप में सामने लाने का प्रयास किया है। आप 50 फिल्मों में किसी चरित्र को, जैसे पिता का चरित्र, एक ही तरीके से नहीं निभा सकते। आपको भिन्न होना होगा और अपने आप को नया रूप देना होगा। और वह प्रक्रिया तभी शुरू होती है, जब आप अपने आप को फिर से खोजते हैं।
मेरे लिए खुद को खोजने की वह प्रक्रिया तब शुरू हुई, जब कुछ वर्ष पहले मैं अपने नाटक 'कुछ भी हो सकता है' की योजना बना रहा था। यदि आप मेरी फिल्मों की संख्या देखें, तो मैं एक बहुत कामयाब अभिनेता था। मुझे मिली आलोचकों की सराहना और मेरे हिस्से में आए पुरस्कारों को देखें, तो वे मुझे एक बेहतर अभिनेता ही प्रमाणित करते हैं।
शिमला में एक अवर श्रेणी लिपिक (लोअर डिविजन क्लर्क) के परिवार में पले, सपने देखनेवाले एक लड़के के रूप में, मैंने अपनी कल्पना से कहीं अधिक व्याति और पैसा हासिल किया था। और फिर, जैसा कि हममें से अधिकतर के साथ होता है, सपनों ने मुझे अभिभूत कर लिया। मुझे ऐसा लगा कि मेरे पास जादुई शक्ति है और कुछ भी गलत नहीं हो सकता। एक दशक पहले के चलन के मुताबिक मैंने भी इस उद्योग के लिए 'सॉक्टवेयर' बनाने के लिए एक विशाल प्रोडक्शन हाउस स्थापित कर लिया।
आरंभ में, मेरे पास काफी कामयाब टेलीविजन कार्यक्रम थे। उनसे संतुष्ट न होकर, मैंने और भी विविधता लाने का फैसला किया। मैं इवेंट मैनेजमेंट के क्षेत्र में चला गया, क्योंकि उन दिनों वह सबसे आधुनिक व्यवसाय था और कई बड़े कार्यक्रमों का आयोजन किया।
वही हुआ जो होना था। जल्दी ही, बहुत सारे प्रोडक्शनों और कार्यक्रमों, और हमारे व्यवसाय के अभिशाप खराब वित्तीय प्रबंधन के चलते आर्थिक स्थिति खराब हो गई। मुझे ऋणदाताओं के बहुत से मुकदमों का सामना करना पड़ा। तभी मैंने अपने आप को पुन: खोजा और अपना उपचार स्वयं करना शुरू किया। मैंने अपने आप से पूछा—
• मैं महान् क्यों बनना चाहता था?
• मैं किस चीज की तलाश में था? पैसा या खुशी? या सिर्फ अपनी विरोधी प्रोडक्शन कंपनी से बड़ी हेडलाइन?
इस प्रक्रिया में मुझे बहुत से सच मेरे सामने आए। और मैंने कई सिद्धांत बनाए, जो अपने एक्टिंग स्कूल 'ऐक्टर प्रिपेयर्स' (यह स्कूल मैंने 2005 में मुंबई में शुरू किया था) में लागू किए। आज, 'ऐक्टर प्रिपेयर्स' चंडीगढ़, अहमदाबाद और लंदन में भी चल रहा है। यह लोगों को अपनी तलाश करना सिखाता है।
इस प्रकार मैंने 'अपने भीतर परिवर्तन' कॉन्सेप्ट की रचना की। इस खंड में मैं इस लाइफ कोचिंग प्रोग्राम के कुछ पहलुओं की चर्चा करूँगा। यह छोटी सी पुस्तक लिखने का मेरा उद्देश्य हमारे जीवन में बदलाव लाना है, जो बेहतरी के लिए हों।
—अनुपम खेर

आभार

ह पुस्तक तैयार करने में कई वर्ष लगे, जो जीवन से तालमेल बिठाने और जीने की कला के बारे में है। यह उन लोगों से मिलने और सीखने के अनुभवों के बिना संभव नहीं होता, जिनका इतने सालों के दौरान मुझसे सामना हुआ है।
मैंने हमेशा यह माना है, और अब तो इस धारणा को शोध द्वारा पुष्ट भी किया जा चुका है, कि जीवन में हमारा भावनात्मक चरित्र हमारे बचपन में ही जुड़ जाता है। शेष जीवन हम सिर्फ उसे माँजते रहते हैं, जो पहले से हमारे अंदर होता है। इसलिए, मैं अपने माता-पिता, अपने पिता पुष्करनाथ और अपनी माता दुलारी को धन्यवाद देना चाहता हूँ कि उन्होंने मुझे एक बहुत बढिय़ा भावनात्मक आधार प्रदान किया, जिस पर मैं अपना जीवन निर्मित कर सकता था। विशेष रूप से, मेरे पिता हमेशा सकारात्मकता प्रदर्शित करते थे; वह एक साधारण व्यक्ति हैं, परंतु मैंने जीवन को जितना अधिक देखा है, उतना ही अधिक यह महसूस किया है कि वह साधारण होते हुए असाधारण हैं। मेरे शुरुआती वर्षों में मेरे आज्ञाकारी छोटे भाई राजू, और मेरे सबसे करीबी मित्र विजय सहगल की भूमिकाएँ भी बहुत महत्वपूर्ण रहीं। विजय सहगल अब भी मेरे लिए सरलता के मानदंड हैं।
लेखन के हर कार्य में लेखक के करीबी लोगों को उसका खामियाजा भुगतना पड़ता है। इस मामले में मेरी पत्नी किरण का मुझमें विश्वास मेरे कई विचारों का आधार रहा है। इसके बाद मुंबई में मानसिक रूप से अस्वस्थ बच्चों के स्कूल, दिलखुश स्पेशल स्कूल की स्वर्गीय सिस्टर मारिया डोलोरेस का आभार व्यक्त करना चाहता हूँ। अविश्वास से भरी दुनिया में, उन्होंने मुझे अजनबियों पर भरोसा करने का महत्व सिखाया। मैं वह सबक नहीं भूल सकता!
