भली लड़कियाँ, बुरी लड़कियाँ PDF | Bhali Ladkiyan, Buri Ladkiyan PDF Download Free by Anu Singh Choudhary

पुस्तक का विवरण (Description of Book) :-

नाम 📖भली लड़कियाँ, बुरी लड़कियाँ PDF | Bhali Ladkiyan, Buri Ladkiyan
लेखक 🖊️
आकार 2 MB
कुल पृष्ठ140
भाषाHindi
श्रेणी
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पूजा प्रकाश बिहार के एक छोटे से शहर से अपने सपनों का सूटकेस उठाए दिल्ली चली आती है। अठारह साल की उम्र में ही उसकी आँखों ने पुलिस अफ़सर बनने का मुश्किल सपना तो देख लिया है, लेकिन दिल्ली की रोज़मर्रा की ज़िन्दगी के संघर्ष उन सपनीली आँखों की किरकिरी बन जाते हैं। ‘भली लड़कियाँ, बुरी लड़कियाँ’ की बुनावट की नींव में रोज़-रोज़ की यही जद्दोज़ेहद है, जिसका सामना दिल्ली शहर में रहनेवाली हर लड़की किसी न किसी रूप में करती है। यह उपन्यास जवानी की दहलीज़ पर क़दम रखती पूजा प्रकाश के प्रेम में पड़ने, धोखे खाने, और उन धोखों से सबक लेते हुए अपने तथाकथित प्रेमी को सबक सिखाने की सतर्क चालें बुनने की कहानी बयाँ करता है।

यह कहानी जितनी पूजा की है, उतनी ही उसके साथ उसकी पीजी में रहनेवाली लड़कियों—मेघना सिम्ते, सैम तनेजा और देबजानी घोष की भी है। अलग-अलग परिवेशों और सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमियों से आईं ये लड़कियाँ किस तरह एक-दूसरे के साथ खड़ी होकर इस पुरुषवादी समाज के एक और हमले का मुक़ाबला करती हैं—‘भली लड़कियाँ, बुरी लड़कियाँ’ उसी की कहानी है।

 

पुस्तक का कुछ अंश

1.

पूजा प्रकाश दुनिया में कोई क्रांति नहीं लाना चाहती। लेकिन उम्र का तक़ाज़ा ही कहिए कि आज से नहीं बल्कि पीढिय़ों से जि़ंदगी के सालों में लगनेवाली अठारहवीं गिरह हमेशा बग़ावतों के नाम की ही होती है।
वैसे, अठारह की हुई नहीं थी अभी पूजा। चार-छह महीने बाक़ीथे। फिर भी ख़ुद को, और अपनी छोटी-सी दुनिया को, अपनी उम्र याद दिलाती फिरती।
‘‘याद है न! इस साल चार जुलाई को अठारह साल के हो जाएँगे हम अम्मा। वोट देंगे, पसंद की सरकार चुनेंगे। ड्राइविंग लाइसेंस लेंगे। चाहें तो शादी भी कर लें भाग के। समझी तुम... मेरी अम्मा रानी!’’
अम्मा रानी को चिढ़ाने के लिए इतनी ख़ुराक बहुत होती।
आपको बेशक पूजा प्रकाश की ऐसी बातों से जवाँ बलवे की ताज़ा ख़ुशबू आती हो, लेकिन पूजा का इरादा दुनिया में किसी क़िस्म के राजनीतिक या सामाजिक बदलाव लाने का बिल्कुल भी नहीं था।
अठारह साल की लड़की के लिए इससे भी बड़ी कई और लड़ाइयाँ होती हैं।
मिसाल के तौर पर, बारहवीं में जि़ले में नहीं तो कम-से-कम स्कूल में टॉपर की कुर्सी पर अपना क़ब्ज़ा बरकरार रखते हुए इतने नंबर तो ले ही आना कि दिल्ली विश्वविद्यालय के बेस्ट वुमेंस कॉलेज में कम-से-कम एडमिशन मिल जाए, हॉस्टल चाहे मिले न मिले।
मुज़फ़्फ़रपुर के डीएवी पब्लिक स्कूल में पढऩेवाली इस लड़की—पूजा प्रकाश—की ख़्वाहिशें इतनी ही छोटी और ‘विमेंस लिब’ की परिभाषा इतनी ही दीन-हीन थी। अपने मोहल्ले, क़स्बे और शहर की दहलीज़ पार कर पाना ही उसका सबसे अज़ीज़ ख़्वाब था। छोटे शहर की ये लड़की अपनी तलैया से निकलकर एक विशाल दरिया में समा जाना चाहती थी बस!
जानती थी कि ठहराव बाँधता है और बहाव उन्मुक्त करता है।

इसलिए महानगर के महासागर में समा जाने की अदम्य इच्छा लिए पूजा प्रकाश ने बारहवीं में अच्छे नंबर लाने के लिए अपना समस्त न्योछावर कर दिया। और उसकी साथिन बनीं पूजा की अम्मा रानी।
अम्मा और पूजा दादी-पोती ही नहीं थीं, एक-दूसरे के लिए सबकुछ थीं।
पूरे जवार में बेटी के पैदा होने पर बच्ची की माँ को कोसने और एक काला जामुन और एक रसगुल्ला बाँटकर किसी तरह छट्ठी की औपचारिकता कर देने का चलन था। लेकिन अम्मा के घर में तो उल्टी गंगा बहती थी।
सबसे छोटे बेटे की सबसे बड़ी संतान—यह लड़की—पैदा हुई तो अम्मा ने पूरे मोहल्ले का भोज-भात कराया और एक महीने तक अपने घर में सोहर गवाने का कार्यक्रम रखवाया। नाम भी बड़ा सोच-समझकर रखा। इतने पूजा-पाठ के बाद आई थी ओमप्रकाश की बेटी, इसलिए अम्मा ने नाम रख दिया—‘पूजा प्रकाश’।
सोहर के गीतों के मद्धम पड़ते ही अम्मा ने बेटे को अपना फ़ैसला भी सुना दिया, ‘‘दुलहिन सरकारी नौकरी नहीं छोड़ेगी। दुनियाभर का लोग जमीन बेच-बेच के घूस देता है, तब जाके एकठो परमामेन नौकरी लगता है। और हम इसका नौकरीये छोड़वा दें? तुमरा पोस्टिन जहाँ होता है उहाँ जाओ बबुआ। हम तुमरा जच्चा-बच्चा दुन्नो अकेले सँभाल लेंगे।’’
अम्मा ने जो कहा, वो किया।


