आई लव यू / I Love You

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प्रेम कहानियाँ आपने खूब पढ़ी होंगी, लैला-मजनूं, हीर-रांझा जैसे अनेक प्रेम के किस्से आपके जेहन में हैं। ‘आई लव यू’ भी ऐसी ही प्रेमकथा है, जिस पर आपको शायद सहसा विश्वास न हो मगर ये आपके जेहन में बस जायेगी। चाहत और मोहब्बत हम पर किस कदर हावी होती है कि, हम उम्र के तमाम बंधनों को दरकिनार कर देते हैं। इस प्रेम कहानी को अविश्वसनीय इसलिए कहा गया है कि एक साथ कॉलेज में पढ़ते हुए, एक साथ स़फर करते हुए, बचपन से एक साथ रहते हुए, दो हमउम्र लोगों के बीच प्यार होना कोई नई बात नहीं है। लेकिन ये कहानी है पच्चीस वर्षीय ईशान और तीस वर्षीय स्नेहा की, जो बिलकुल अलग है। दोनों एक ऑफिस में हैं, लेकिन डिपार्टमेंट अलग हैं। ऑफिस में दोनों कभी नहीं मिले। ईशान अपनी ज़िन्दगी में प्यार तलाश रहा है और स्नेहा प्यार के इस पड़ाव को पार करके आगे बढ़ चुकी है। लव मैरिज और उसके बाद ससुराल की यातनाओं के बाद तलाक। एक बेटी की जिम्मेदारी के अलावा उसकी ज़िन्दगी में कोई रोमांच नहीं है। एक ऑफीशियल इवेंट के लिए दोनों का चंडीगढ़ जाना, इस मोहब्बत की कहानी की शुरूआत है। आगे क्या होता है आप खुद पढ़ लेंगे।

अप्रैल का महीना शुरू हो चुका था। दिल्ली की गर्मी अपने तेवर दिखा रही थी। जैसे-जैसे दिन चढ़ता, गर्मी तेज होने लगती, इसलिए सुबह जल्दी ऑफिस चले जाना और शाम को देर तक ऑफिस में बैठे रहने का रूटीन बना लिया था। ऑफिस में एसी की ठंडक अब सुकून देने लगी थी।
ऑफिस से लौटकर कमरे पर पहुँचा ही था, कि पापा का फोन आ गया था।
“हलो पापा, कैसे हो आप!”
“हम अच्छे हैं जनाब, आप कैसे हैं।”
“मैं भी अच्छा हूँ और अभी ऑफिस आया हूँ।”
“तो, कल तो संडे है, आओगे न इस बार घर?”
“हाँ पापा, रात में ही तीन बजे निकलूँगा।”
“ठीक है, आओ; चलते ही फोन करना।”
ऑफिस की छुट्टी थी। तीन महीने बाद पहली बार मैं अपने घर ऋषिकेश के लिए निकला था।
स्नेहा जब से मिली थी, तब से मैं घर ही नहीं गया था। जब भी घर जाने की बात करता था, तो स्नेहा का चेहरा उदास हो जाता था और उन्हें परेशान करके मैं कभी खुश नहीं रह सकता था।
तीन महीने से घर पर पापा, मम्मी, छोटा भाई और बहन इंतजार कर रहे थे मेरे आने का, पर मैं हर संडे किसी न किसी काम का बहाना लगा देता था… यही वजह थी कि पिछले महीने होली पर भी मैं ऋषिकेश नहीं गया था।
सुबह के तीन बज रहे थे।
कश्मीरी गेट से ऋषिकेश के लिए वॉल्वो में बैठ चुका था, तभी स्नेहा का फोन आया।
“कहाँ हो ईशान?”
“कश्मीरी गेट, वॉल्वो में; पर ये बताओ, अभी एक घंटे पहले ही तो मैंने सुलाया था तुमको…
मना किया था कॉल मत करना, आराम से सोना, मैं दिन निकलने पर कॉल करूँगा।”
“यार तुम जा रहे हो, वो भी दो दिन के लिए; मुझे बहुत डर लग रहा है… कैसे रहूँगी तुम्हारे
बिना?”- स्नेहा ये बोलते-बोलते रोने लगी थी।
“स्नेहा…स्नेहा…प्लीज! रोना बंद करो यार।”……

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