चाँदपुर की चंदा | Chandpur Ki Chanda Book PDF Download Free : Hindi Novels by Atul Kumar Rai

पुस्तक का विवरण (Description of Book) :-

नाम / Name 📥चाँदपुर की चंदा PDF। Chandpur Ki Chanda
Author 🖊️
आकार / Size 67.7 MB
कुल पृष्ठ / Pages 📖477
Last UpdatedJuly 24, 2022
भाषा / Language Hindi
Category

कुछ साल पहले पिंकी और मंटू का प्रेम-पत्र सोशल मीडिया पर वायरल हुआ और ऐसे वायरल हुआ कि उसे शेयर करने वालों में हाईस्कूल-इंटरमीडिएट के छात्र भी थे और यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर भी। लेकिन उस छोटे से प्रेम-पत्र के पीछे की बड़ी कहानी क्या थी, यह किसी को नहीं मालूम। क्या था उन दो प्रेमियों का संघर्ष? ‘चाँदपुर की चंदा’ क्या उस मंटू और पिंकी की रोमांटिक प्रेम-कहानी भर है? नहीं, यह उपन्यास बस एक खूबसूरत, मर्मस्पर्शी वायरल प्रेम-कहानी भर नहीं है, बल्कि यह हमारे समय और हमारे समाज के कई कड़वे सवालों से टकराते हुए, हमारी ग्रामीण संस्कृति की विलुप्त होती वो झाँकी है, जो पन्ने-दर-पन्ने एक ऐसे महावृत्तांत का रूप धारण कर लेती है जिसमें हम डूबते चले जाते हैं और हँसते, गाते, रोते और मुस्कुराते हुए महसूस करते हैं। यह कहानी न सिर्फ़ हमारे अपने गाँव, गली और मोहल्ले की है, बल्कि यह कहानी हमारे समय और समाज की सबसे जरूरी कहानी भी है।

 

पुस्तक का कुछ अंश

1
जनवरी 2006
घड़ी सुबह के सात बजा रही है। घने कोहरे में सिमटकर बलिया रेलवे स्टेशन सफेद पड़ गया है। दो दिन से दिल्ली-मुंबई जाने वाली गाड़ियाँ दस-दस घंटे की देरी से चल रही हैं। इस कारण बहुत सारे यात्री परेशान हैं, तो कुछ यात्री अभी भी प्लेटफॉर्म की तरफ टकटकी लगाए देख रहे हैं। कहीं कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा। चारों तरफ गलन से भरा एक ठंडा सन्नाटा है, जो वक्त के साथ फैलता ही जा रहा है।
इधर प्लेटफॉर्म नंबर दो से आती ‘ए चाय गरम, गरम चाय’ की आवाज इस सन्नाटे को चीर रही है। तब तक पूछताछ केंद्र पर हलचल होने लगी। दो-चार यात्री उठ खड़े हुए। उनको देखकर बाकी लोग भी खड़े होने लगे। अचानक सूचना प्रसारण यंत्र में किसी ने जोर की फूँक मारी- ‘यात्रीगण कृपया ध्यान दें, जयनगर से चलकर नई दिल्ली को जाने वाली स्वतंत्रता सेनानी एक्सप्रेस प्लेटफॉर्म नंबर दो पर आ रही है।’
ये सुनते ही चारों ओर हल्ला शुरू हो गया। गाड़ी का इंतजार करके थक चुके सारे यात्री अपने-अपने स्वेटर, मफलर, अटैची, बक्सा, गठरी, झोला, कंबल, ठीक करने लगे। देखते-ही-देखते कोहरे को चीरकर धुआँ उड़ाती, सीटी बजाती स्वतंत्रता सेनानी एक्सप्रेस प्लेटफॉर्म नंबर दो पर खड़ी हो गई।
गाड़ी खड़े होते ही जनरल बोगी से लड़खड़ाते हुए पाँच अधेड़नुमा युवक उतर रहे हैं। पाँचों की उम्र पच्चीस से तीस के बीच है। सबके हाथों में झोले और पैरों में गोल्डस्टार के जूते हैं। मुँह से गुटखा टपक रहा है और आँखों तक लटकती जुल्फों से रूसी झड़कर जैकेट पर गिर रही है। पाँचों को गौर से देखने पर यकीन हो जाता है कि इस देश में सिर्फ ठंड ही नहीं बल्कि बेरोजगारी और महँगाई भी काफी बढ़ गई है और सरकार को सबसे पहले ‘युवा कल्याण मंत्रालय’ और ‘मद्य निषेध मंत्रालय’ को एक में मिला देना चाहिए, क्योंकि जिस दिन ठीक से ‘मद्य निषेध’ हो गया, उस दिन ‘युवा कल्याण’ अपने आप हो जाएगा।
थोड़ी देर में पाँचों लड़के आँख मलते हुए स्टेशन के बाहर आ गए। बाहर आते ही आपस में विचार-विमर्श होने लगा। सबसे होशियार दिखने वाले एक लड़के ने गुटखा थूककर कहा, “बोंधू, आमादेर स्टेशनटा पेच्छोने छूटे गेचे...”
“चुप करो दादा... वहाँ गारी का स्टॉपेज ही नहीं था तो कैसे उतर जाते? यहाँ से हम लोगों को रिजरब ऑटो पकरके चलना परेगा।”
ऑटो का नाम सुनते ही पाँचों ने झोला उठाकर ऑटो स्टैंड की तरफ कूच किया। इधर सुबह से सूने पड़े ऑटो स्टैंड पर भारी भीड़ उमड़ पड़ी थी। ट्रेन से उतरे सारे यात्री ऑटो में बैठकर हवाई जहाज की स्पीड से जल्दी-जल्दी घर जाना चाहते थे। इस कारण ऑटो स्टैंड का माहौल मछली बाजार बन गया था। लेकिन इस बाजार से दूर एक दारू की दुकान के सामने खड़े होकर दो ऑटो वाले बड़े ही निर्विकार भाव से खैनी बना रहे थे। पाँचों लड़कों को देखते ही उनके हाथ रुक गए, भौंहें तन गईं और मुँह से निकला...
“रे बित्तन!”
“का रे?”
“ई सब आर्केस्ट्रा वाले हैं का भाई?”
“लग तो इहे रहा है भाई। ई सरवा लगन शुरू होते ही मेहरारू-लइका लेकर बंगाल से बलिया चले आते हैं। फिर पूरे लगन उनको रूपश्री, प्रधान आर्केस्ट्रा में नचवाते हैं और अपने सामियाना में सुतकर लइका खेलाते हैं।”
“बक्क बोक्का! ई सब मालदा जिला वाले मजदूर हैं। बलिया-छपरा रेल लाइन पर काम चल रहा है, देखे नहीं हो का? जाकर पूछो तो...”
ऑटो वाला आगे बढ़कर पूछने लगा, “कहाँ जाना है दादा?
“कहीं नहीं जाना।”
“बाँसडीह कचहरी, मनियर?”
“ना।”
“नरही, भरौली, बक्सर?”
“ना दादा।”
“खेजुरी, खड़सरा, सिकंदरपुर?”
“ना।”
“तब गाजीपुर, मऊ, आजमगढ़, देवरिया, गोरखपुर, सिवान, छपरा बक्सर, आरा, भभुआ, मोहनिया, रोहतास?”
“नहीं भाई, बस करो!”
“तब कहीं तो जाएँगे कि रेलवे स्टेशन पर ट्रेन का डिब्बा गिनने आए थे?”
“एक मिनट रुको... पढ़ो जी का लिखा है!”
पाँचों में सबसे पढ़ाकू दिख रहा एक लड़का कागज निकालकर पढ़ने लगा, “चाँदपुर!”
“वाह!”
चाँदपुर का नाम सुनते ही ऑटो वाले का सूखा चेहरा चाँद जैसा खिल गया। उसकी आँखें इन पाँचों दिव्य मूर्तियों का गहन निरीक्षण करने लगीं, मन में शंख बजने लगे, चित्त में सुगंधित अगरबत्तियाँ जलने लगीं और दिल से आवाज आने लगी, “जय हो भिरगू बाबा! सुबह-सुबह क्या आइटम भेजा है आपने।” लेकिन मौके की नजाकत को समझकर उसने उत्तेजना भरी आवाज को अपनी जेब में छिपाकर पूछा, “आप लोगों को मैनेजर साहब के यहाँ जाना है क्या दादा?”
एक ऑटो वाले के मुँह से मैनेजर साहब का नाम सुनते ही पाँचों लड़के अवाक होकर एक-दूसरे को देखने लगे। किसी ने कुछ नहीं कहा। सब सुन्न पड़ गए। ऑटो वाला मामले की गोपनीयता को झट से समझ गया। उसने दाँत चियारते हुए कहा, “कोई बात नहीं, हम सब समझते हैं। वैसे जब चाँदपुर ही जाना था तो बलिया स्टेशन नहीं आना चाहिए था। सहतवार रेलवे स्टेशन पर उतर जाते, वहाँ से घोड़ा गाड़ी पर सवार होते और सीधे चाँदपुर चले जाते।”
“वो सब छोड़ो... तुम बताओ, तुमको चाँदपुर चलना है कि नहीं?”
“काहे नहीं चलना है, आप आदेश तो करिए।”
“कितना लोगे?”
“कितना देंगे?”