बरियारपुर की उन्नीस बीघा ज़मीन बटाई पर देकर बोरिया-बिस्तर समेत वे मुज़फ़्फ़रपुर चली आईं। बेटा बिहार पुलिस में था। कभी इस पोस्टिंग कभी उस पोस्टिंग, कभी इस थाने कभी उस थाने की ख़ाक छानता था। सो, अम्मा के क़ाबिल बेटे और पूजा प्रकाश के समझदार पिता ने उसकी परवरिश में इतना योगदान दिया कि मुज़फ़्फ़रपुर में एक पक्का मकान बनवा दिया।
तीन महीने की बेटी को अपनी सास की गोद में सौंपकर पतोह पढ़ाते-पढ़ाते एक सरकारी स्कूल में प्रिंसिपल हो गई। बेटा भी दारोग़ा हो गया।
अम्मा ने कभी नहीं पूछा कि तुम दोनों आख़िर करते क्या हो कि न पूजा के पहले कोई बच्चा हुआ और न उसके बाद। अम्मा ने यह भी कभी नहीं पूछा कि पूजा को भूख लगेगी तो दाल-भात मीस के खिला दें कि रोटी-दूध सान लें। अम्मा ने यह तक नहीं पूछा कि बेटी के बाद तुम दोनों के बुढ़ापे का सहारा कौन होगा।
जो ख़ुद दूसरों का सहारा होता है, उसे बुढ़ापे की चिंता नहीं सताती।
बेटा और बहू अपना-अपना काम करते रहे, घर में भी और बाहर भी, और अम्मा ने अपनी सारी ऊर्जा पूजा में लगा दी। देयाद-गोतिया और मोहल्ले की औरतें बकती-झकती रहीं, कामकाजी कनिया की बेपरवाही के ख़िलाफ़ सास के कान भरने के उपाय सोचती रहीं और अम्मा मस्त अपने कान में एक चुलुआ कड़ुआ तेल डाले अपने मन की करती रहीं, पूजा को अपने तरीक़ेसे पालती रहीं।
अकेला बेटा कोतवाल ही रह गया, इस बात का बहुत अफ़सोस था अम्मा को। इसलिए पूजा बड़ी होने लगी तो अम्मा ने बड़ी तफ़सील और सोची-समझी योजना के तहत काम करते हुए उसके उर्वर दिमाग़ की ज़मीन पर अपनी पसंद के बीज डालने शुरू किए।

‘‘बाबू, तुमको पुलिस अफसर बनना है। बाबू, तुमको स्कूल में सबसे ज्यादा नंबर लाना है। बाबू, तुमपे जींसे-टॉप जँचता है, ई सलवार-फलवार मत पहना करो। बाबू, पुलिस अफसर बनने के लिए एक ठो एक्जाम देना होता है—यूपीएससी, और उसका सबसे अच्छा तैयारी दिल्ली में होता है। बाबू, तुमको तो दिल्लिए पढऩे जाना है। बाबू, जहिया अफसर बनोगी तहिया दुनिया को अपना कानी उँगली पर नचाओगी। बाबू, मरने से पहले लाल बत्ती गाड़ी पर चढऩे का मेरा एके ठो सपना है, पूरा कर दोगी न? बाबू, किरण बेदी बनोगी न?’’
पूरे हिंदुस्तान की दादियाँ अपनी पोतियों के लिए गुडिय़ा ख़रीदती हैं, उस गुडिय़ा के कपड़े सिलती हैं। अम्मा अपनी पोती के लिए बाज़ार से खिलौने वाली बंदूकें ख़रीदकर लातीं, उसे जीन्स और शर्ट पहनातीं, ख़ुद हज्जाम के पास बैठकर उसके बाल बॉयकट करवातीं। लीक से हटकर चलनेवाली लड़कियों की सारी कहानियाँ अम्मा अख़बार-पत्रिकाओं से चुनती चली जातीं और उनको एक फ़ाइल में सहेज-सहेजकर ऐसे रखतीं जैसे पूजा के बियाह का झाँपी-बक्सा सजा रही हों।
अम्मा की पूरी ताक़त अपनी पोती को ‘बाबू’ बनाने में लग गई। मम्मी कभी रसोई में या घर के किसी काम में पूजा की मदद माँगतीं तो सबसे ज़्यादा अम्मा नाराज़ होती थीं। ‘‘बाबू पढ़ रही है’’ कहतीं, और बाबू की पढ़ाई को और तत्परता से अगोरने में लग जातीं।
मम्मी के पास इस बात पर कुढऩे-चिढऩे के अलावा कोई रास्ता नहीं था। मम्मी के हिसाब से अगर पूजा को कोई बिगाड़ रहा था, उसका भविष्य तबाह कर रहा था तो वो थीं अम्मा!
पूजा को पहली बार पीरियड्स हुए तो अम्मा और मम्मी दोनों थीं घर पर। अम्मा सुन्न पड़ गईं और मम्मी ने मोर्चा सँभाल लिया। मम्मी ने पूजा को केयरफ्री का पैकेट देते हुए जब यह कहा कि अब ज़रा लड़का लोग टाइप कूदना-फाँदना कम कर दो तो अम्मा बिदक गईं!