हालाँकि मैं उन सबका ऋणी हूँ, जिनसे मैं इस पुस्तक के लेखन के दौरान मिला और जिनसे प्रेरित हुआ, परंतु द डेक्कन क्रॉनिकल के प्रकाशकों और उसके मुख्य संपादक ए.टी. जयंती के सहयोग और मदद के बिना यह पुस्तक संभव नहीं हो पाती। मैं महेश भट्ट का आभारी हूँ, जिन्होंने सारांश (1984) में मुझे मेरा पहला ब्रेक दिया, जिसके बिना मैं वह नहीं बन पाता, जो आज हूँ, साथ ही मैं प्रीतिश नंदी का शुक्रिया अदा करना चाहता हूँ, जिन्होंने मुझे निर्भय होना सिखाया।
मेरे विचारों को स्पष्टता देने के लिए शैलेष कोठारी को विशेष रूप से धन्यवाद देना चाहता हूँ। इस पुस्तक में शामिल किए गए खूबसूरत चित्रों के लिए फोटोग्राफर तारिणी चोपड़ा, जेसी रॉबर्टसन, राघव खट्टर और प्रेम कुमार सिंह तथा आवरण चित्र के लिए अतुल कासबेकर को धन्यवाद देना चाहता हूँ। नोनी चावला को धन्यवाद कैसे कहें? उन्होंने मेरे सामने हजारों फोटोग्राफों का अपना पूरा भंडार रख दिया और बस कहा—'आप जो भी चाहें, चुन लें। यह सब आपके हैं।'

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1. हम सब दु:खी हैं
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पनी महान् कृति 'अन्ना केरेनिना' में महान् रूसी रहस्यवादी और उपन्यासकार लियो टॉल्सटॉय लिखते हैं : '...हर दु:खी परिवार एक अलग रूप में दु:खी है।' जी हाँ, यह सच है कि कोई भी सुखी नहीं है। हम सब दु:खी हैं, परंतु अलग-अलग रूप में। हमारी अप्रसन्नता की जड़ें अपनी समझ में कई विफलताओं से उपजती हैं—विफल रिश्ते; संतान न होना; पर्याप्‍तप्‍त सुविधाएँ जुटा पाने में नाकामयाबी; सुंदर न होना। ऐसे लाखों कारण हो सकते हैं।
आपने ध्यान दिया होगा कि मैंने 'अपनी समझ में' का प्रयोग किया है। वह इसलिए, क्योंकि ये चीजें वास्तव में हमारी विफलताएँ नहीं हैं। हम दूसरों के दृष्टिकोण से उन्हें विफलता समझते हैं। मैं ऐसी धारणा के प्रभावों पर बाद में आऊँगा। यहाँ मैं इस व्यापक रूप से प्रचलित धारणा की चर्चा करना चाहता हूँ कि खूब सारा पैसा हमारी सभी विफलताओं को समाप्त कर देगा। दुर्भाग्यवश, ऐसा नहीं है।

ऐसा नहीं है कि बिल गेट्स और वॉरेन बफे इस धरती के सबसे सुखी व्यक्ति हैं। गेट्स और बफे की चिंता यह नहीं होगी कि उनके अगले समय के भोजन का प्रबंध कैसे होगा, परंतु अन्य मनुष्यों की तरह वे भी अपने बच्चों, व्यक्तिगत संबंधों और अनगिनत अन्य चीजों की चिंता से ग्रस्त हैं। वे अपनी भारी प्रतिष्ठा की सुरक्षा को लेकर भी काफी चिंतित रहते हैं। क्योंकि जब आप अपने क्षेत्र में अग्रणी होते हैं, तो आगे बढऩे के लिए कोई जगह नहीं होती। आपको सिर्फ उस जगह बने रहने के लिए सारा समय संघर्ष करना होता है, चूँकि बहुत से प्रतिद्वंद्वी आपसे आगे बढऩे के लिए जबरदस्त मेहनत कर रहे होते हैं। अपने देश की बात करें, तो मुझे यकीन है कि रतन टाटा या मुकेश अंबानी और उनके छोटे भाई अनिल के साथ भी ऐसा ही होता होगा।
मुझे याद आता है कि 80 के दशक में दुनिया के सबसे अमीर लोगों की सूची में लगातार ब्रुनई के सुल्तान, हस्सनल बुल्किया का नाम सबसे ऊपर चल रहा था। आज भी उनके सोने से मढ़े बोइंग 747,1178 कमरोंवाले उनके शानदार महल और लक्जरी तथा हाई-परफॉर्मेंस कारों के सबसे बड़े संग्रह की तसवीरों से वेब भरा हुआ है।