थोड़ी देर में मोल-भाव होने लगा। इधर ठंड बढ़ती जा रही थी और ट्रेन चले जाने के बाद ऑटो स्टैंड के आस-पास की भीड़ भी कम होती जा रही थी। दस मिनट बाद आखिरकार ऑटो वाला विजयी मुद्रा में आकर बोला, “देखिए दादा, फाइनल बात। राम-राम का बेरा है। ठंड देख रहे हैं न... हाथ काम नहीं कर रहा है। विश्करमा छू रहे हैं, झूठ नहीं बोलेंगे। पाँच सौ से पाँच पइसा कम नहीं होगा।”
पाँचों में से तेज-तर्रार दिखने वाले एक लड़के ने कहा, “चार सौ देंगे चलो, वरना जाओ।”
‘जाओ’ सुनते ही जैसे जाल में फँसी हुई मछली के जाल से निकल जाने पर मछुवारा तड़पता है, वैसे ही ऑटो वाला तड़पने लगा। “ए दादा, अरे! राम-राम के बेरा नाराज नहीं होते। आपको हम मैनेजर साहब के घर छोड़ेंगे, घर नहीं होंगे तो उनके स्कूल पर छोड़ेंगे। अगर स्कूल नहीं छोड़े तो आपका जूता मेरा सर! समझे!”
औसत भारतीय की तरह जूते वाली बात पाँचों लड़कों को तुरंत समझ में आ गई। कुछ देर तक अपने फटे जूते की तरफ देखकर पाँचों में से एक ने कहा, “ठीक है तब, चलो।”
“पीछे सामान रखो दादा।”
“ना-ना, हम लोग सामान साथ लेकर बैठेंगे, इसमें बहुत जरूरी समान है।”
“ठीक है दादा, जैसी मर्जी।” इतना कहकर ऑटो वाले ने मन-ही-मन गरियाते हुए पगड़ी टाइट बाँधी। मुँह में गुटखा डालकर निरहुआ का गाना बजाया। स्टियरिंग को सुबह का तूफानी नमस्कार किया और चलने लगा। इधर सड़क पर दस मीटर के आगे कुछ दिखता नहीं था। बिना डीपर के चलना मुश्किल हो रहा था। इसी मुश्किल में अखबार वाले, दूध वाले, ट्रेन पकड़ने वाले और कोचिंग पढ़ने वाले इक्का-दुक्का लोग आ-जा रहे थे।
थोड़ी देर में ऑटो शहर के बाहर निकल आया। बाहर निकलते ही पाँचों लड़कों के चेहरे पर हवाइयाँ उड़ने लगीं। उनके चेहरे भय से सिकुड़ गए। एक लड़का अपने मोबाइल को बार-बार कान से हटाकर सटाता रहा। बाकी चारों कौतुक भरी आँखों से बलिया जनपद को देखते रहे! दस-पंद्रह मिनट तक ऑटो में शांति पसरी रही। कोई किसी से बोलता नहीं था, बस मफलर को कान के आगे पीछे कर लेता था। अचानक सबसे किनारे बैठे एक अधेड़ लड़के ने मुँह से मफलर हटाकर साइड मिरर में झाँकते हुए ऑटो वाले से पूछा, “भाई साहब, क्या आप सच में मैनेजर साहब को जानते हैं?”
“जानते हैं? का बात किए आप दादा। मैनेजर साहब के लड़के हैं डब्लू नेता, हम उनके खास आदमी हैं और उनके कॉलेज में मास्टर हैं, मनोहर मास्टर, वो हमारे खास आदमी हैं। इससे ज्यादा का कहें... चलिए रहे हैं, देख लीजिएगा।”
डब्लू नेता का नाम सुनने के बाद पाँचों ने एक-एक गहरी साँस ली। ऑटो वाले ने गि‍यर बदल दिया और साइड मिरर साफ करते हुए बोला, “दादा, एक पइसा का टेंशन मत लीजिए। जहाँ मैनेजर साहब का घर है न, उसी चट्टी पर तो हमारे भइया बिजली मिस्त्री हैं। किसी से पूछिएगा फूँकन मिस्त्री का नाम। चाँदपुर का बच्चा-बच्चा जानता है उनको।”
ऑटो वाले के धड़ाधड़ जवाब से पाँचों यात्रियों को थोड़ा आश्चर्य हुआ। इस आश्चर्य में थोड़ी देर फिर चुप्पी रही। निरहुआ का गाना भी बंद हो गया। लेकिन ऑटो वाला साइड मिरर में सबका चेहरा पढ़ता रहा और मन-ही-मन मुस्कुराता रहा। थोड़ी देर बाद उसने अपने रूखे चेहरे पर आत्मीयता का क्रीम पोतकर पूछा, “दादा एक बात पूछें?”
“हँ हँ पूछो।”
“आप लोग बंगाल से यूपी बोर्ड का फॉर्म भरने आए हैं क्या?”
इस सवाल के बाद तो पाँचों लड़के एक-दूसरे का मुँह देखने लगे। समझ में नहीं आया कि क्या कहें, कैसे कहें। तब तक सबसे किनारे बैठे एक लड़के ने लजाते हुऐ मामला सँभाल लिया, “हँ... बारहवीं का फॉर्म। किसी से कहिएगा मत, डब्लू भइया मना किए हैं।”
“अरे! सरकार, यही बात आप लोग पहले कहे होते कि यूपी बोर्ड का फॉर्म भरने आए हैं। तब्बे से न जाने का दिस-दैट बतिया रहे हैं। टेंशन मत लीजिए। हम भी परियार साल उसी कॉलेज से इंटर पास हुए हैं।”
“उसी कॉलेज से? सच में?” पाँचों लड़कों ने चेहरा सिकोड़कर एक साथ पूछा।
“तब क्या? जानते हैं हमारा केतना परसेंट था?”
सबसे अधेड़ दिखने वाले लड़के ने पूछा, “कितना परसेंट था?”
“देखिए, जिस दिन से साइंस का पेपर था, उस दिन तो हमारी भैंस बिया गई थी। हम परीक्षा में बैठिए नहीं पाए थे। हमारी जगह हमारे बड़के भइया का छोटका सरवा परीक्षा दिया। इसलिए पैंसठ परसेंट आया नहीं तो ई बुझिए कि हमारा पचहत्तर से ऊपरे हेल गया होता।”
अचानक पाँचों लड़कों के चेहरे पर हँसी तैर गई। इस बार हँसी का आकार लंबवत न होकर आयताकार हो गया। ऑटो वाला तीर सही जगह लगने की खुशी में गाना भोजपुरी से बदलकर हिंदी कर दिया।
‘दिल दीवाना ना जाने कब खो गया...’
इधर सामने सड़क पर सुनहरी धूल उड़ रही थी और दूर देस से आए इन अजनबियों की आँखें अब सड़क किनारे उगे सरसों, मटर, चना के फूलों को देख रही थीं। सामने गेंहूँ के खेत हवा में हिल रहे थे और आसमान से सूरज थोड़ा-थोड़ा झाँकने लगा था। तभी पीछे बैठे लड़के की नोकिया मोबाइल पर रिंगटोन बज उठा- ‘इश्क दी गली विच नो एंट्री...’
उसने झट से कान में सटाकर कहा, “हैलो-हैलो डब्लू भइया... आवाज आ रही है? हैलो हैलो... हम भोर से ही आपको कॉल कर रहा। हम लोग आ रहा... गारी मिल गया है... छपरा में गारी से उतरा। हम लोग बलिया वाली एक्सप्रेस पकर लिया... हैलो भइया हैलो...”
ऑटो वाले ने गाने की आवाज कम कर दी और पूछा, “टॉवर भाग गया का जी?”
“हँ, दादा।”
“आपका बेसनल है कि हच है?”
“बीयसनल है।”
“तब्बे न भग गया! हच लीजिए हच, एकदम गच-गच पकड़ता है।”
इस बात पर पाँचों लड़के मुस्कुराने लगे। इधर सूरज भगवान की कृपा से कोहरा कुछ कम हो गया। ऑटो वाले की स्पीड बढ़ गई। सामने से आ रहे एक दूध वाले की साइकिल से टकराने के बाद माँ-बहन की दो-चार खतरनाक गाली सुनकर उसने कहा, “वइसे दादा जानते हैं, पिछले साल तो पंजाब, नेपाल, हरियाणा से एक दर्जन स्टूडेंट परीक्षा देने चाँदपुर आया था। सबके रहने, खाने आने-जाने से लेकर पान, तंबाकू और गुटखा की बेवस्था हम ही किए थे। उ सब लोग फर्स्ट डिवीजन पास हो गया है। अभी भी हमको फोन करता है। इस बार भी बोर्ड परीक्षा में हम ही ड्यूटी करेंगे। आप लोगों को भी कवनो परकार का दिक्कत नहीं होगा। ई बुझिए कि अपने घर का कालेज है!”
ऑटो वाले के इस बड़ी-सी आश्वस्ति के बाद पाँचों लड़कों के चेहरे की शिकन कुछ कम हो गई। सब जान गए कि ये ऑटो वाला पहुँचा हुआ फकीर है। दूसरी बात ये कि अनजान जगह पर मौन रहना भीतर के डर को बढ़ाता है। इसलिए बात चाहे कितनी भी फालतू क्यों न हो, करते रहनी चाहिए। फिर तो पाँचों लड़के सामान्य हो गए। किसी ने ऑटो वाले से पूछा, “आपका नाम क्या है?” आटो वाले ने गियर बदलकर कहा, “स्कूल का नाम तो गोवर्द्धन है दादा, लेकिन चाँदपुर में सब बित्तन कहते हैं।”
किसी ने पूछा, “भैया कल शाम को हम लोग फॉर्म भरकर फिर अपने घर चले जाएँगे, आप स्टेशन छोर देंगे न?”
“का बात किए, स्टेशन क्या चीज है, कहेंगे तो कलकत्ता छोड़ देंगे। हर साल चाँदपुर की फजलु बैंड पार्टी का नचनिया लाने हम ही तो कलकत्ता जाते हैं। जानते हैं पिछले साल जो नचनिया आया था, उ साला आज भी हमको कहीं देखता है तो चुम्मा देकर आई लभ यू बोलता है, लेकिन ई सब लसरघंट से हम दूर रहते हैं। बदनामी न होता है जी। अगले साल बियाह करना है।”
पाँचों लड़के हँसने लगे। लेकिन बियाह का नाम सुनते ही सबसे अधेड़ दिखने वाले लड़के ने पूछा, “भइया, हमारा भी शादी नहीं हो रहा है। किसी तरह से इस साल इंटर पास करना जरूरी है। ई बताइए, सच में यहाँ परीक्षा में नकल करने का सुविधा मिलता है?”