‘‘महीना हुआ है। बीमारी नहीं हुआ है कोई। काहे लड़की को अलाय-बलाय सिखा रही हो?’’ मम्मी ने कोई जवाब नहीं दिया। उन्हें उस बात की तसल्ली थी कि अम्मा ने अपनी लाडली ‘बाबू’ को कम-से-कम लड़की तो माना!
पूजा ने भी अम्मा को कम ही निराश किया। अम्मा चार बजे उठाती रहीं तो पूजा भी उठती रही। अम्मा पढ़ाई के लिए उकसाती रहीं तो पूजा हमेशा अव्वल ही आती रही। अम्मा के साथ हिंदी के तीन अख़बार चाट जाने का यह फ़ायदा हुआ कि डिबेट और क्विज़, दोनों में पूरे मुज़फ़्फ़रपुर में पूजा प्रकाश को हरा सकने वाला कोई अम्मा का लाल पैदा न हो सका।
लेकिन टीनएज बड़ी ज़ालिम शय है। घर में फूट डलवा दे, दोस्तों के बीच दरार पैदा कर दे, अच्छे-भले शांतिप्रिय परिवार में कलह मचा दे! इसी कमबख़्त टीनएज ने पूजा और दादी के बीच पहली बार एक छोटी-सी खाई खींची थी। पहली बार इसी टीनएज के चक्कर में लड़ी थीं दोनों।
चौदह की थी पूजा। शरीर बदलने लगा था। चेहरे पर कील-मुँहासे आकर अपने निशान छोडऩे लगे थे। क्लास के लड़कों की नज़रें बदलने लगी थीं और लड़कियों की बात-बेबात झुकने लगी थीं।
आईने से दोस्ती बढऩे लगी थी। अम्मा के भृंगराज तेल की बास नाक को चुभने लगी थी। पूजा अब तन्हाई खोजती। अम्मा से कम बोलती और फ़ोन पर ज़्यादा रहती। किताबें अब भी पढ़ती पूजा, लेकिन अब उन किताबों के कवर रंगीन—बहुत रंगीन—होने लगे थे।

पूजा की पढ़ाई-लिखाई को लेकर अम्मा की अगली पंचवर्षीय योजना में पूजा का यह नया रंग-ढंग एकदम फ़िट नहीं बैठ रहा था। पोती तो हाथ से निकलती हुई लग ही रही थी, सपने के टूटने का डर भी सताने लगा था।
‘‘जबे देखो तबे सीसा के सामने खड़ी रहती है। मार कभी इ पट्टी, कभी उ पट्टी माँग फाड़-फाड़ के केस झाडऩे से कोई बड़ा आदमी बन गया होता तो कन्हैया हज्जाम का दोकान से सबसे जयादा अफसर सब निकलता। तुम्हरा इहे लच्छन रहा तो हो गया यूपीएसई,’’ अम्मा बड़बड़ातीं और पूजा पैर पटकती हुई रूठकर बाहर निकल जाती।
फिर घर में कई-कई दिनों तक शीतयुद्ध चलता। मम्मी को अपने स्कूल के बाक़ीतीन सौ बत्तीस बच्चों का भविष्य बनाने, इलेक्शन ड्यूटी निभाने और पटना शिक्षा विभाग की चौखट पर मत्था टेककर आने से फ़ुरसत ही कहाँ मिलती थी कि दोनों के बीच मध्यस्थता करतीं!
इसलिए दादी-पोती अपने-आप लड़तीं, अपने-आप उनका झगड़ा सुलझ जाता। इस बार भी वैसा ही एक ऐतिहासिक समझौता हो गया था दोनों के बीच।
अम्मा ने दो क़दम पीछे हटकर पूजा को जींस-पैंट से सलवार-कमीज़ और बॉयकट से ब्लंटकट पर उतर आने की इजाज़त देते हुए अपनी तरफ़ से पहली पहल की। पूजा ने भी अपने और अम्मा के कमरे में से ड्रेसिंग टेबल निकलवाकर स्टडी टेबल लगवाकर समझौते के बढ़े हुए हाथ को फ़ुर्ती से थाम लिया।
वैसे इस समझौते के पीछे एक बाहरी ताक़त का भी हाथ था।

पूजा प्रकाश की क्लास में अस्मिता अमृत नाम का एक नया एडमिशन क्या हुआ, पूजा की तो जि़ंदगी ही उलट-पुलट हो गई। मुज़फ़्फ़रपुर के डीएम अमृत आनंद की बेटी थी अस्मिता। क्लास के बाहर उसके पापा की लालबत्ती का रौब-दाब चलता और क्लास के भीतर उसके नंबरों का। पहली बार किसी ने पूजा प्रकाश के एकाधिकार को चुनौती दी थी।
हाफ़ ईयरली में अस्मिता बाज़ी मार ले गई और अँग्रेज़ी के तीन नंबरों से आगे निकल गई। उसने अपना बचपन पटना के नॉट्रेडेम में काटा था। अस्मिता क्लास में जवाब देती तो उसकी ज़ुबान से फूटने वाली बीबीसी-सीएनएननुमा अँग्रेज़ी पूजा की किताबी पब्लिक स्कूलनुमा अँग्रेज़ी पर हमेशा भारी पड़ती।
सारी टीचर्स अचानक अस्मिता की मुरीद हो गईं। लड़के पूजा के बजाय अस्मिता से डरने लगे, उसे तवज्जो देने लगे। लड़कियाँ कूद-कूदकर अपने नोट्स उससे शेयर करतीं। हद तो तब हो गई जब अस्मिता के बर्थडे के लिए क्लास में सबने पैसे जमा करके उसके लिए गिफ़्ट ख़रीदने का फ़ैसला किया!
ज़ाहिर है, पूजा ने क्लास के उस फ़ैसले का बायकॉट किया और घर लौटकर अम्मा से सुलह कर ली। उसने अपने लिए एक लघुकालिक और एक दीर्घकालिक लक्ष्य तय कर लिया—अस्मिता को फ़ाइनल एक्ज़ाम में पीछे छोड़कर सबसे ज़्यादा नंबर ले आने का, और यूपीएससी क्लियर करने का।
और इन दोनों लक्ष्यों की प्राप्ति अम्मा के सहयोग के बिना मुमकिन नहीं थी।
वैसे तो फ़ाइनल एक्ज़ाम के पहले ही अस्मिता के पापा का वापस पटना ट्रांसफ़र हो गया, लेकिन पूजा के दृढ़ निश्चय में कोई कमी नहीं आई। बीच-बीच में बग़ावत की आवाज़ उठती भी तो सिर्फ़ और सिर्फ़ अम्मा को चिढ़ाने की ख़ातिर। वरना अम्मा और पूजा की जि़ंदगी का मक़सद एक ही था—पूजा के ‘चलो दिल्ली’ अभियान पर सफलतापूर्वक कार्रवाई।
और इस तरह चार जुलाई 2016 के आते-आते पूजा प्रकाश की जि़ंदगी में तीन अहम घटनाएँ घट चुकी थीं: उसकी अठारहवीं सालगिरह यानी एडल्टहुड में प्रवेश, बारहवीं का रिज़ल्ट और मिरांडा हाउस में मैथ्स ऑनर्स में दाख़िला।

