महिषासुर : मिथक और परंपराएं / Mahishasur: Mithak aur Paramparayen

जिस समय हमारी ट्रेन महोबा स्टेशन पर लगी, उस समय तक रात गहरी हो चुकी थी। दिल्ली तो आठों पहर जागती रहती है। हम दिल्ली से 600 किलोमीटर दूर थे। सांस्कृतिक इतिहास के समृद्धतम शिखर पर बैठे उस बुंदेलखंड में, जो आज भूख और प्यास से तड़पते क्षेत्र के रूप में जाना जाता है। इस ओर का रुख हमारी पत्रकार

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सलाम बस्तर / SALAM BASTAR

पेट की ऐंठन फिर दिक्कत पैदा कर रही थी। दरअसल पिछले तीन दशकों की मशक्कत भरी ‘जिंदगी ने उसे पेचिश की जो बीमारी सौंप दी थी उससे निजात पाना मुश्किल था। और तो और प्रोस्ट्रेट भी बढ़ा हुआ था। बावजूद इसके हाथों में बंदूक की बेहद ठंडी धातु के एहसास के मुकाबले इस दर्द को बर्दाश्त किया जा सकता था।

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