परंतु सबसे बड़ा प्रश्न यह है—क्या वे सुखी हैं? नहीं। उनके भाई ने उनसे धोखे से 15 अरब डॉलर हड़प लिये और भाई के गलत व्यावसायिक सौदों में भी कई अरब डॉलरों का नुकसान हुआ। आखिर में सुल्तान परिवार ने उसे बेदखल कर दिया।
आप कह सकते हैं कि बु्रनई के सुल्तान का मामला एक असाधारण मामला था। तो, मैं आपको एक व्यक्तिगत उदाहरण देता हूँ। अभिनेता बनने की इच्छा रखनेवाले एक अकिंचन व्यक्ति से मैं एक प्रभावशाली व्यक्ति बन गया, जिसने अपनी कल्पना से भी कहीं अधिक पैसे कमाए। फिर, अपने कॅरियर के चरम के दौरान, मैं लगभग दिवालिया हो गया। और मैं आपको बता सकता हूँ, कि पैसा अपने साथ प्रसन्नता लेकर नहीं आया।
यही कारण है कि आध्यात्मिक गुरुओं के दर्शन की इच्छा रखनेवाले लोगों में हमेशा अमीर और प्रसिद्ध लोग होते हैं। इसलिए, पैसा या अकूत दौलत सुख की ओर नहीं ले जाती, जैसा कि जॉन स्टेनबेक के श्रेष्ठ लघु उपन्यास द पर्ल— जिसे द अमेरिकन ड्रीम की एक आलोचना माना जाता है—के पाठकों ने बहुत पहले समझ लिया था।
जिस तरह पैसा सुख का रास्ता नहीं है, उसी तरह आपको एक कृत्रिम संतुष्टि देनेवाली चीजें भी हैं, जो पैसे से खरीदी जा सकती हैं। अपने मूड को सही करने के लिए अमूमन खूब खरीदारी करने का नुस्खा बताया जाता है; इसके लिए एक नया शब्द—रिटेल थेरेपी गढ़ा गया है। या आपको चमत्कारी सुंदरता प्रदान करने के लिए सौंदर्य उपचार की नई दुनिया। दुर्भाग्यवश, इन उपचारों के लाभ कुछ ही समय में गायब हो जाते हैं और आप फिर उसी अवसाद में पहुँच जाते हैं, जहाँ थे।
हम यह महसूस करना शुरू कर रहे हैं कि खुशी सिर्फ बाहरी स्रोतों से नहीं आ सकती। सबसे पहले हमें अपने आप को जानने और अपने अस्तित्व में रहने की बातें सीखनी होंगी।
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2. अपने आप को जानें, अपने व्यक्तित्व को स्वीकारें
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म भले सुख को प्राप्‍त करने का सजग प्रयास न करें, परंतु हम सभी अपने जीवन में दु:ख को कम करने की चाहत रखते हैं। और जब हम ऐसा करते हैं, हम स्वाभाविक रूप से ध्यान देते हैं कि हमारी प्रसन्नता का अनुपात बढ़ जाता है।
हम अप्रसन्नता को यदि समाप्त नहीं, तो कम कैसे कर सकते हैं? एक पुरानी कहावत है कि सभी सड़कें रोम की तरफ जाती हैं, जिसका अर्थ है कि एक ही लक्ष्य के कई रास्ते हैं। यह अपने जीवन में अप्रसन्नता को कम करने पर भी लागू होता है, जो इस बात पर निर्भर करता है कि हमें सबसे अधिक दु:ख किस चीज से होता है।
परंतु रास्ता जो भी हो, बुनियादी चीज, जो सुकरात के सिद्धांत जितनी पुरानी है, सबसे पहले अपने आप को जानना है। यह भले ही एक पुरानी ग्रीक कहावत हो, परंतु इसकी प्रासंगिकता हमेशा रहेगी। एक प्रकार से, हम जो हैं, वह इसलिए हैं, क्योंकि हम नहीं जानते कि हम कौन हैं।
हम अकसर ऐसे युवाओं से मिलते हैं जो अपनी किशोरावस्था के आखिरी दौर में भी अपने कॅरियर विकल्पों के बारे में अस्पष्ट होते हैं। या ऐसे युवा जो इस सोच में होते हैं कि विपरीत लिंग के अपने मित्रों में से किसके साथ जीवन बिताएँ। ऐसा क्यों होता है? क्योंकि वे बहुत अनिश्चित होते हैं। वे असल में खुद को नहीं जानते।
बाहर के देशों में अपने आप को ढूँढऩे के लिए इधर-उधर भटकना और भी फैशनेबल है। बहुत से लोग पेचीदा नए सत्यों की तलाश में भारत आते हैं, परंतु सत्य उतना ही सरल होता है जितना कि सास्वत। जैसे कि अपने आप को जानना।