2.

‘‘कहाँ-कहाँ तक कोई तुमरे साथ जाएगा? अकेले निकलो और दुनिया जीत लो,’’ अम्मा ने यूँ कहा कि जैसे उन्हें अपनी पोती में साक्षात इंदिरा गांधी और इंदिरा नूई की रूह एक साथ दिखाई दे गई हो!
पापा हमेशा की तरह निर्विकार, निष्पक्ष रहे। घर की तीन औरतों के अटल फ़ैसले के बीच टाँग अड़ाने की कोशिश उन्होंने वैसे भी बहुत पहले ही त्याग दी थी। अपने एक सहयोगी के दिल्ली-प्रवासी बेटे का फ़ोन नंबर जुगाड़कर उन्होंने अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ ली।
और मम्मी ने हमेशा की तरह अपनी जि़म्मेदारी का निर्वहन करते हुए बेटी के लिए बैंक में एक अकाउंट खोला, उसके लिए एटीएम-कम-डेबिट कार्ड बनवाया। नए कपड़े, चप्पलें, यहाँ तक कि चक्केवाला सैमसोनाइट का बड़ा-सा सूटकेस भी ख़रीदा।
अम्मा के बस में जो था, वो उन्होंने किया। दिल्ली में रहनेवाली पुन्नू फुआ के नंबर का जुगाड़ कर उन्हें फ़ोन किया और पूजा को कुछ दिन अपने पास रख लेने की ताक़ीद दे डाली।
पुन्नू फुआ ने पूजा की मदद की हामी क्या भरी, सतुआ-ठेकुआ, मूढ़ी-चूड़ा समेत पूजा प्रकाश को उसकी मार्कशीट और बाक़ी के काग़ज़ात के साथ वैशाली एक्सप्रेस पर चढ़ा दिया गया। निपट अकेले।
पुन्नू फुआ पूजा के तीसरे नंबर वाले चचेरे बाबा की बेटी थीं। उनका जन्म, छट्ठी, कनछेदाई, पढऩा-लिखना, उठना-बैठना, यहाँ तक कि शादी-ब्याह सब बरियारपुर में हुआ। गाँव में। मुज़फ़्फरपुर तक आना भी होता तो मोती झील से होली-छठ का कपड़ा-लत्ता, जूता- चप्पल ख़रीदकर गाँव लौट जातीं पुन्नू फुआ। शहर से बहुत वास्ता था नहीं। लेकिन क़िस्मत देखिए कि ब्याह हुआ ऐसे लड़के से जो दिल्ली में काम करता था। सो बरियापुर से छलाँग लगाकर मुज़फ़्फरपुर को भी बाईपास करते हुए पुन्नू फुआ सीधे आ पहुँचीं सैयद नांगलोई।

नाम से बेशक आपको मुज़फ़्फरपुर-मुज़फ़्फरनगर का कोई एक गाँव लगता हो, लेकिन दिल्ली का ही एक इलाक़ा है सैयद नांगलोई। सैयद नांगलोई की तंग गलियाँ पश्चिम विहार के पॉश मीरा बाग़ के मुहाने पर खुलती हैं। रिंग रोड और पश्चिम विहार से दस-पंद्रह मिनट का रास्ता होगा यहाँ का, लेकिन सैयद नांगलोई के घने रास्ते पर चलते हुए दिल्ली वो दिल्ली नहीं होती जिसके बारे में इतिहास-भूगोल की किताबें हमें पढ़ाती रही हैं।
दूर-दूर तक सड़क के दोनों छोरों को घेरकर फल, सब्ज़ी, चप्पलें, कपड़े, बर्तन बेचते रेहड़ीवाले, और इन पर भिनभिनाती मक्खियाँ, डेंगू-चिकनगुनिया के मच्छर। धूल और मिट्टी। पसीना। रोते-कलपते बच्चे। दुकानदारों से मोल-तोल करतीं माँएँ। दिल्ली मिल्क स्कीम के बूथों के सामने लगी लाइनें। जाम लगाते, टेढ़े-मेढ़े चलते हुए अपने लिए रास्ते निकालते रिक्शेवाले। फ़िज़ाओं में घुली हुई बिस्किट की तीखी ख़ुशबू। नाले की बदबू। घरों के बाहर कपड़ों की कतरनों के ढेर।
अपने सेंट्रल आँगन में राजधानी होने के गुमान की परिधि से आगे बढ़ती हुई दिल्ली जितना ही गलियों, क़स्बों और मोहल्लों में पसरती जाती है उतना ही और हिंदुस्तान बनती चली जाती है।
ऑटो में जीपीएस की मदद से रास्ता तलाशती पूजा को लगा कि जैसे वो एक मुज़फ़्फरपुर से निकलकर दूसरे मुज़फ़्फरपुर में आ गिरी है। दुनिया के नक़्शेपर अब भी कई सारे ऐसे पते हैं जो जीपीएस के नियंत्रण से एकदम बाहर हैं। शहरों में होते हुए भी।