ऑटो वाले ने आँखें चौड़ी करके बताया, “अरे महराज! जो इस्टूडेंट बलिया जिला में हाईस्कूल, इंटर पास नहीं होगा, उसको तीनों तिरलोक, चउदहों भुवन में बरम्हा, बिसनू, महेस भी पास नहीं करवा सकते हैं। और सुविधा तो इतना है कि बस ‘सुविधा शुल्क दीजिए और बिलेकबोर्ड पर पेपर हल कर दिया जाएगा, छाप लीजिए। लिख नहीं सकते हैं तो पैसा दीजिए अपने चुपचाप बैठे रहिए, कॉपी आपकी लिखा जाएगी। मने बूझिए कि मैनेजर साहब देवता आदमी हैं, देवता। हर साल सौ-डेढ़ सौ आप जैसे बुजुर्ग छात्रों को हाईस्कूल-इंटर पास करवाते हैं।”
बित्तन की इस बात ने जादू का काम किया। पाँचों लड़के एकदम ढीले पड़ गए। एक-दो लोगों ने अँगड़ाई और जम्हाई लेनी शुरू कर दी। मानो अब तक का सारा तनाव छू-मंतर हो गया हो। तब तक अचानक ऑटो की स्पीड को पीडब्ल्यूडी के ठेकेदारों ने नाकाम कर दिया। ऑटो गड्ढे की संगति पाकर हिचकोले खाते हुए मध्य लय में कत्थक करने लगा। एक लड़के ने जम्हाई खत्म करते हुए पूछा, “दादा, अब चाँदपुर कितना दूर है?”
ऑटो वाले ने झट से ब्रेक मार दिया और एक पान की गुमटी तरफ देखकर कहा, “भइया, एक पान खा लेंगे तो एक किलोमीटर और नहीं खाएँगे तो तीन किलोमीटर तो मानकर चलिए।”
पीछे बैठे पाँचों लड़के फिर मुस्कुरा उठे। उधर टूटे-फूटे रास्तों और झाड़ियों के बीच कोहरे से झाँकता हुआ वह मील का पत्थर दिखने लगा जिस पर लिखा था- ‘चाँदपुर 1 किलोमीटर’।
थोड़ी देर बाद उसी पत्थर के सामने एक आदमी आया और लोटा लेकर बैठ गया। पाँचों लड़कों ने गुमटी की तरफ मुँह फेर लिया। उन्होंने देखा पान वाला अब चूना लगा रहा है और बगल में एक साइकिल वाला मोटरसाइकिल का पंचर बना रहा है। इधर घड़ी साढ़े आठ बजा रही है। सूरज अब आसमान में साफ-साफ दिखने लगा है। सामने एक पुल पर कुछ लड़के बैठकर टयूशन जाती लड़कियों को ताड़ रहे हैं। चार लोग एक भैंस और पाड़ी को पकड़कर जबरदस्ती खींच रहे हैं। इसी बीच एक साइकिल झट से गुजरी। साइकिल सवार को देखते ही पान की गुमटी से ऑटो वाला खड़े-खड़े चिल्लाया, “देखिए दादा देखिए, वही मनोहर मास्टर हैं। मैनेजर साहेब के यहाँ जा रहे हैं। वही आप लोगों का फॉर्म भरेंगे और वही परीक्षा में आप लोगों की कॉपी लिखेंगे!”
ये सुनते ही पान की दुकान वाला हँसने लगा। पंचर बनाने वाला मुस्कुरा उठा। पाँचों लड़के दूर जाती हुई उस साइकिल को आँखें फाड़कर देखने लगे! उनकी आँखें उत्साह से चमक उठीं।
बित्तन पान खाकर टॉप गियर लगा दिया। ऑटो फिर दौड़ने लगी! देखते-ही-देखते आँखों के सामने हजारों एकड़ में फैले गेंहूँ और सरसों के लहलहाते खेतों का नयनाभिराम दृश्य नृत्य करने लगा।
पाँचों लड़कों का दिल चाँदपुर को देखने के लिए बेताब हो उठा।
2
चाँदपुर! सरयू किनारे बसा बलिया जिले का आखिरी गाँव! कहते हैं चाँद पर पानी है कि नहीं ये तो शोध का विषय है लेकिन चाँदपुर की किस्मत में पानी ही पानी है। चाँदपुर चलता है पानी में, जीता है पानी में और टूटता भी है पानी में!
सालों से आ रही विनाशकारी बाढ़ ने इसके इतिहास-भूगोल से कई बार छेड़-छाड़ किया है लेकिन बूढ़े हो रहे लेखपालों के कागजों में और दिनभर बीपी-सुगर की दवाई खा रहे बाढ़ नियंत्रण अधिकारियों की आँखों में चाँदपुर की ग्राम सभा एक है, जनपद एक और प्रदेश एक।
इस गाँव में अधिकतर लोग किसान हैं, कुछ फौजी जवान, करीब चार मास्टर, दो क्लर्क, चार बुद्धिजीवी, तीन क्रांतिकारी, दो प्रेमी, एक कवि और अनगिनत नेता हैं।
गाँव में प्रवेश करते ही सड़क टूटनी शुरू हो जाती है। सड़क में अपने-आप पैदा हो गए गड्ढे भारतीय भ्रष्टाचार की गहराई का आलंकारिक वर्णन करते हुए ये बताते हैं कि इस देश में ड्राइविंग लाइसेंस लेने से आसान ठेकेदारी का लाइसेंस लेना और खैनी बनाने से आसान सड़क बनाना है।
लगभग सौ मीटर इसी अंदाज में सीधे चलने के बाद नवीन विद्युतीकरण का शंखनाद करता एक खंभा दिखता है। खंभे पर क्षेत्र के छोटे-बड़े, नाटे, मझोले नेताओं के पोस्टर जोंक की तरह चिपके हैं। एक मिनट बिजली के खंभे और दूसरी मिनट इन पोस्टरों को देखने के बाद यकीन हो जाता है कि खंभे के तार में बिजली दौड़े या न दौड़े गाँव की रगों में राजनीति की बिजली बड़ी तेजी से दौड़ रही है और विद्युत ऊर्जा पैदा करने में भले हम फिसड्डी हों लेकिन राजनीतिक ऊर्जा पैदा करने में हम अभी भी पहले स्थान पर हैं।
बस इसी रास्ते पर थोड़ा-सा आगे चलने पर बाढ़ नियंत्रण बोर्ड का कार्यालय और डाकबंगला पड़ता है। जिसके कैंपस में उग आए आवारा घासों और बेहया के पौधों ने बाढ़ विभाग के साथ-साथ वन विभाग से भी अपना संबंध स्थापित कर लिया है, और बगल में जंग खा रहे पीपा के पुलों, डूबते पत्थरों और बालू की बोरियों के साथ मिलकर ये ऐलान कर दिया है कि चाँदपुर में बाढ़ छोड़कर सब कुछ निंयत्रण में रहता था, रहता है और आगे भी रहता रहेगा।
डाकबंगले के ठीक बाद गाँव का एहसास कराती गाँव की उन बस्तियों में बने उन घरों के दर्शन होने लगते हैं, जो शहरों के वातानुकूलित कमरों में बैठे योजना आयोग के विद्वानों, स्त्री के वक्षस्थल, कटि‍ प्रदेश और सुरमयी आँखों पर कविता करके उकता चुके रोमांटिक कवियों को कविता करने और गरीबी पर चिंता व्यक्त करने के लिए एक साथ आमंत्रित करते हैं, और धूसर लैंडस्केप रचते हुए दिखाते हैं टूटी हुई झोपड़ि‍यों की ऐसी शृंखला, जिसको देखकर कोई भी सहज ही अनुमान लगा सकता है कि लाख प्रयासों के बावजूद ये दुनिया, बाकी दुनिया से कई प्रकाश वर्ष दूर है।
इसी सड़क से हटकर ठीक बायें देखते ही सरयू किनारे हजारों एकड़ परती, उपजाऊ और ऊसर खेतों का एक ऐसा मनोरम मैदान शुरू हो जाता है, जिसको कवि देख लें तो काव्य का एक नया छंद बने। गालिब की नजर फिरे तो मोहब्बत की कोई नई नज्म हो। पंडित रविशंकर देख लें तो तरब के तारों से एक नई आलापचारी उठे। आम आदमी देखे तो मन उसका मयूर और छुट्टा जानवर देख लें तो बेशऊर हो उठें।
देसी भाषा में किसी नदी किनारे बसे ऐसे भू-भाग को ‘दियरा’ कहा जाता है।
इसी दियारे में किसी बुझ रहे दीये-सा बारहों महीने टिमटिमाता, धरती की रेंगनी में टँगे किसी फटे कपड़े की तरह लहराता, आधा सरयू के इस पार, आधा सरयू के उस पार रहता है चाँदपुर गाँव। ये इस पार और उस पार की भौगोलिक संरचना ही चाँदपुर की ताकत है और यही उसकी कमजोरी।
इस पार की मुख्य सड़क के ठीक बगल में शिव जी का मंदिर है। उसी के ठीक बगल में एक बँसवारी है। बँसवारी के बगल में नीम के नीचे काली माई का चऊरा और चऊरा के बगल में सैकड़ों साल पुराना एक कुआँ, कुएँ के बगल में पीपल का एक विशालकाय पेड़। और पेड़ के नीचे गाँव के ग्राम देवता ‘डीह बाबा’ हैं।