मैंने बहुत से लोगों को पूरा जीवन क्रोध में बिताते देखा है, हमारे समाज की सडऩ, हमारे बुनियादी ढाँचे की कमियों, जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में व्यापक भ्रष्टाचार, हमारी राजनीतिक व्यवस्था की निराशा के खिलाफ भड़कते हुए देखा है, जिन कठिन चीजों को वे करने में सक्षम नहीं हैं या खुश नहीं हैं। वे अपने माता-पिता या मित्रों से प्रभावित होते हैं। दूसरे लोग कोई कॅरियर अपना लेते हैं या शादी कर लेते हैं, क्योंकि वे अब भी खुद को नहीं जानते या इतने दभ्बू हैं कि बेहतर नहीं जान सकते। इसका नतीजा होता है, जीवन भर का दु:ख।
इसलिए यदि आपके जीवन में ऐसी वजह हैं जो आपको दु:खी करती हैं, तो अभी से अपने आप को परखना शुरू कर दीजिए। एक एकांत कोने में, अकेले बैठें और सोचें कि कौन सी चीज आपको दु:खी करती है? मानसिक रूप से अपने सामने एक दर्पण रखें और फिर ईमानदारी से उन सभी अवयवों की सूची बनाएँ, जो उस दु:ख में योगदान करनेवाले कारक हो सकते हैं।



क्या आपका किशोर बेटा पढ़ाई में कम नंबर लाते हुए आपको दु:खी कर रहा है? हो सकता है आप पिछले कुछ समय में उसके पीछे पड़े रहे हों, इसलिए वह आपके रोब का इस तरह विरोध कर रहा हो। उसे अपने साथ कॉफी के लिए बाहर ले जाएँ और उससे बात करने की कोशिश करें। अगली बार से उससे फटकार की भाषा में बात न करें और देखें कि इससे कोई फर्क पड़ता है या नहीं।
क्या आपका बॉस आपसे कभी संतुष्ट नहीं होता? उसे कौन सी चीज असंतुष्ट करती है? क्या वह आपका ढीला काम या समय पर काम न पूरा करना हो सकता है? सोचिए!
थोड़ा सा आत्म-विश्लेषण आपको आत्म-अन्वेषण की राह पर काफी दूर ले जाएगा। एक बार यह प्रक्रिया आरंभ होने पर, आपको दु:ख महसूस होने की बजाय अपनी अधिकांश समस्याओं के जवाब मिलने शुरू हो जाएँगे। और फिर, एक बार खुद को जान लेने के पश्चात, अगले कदम के लिए तैयार हो जाएँ, जो है, अपने व्यक्तित्व को स्वीकारना।
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एक पुरानी कहावत है—'यदि हमारे जीवन में कोई कष्ट नहीं होता है, तो हम उसे पैदा कर लेते हैं।' जी, हाँ। मैंने अकसर ध्यान दिया है कि हममें से कई लोग किसी और के व्यक्तित्व को ओढ़ते हुए या उसकी तरह व्यवहार करते हुए अपने आप को दु:खी करते हैं। या फिर इस तरह व्यवहार करते हैं, जो हमारे विचार में कामयाब लोग करते हैं। ऐसा संशोधित व्यवहार अनिवार्य रूप से आत्मविश्वास की कमी से उपजता है; इस धारणा से उत्पन्न होता है कि हम निकृष्ट हैं, जबकि कुछ अन्य हमसे श्रेष्ठ हैं।
दूसरों की अच्छी और सकारात्मक चीजों का अनुकरण करने में कोई बुराई नहीं है; बल्कि यह एक बहुत अच्छा गुण है, क्योंकि यह दरशाता है कि हम स्वीकार कर रहे हैं कि हम संपूर्ण नहीं हैं। यह निश्चित रूप से उनसे बेहतर है, जो कई लोग मानते हैं कि वे संपूर्ण हैं और सारी कमियाँ दूसरों में होती हैं! परंतु दूसरों के व्यवहार या हमारे हिसाब से आदर्श व्यवहार से प्रभावित होने की एक सीमा होती है।
जब मैं कहता हूँ कि हम किसी दूसरे व्यक्ति की तरह होने की कोशिश कर रहे हैं, तो सिर्फ दूसरों के लहजे में बोलना या कोई फैशनेबल भाषा बोलना या एक 'कूल' जीवनशैली जीना ही इस रुग्णता की पहचान नहीं है। यह अधिक गहरी बात है और इसमें पूरी तरह एक नया व्यक्तित्व ओढऩे का प्रयास शामिल है, जैसा कि हम सोचते हैं कि हमें होना चाहिए।