हारकर पूजा को पुन्नू फुआ को फ़ोन करना पड़ा। फूफा जी आ रहे थे लेने। पूजा सैयद नांगलोई के बस स्टॉप पर खड़ी होकर उनका इंतज़ार करती रही और सामने खड़े ऑटोवालों की कतारों को देखती रही। कितना अच्छा होता अगर वो इन्हीं में से एक को बिना किच-किच, बिना लड़ाई-झगड़े के नई दिल्ली रेलवे स्टेशन ले जा पाती। कितना अच्छा होता अगर आज के आज ही घरवापसी का टिकट मिल जाता! दिल्ली के साथ की जंग शुरू होने से पहले ही उसे हारे हुए सिपाही-सा महसूस होने लगा था। दिल्ली से परिचय के दो घंटे के भीतर ही पूजा ने तय कर लिया था कि उसे यह शहर बिल्कुल रास नहीं आने वाला।
अगर दिल्ली यही दुनिया थी, ऐसा ही कोई गंदा-सा एक शहर, तो उसे नहीं रहना था दिल्ली में। कम-से-कम घर पर अम्मा के हाथ का खाना, मम्मी का लाड़-प्यार और पापा के ओहदे का रौब तो मिलता। यहाँ करोड़-डेढ़ करोड़ की भीड़ में कहाँ गुम होती, कहाँ ढूँढ़ती ख़ुद को!
‘‘यहाँ हमलोग के एरिया में बहुत सारा छोटा-छोटा फैक्ट्री सब है। यू नो, कॉटेज इंडस्ट्री। बहुत बड़ा-बड़ा ब्रांड का कपड़ा-जूता, सब यहीं बनता है। नाइकी, रीबॉक... नाम सब तो सुनी ही होगी तुम?’’ पूजा का सूटकेस उठाकर साथ-साथ चलते जगदीप फूफा अपने आप लोकल टूरिस्ट गाइड की भूमिका में आ गए थे। सड़कें और गलियाँ इतनी ही गंदी थीं कि पूजा से चाहकर भी फूफा जी से यह न कहा गया कि सूटकेस में चक्का लगा है, चाहें तो डगराते हुए ले जा सकते हैं। और न यह कहने का मन किया कि नाइकी और रिबॉक के एक्सक्लूसिव शोरूम अब मुज़फ़्फरपुर में भी खुल गए हैं। ध्यान से देखें फूफा जी तो उसके जूतों पर का टिक मार्क भी देख पाएँगे। एकदम ओरिजनल है।
लेकिन धूप में छिछिया-छिछियाकर पूजा का मन एकदम खिन्न हो गया था। बोलने का तो क्या, रोने का भी अब जी नहीं था उसका।

पुन्नू फुआ का घर तो घर क्या था, कबूतरख़ाना ही था बस। सामने एक छोटी-सी बालकनी जिसे घेरकर उसे ड्राइंग रूम का दर्जा दे दिया गया था। शाम को ये कमरा पुन्नू फुआ के बच्चों का स्टडीरूम भी बन जाया करता था। भीतर की ओर एक और कमरा, जिसमें दो जने पलंग पर और दो फ़र्श पर तोशक-तकिया डालकर सो जाया करते थे। उससे भी अंदर जाकर एक ओर बाथरूम-लैट्रीन था और दूसरी ओर चार फ़ीट बाई छह फ़ीट की एक रसोई।
अपना सामान पलंग के नीचे एक कोने में खिसकाती पूजा को इतना गहरा अपराधबोध हुआ कि जैसे उसने कोई चोरी कर ली हो। फुआ की इस छोटी-सी हैरान-परेशान दुनिया में वो सेंध ही तो मार रही थी!
लेकिन पूजा करती भी तो क्या! पूरी दिल्ली में एक पुन्नू फुआ ही मिलीं अपनी। थीं तो गोतिया, लेकिन अपने परिवार की ही तो थीं। बारहवीं का रिज़ल्ट निकलते ही जब अम्मा ने सबसे पहले पुन्नू फुआ का फ़ोन घनघनाया तो फुआ ने भी एक बार नहीं कहा कि मेरे पास मत भेजो लड़की को, हमको दिक़्कत हो जाएगी।
पुन्नू फुआ ने बख़ुबी अपनी जि़म्मेदारी निभाई। सैयद नांगलोई के अपने उस एक कमरे के घर में पूजा को वो सारी सुख-सुविधाएँ और हिम्मत दी जो उनके वश में थी। समय पर खाना, पानी, बिस्तर और अपने गंतव्य तक पहुँचने के लिए बस और मेट्रो के रूट नंबर, और थोड़ा-सा हौसला—इसके अलावा एक लोकल गार्जियन के तौर पर पहली बार दिल्ली आई किसी लड़की को कोई और दे भी क्या सकता था!