चैत की कटनी के दिनों में समूचा गाँव इसी बाबा की छाया में अपना खलिहान लगाता है, अनाज की दँवरी करता है। जेठ की धूप में बैठकर सुस्ताते हुए रेडियो पर ‘हैलो फरमाइश’ के गीत सुनता है और रात के समय दोस्तों की फरमाइश पर महुआ पीकर सारे गाँव को गाली सुनाता है।
हाँ, बाढ़ के दिनों में ठीक यहीं बैठकर गाँजा फूँकता है, भाँग खाता है और इन सब कामों में कुछ ऊँच-नीच, आगे-पीछे होता है तो हो जाए लेकिन हर मौसम में राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय राजनीति बतियाना नहीं छोड़ता है।
अब शिक्षा-दीक्षा की बात करें तो गाँव में एक संस्कृत पाठशाला है। जिसका संस्कृत से वैसा ही संबंध है जैसा राजनीति का नैतिकता और नेता का ईमानदारी से होता है। स्कूल कमेटी में आए दिन होने वाले लफड़े और स्कूल के मैनेजर नथुनी सिंह द्वारा घूस लेकर अपने दूर के दामादों की की जाने वाली भर्ती के बाद ये बड़े ही सम्मान और गर्व के साथ कहा जा सकता है कि‍ संस्कृत पाठशाला घर बैठकर अवैध पैसा कमाने का एक सुसंस्कृत स्थल है।
यहाँ से गिनकर दो मिनट चलने पर एक प्राइमरी और एक मिडिल स्कूल भी बना है। जिसकी दीवारों पर गिनती, पहाड़ा के अलावा ‘सब पढ़ें-सब बढ़ें’ का बोर्ड लिखा तो है, लेकिन कभी-कभी बच्चों से ज्यादा अध्यापक आ जाते हैं, तो कभी समन्वय और सामंजस्य जैसे शब्दों की बेइज्जती करते हुए एक ही मास्टर साहेब स्कूल के सभी बच्चों को पढ़ा देते हैं।
स्कूल के ठीक आगे पंचायत भवन है, जिसके दरवाजे में लटक रहे ताले की किस्मत और चाँदपुर की किस्मत में कभी खुलना नहीं लिखा है। मालूम नहीं कब ग्राम सभा की आखिरी बैठक हुई थी लेकिन पंचायत घर के बरामदे में साँड़, गाय, बैल खेत चरने के बाद सुस्ताते हुए मुड़ी हिला-हिलाकर गहन पंचायत करते रहते हैं और कुछ देर बाद पंचायत भवन में ही नहीं गाँव की किस्मत पर गोबर करके चले जाते हैं।
हाँ, गाँव के उत्तर एक निर्माणाधीन अस्पताल भी है। जो लगभग दो साल से बीमार पड़ा है। उसकी दीवारों का कुल जमा इतना प्रयोग है कि उस पर गाँव की महिलाओं द्वारा गोबर आसानी से पाथा जा सकता है। साथ ही गाँव के दिलजले लौंडों द्वारा खजुराहो, कोणार्क, वात्स्यायन और पिकासो को मात देती हुईं कुछ अद्भुत कलाकृतियाँ बनाकर कला जगत के सम्मुख नई चुनौती उत्पन्न की जा सकती है।
अस्पताल की छत पर बने कुछ अर्द्धनिर्मित कमरे भी हैं। जिनमें दिन में जुआ और रात में गाँव के प्रेमियों द्वारा एक ऐसे शारीरिक कार्यक्रम को अंजाम दिया जाता है, जो स्थानाभाव में दिन में नहीं किया जा सकता। हाँ, इंटर कॉलेज गाँव से दो किलोमीटर दूर और डिग्री कॉलेज बारह किलोमीटर दूर है।
लेकिन लाख दूरियों के बावजूद चाँदपुर में कुछ ऐसी चीजें हैं, जो एक ही जगह से संचालित होती हैं। जी हाँ, एक ही जगह से! बस उसी जगह ऑटो वाले ने ब्रेक मारकर पान थूक दिया। और बड़े जोर से कहा, “लो दादा आ गए चाँदपुर। ये रहा मैनेजर साहब का घर और वो रहे डब्लू नेता!”
इतना सुनते ही पाँचों लड़के हड़बड़ाकर उठ गए। पाँचों ने अपना-अपना सामान समेटा और आँखें मलते हुए देखा। सामने पूर्व प्रधान नथुनी सिंह उर्फ मैनेजर साहब का चमचमाता हुआ घर स्पष्ट दिख रहा है। घर के आगे खड़े दो-दो ट्रैक्टर, तीन-तीन मोटरसाइकिल और कई नौकर-चाकर ये चीख-चीखकर बता रहे हैं कि गाँव की उन्नति की बात भले असत्य हो लेकिन ये परम सत्य है कि दस सालों में मैनेजर साहब ने अपनी उन्नति करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है।
पाँचों लड़के सामान लेकर ऑटो से उतर गए। इधर बरामदे में अलाव ताप रहे मैनेजर साहब के सुपुत्र युवा नेता डब्लू जी ने इनको देख लिया, “आइए-आइए, आप सबका चाँदपुर में हार्दिक स्वागत है! कुर्सी लाव रे।”
झट से एक नौकर कुर्सियाँ ले आया। दूसरा चाय लेने चला गया। डब्लू नेता ने शॉल लपेटकर कहा, “बैठिए-बैठिए। देखिए तो आप लोगों के आते ही धूप भी निकल आया। अब आराम से जाकर सरयू जी में तेल लगाकर नहाइए, मिजाज फरेश होगा। का रे बित्तन?”
बित्तन ने डब्लू जी का पैर छूते हुए सिर हिलाया, “हँ भइया, कहेंगे तो स्नान के बाद चाँदपुर के उस पार भी घुमा देंगे।”
डब्लू नेता ने मना किया, “ना, ना... अभी जिस काम के लिए आए हैं उसको कर लेने दो। जानते हो न कि काम कितना रिस्की हो गया है। परीक्षा के डेढ़ महीने पहले कहीं बोर्ड का फारम भरा जाता है?”
“ना भइया, एकदम ना। वही तो हम इन लोगों को रास्ते में समझा रहे थे। लेकिन भइया कुछ लेकर करवा दीजिए। इस बेचारे का बियाह नहीं हो रहा है। इस दाढ़ी वाले भइया को हाईस्कूल पास न होने के कारण सिक्योरिटी गार्ड का बढ़िया नौकरी नहीं मिल रहा है। ये जोधपुर की एक स्टील फैक्ट्री में काम करते हैं। हई मोबाइल वाले भइया आगे चलकर क्लर्की करना चाहते हैं।”
बित्तन की इस घनघोर पैरवी को सुनकर पाँचों लड़कों के हाथ श्रद्धा से जुड़ गए, “जी भइया, हम लोगों ने तो हाईस्कूल-इंटर में लगातार फेल होने के बाद पढ़ाई ही छोड़ दिया था। अब आपका ही आसरा है।”
डब्ल्यू नेता ने इस विनम्रता और अपनी तारीफ को अस्वीकार करके कहा, “मनोहर जी, इन लोगों का काम आज देख लीजिए, इनको कल जाना भी है!”
“जी भइया।”
पाँचों लड़कों ने मनोहर मास्टर के पैर छूकर झट से प्रणाम किया। मनोहर मास्टर बात करने में मशगूल हो गए। इधर ऑटो वाला बित्तन भी डब्लू नेता से इसी महीने होने वाली चाँदपुर की सरस्वती पूजा के बारे में बतियाने लगा।
उधर मैनेजर साहब ईशान कोण पर बने अपने पूजा घर में पूजा करने में व्यस्त थे और पूजा खत्म होने में अभी समय था। लेकिन बाँध पर घर होने के कारण राहगीरों ने इन लड़कों का हुलिया देखकर सारा मामला समझ लिया और चंद मिनट के भीतर ही हल्ला कर दिया कि बोर्ड की परीक्षा से एक महीने पहले हाईस्कूल और इंटरमीडिएट का फॉर्म भरने बंगाल, झारखंड और आसाम से कई लड़के चाँदपुर आए हैं।
मैनेजर साहब को ये स्थिति समझते देर न लगी। उन्होंने मनोहर मास्टर को बुलाकर कहा, “मनोहर जी, इन लोगों का काम करके जल्दी से ट्रेन पकड़ा दीजिए। बात जिला विद्यालय निरीक्षक तक गई तो दिक्कत होगी। और इनसे साफ-साफ कह दीजिए कि परीक्षा शुरू होने के तीन दिन पहले हमें फुल पेमेंट चाहिए। चालीस हजार से चालीस रुपया भी कम नहीं होगा। ये बनिया की दुकान नहीं है कि उधार खाता चलेगा। इस साल परीक्षा सेंटर लेने में ही कई लाख रुपया लग गया है।”
“जी जी ठीक है।”
“और सुनिए, आज जाकर क्लास लीजिए और सभी विद्यार्थियों से कहिए कि बोर्ड परीक्षा की तैयारी शुरू कर दें। कल शाम तक परीक्षा का फाइनल डेट आ जाएगा।”
इस आदेश को सर आँखों पर उठाकर मनोहर मास्टर ने लड़कों का सारा जरूरी कागज जमा कर लिया। और दस मिनट बाद अपनी साइकिल पर सवार होकर सीधे इंटर कॉलेज का रुख कर लिए। थोड़ी दूर बढ़ते ही खेदन टी स्टॉल पर उनका एक सवाल से सामना हुआ!
“माट साब, बड़ा सबेरे-सबेरे भाग रहे हैं, तनख्वाह मिल गया क्या?”