फिर, हम एक मुखौटा लगा लेते हैं। उदाहरण के लिए, शुरू में, हम दफ़्तर में एक मुखौटा ओढ़कर बॉस की तरह होने की कोशिश करते हैं। फिर हम बहुत सी भूमिकाएँ निभाने के लिए कई मुखौटे लगाते हैं। एक जीवनसाथी के लिए, एक बच्चों के लिए, और एक पड़ोसियों के लिए। फिर मुखौटा महत्वपूर्ण हो जाता है और हम नहीं जान पाते कि हम वास्तव में कौन हैं।
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मुझे फ्रेंच नाटककार जीन एनुअल के श्रेष्ठ नाटक 'बेकेट' की एक अमर पंक्ति याद आती है, जिसमें थॉमस बेकेट वायु की दशा बतानेवाले यंत्र के रूप में मौजूद एक दरबारी से कहते हैं—''मुझे उम्मीद है कि जब तुम्हारा सिर घूमना रुकेगा, तो तुम्हारा चेहरा सामने होगा!'' इसमें अप्रसन्नता के बीज निहित हैं, क्योंकि चाहे हम कितनी भी कोशिश कर लें, एक दिन अपने घूमते सिरों से थक जाएँगे।
मैं एक उदाहरण से स्पष्ट करता हूँ। कॉरपोरेट जगत् में कोई व्यक्ति जितना ऊपर जाता है, यह धारणा अधिक दृढ़ होती जाती है कि हमें संयमित रहना चाहिए और कभी मुसकराना नहीं चाहिए। मुसकराना छिछोरापन माना जाता है; पाषाण की तरह हाव-भाव बनाए रखना आदर्श समझा जाता है, मानो कॉरपोरेशन की सारी चिंता हमारे कंधों पर हो। उदाहरण के लिए, मैंने बिजनेस क्लास उड़ानों में जब भी हवाई यात्रा की है, उन सब में अपने सह-यात्रियों को भावहीन दिखने की कोशिश करते देखा है; सभी को पिनस्ट्राइप्स पहने; सभी को आर्थिक समाचार-पत्र पढ़ते, सभी न मुसकराते और साथी यात्रियों से पूरी तरह बेखबर देखा है और जैसे ही विमान उतरता है, मान लीजिए दिल्ली में, तो वह अपने समाचार-पत्र को तह करेगा, आपकी ओर एक फीकी मुसकराहट देगा और पूछेगा—'क्या आप दिल्ली जा रहे हैं?'
यदि वह अपने व्यक्तित्व में रहे, मुसकराए और खुशमिजाज रहे तो? और यदि हर कोई ऐसा करे तो? केबिन निश्चित रूप से एक अधिक खुशनुमा जगह बन जाएगी।
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3. क्रोध पर नियंत्रण
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जैसा कि मैंने आमुख में उल्लेख किया है, यह छोटी सी पुस्तक लिखने के पीछे मेरा उद्देश्य हमारे जीवन में बेहतरी के लिए परिवर्तन लाना है। और आगे की ओर जाने का एकमात्र रास्ता अपनी कमियों को पहचानना और उनका समाधान ढूँढऩा है। पिछले अध्याय में, मैंने किसी दूसरे की तरह बनने की इच्छा रखनेवाले लोगों को दु:खी करनेवाले पक्ष पर चर्चा की थी, जो शायद आत्मविश्वास की कमी से उत्पन्न होता है। इस अध्याय में, मैं आज के समय में बहुत बड़ी सभ्या में लोगों को परेशान करनेवाली एक और बड़ी समस्या—क्रोध के बारे में बात करना चाहूँगा।
हम सब जानते हैं कि क्रोध हमारी शारीरिक प्रणाली पर क्या कहर ढाता है, इसलिए मैं उसे दुहराना नहीं चाहूँगा। वह उच्च रक्तचाप से लेकर हृदयाघात और कोरोनरी रोगों तक का कारण है। फिर भी आज बड़ी सभ्या में लोग क्रोध के दौरों से पीडि़त हैं।
हम अपने गुस्से पर काबू कैसे पा सकते हैं? बहुत सारी किताबों में बहुत सी चीजें दी गई हैं, जिनमें गहरी साँस लेने से लेकर दस तक गिनना और ध्यान, वगैरह शामिल हैं। इन सभी के अपने लाभ हैं, परंतु समस्या फिर भी बनी रहती है। तो फिर हमें क्या करना चाहिए?