बदले में पूजा भी भरसक पुन्नू फुआ का हाथ बँटाती। आलू-प्याज़ छीलना तो आता नहीं था, इसलिए उनके बच्चों को मैथ्स पढ़ाती और अपनी तरफ़ से कुछ योगदान दे पाने के संतोष के साथ सोती।
लेकिन फ़ॉर्म भरे जाने और एडमिशन हो पाने के बीच के वो दो हफ़्ते बहुत मुश्किल थे।
जून-जुलाई की दुपहरी में भटकते-भटकते, कभी दस से एक वाली, तो कभी चार से छह वाली ओपन हाउस काउंसिलिंग में एक ही तरह के सवाल बार-बार पूछते हुए और उनके रटे-रटाए जवाब बार-बार सुनते हुए पूजा को दो हफ़्तो की मशक़्कत के बाद यह समझ में आ गया कि दिल्ली यूनिवर्सिटी की इस रंग-बिरंगी दुनिया में बारहवीं का रिज़ल्ट ही एकमात्र शाश्वत सत्य है और बाक़ी सब माया है। यहाँ तक कि छात्र संगठनों के बैच लगाकर घूमते वॉलंटियर्स भी। इनकी असली पहचान भी इनके नंबरों से ही होती है, उन नंबरों से जो डीयू में उनकी औक़ात यानी कि उनका कॉलेज तय करते हैं। जिस यूनिवर्सिटी की तक़रीबन 54,000 सीटों के लिए देशभर से लाखों स्टूडेंट्स आते हैं वहाँ तो आर्ट और कॉमर्स पढऩेवाले बच्चों को भी चाल्र्स डार्विन की सर्वाइवल ऑफ़ द फ़िटेस्ट की थ्योरी बिना पढ़े ही समझ में आ जाती है।
अम्मा ने पूजा के दिमाग़ में सही बीज बोया था। अगर कुछ बनना है, कहीं तक पहुँचना है तो मुज़फ़्फरपुर का कुँइया छोड़कर दिल्ली जाना ही होगा। एक तरह से ये क्रांतिकारी ख़्याल ही था क्योंकि बरियारपुर की बेटियाँ अभी तक अपने घरों की ड्योढ़ी ब्याह के बाद ही पार करती रही थीं।

‘‘बाबू, मैं तो जब कॉलेज जाने लायक हुई तो बाबा दुआर पर लाठी लेकर बैठने लगे। नब्बे के दशक में पूरा देश दुनियाभर से जुड़ रहा था और एक ठो मैं थी कि वहीं गाँव के ओखल में अपना मुंडी कुटवा रही थी। लेकिन बड़की माई तो अद् भुत महिला हैं। देखो, तुमरी माँ को प्रिंसिपल बना दीं, तुमको दिल्ली भेज दीं,’’ पुन्नू फुआ एक उमस भरी शाम को तरकारी काटते-काटते अपने दिल का दुखड़ा पूजा से रो रही थीं।
और अपनी चचेरी भतीजी से अपना ग़म हल्का करते हुए फुआ ने एक और आख़िरी बात कही जिसे पूजा ने अपने मन में गाँठ बाँधकर रख ही लिया।
‘‘जितना चुप रहोगी, समझौता करोगी पूजा, दुनिया तुमको उतना दबाती जाएगी। दिल्ली शहर में जीना है तो अपना आवाज को ऊँचा रखना सीख लो। नहीं तो यहाँ लोग मदर डेयरी का बूथ पर भी तुमको धकियाते हुए लाइन तोड़कर निकल जाते हैं। खूँखार शहर है ये। यहाँ दबंगी बनके जीना पड़ता है... किसी से दबना नहीं है तुमको, समझी तुम? किसी से डरना भी नहीं है। दिल्ली की लड़की लोग किसी दूसरा ग्रह-व्रह से नहीं आई है।’’
इस तरह अपनी अठारहवीं सालगिरह के दिन पुन्नू फुआ के परम सहयोग से पूजा प्रकाश अपनी अम्मा के सपनों की बाल्टी-फ़ेहरिस्त यानी बकेट लिस्ट में एक और टिक लगा पाने में कामयाब हो गई।
पहली ही लिस्ट में पूजा का नाम आ गया था। बेस्ट ऑफ़ फ़ोर में। 96.75' आख़िर कम नंबर तो होते नहीं हैं! बस दिक़्क़त यह थी कि इतने नंबर में हॉस्टल मिल पाना नामुमकिन था।

और तब पापा काम आए। पूजा ने उस नंबर पर फ़ोन किया जो एक चिट में लिखकर पापा ने पूजा के हाथ में पाँच सौ रुपए के नोट के साथ थमाया था।
‘‘बिकास मिसरा स्पीकिंग।’’
‘‘हम पूजा बोल रहे हैं। मुजफ्फरपुर से हैं। भगवानपुर में रहते हैं। मेरे पापा...’’
‘‘अरे तुमको कौन नहीं जानता है भाई। स्कूल की टॉपर थीं तुम। तुमको याद नहीं होगा... हम भी तुम्हारे ही स्कूल में थे। तुमसे सीनियर थे थोड़ा, इसलिए शायद याद नहीं होगा। ओपी अंकल की बेटी हो न जी? वही पूजा न? पूजा प्रकाश।’’
‘‘अरे आप वो विकास भैया हैं? मोती झील वाले? लेकिन आप आईआईटी की तैयारी के लिए कोटा नहीं चले गए थे?’’
‘‘बड़ा खबर रखती हो लोग का?’’
‘‘हाँ... अम्मा हर रोज याद दिलाती थीं... मिसरा जी का बेटा देखो कोटा चला गया... अब तो इंजीनियर बन के लौटेगा। मुजफ्फरपुर से कितना स्टूडेंट बाहर निकल पाता है, आपको तो मालूम ही है विकास भैया। जो निकल जाता है उसका गाना गा-गाकर माँ-बाप लोग अपना बच्चा सब का जीना हराम किए रहता है। वैसे आप कोटा से दिल्ली कैसे पहुँच गए?’’
‘‘आईआईटी क्लियर कर नहीं सके तो पहुँच गए। सेंट स्टीफेंस में पढ़ रहे हैं। तुम्हारा एडमिशन कहाँ हुआ है?’’
‘‘स्टीफेंस में? तब तो भाई बहुत ज्यादा नंबर आया होगा आपको। हमको तो मिरांडा हाउस से ही सैटिस्फाई होना पड़ा है। कौन-सा सब्जेक्ट है आपका?’’