मनोहर मास्टर इस सवाल को हमेशा की तरह नजरअंदाज करके जेठ के खेत में जुते हुए बैल की तरह सीधे चलने लगे। अचानक उनके सामने एक साइकिल वाले ने ब्रेक मार दिया। मनोहर मास्टर चौंक गए। उनके मुँह से निकला, “अरे राकेश तुम? ये कैसा हुलिया बना लिए हो जी?”
“माट साहेब प्रणाम!”
“अरे! बस करो... जाड़ा पाला में ज्यादा मेहनत न करो। कहाँ सुबह-सुबह झांझा मेल की तरह भाग रहे हो?”
“सर, जा रहे हैं उस आवारा को उठाने। सुना है कि आज आप क्लास लेने वाले हैं?”
मनोहर मास्टर मुस्कुराने लगे, “बिलकुल ठीक सुना है। कल बोर्ड एग्जाम का फाइनल डेट आ रहा है। सभी विद्यार्थियों को आज एक विशेष सूचना भी मिलने वाली है। फटाफट सबको लेकर क्लास में आ जाओ।”
“ठीक है सर आप चलिए, हम अभी आ रहे हैं।”
इतना कहने के बाद राकेश नामक लड़के ने साइकिल का पैडल दबाया और गाँव के उस पूरब टोले की तरफ रुख कर लिया, जहाँ छत पर एक दीवाना लड़का, रात भर लव लेटर लिखने के बाद कुंभकर्णी निद्रा में सो रहा था।
3
पूरब टोले की एक छत पर बने इस छोटे से कमरे की दीवारों से ईंट की अधिकता और बालू-सीमेंट की कमी साफ-साफ झाँक रही है। छत की ओर ध्यान से देखने पर लगता है कि किसी नौसिखिए राजमिस्त्री ने मजदूरी न मिलने का सारा गुस्सा इस कमरे पर निकाल दिया है।
भीतर की दीवारों को अभी प्लास्टर चढ़ाने लायक नहीं समझा गया है। लेकिन कमरे में रहने वाले विद्यार्थी ने अपने बुद्धि, कौशल और ब्राउन पेपर के सहारे कमरे को सजाकर होम डेकोरेशन वालों के सामने एक नई चुनौती पेश कर दी है।
प्लास्टर चढ़ जाने के बाद जब दीवाल की खूबसूरती में चार चाँद लगाने वाली कालजयी पेंटिंग्स की कमी महसूस हुई है, तब उसने अखबारों के रविवासरीय संस्करणों में छपे सिने तारिकाओं की लुभाती मुद्राओं का सहारा लिया है और उन पेपर कटिंग्स को इस अंदाज में चिपका दिया है कि समूचा बॉलीवुड एक ही कमरे में उठ रहा, बैठ रहा और हाँफ रहा है।
यानी कमरे में घुसते ही गोली मारते अजय देवगन का सामना ऐश्वर्या की कमर में हाथ डाले सलमान से हो रहा है, जिसके कारण रवीना टंडन की कमर में मोच आ गई है। इधर संजय दत्त ने रिवॉल्वर निकालकर ‘गदर एक प्रेम कथा’ वाले सनी देओल की सर पर तानकर समूचा पाकिस्तानी हैंडपंप उखाड़ने का सख्त विरोध किया है।
एक साइड में अक्षय कुमार समंदर किनारे खड़े होकर कम कपड़े में ज्यादा सुंदर दिखने का प्रयास करती प्रियंका चोपड़ा, लारा दत्ता के साथ पानी में आग लगाने की योजना बना रहे हैं। लेकिन मनोज तिवारी ने ‘बगल वाली जान मारेली’ कहकर उनको कन्फ्यूज कर दिया है।
उधर कमरे के तापमान में तीन डिग्री की वृद्धि करती बिपाशा बसु अपना ‘राज’ छिपा ही रही हैं कि सामने मल्लिका सहरावत का ‘मर्डर’ हो चुका है।
हाँ केरल की गर्मी में बैठे ‘सिर्फ तुम’ के दीपक का हाल बेहाल है। वो नैनिताल की आरती से कह रहा है कि ‘केरल में गर्मी है, नैनीताल से सर्दी भेजो’ लेकिन ये क्या, गोविंदा ने ‘सरकाए लियो खटिया जाड़ा लगे’ गाकर दीपक के अरमानों को बेदर्दी से बुझा दिया है।
इससे ज्यादा दुख की बात ये है कि अँखियों से गोली मारने वाले गोविंदा, आशिक बनाया आपने वाले इमरान हाशमी के बगल में खड़े होकर अपने ‘नसीब’ को कोस रहे हैं।
ठीक बगल में करीना कपूर की बलखाती कमर की तरफ हिमेश रेशमिया इशारा करके बड़े ही शोकपूर्ण मुद्रा में गा रहे हैं, “झलक दिखला जा... एक बार आ जा आ जा आ जा...”
लेकिन खिड़की की तरफ देखने पर लगता नहीं है कि सिवाय कबूतरों के इस कमरे में कोई बाहरी आता भी होगा!
कमरे में सामान के नाम पर बस एक टूटी हुई मेज है जिस पर कभी न साफ किया जाने वाला एक लैंप रखा है। लैंप से चू रहा केरोसिन, मेज पर रखी ऑर्गेनिक केमिस्ट्री की मोटी-सी किताब से अपना अवैध संबंध स्थापित कर चुका है जिसके कारण विज्ञान की किताबों से ज्ञान कम, मिट्टी तेल ज्यादा टपक रहा है।
सरस सलिल, मनोहर कहानियाँ, फिल्मी कैसेटों के फटे रैपर और आशिकों की शायरी, ये सब बता रहे हैं कि कमरे में रहने वाला विद्यार्थी विज्ञान और मनोविज्ञान में समान रुचि रखता है। उसकी रुचि के आतंक से इन किताबों के नीचे ढेर सारे मच्छरों के प्राण पखेरू उड़ गए हैं, जो अंतिम संस्कार होने का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं।
इधर मेज के सामने ही एक टूटी हुई खटिया है, जिसका आखिरी हिस्से का ओरचन देसी जुगाड़ के सहारे बाँधकर रोका गया है ताकि कोई झटके में बैठे तो खटिए पर बैठा ही रहे, जमीन पर न बैठ जाए।
यही खटिया इस कमरे का बेड और सोफा है। जिस पर फटी साड़ी और पुराने बिछौने के मेल से बना एक नया बिछौना बिछाया गया है। इसी देशी तकनीकी से बनी एक रजाई भी है, जिसे कंबल के ऊपर सटाकर इस कमरे में रहने वाला विद्यार्थी सोता है।
हाँ, खटिया के ठीक ऊपर दो दीवारों को जोड़ता हुआ एक बिजली का केबल भी है। जो बिजली के लिए नहीं, बल्कि कपड़ा टाँगने के लिए प्रयोग में लाया जाता है।
दाहिने ओर की दीवार में एक आलमारी है, जिसमें फिल्मी ऑडियो कैसेटों के आधे दर्जन कुतुबमीनार खड़े हैं। अभी धड़कन, दिलवाले, मोहब्बतें, हसीना मान जाएगी, बेवफा सनम से लेकर सिर्फ तुम, साजन चले ससुराल, बगलवाली, सामने वाली, ऊपर वाली के रैपर छितराए हुए हैं। कुछ कैसेटों
की रीलें उलझी हैं, तो कुछ लिखो-फेको पेन से सुलझाने के चक्कर में टूट गई हैं।
इसके ठीक बगल में एक ऑडियो प्लेयर है, जो यूँ तो दक्षिण टोला के सुखारी डॉक्टर को दहेज में मिला था लेकिन डॉक्टराइन ने डॉक्टर साहब को न जाने कौन-सा डोज दिया कि एक दिन टूटकर धराशाई हो गया। फिर दूसरे दिन कबाड़ी की दुकान से मैकेनिक की दुकान तक बनते-बिगड़ते, बिकते इस कमरे में आकर विराजमान हो गया।
ऑडियो प्लेयर के आगे का हिस्सा छोड़कर सारे कलपुर्जे खुले हैं। बेतरतीब तरीके से जोड़े गए तारों को देखकर लगता है कि इस यंत्र को ठीक करने में क्षेत्र के सारे मिस्त्रियों ने थोड़ा-थोड़ा मंत्र फूँका है लेकिन फूँकन की दुकान पर टेस्टिंग के दौरान समूचा सिस्टम ही फुँक गया है। फिर भी विद्यार्थी ने हार न मानते हुए इसको बजने लायक बनाकर अपने हुनर का लोहा मनवा दिया है।
यही कारण है कि इतनी मेहनत और उद्यम से पैदा हो रहे संगीत को अकेले न सुनकर समूचे चाँदपुर को सुनाने का फैसला किया गया है और इसके लिए दो साउंड बक्सों को छत पर लगा दिया गया है।
जैसे ही सुबह बिजली आती है, पहले हनुमान चालीसा सुनाई देता है और फिर कुछ भोजपुरी देवी गीत बजते हैं। इसके ठीक बाद विविध भारती को पानी-पानी करता सदाबहार फिल्मी गीतों का ऐसा कारवाँ उठता है, जो बिजली जाने, कमरे में रहने वाले विद्यार्थी के सो जाने या कहीं चले जाने के बाद ही बंद होता है।
लेकिन इधर कई दिन से चाँदपुर उदास है। बिजली भी नहीं आई है, एक हफ्ते से धूप भी तो नहीं हुई थी। जाड़ा कुछ ज्यादा ही बढ़ गया है। आदमी तो आदमी चाँदपुर के पेड़-पौधे, चिरई-चुरुंग तक सिकुड़ रहे हैं। लेकिन आज भगवान भास्कर की बड़ी कृपा हुई है। सुबह का सूरज आसमान में कुहासे को चीरता हुआ निकलने की जद्दोजहद कर रहा है। जिसे देखकर छोटे बच्चे चिल्ला रहे हैं, “राम-रामजी घाम करऽ सुगवा सलाम करऽ”, बूढ़े अलाव तापना छोड़कर आसमान की तरफ निहार रहे हैं, “हे प्रभु अब तो निकल आइए!”