चलिए इस विषय को वैज्ञानिक रूप से देखते हैं। जब आप सामान्य स्थिति में होते हैं, तो अपनी साँस पर ध्यान दीजिए। आप पाएँगे कि आपकी साँस सधी हुई और लयबद्ध है। अब उस समय अपने आप पर नजर डालिए, जब आपको क्रोध आना आरंभ होता है। आप पाएँगे कि आपकी साँस उथली हो जाती है और उसका अंतराल कम हो जाता है। इसलिए क्रोध आने पर उस पर काबू पाने का एक स्पष्ट तरीका है, गहरी साँस लेना और हलकी साँसों को आने से रोकना।
आप कहेंगे कि इस मंत्र में कुछ नया नहीं है। लेकिन हमें छाती में साँस नहीं लेनी है, जैसा कि हम सभी करते हैं। सही तकनीक, जिस में हमारे योगियों ने हजारों वर्ष पहले महारत हासिल कर ली थी और आज भी योग विद्यालयों में सिखाई जाती है, अपने पेट में गहरी साँस लेना है।



अपने पश्चिमीकृत समाज में, हमारी सभ्यात 'उथली' साँस लेनेवालों की सभ्यता बन गई है। जैसा कि हमें स्कूल में अपने पी.टी. (फिजिकल ट्रेनिंग) क्लास में सिखाया जाता था, सही मुद्रा है 'सीना बाहर, पेट अंदर'। इसलिए, हम साँस लेते समय अपने फेफड़ों के सिर्फ मध्य और ऊपरी भाग का इस्तेमाल करते हैं। अब सुनिए कि विशेषज्ञ क्या कहते हैं। वाशिंगटन डी.सी. में सेंटर फॉर माइंड/बॉडी मेडिसिन के जेत्स जॉर्डन के अनुसार, ''जब आप वायु को नीचे फेफड़ों के निचले भाग में लाते हैं, जहाँ ऑक्सीजन एक्सचेंज सबसे प्रभावी होता है, तो सबकुछ बदल जाता है। धड़कन धीमी हो जाती है, रक्तचाप कम हो जाता है, मांसपेशियाँ शिथिल हो जाती हैं, व्यग्रता कम हो जाती है और मन शांत हो जाता है।''
ऐसा सोचनेवाले जॉर्डन अकेले नहीं हैं। बहुत से पश्चिमी शोधकर्ता उनके विचारों से सहमत हैं और गहरी साँस लेने की सही तकनीकी में काफी लाभ देख रहे हैं।
और यदि आपको अब भी संदेह है, तो मेरा सुझाव है कि आप एक शिशु को साँस लेते देखें और आप उसके पेट को ऊपर और नीचे जाते देखेंगे, इसी तरह हमारे पेट को भी करना चाहिए।
एक और पुराना तरीका है, जिसमें थोड़ा सुधार करने से क्रोध पर काबू पाने में मदद मिल सकती है। दस तक न गिनें, पचास से उलटा गिनें। यह आपके मस्तिष्क के तर्कवाले हिस्से को अतार्किक हिस्से पर हावी होने के लिए प्रेरित करता है, जब आप क्रोध के प्रवाह को तोड़ते हुए सत्या पर ध्यान केंद्रित करते हैं। इसलिए, अगली बार जब भी आप खुद पर से नियंत्रण खोने लगें, उलटा गिनना शुरू कर दें और सही तरीके से गहरी साँस लें।



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असंतोष एक बीमारी है
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जैसा कि मैंने अध्याय 1 में उल्लेख किया था, हम सभी अलग-अलग कोटि के दु:खों से ग्रस्त असंतुष्ट लोग हैं। असंतोष एक बीमारी की तरह है। यदि उसका उपचार न किया जाए, तो वह बिगड़ती जाती है।
निश्चित रूप से हर किसी के पास असंतोष के ढेरों कारण होते हैं; परंतु उससे भी अधिक ऐसे कारण होते हैं कि उन्हें असंतुष्ट क्यों नहीं होना चाहिए। इसी बात में 'सकारात्मक मानदंड' (पॉजिटिव बेंचमार्किंग) का एहसास निहित है।
मैं स्पष्ट करता हूँ कि सकारात्मक मानदंड से मेरा क्या तात्पर्य है। आप किसी भी सुबह उठने के बाद अपनी परेशानियों से निराशा महसूस कर सकते हैं। आपकी नौकरानी ने कहा है कि उसे छुट्टी चाहिए, आपके ड्राइवर ने फोन किया है कि वह देर से आएगा, इसलिए आप किटी पार्टी में अपनी सहेलियों से मिलने से पहले हेयरड्रेसर के साथ अपनी महत्वपूर्ण अप्वाइंटमेंट के लिए लेट हो जाएँगी, आप अपनी बेटी के नखरे से परेशान हैं और आपके पति, हमेशा की तरह, शहर में नहीं हैं।