‘‘सारा बात अभी कर लोगी कि कुछ हमलोग के मुलाकात के लिए बचाकर भी रखोगी? और सुनो, पूजा... हमको भइया-उइया मत बोला करो यार! और सुनो, मेरा नाम बिकास है।’’
इस तरह ऐन मौक़े पर बात का रुख़ बदलते हुए बिकास मिसरा ने पूजा के एक उस बड़े सवाल से छुट्टी पा ली जो डीयू में एक साल गुज़ार लेने के बाद आज भी उसके साथ ढलती हुई शाम की परछाईं की तरह साथ-साथ चलता है।
इसलिए पूजा और पूजा के परिवार की नज़रों में अपने लिए सम्मान बचाए रखने का यही एक रास्ता था—पूजा के लिए एक ऐसा पीजी ढूँढ़ निकालना जिससे सीनियर मिसरा जी को भी लगे कि उनका बेटा दिल्ली जाकर बड़ा आदमी बनने की राह पर अग्रसर हो चुका है।
मुखर्जी नगर, कमला नगर, विजय नगर, जवाहर नगर, मॉडल टाउन, मॉरिस नगर, मलकागंज, रूपनगर, हडसन लाइन, सिविल लाइंस, आउटरम लाइंस, ककिंग्सवे कैंप—हर दूसरे-तीसरे घर में तो पीजी चलता है इन इलाक़ों में।
साँस लेने को जगह नहीं मकानों के बीच, लेकिन किरायेदारों के लिए जगह फिर भी बन जाती है। कई मकानमालिकों ने तो अपने पूरे के पूरे घर को रिमॉडल करके उसे प्राइवेट हॉस्टलों में तब्दील कर दिया है। हर क़िस्म की जेबों के लिए हर क़िस्म के पीजी अकॉमोडेशन मिलते हैं यहाँ।

लेकिन बिकास मिसरा की पूजा से यह पूछने की हिम्मत हुई नहीं कि भई, तुम्हारे पापा की जेब कितनी भारी है, और तुमको कैसा पीजी चाहिए। वैसे भगवानपुर में पूजा के घर के सामने से दो-चार बार निकलने का मौक़ा मिला था, इसलिए याद था कि उसका घर खुला-खुला सा है, बड़े-से आँगन वाला दोतल्ला मकान, जिसका मेन दरवाज़ा मोहल्ले के बाक़ी घरों की तरह सड़क पर नहीं बल्कि एक छोटे-से लॉन में खुलता है।
जिसे ऐसे मकान में रहने की आदत हो, वो किसी डॉरमेटरी या फ़ोर-सीटर में कैसे रह पाएगी?
जूनियर मिसरा जी की यही खोज उन्हें अरोरा’ज़ पीजी तक ले गई थी। कमला नगर में जगह-जगह बिजली के खंभों पर अरोरा’ज़ पीजी का इश्तहार चिपका था।
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‘एक़्जिस्टेंस’ की ग़लत स्पेलिंग के बावजूद बिकास मिसरा ने तय कर लिया कि बस यही वो जगह है जो बिहार पुलिस में डीएसपी बनने की कुर्सी के बहुत क़रीब पहुँच चुके एक दारोग़ा की इकलौती बेटी के रहने के लायक़ है।
‘‘पूजाऽऽऽ... दिल्ली में रहने का तुम्हारा प्रॉब्लम सलटा दिए हैं। आज दो बजे अपना बोरिया बिस्तर लेकर आउटरम पहुँच जाना। लोकेशन तुमको वॉट्सएप्प पर भेज देंगे।’’

बिकास मिसरा ने पूजा को साँस लेने की भी फ़ुरसत नहीं दी। पुन्नू फुआ से अपना सत्तू-चूड़ा-ठेकुआ-भुंजा आधा-आधा बाँटकर पूजा ने अपना सामान पैक किया और अपने लिए एक प्रीपेड जुगनू ऑटो बुक करके रास्ते भूलते-भटकते पहुँच गई आउटरम लाइंस।
जहाँ जीपीएस काम करता है, वहाँ ज़बरदस्त काम करता है। आपका सेंस ऑफ़ डायरेक्शन इस धरती की तरह गोल हो तो जीपीएस आपको दुनिया का सबसे अद् भुत आविष्कार लगेगा। जीपीएस की मदद से आप मंजि़ल पर पहुँचेंगे ज़रूर, लेकिन सबसे छोटे रास्ते से आपको लेकर चलते हुए जीपीएस न रास्तों के गड्ढों की गारंटी लेता है और न कॉलोनी के बंद गेटों की ख़बर देता है। इसलिए मुमकिन है कि आप सही घर तक पहुँच तो जाएँ, लेकिन आपके और आपकी मंजि़ल के बीच लोहे का कोई एक ऐसा विशालकाय गेट हो जिसके खुलने का वक़्त जीपीएस को मालूम ही नहीं हो!
उस खुले हुए एक गेट की खोज में, जो उसे अरोरा पीजी के सामने ले पहुँचाए, पूजा आउटरम के गोल-गोल चक्कर काटती रही। पूजा को पीजी मिल भी गया लेकिन दूर-दूर तक विकास भइया का पता नहीं था। अब तो फ़ोन भी नहीं उठा रहे थे वो। एक हाथ में फ़ोन लिए दूसरे हाथ से सामान उतारने की कोशिश करती पूजा का ऑटोवाले से झगड़ा भी हो गया।
और एक छोटा-सा हादसा भी।