अचानक धूप का एक टुकड़ा धरती पर दस्तक देता है। आँखों में बैठा कुहासा छँटने लगता है। सहसा पछुआ चलती है। सरसों की पीली चुनरी ओढ़े खेत इठलाते हैं। मटर के फूलों पर शीत की बूँदें मोतियों की तरह चमकती हैं और देखते-ही-देखते इस कुहासे और धूप की लड़ाई में एक नर्म धूप का टुकड़ा इस विद्यार्थी के कमरे में आकर उसे चौंका देता है। मानो कानों में कह रहा हो कि अब तो उठ जाओ। लेकिन ये क्या? नौ बजने को हैं और विद्यार्थी अभी तक सो रहा है!
अचानक कमरे के ठीक नीचे राकेश ने साइकिल की घंटी बजाई। मानो उसने गुप्त भाषा में किसी से कोई बात कही हो। लेकिन इस गुप्त भाषा का किसी पर कोई असर नहीं हुआ। फिर लगातार तीन बार घंटी बजी। लेकिन इस बार भी जवाबी कार्रवाई शून्य रही।
बार-बार घंटी बजाने के बाद भी जब कहीं कोई असर नहीं हुआ, तब राकेश ने घंटी की आवाज और स्पीड दोनों में वृद्धि कर दी और कई मिनट लगातार इस लय में बजाया, मानो सत्यनारायण भगवान की कथा अब शुरू होने जा रही हो! लेकिन इस लयात्मक कथा का न किसी देवता पर असर हुआ न किसी जानवर पर और न ही किसी पेड़-पौधे पर। अचानक राकेश का धैर्य टूट गया और वो पूरे जोर से चिल्लाया-
“मंटुआ रे... ए मंटुआ...”
“अरे उठ रे... पिंकिया गई...”
“स्कूल चलना है कि नहीं?”
“नौ बज गया रे बेहूद्दा!”
“आज तुमको मनोहर मास्टर बुलाए हैं।”
लेकिन ये क्या? इस पुकार पर भी कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई। राकेश का सारा धैर्य टूट गया। उसने मान लिया कि सोते हुए आदमी को उठाना बहुत आसान काम है लेकिन सोने का नाटक करने वाले को उठाना वाकई कठिन काम है। अगर भगवान इस लौंडे को हमेशा के लिए उठा देते तो ज्यादा अच्छा रहता। उसकी झल्लाहट बढ़ने लगी। उसने साइकिल को दीवार के सहारे खड़ा किया और छत पर जाने के लिए तेजी से कदम बढ़ाने लगा। लेकिन जैसे ही सीढ़ी पर उसका पहला कदम पड़ा कि सामने से आ रही एक तेज आवाज से उसके कदम ठिठक गए।
“अरे रकेसवा... रुक! जानते नहीं हो कि लाट साहेब दस बजे तक सोते हैं? तुमसे कुछ छिपा है कि आकर चिल्ला रहे हो? अपना काम देखो। इसको जो पढ़ना है ये पढ़ चुका है। हम इसका भविष्य जान गए हैं। ये रात भर फिल्मी गाना सुनेगा, दस बजे सुबह उठेगा। फिर एक थरिया खाकर, बबरी झारकर, रेडियो लेकर सरयू में नाव चलाएगा। अरे ददरी मेला में बैल बेचकर इसके लिए साइकिल खरीदे कि पढ़कर एक दिन आदमी बन जाएगा, लेकिन इस बैल ने सारा पैसा माटी में मिला दिया। अब तो हम कान पकड़ लिए हैं। सारा सिलेमा का कैसेट तोड़कर सरजू जी में नहीं बहा दिए दिए तो हमरो नाम रमेसर नहीं।”
इस डाँट के बाद सीढ़ी चढ़ रहे राकेश के पैर सुन्न हो गए। वो यंत्रवत खड़ा हो गया। मानो चाहकर भी पैर आगे न बढ़ रहे हों। उसने नजरें नीची कर लीं और पीठ पर टँगा झोला झाड़ने लगा। तब तक फिर आवाज आई...
“सुन रकेसवा... तुमको फिर समझा रहे हैं, इसके पीछे अपना जीवन बर्बाद मत कर। पुरुब टोला से लेकर पच्छिम टोला और उत्तर टोला से लेकर दक्षिण टोला तक कौन लड़का है जो दस बजे तक सोता है? इसी के साथ पढ़े जोगिंदर चौधरी के लड़के बीटेक्स की तैयारी कर रहे हैं और ई ससुर तीन साल से इंटर में फेल हो रहे हैं। तुमको भी फेल होना है?”
इस प्रश्न के बाद तो राकेश को मानो साँप सूँघ गया। उसकी बोलती बंद हो गई। अचानक से एक लड़की की आवाज आई, “बाबूजी ऊ बीटेक्स नहीं, बीटेक कहा जाता है। बीटेक्स तो मलहम होता है।”
इतना सुनकर बाबूजी भड़क गए, “तुम चुप रहो! ज्यादा अकीला फुआ न बनो। जाकर मेरा कुर्ता लाओ।”
इस बात के बाद लड़की चुप हो गई। सीढ़ी पर खड़ा राकेश भी सहम गया। इधर चूल्हे पर लड़की की माँ रमावती खाना बना रही हैं और थाली में खाना परोसती जा रही हैं। तेज आवाज में बोलने वाले रमेसर को आज कचहरी जाना है, लेकिन मंटू के कारण गुस्सा है जो जाने का नाम नहीं ले रहा है। अचानक रमावती की तरफ देखते हुए रमेसर बोले, “देख ले, राजा बाबू राम-राम के बेरा मूड खराब कर दिए। बैठकर रोटी बेल... हो गया कचहरी और खोज लिए दामाद!”
चूल्हे पर रोटी बना रही रमावती ने चूल्हा फूँकना छोड़कर हाथ झाड़ा और बड़े प्रेम से बोलीं, “जाने दो बच्चा तो है अभी। इस उमर में सबका यही हाल होता है। बड़ा हो जाएगा तो समझदार हो जाएगा न!”
“हँ-हँ यही कहकर तो तुम ने इसको बिगाड़ दिया। बियाह हो गया होता तो इसके बच्चे अब तक स्कूल जा रहे होते। इसकी उम्र में हम चार भैंस रखते थे। बाबूजी अकेले थे। हम ही दियरा से चारा काटकर कपार पर लाते थे, फिर काटते थे तब भैंस खिलाकर पैदल पढ़ने जाते थे। आज न भोजन झट से मिल जा रहा तो नवाबी चढ़ी है राजा साहब को।”
रमावती चुप रहीं! माहौल में एकदम मुर्दा शांति छा गई। राकेश यंत्रवत सर झुकाए, हाथों से सीढ़ी की रेलिंग को साइकिल की चाभी से खुरचते हुए इन सब बातों को सुनता रहा! मानो किसी मूक आदेश का इंतजार कर रहा हो कि जरा-सा आदेश मिले, तो वो दौड़ता हुआ ऊपर मंटू के कमरे में चला जाए और रमेसर की चुभती बातों से जान बचे। लेकिन ये क्या रमेसर हैं कि बिना ब्रेक लिए बोले ही जा रहे हैं। रमावती को राकेश का चेहरा देख दया आ गई। स्नेह से देखते हुए और बात बदलते हुए पूछा, “और बता राकेश, माई कैसी है तुम्हारी?”
राकेश ने लाचार दृष्टि बनाई और रमेसर की गुस्सैल आँखों से नजरें बचाकर कहा, “एकदम ठीक हैं, मौसी।”
“गठिया ठीक हुआ?”
“पहले से ठीक है, मौसी। कल ही बलिया अस्पताल से दवाई लेकर लौटी हैं। डॉक्टर ने कहा है कि हमेशा के लिए तो नहीं, लेकिन चलने-फिरने भर की हो जाएँगी।”
इस जवाब के बाद खाना खा रहे रमेसर की आवाज फिर तेज हो गई। सीढ़ी पर खड़े राकेश की तरफ देखा और बोलने लगे, “ए राधेश्याम कऽ बेटा, पढ़ो-लिखो नालायक! वरना अपने बाप की तरह चाँदपुर घाट पर नाव चलानी पड़ेगी और माई किसी दिन गठिया से मर जाएगी।”
लीजिए हुआ बवाल। रमावती को रमेसर की इस बात पर इतना तेज गुस्सा आ गया कि चिमटा फेंककर और रोटी सेंकना छोड़कर गरजने लगीं, “ये अपशकुन मुँह से निकालते हुए लाज नहीं लगा? ज्यादा गर्मी चढ़ गई है सुबह-सुबह? कौन-सा पढ़कर हाईकोर्ट में जजी कर रहे हो? ईंट-भट्ठा की मुनीमी ही तो कर रहे हो? बाप गोबर पाथते हुए मर गए, तुम ईंटा पाथकर मर रहे हो। अब एक शब्द बोल दिए तो बता देंगे।”
लीजिए, एक झटके में रमावती की इस मिसाइल के आगे रमेसर ध्वस्त हो गए। आँगन का माहौल एकदम शांत हो गया। मानो बंदूक लेकर लड़ रहे किसी बड़े बंदूकबाज को किसी गुलेल वाले ने चित्त कर दिया हो। रमेसर खाना छोड़कर उठ गए। “ठीक है, हम तो चुप ही रहेंगे अब! जा रहे हैं। जिसको जो मन करना हो करे, ये घर रहने लायक है? सब अपने मन के राजा हो गए हैं! जहाँ एक से अधिक लोग मालिक हो जाए, वो घर कभी घर नहीं रहता है।”
राकेश अभी भी खड़ा रहा। वो निरुद्देश्य आसमान में ताकता रहा। रमावती ने रोटी तवे पर रखकर उसकी तरफ प्यार से देखा और भरपूर स्नेह भरी नजरों से दुलारते हुए कहा, “जाओ बेटा राकेश, मंटू को उठा दो। जाओ इनकी बात पर ध्यान नहीं दिया जाता। ये तो ऐसे ही बड़बड़ाते रहते हैं।”
तब तक किसी ने दरवाजे पर दस्तक दी, “कोई है?”