या, यदि आप पुरुष हैं, तो आप आज सुबह की प्रेजेंटेशन को लेकर तनाव में होंगे, क्योंकि आपके डिवीजन के सेल्स लक्ष्य से काफी दूर हैं, आपके ड्राइवर का बेटा बीमार है, इसलिए आपको खुद गाड़ी चलाकर ऑफिस जाना है, आपका एक्जीक्यूटिव असिस्टेंट बेकार हो रहा है, क्योंकि वह इस शाम की क्लाइंट मीटिंग के लिए स्लाइड तैयार करना भूल गया है और आपको लगता है कि आपका परचेज मैनेजर चुपचाप रिश्वत खा रहा है। यह सूची बढ़ती जाती है...जी, हाँ, इन दोनों के पास असंतुष्ट होने के पर्याप्‍त कारण हैं या वह ऐसा सोचते हैं।
लेकिन एक पल के लिए सोचते हैं। कितने भारतीयों के पास नौकरानियाँ और ड्राइवर होते हैं? हममें से कितने भाग्यशाली लोगों के पास कार होती है? हममें से कितनों के पास चाहे तनावपूर्ण, लेकिन बढिय़ा वेतनवाली नौकरियाँ हैं? हममें से कितनों को किटी पार्टियों में आमंत्रित किया जाता है? जिस क्षण आप इस प्रकार के प्रश्न पूछेंगे, उभर आपके दिमाग में गूँजेगा और थोड़ा धीरज दे जाएगा। अपरिहार्य सच यह है कि आप एक छोटे और अत्यंत खुशकिस्मत अल्पसंख्यक वर्ग से संबंध रखते हैं और आपके पास असंतोष का कोई कारण नहीं है।
इस प्रक्रिया में हमने क्या किया है? हमने अपने आप को अपने देश के लाखों पुरुषों और महिलाओं के मुकाबले रखा, जिनके पास बिजली नहीं है, घर नहीं है, जो अकसर भूखे पेट सोते हैं और जिनके पास एक अनिश्चित भविष्य के लिए कोई बचत नहीं है।
जब हम सोचते हैं कि हम कितने खुशकिस्मत हैं, यह सकारात्मक मानदंड स्थापित करना है। निश्चित रूप से, हम अपने आप को पॉश इलाकों, जैसे नई दिल्ली में गोल्फ लिंक्स या हैदराबाद में बंजारा हिल्स या मुंबई में मालाबार हिल्स में रहनेवाले अपने मित्रों के मुकाबले भी रख सकते हैं। और हम इस बात की बुराई, नुक्ताचीनी कर सकते हैं, आह भर सकते हैं कि उनके पास कितना अधिक है। ऐसे विचार, दुर्भाग्यवश, भौतिकवाद और विनाश की ओर ले जाते हैं, जैसा कि पश्चिम ने बहुत पहले समझ लिया है।
मैं एक बहुत सुंदर विचार आपके साथ बाँटना चाहता हूँ, जिसके बारे में मुझे कई वर्ष पहले पता चला और जो मेरे साथ बना रहा है : मैं हमेशा एक जोड़ी जूतों के लिए तरसता रहा, जब तक कि मैंने बिना पैरवाला व्यक्ति नहीं देखा था। इस सादगीपूर्ण विचार का चित्र हमेशा मेरे साथ रहा है। एक गांधीवादी विचार भी है : 'यहाँ दुनिया की जरूरतों के लिए पर्याप्‍त धन है, परंतु वह दुनिया के लालच के लिए पर्याप्‍तप्‍त नहीं है।'
अगली बार जब आप असंतुष्ट हों, इन पहलुओं पर विचार करें और आपको जवाब मिल जाएँगे।
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अपना विश्लेषण करें
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पको ऐसे लोगों से मिलने के लिए बहुत दूर नहीं जाना होगा जिनके पास ऐसे दुखद किस्से होते हैं कि जीवन ने किस प्रकार उनके साथ अन्याय किया है और कैसे वे परिस्थितियों के शिकार रहे हैं। सफलता के पीछे भागती और सफलता की पूजा करनेवाली दुनिया में ऐसा प्रत्याशित है।