हुआ यूँ कि कॉलोनी में घूमते हुए ऑटोवाला इतना परेशान हो गया था कि सही मकान के सामने पहुँचते ही उसने अपने ऑटो को किनारे लगाने की ज़रूरत ही नहीं समझी। बीच सड़क पर सामान उतारती पूजा और दूसरी ओर से आती हुई गाडिय़ों के बीच का फ़ासला ख़तरे के निशान को छूने लगा।
दो-चार गाडिय़ाँ पूजा को घूरती हुई निकल गईं, दो-चार ड्राइवरों ने चिल्लाकर किनारे हटने की सलाह भी दी लेकिन जो हादसा होना था, सो तो होना ही था।
उलटी तरफ़ से आती हुई एक लाल गाड़ी अपना संतुलन नहीं सँभाल पाई और पूजा को सामान समेत धक्का देती हुई निकल गई।
एक ओर पूजा का भारी-भरकम सूटकेस था, दूसरी ओर सड़क के ठीक बीचो-बीच गिरी हुई पूजा प्रकाश थी। मुज़फ़्फरपुर में गिरी होती तो उसके उठने से पहले अम्मा तक ख़बर पहुँच चुकी होती। यहाँ तक कि उसको उठाकर रिक्शे पर बिठाने वाले कई लोग पहुँच गए होते। लोग मरहम-पट्टी करते, पानी-वानी पिलाते। इसकी भी प्रबल संभावना होती कि उनमें से दो-चार ने तो गाड़ी चलानेवाले को गाड़ी से उताकर उसकी कुटम्मस भी की होती।
लेकिन पूजा प्रकाश इस वक़्त दिल्ली में थी, मुज़फ़्फरपुर में नहीं।

ऑटोवाला मुँह से ‘च्चचचच’ की अजीब-सी आवाज़ निकालते हुए अपने रास्ते चल पड़ा। लाल गाड़ी की ड्राइविंग सीट की खिड़की से निकली हुई एक ख़ूबसूरत-सी मुंडी ने वहीं से ‘सॉरी’ बोलकर अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ ली और अपने रास्ते निकल पड़ी।
दिल्ली में मिले एक और शानदार स्वागत से कुढ़-चिढ़कर पूजा के मुँह से गालियाँ ही निकल सकीं।
‘‘स्साले कुत्ते कमीने!’’
यह समझना ज़रा मुश्किल था कि ये क्यूट गालियाँ आख़िर थीं किसके लिए! उस लड़की के लिए जिसने पूजा को सड़क पर गिराया? उस ऑटोवाले के लिए जिसने उसकी मदद की ज़रूरत नहीं समझी? या उस बेरहम शहर के लिए जो उसकी दुर्घटना से बेअसर, बेपरवाह रहा? या फिर जि़ंदगी के लिए जिसने अचानक पूजा को अपने सुरक्षाचक्र के घेरे से निकालकर एक खुले मैदान में पटक फेंका था?
और ऊपर से भगवान ही जाने कि ये विकास भैया कहाँ रह गए थे!

 

3.

सोफ़े पर अरोरा आंटी मलिका-ए-हुकूमत बनी बैठी थीं।
उनके ड्रॉइंगरूम में हर चीज़ ज़रूरत से ज़्यादा बड़ी, और ज़रूरत से ज़्यादा आउट ऑफ़ प्लेस थी। सोफ़े ऐसे कि एक जगह लग गए तो बस जम गए—अंगद के पाँव की तरह। उन पर कुशन इतने विशालकाय कि तय कर पाना मुश्किल, कि सोफ़े इंसानों के बैठने के लिए थे या कुशनों के बैठने के लिए।
दीवार पर नारंगी रंग था तो फ़र्श पर सफ़ेद मार्बल। खिड़कियों और दरवाज़ों पर लगे भारी-भरकम पर्दों को हटाने और गिराने में ज़रूर दो लोग लगते होंगे। पीछे एक शोकेस में आंटी की पूरी रसोई चीनी मिट्टी के बर्तनों के रूप में सजा दी गई थी। एक बड़ा-सा कोलाज भी था—पीजी में रह चुकी लड़कियों का। सारी तस्वीरों के फोकल पॉइंट में साक्षात अरोरा आंटी ही थीं।
पूरे ड्रॉइंगरूम की सजावट से नई-नई समृद्धि टपक रही थी। हालाँकि आंटी के बदन पर एक पुराना-सा काफ़तान लटक रहा था। उसमें भी काँख पर की खुली हुई सिलाई से होकर झाँकती गंदी-सी पुरानी ब्रा की पट्टी। उफ़्फ़! आंटी ने जिन पर्दों को कमरे में टाँग दिया था उनके कुर्ते ही सिलवा लेतीं कम-से-कम! पूजा के जी में आया कि आंटी को टोक ही दे। लेकिन पहली बार मिलने की हिचक में औपचारिकता से कहीं ज़्यादा ख़ौफ़ भी होता है। सामनेवाला अपनी नाराज़गी में जाने क्या कर जाए। वो भी मकानमालकिन!

वैसे भी मकानमालिकों से किसी भी क़िस्म के रहम की गुँजाइश नहीं होनी चाहिए। इसलिए अरोरा आंटी ने पूजा को अपनी एक छोटी-सी अप्रत्याशित हरकत से हैरान कर दिया।
पूजा की चोट देखकर वो उसके लिए डिटॉल और कॉटन ले आईं।
‘‘सड़क ऐसे... ऐसे देखकर पार नहीं करती, हैं बेटे? ये दिल्ली है, है कि नहीं? यहाँ न सबको बड़ी जल्दी मची रहती है मरने की। इत्ती चोट कैसे लग गई तुझे, हैं? गड्डी का नंबर देखा था कि नहीं। ऑड था कि इवेन, हैं?’’
‘‘आंटी, वो हम आपके घर के सामने ऑटो से उतरे ही थे कि एक रेड कलर की गाड़ी...’’
‘‘ओ बिज्जी! टीवी का वॉल्यूम ते कम कर दे यारऽऽ। क्लाइंट के साथ मीटिंग में हूँ यार,’’ पूजा को बीच में काटकर अरोरा आंटी भीतर के कमरे की ओर देखती हुई इतना तेज़ चीखीं कि पूजा के हाथ से थोड़े-से सब्र के साथ-साथ रूई का टुकड़ा भी छूट गया। पता नहीं क्यों उसकी आँखें भर आईं।

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Q. भली लड़कियाँ, बुरी लड़कियाँ PDF | Bhali Ladkiyan, Buri Ladkiyan किताब के लेखक कौन है?
Answer.   अनु सिंह चौधरी / Anu Singh Choudhary  
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