“मुनीम जी, ए रमेसर जी!”
“आ रहे हैं, आ रहे हैं बैठिए।” रमेसर ने उत्तर में आवाज लगाई और आँगन में गड़े हैंडपंप पर हाथ धोते हुए कहा, “ए गुड़िया ठाकुर को पानी पिलाओ, लग रहा कहीं से कोई समाचार आया है।”
गुड़िया मीठा-पानी लेने चली गई। रमेसर गमछा कंधे पर रखे और दालान में चले गए। इधर सीढ़ी पर खड़े राकेश के जान में जान आ गई। एक ठंडी साँस लेकर सीढ़ी चढ़ता गया और सोचता गया कि हे भगवान जान बची तो लाखों पाए, इस मंटुआ कमीने को तो आज छोड़ना नहीं है। इसी खयाल से कमरे में घुसते ही सबसे पहले उसने मंटू की रजाई खींची, फिर बेडशीट हटाया। तकिया फेंक दिया और मंटू की पीठ पर जोर का मुक्का जमाते हुए कहा, “अरे कमीना! चार लाठी देंगे अभी एक मिनट में सारी आशिकी भीतर घुस जाएगी। फिर सोते रहना तेरह बजे तक! पता है मौसा कितना बोले हैं हमको? बंदूक होता तो अब तक सारा चाँदपुर दियरा धुआँ-धुआँ हो गया होता।”
लेकिन ये क्या? इन बातों का मंटू के ऊपर कोई खास असर नहीं हुआ, बस इतना ही हुआ कि उसने हाथ-पैर मोड़कर एक कुंभकर्णी जम्हाई ली और फिर आँखें बंद करके सो गया। ये देखकर राकेश का बचा-खुचा धैर्य भी टूटने लगा, वो याचना की मुद्रा में आ गया, “अरे! मंटुआ, उठ भाई।”
“बक्क यार! सोने दे।”
“काहें नहीं उठ रहे? साढ़े नौ बज रहे, स्कूल नहीं चलना क्या?”
“नहीं जाना।”
गुस्से में राकेश ने रजाई फेंक दी।
“मत जाओ साले! पिंकिया जा रही है, आज परीक्षा का डेट आने वाला है। सोचा कि बता दें तुमसे! लेकिन आज हम कान पकड़ रहे हैं। आज के बाद पिंकिया जाए या पूनमी आए, क्लास चले या बंद रहे। हम अब तुमको कभी जगाने नहीं आएँगे, न कभी तुम्हारे घर आएँगे। कसम खा रहे हैं।”
राकेश इतना कहकर आलमारी में रखे कैसेटों का औचक निरीक्षण करने लगा। अचानक कमरे में लगे दो-चार पोस्टरों को देखकर उसके मिजाज में नर्मी आ गई।
“ठीके है, सो जाओ, हम ई मोहब्बते वाला लेकर जा रहे हैं। धड़कन का तुम हमारा लिए हो याद रखना। एक मेरा बेवफा सनम वाला परदीपवा लेकर चला गया है। कह रहा था की सुखरिया की साली को सुनाना है, साली ने उसका दिल तोड़ दिया है। साला अपना दिल और मेरे कैसेट का रील दोनों तोड़वा लाया है। मिल जाए जरा... उसकी भी आशिकी भीतर घुसानी है।”
इतना कहकर राकेश कमरे से निकलने लगा। मानो अब भैंस के आगे बीन बजाने से क्या फायदा? जाते-जाते थक हारकर एक रामबाण दवाई का प्रयोग कर दिया। “सोवो बेटा सोवो। पिंकि‍या आज ददरी मेला वाला पियरका सुटरवा पहनकर जा रही है।”
ये सुनते ही मंटू में एक ऐसी अदृश्य शक्ति का विस्फोट हुआ जिसका जिक्र प्रेम के किसी शास्त्र में नहीं किया गया है। उसकी आँखें खुल गईं। खोई हुई चेतना वापस आ गई। मानो प्यासे जेठ को सावन ने आवाज दे दी हो। उसने अपने बिखरे बालों को ठीक किया और एक दिलकश जम्हाई लेकर बड़े प्रेम से राकेश की तरफ देखकर बालों में उँगलियाँ फिराते हुए बोला, “सही में पिंकिया जा रही है?”
“नहीं नहीं, कहाँ जा रही है, वो तो हम झूठ बोलने की प्रैक्टिस करने आए थे न!”
मंटू इस व्यंग्य बाण से चुप हो गया। राकेश ने मफलर सँभालते हुए प्रेम से कहा, “यार अपने मौसा को समझाते क्यों नहीं हो? साला बोलने लगते हैं तो झांझा मेल की तरह रुकने का नाम नहीं लेते हैं।”
मंटू ने राकेश की शिकायतों को नजरअंदाज करके एक जोर की अँगड़ाई ली और तकिया गोद में भरके राकेश की तरफ देखने लगा, “अरे यार राकेश मौसा को गोली मारो। पता है, हम साला बड़ा खतरनाक सपना देख रहे थे यार। जानते हो, देख रहे थे कि मेरी साइकिल पिंकी की साइकिल में टकरा गई है, और हम दोनों सरसों के खेत में गिर गए हैं।”
“रे चिरकुट आदमी! ज्यादा साहरुख खान मत बनो। पहले साइकिल का पंचर तो बनवा लो तब न साइकिल लड़ाओगे।”
राकेश की इस शिकायत का मंटू पर कोई असर नहीं हो रहा था। उसने बाँहों को हवा में फैलाकर जम्हाई ली और फिर पूछा, “ए राकेश, सही में पिंकिया जा रही है कि दीपावली की तरह मुझसे आज भी मजाक कर रहे हो?”
राकेश को गुस्सा आ गया, “ठीक है हम मजाक कर रहे हैं। तुम सो जाओ आराम से, हम जा रहे हैं।”
राकेश की इस बात के बाद मंटू की मनोदशा में क्रांतिकारी परिवर्तन आया, “अरे! तब पाँच मिनट रुक मेरे भाई, पाँच मिनट... बस, भाई न!”
मंटू ने झट से याचना की मुद्रा बना ली। राकेश तटस्थ भाव से खड़ा रह गया। “भाई न, बस पाँच मिनट।” मंटू ने फिर वही याचना दुहराई।
राकेश कपार पर हाथ रखके खटिया पर बैठ गया।
चंद सेकेंड के अंदर मंटू देह तोड़ता, आईने में बालों को ठीक करता एक फिल्मी सीटी बजाया और चार-पाँच खूब गहरी साँस लेकर घड़ी में देखा कि सुबह के नौ बजकर बीस मिनट हो गए हैं। लैंप के द्वारा केमि‍स्ट्री की किताब में रासायनिक परिवर्तन हो गया है। उसने लैंप को मेज के नीचे रख दिया और सीधे लोटा लेकर नीचे भागा। पाँच मिनट के भीतर जैसे-तैसे मुँह धोकर, मंत्र स्नान करके, कपड़ा पहनकर फटाफट स्कूल बैग लिए कमरे में लगी प्रियंका चोपड़ा के बेहतरीन ‘अंदाज’ का दर्शन कर मन-ही-मन- ‘आएगा मजा अब बरसात का, तेरी-मेरी दिलकश मुलाकात का...’ पाठ किया और मन-ही-मन मान लिया कि भले अभी आग नहीं, पानी नहीं, प्रियंका चोपड़ा नहीं, लेकिन वो अक्षय कुमार से जरा भी कम नहीं है। इसलिए उसे जूते और घड़ी भी पहन लेने चाहिए। उसने महीने से बंद पड़ी अपनी कलाई घड़ी की ओर हिकारत की निगाह से देखा और घड़ी बंद होने के बावजूद खुद को समय का पाबंद महसूस करते हुए बिना बाल झाड़े, जूता झाड़ने लगा।
मंटू की मासूम आँखों में चमक बिखर गई। क्लास में बगल वाली डेस्क पर बैठी पिंकी के चित्र उसकी आँखों के सामने घूमने लगे। उसने खिड़की से झाँकते सूरज को देख प्रणाम की मुद्रा बनाई और मन-ही-मन धन्यवाद देने लगा कि हे सूरज भगवान! आज आप दस दिन बाद क्या निकले ‘चाँदपुर की चंदा’ भी निकल आई है। मन पुरइन की पात पर गिर रहे पानी जैसा छलकने लगा कि अचानक इस धन्यवाद कार्यक्रम में ब्रेक लग गया। नीचे से तेज आवाज आई, “टिफिन ले जा ए बबुआ।”
“मौसी भूख नहीं है।”
“अरे नालायक खा के तो जा!”
“अरे! आकर खा लेंगे मौसी, अभी तो क्लास शुरू हो रही होगी।”
इस बात पर फिल्म ‘दीवाना’ का कैसेट उलट-पलट रहे राकेश के चेहरे पर व्यंग्य भरी मुस्कान तैर गई, मानो मन-ही-मन कह रहा हो कि कौन-सी क्लास जा रहे हो बेटा, हमको सब पता है!
मंटू ने जूता पहनते हुए राकेश से पूछा, “आज संस्कृत वाले सर आएँगे?”
“नहीं रे... तिवारी जी जबसे इंग्लिश मीडियम वाली लड़की से बियाह किए हैं, तबसे उनका भी सारा रूप और लकार खराब हो गया है।”
“और इतिहास वाले?”