मैं ऐसे शराबियों से मिला हूँ, जो इसलिए अपने पीने को उचित ठहराते हैं, क्योंकि उनकी पत्नियाँ उनके पीछे पड़ी रहती हैं। परंतु उनके परिवारों से बात करने पर आपको कहानी का दूसरा पक्ष सुनने को मिलता है। जहाँ निर्णय व्यक्तिपरक होता है, वहाँ मामला अधिक पेचीदा हो जाता है।
दु:ख उन लोगों तक सीमित नहीं है, जो सफल या अमीर नहीं हो पाए। मैं पाता हूँ कि दु:ख सबको बराबरी पर ला देता है। अमीर व्यवसायी पाता है कि उसका पुत्र नशीले पदार्थों का अत्यस्त हो चुका है। अपने काम के लिए दुनिया भर में घूमनेवाला एक्जीक्यूटिव अपनी पत्नी को बेवफा पाता है। उद्योगपति पाता है कि उसके प्रतिस्पर्धी उससे आगे निकल रहे हैं, उससे अधिक और तेजी से तरक्की कर रहे हैं।
सफल या कम सफल, इन सभी लोगों के लिए एक सरल मंत्र है। आपकी खुशी आपके हाथों में है। एक प्रकार से, यह मंत्र इस बात का विश्लेषण करना है कि आपके पास सकारात्मक चीजें क्या हैं, उनका अधिकतम लाभ आप किस प्रकार उठा सकते हैं और किस प्रकार आप अपनी कमजोरियों को दबा सकते हैं। कॉरपोरेट भाषा में इसे स्वोट (एस.डब्ल्यू.ओ.टी.) विश्लेषण कहते हैं, जिसका विस्तार है, स्ट्रेंथ (मजबूत पक्ष), वीकनेस (कमजोरियाँ), अपोरचुनिटी (अवसर) और थ्रेट (खतरे)।
यह आलोचनात्मक मूल्यांकन पर्याप्‍त नहीं है। आपको उसे अपनी महत्वाकांक्षा के मुकाबले रखना होगा। इसमें ध्यान रखने की बात है। हम सभी की कुछ महत्वाकांक्षाएँ हैं, परंतु हमें यह देखना चाहिए कि वे हमारे स्वोट विश्लेषण के अनुरूप हैं या नहीं। हम निश्चित रूप से अपनी मजबूतियों का लाभ उठा सकते हैं और जिस क्षेत्र में हम महारत रखते हैं, उसमें और मेहनत कर सकते हैं, परंतु हमें अपने अतिशयोक्तिपूर्ण आकलन में बह नहीं जाना चाहिए।
यदि मैं 5 फीट 8 इंच लंबा हूँ और 6 फीट का होना चाहता हूँ, तो मैं स्वयं अपने आप को दु:खी कर रहा हूँ। यदि मेरी आवाज मेंढक जैसी है, और मैं एक गजल गायक बनना चाहता हूँ तो मैं स्वयं अप्रसन्नता की ओर कदम बढ़ा रहा हूँ। यदि मेरा चेहरा-मोहरा औसत है और मैं सिनेमा का स्टार बनना चाहता हूँ, तो मुझे नहीं लगता कि यह सफलता की राह है, जब तक कि मैं अद्भुत अभिनय क्षमता से संपन्न नहीं हूँ।



मेरा मंत्र बहुत ही सरल लग सकता है—मेरी यह बात याद रखिए कि बहुत से महान् सत्य खोजने की आवश्यकता नहीं है—परंतु यह आपको खुद को ढूँढऩे में मदद करेगा। वह है, यदि आप स्वयं के प्रति ईमानदार हैं। यदि आप दु:ख के भँवर में फँसे हैं, तो यह आपको पता लगाने में मदद करेगा कि आपसे कहाँ गलती हुई है और आपको किस प्रकार अपने आप को बदलना चाहिए।
एक्जीक्यूटिव और व्यवसायी को यह पता चल सकता है कि उनका दु:ख अपनी पत्नी और परिवार पर ध्यान न देने से उपजा है। उद्योगपति को यह फैसला करना होगा कि वह खुश रहना चाहता है या हमेशा अपने से ऊपर देखते रहकर दु:खी रहना चाहता है। हर किसी की खुशी या दु:ख अपने हाथ में है।
अमीर और वित्यात होने का प्रलोभन बहुत बड़ा होता है। एक कठोर और वास्तविक सत्य यह है कि हर कोई अमीर या प्रसिद्ध नहीं हो सकता। एक अच्छा शिक्षक, जौहरी, डिजाइनर और वकील बनने में भी खुशी तलाशी जा सकती है। इस राह पर हम जितनी जल्दी चल पड़ेंगे, हमारे लिए उतना ही बेहतर होगा।
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Q. आप खुद ही बेस्ट हैं / Aap Khud Hi Best Hain किताब के लेखक कौन है?
Answer.   अनुपम खेर / Anupam Kher  
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