“इतिहास क्या चलेगा रे! मास्टर साहब खुद चलने लायक नहीं हैं। जिस दिन होमोसेपियंस के बारे में बताकर घर जा रहे थे उसी दिन टीएस बाँध पर उनको एक बंदर काट लिया।”
इस बात पर मंटू के मुँह से स्वाभाविक रूप हँसी निकल आई। शर्ट की बटन बंद करते हुए बोला, “तुम बहुत हरामी हो रे रकेसवा। क्या मनोहर मास्टर भी नहीं आएँगे?”
“आएँगे यार... वो नहीं आएँगे तो कौन आएगा। चलो तो पहले।”
“बस बस भाई एक मिनट!”
मंटू बड़ी तन्मयता के साथ अपने देशी झोले में काव्य संकलन, गद्य संकलन के बीच में दो-चार इंटर की गाइड और एक-दो ऐसी किताबें रखकर सीढ़ी उतरने लगा, जिन्हें क्लास के खाली घंटियों में पढ़ने का चलन अब अपने अस्तित्व की अंतिम लड़ाई लड़ रहा था। आँगन में उतरते ही उसने मुँह गोल करके सीटी बजाई और गुनगुनाने लगा, “वो लड़की नहीं, जिंदगी है मेरी।”
गाने को अनसुना कर सामने खड़ी रमावती ने टोका, “सुनो मंटू!”
“क्या मौसी?”
“बेटा, अब तो समय से उठा करो। कब तक मौसा को हम मनाते रहेंगे? आज बहुत नाराज थे। राकेश से पूछो, तुम्हारे चक्कर में कितना सुनना पड़ता है मुझे। आज ये भी सुन लिया। पता नहीं बेचारा मन में क्या सोच रहा होगा!”
राकेश ने आँखें झुकाकर धीरे से कहा, “कोई बात नहीं मौसी, इस गधे के लिए तो हम किसी की दुलत्ती भी सह लेंगे।”
मंटू ने हँसते हुए मौसी को गले लगा लिया, मानो ये अपनी गलती छिपाने की कोई पुरानी तरकीब हो। मानो मन-ही-मन कह रहा हो कि ओ मेरी मौसी तुम हो तो क्या फिक्र है। तुम हो तो हम इस मौसा के मौसा को भी देख लेंगे।
देखते-ही-देखते मौसी की आँखों में वात्सल्य का समंदर उमड़ आया। मंटू ने कसकर अँकवारी में पकड़ लिया। एक झटके में रमावती मातृ-प्रेम की प्रांजल मूर्ति में तब्दील हो गई। मंटू छह महीने का कोमल शिशु बन गया। उसकी गहरी आँखों में ठहरा प्रेम छलककर पूछने लगा, ‘क्यों सहती हो मेरे लिए किसी की बातें? कहाँ से लाती हो इतनी ममता, इतनी करुणा और इतना धैर्य?’
एक झटके में आँगन का दृश्य बदल गया। और भला क्यों न बदले? कहते हैं यहीं मंटू जब सोलह महीने का था तब इसकी माँ विमलावती को मलेरिया पकड़ लिया। रमावती तब बीमार बहन को देखने उसके गाँव रघुनाथपुर सिवान गई थी। अस्पताल के सभी डॉक्टरों ने हाथ जोड़ लिया। बाप के पास पटना-बनारस ले जाने की औकात नहीं थी। क्या होता? माँ चल बसी।
दो साल के नन्हे मंटू को रोता देखकर सबका कलेजा फटने लगा। बाप शराबी था। कौन सँभालता बच्चे को! बहन की लाश पकड़ के रो रही रमावती ने छाती से मंटू को लगा लिया था और अपने साथ लेकर चाँदपुर आ गईं।
आज इस घटना के सत्रह साल से ऊपर हो गए। न जाने कितनी बार चाँदपुर में बाढ़ आई और चली गई लेकिन मौसी की दुलार और स्नेह की बाढ़ में आज मंटू भूल गया है कि चाँदपुर उसका गाँव नहीं है। ये मौसी उसकी माँ नहीं हैं। ये गुड़िया उसकी बहन नहीं है। ये रमेसर उसके पापा नहीं हैं।
आज चाँदपुर के खेत-खलिहान भी जानते हैं कि यही चाँदपुर मंटू का गाँव है। सरयू के कछार पर चलती डेंगी को भी पता है कि यही पूरब टोले के रमेसर मुनीम का घर, मंटू का अपना घर है। यही मौसी रमावती उसकी माँ हैं, जिनको गाँव भर के लड़के चाची, काकी, बड़की माई की जगह मौसी ही कहते हैं।
आज मंटू अच्छी तरह से जानता है कि रमेसर की झुंझलाहट बिलकुल जायज है। पिछले साल की बाढ़ में जब चाँदपुर डूबने लगा था, तभी रमावती को डेंगू पकड़ लिया था। कौन इतना दूर डॉक्टर को दिखाने जाता। ओझा और सोखा के भरोसे होने वाली दवाई से रमावती मरने के कगार पर पहुँच गईं।
हालत जब ज्यादा खराब हुई तो बलिया सदर अस्पताल के डॉक्टर ने हाथ जोड़ के बनारस रेफर कर दिया। पैसे तो थे नहीं। रेवती ईंट-भट्ठे पर मुनीमी करने वाले इसी रमेसर ने चार कट्ठा खेत रेहन रखकर रमावती का इलाज करवाया। रमावती तो जैसे-तैसे बीमारी से ठीक हो गईं, लेकिन घर की आर्थिक हालत बीमार हो गई।
अब रमावती के जीवन का भी क्या भरोसा है! यही कारण है कि आजकल घर में गुड़िया की शादी की बातें चल रही हैं। रमेसर सोच रहे कि भले कुछ खेत बिक जाए लेकिन आँखों के सामने दामाद उतार लें। लेकिन मामला हर जगह दहेज पर अटक जा रहा है। जिसके कारण रमावती और रमेसर दिन-रात चिंता में डूबे रहते हैं।
इधर दिन भर किसी चिड़िया जैसी चहचहाने वाली गुड़िया ने भी अब बाहर आना जाना बंद कर दिया है। गाँव की सखियाँ कहती हैं कि कभी बाहर भी निकल लिया करो। लेकिन गुड़िया पिंजरे में रखे किसी मैनी चिड़िया-सी चुप लगाए रहती है। इसके बावजूद रमावती ने कभी अपना ये दर्द, ये चिंता, मंटू के सामने जाहिर नहीं किया। न ही आज तक किसी चीज की कमी महसूस होने दी। मंटू ने जो भी कहा, मौसी ने झट से हाजिर कर दिया। रमावती मंटू के कुर्ते की कॉलर ठीक करते हुए बोलीं, “बाल तो झाड़ ले ठीक से?”
मौसी के प्रति मंटू का प्रेम देखकर राकेश से रहा न गया। उसने पिन मारते हुए कहा, “ए मंटू, मौसा को भी गले लगा लो एक बार!”
मौसी हँस पड़ीं। गुड़िया ने हँसी छिपाते हुए कहा, “वो तो इसका सारा भूत भगा देंगे।”
राकेश और मंटू हँसते हुए घर के जनानी दरवाजे से बाहर आ गए, ताकि मौसा से नजरें न मिलें। हुआ भी यही। मंटू के जाते ही रमेसर आँगन में आ गए और आते ही कहा, “ए गुड़िया, उस पार से न्यौता है। नौ फरवरी को तिलक है चौदह को ब्याह। माई से कह दो। और सुनो, मेरा कुर्ता लाओ। नौ बजिया तो छूट गई, अब जीप या टेंपो का सहारा है। मंटुआ उठा कि नहीं?”
“स्कूल चला गया बाबूजी!” गुड़िया ने धीरे से बताया।
रमेसर चुप रहे। उधर रमावती हाथ में कचहरी के कागज लिए बक्से की चाभी को कमरे में खोंसते हुए आँगन में आकर बोलने लगीं, “ठाकुर से कहे होते की ब्याह लायक कोई लड़का बताइए। उस पार भी तो अच्छे लड़के हैं न? बेटी है तो दहेज तो हर जगह देना ही है, इस पार दें चाहें उस पार दें।”
रमेसर इस बात पर चुप रहे! आँगन बुहारते हुए रमावती ने फिर कहा, “अच्छा सुरेमनपुर वाले लड़के का क्या हुआ? क्या कह रहे थे मदन बाबू?”
“कह क्या रहे थे। तीन लाख और एक गाड़ी। पूरा गहना, टीवी, फ्रिज, कूलर सब माँग रहे हैं। लड़का बिकास भवन में चपरासी है। हीरो होंडा गाड़ी छेका में ही चाहिए। कहाँ से दें?” रमेसर ने कुर्ते की बाँह को चढ़ाते हुए कहा। रमावती का चेहरा उदास हो गया।
“मुँह क्यों बन गया बोलो? उ तो सरकारी नौकरी में है। आजकल आठवीं पास लड़के भी बीए की हुई लड़की खोज रहे हैं। जिसके दरवाजे पर एक खटिया तक नहीं है, वो भी दहेज में डबल बेड का पलंग खोज रहा। जिसके यहाँ साइकिल का पंचर एक हफ्ते बाद बनता है, वो भी कह रहा कि हम तिलक में ही गाड़ी लेंगे। समझ में आया कुछ?”
गुड़िया वहाँ से हट गई, हमेशा की तरह! जब-जब ब्याह की बातें होती हैं। बाबूजी की ये सब बातें उसके कानों में पत्थर के तीर की तरह चुभती हैं। एक अनजाना अपराधबोध उसकी साँसें तेज कर देता है।

 

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Q. चाँदपुर की चंदा PDF। Chandpur Ki Chanda किताब के लेखक कौन है?
Answer.   अतुल कुमार राय / Atul Kumar Rai  
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