इंडियापा | Indiyaapa Book PDF Download Free by Vinod Dubey

पुस्तक का विवरण (Description of Book) :-

नाम / Name 📥इंडियापा PDF | Indiyaapa
Author 🖊️
आकार / Size 1 MB
कुल पृष्ठ / Pages 📖122
Last UpdatedAugust 11, 2022
भाषा / Language Hindi
Category

इस मोबाइल के दौर में, जब हर भोपाल, बनारस और पटना, मुंबई हो जाने को बेताब हैं , चंद सालों पहले की कहानियाँ ‘उन दिनों की बात’ होती जा रही हैं। यह सचमुच उन्हीं दिनों की बात है, जब चित्रहार में सबसे ज़्यादा गानें कुमार शानू जी गाते थे, IIT-JEE क्रैक करने वाला लौंडा मुहल्ले में ऐसे देखा जाता था जैसे वह चाँद से लौट के आया हो, एक लड़के के लिए लड़की को देखने से लेकर हाँथ छू लेने तक का सफ़र एवरेस्ट की चढ़ाई से कम नहीं था। अब यार, हर लौंडा कोई DDLJ का शाहरुख़ खान तो है नहीं कि इंडियन सियापों के अमरीश पुरी से लड़ जाये । पर जब हमारी कहानी के शुक्ला जी, इस इंडियापे से सींघ लड़ा ही रहे हैं, तो सही-ग़लत का फैसला वक़्त के हाथों छोड़, आप भी उनकी इस कहानी का मज़ा लीजिए। इंडियापा लेखक की पहली किताब है। पहली किताब, पहले प्यार की तरह बस हो जाती है, हमें ज़्यादा सोचने का वक्त नहीं देती। इसलिए इसे फ़ुर्सत से पढ़िएगा, ट्रेन के किसी लंबे सफ़र की फ़ुर्सत, exam के बाद वाली रात की फुर्सत, या फिर सर्दियों की धूप में औंधे मुँह पड़े रहने की फुर्सत... उम्मीद है कि विनोद दूबे की यह कहानी आपको फ़ुर्सत की उन्हीं पुरानी गलियों तक पहुँचाने का एक रास्ता बनेगी।

 

पुस्तक का कुछ अंश

फिनलैण्ड में उस दिन खूब बारिश हुई थी। कई बार बारिश भी लगता सारा हिसाब चुक्का-पुक्का करने आती है। मेरे केबिन में लगी घड़ी की सूइयों ने इशारा किया कि मेरे आफिस से घर लौटने का वक्त हो गया था। मैंने जिस अंदाज में लैपटाप बन्द किया, ठीक उसी अंदाज में अपनी पलकें भी बंद कीं। जैसे दोनों को आराम की जरूरत हो। कुछ पलों की खामोशी के बाद मौसम के जायजे के लिये अपने केबिन के ग्लास विंडो के पास जाकर खड़ा हुआ।

बारिश उस दिन का अपना हिसाब चुका गयी थी। अब उसका नामोनिशान भी नहीं बचा था। सबकुछ इतना नॉर्मल था जैसे, पोर्दू की बर्फीली वादियों में चम्पई धूप बरस के गयी हो। पोर्वु फिनलैण्ड का एक छोटा-सा शहर है और इसकी खासियत यह है कि पानी के बड़े-बड़े जहाज यहाँ आया करते हैं। मैंने खिड़की आहिस्ता से खोलकर अपनी हथेलियों में इस महीन कोहरे को पकड़ने की कोशिश की।

कोहरा हाथ से फिसलते-फिसलते ये सलाह दे गया कि मुझे ओवरकोट और बर्फीली हवाओं को झेलने की ताकत पहन के निकलने की जरूरत है। हाथ में ब्राउन कलर का बैग लिये मैं केबिन से बाहर एक रोबोट की तरह निकला। हर रोज की तरह वो दिन भी दुनिया की मण्डी में जैसे-तैसे किसी दाम पर बेच कर लौट रहा था। ये एहसास रोज होता है मुझे, उस दिन भी हुआ। लिफ्ट से नीचे लॉबी में पहुँचा ही था कि याद आया सेल फोन तो ऊपर ही भूल आया हूँ। “बड़े सुधभूलन हो तुम।

“मेरी माँ का सदाबहार ताना कानों में झनक गया। माँ बचपन से ये कहती रही है। और मैं भी कहाँ कम हूँ? अपनी किताब, अपना स्कूल बैग, अपनी चप्पल, अपने टिकट, अपना ब्रश मंजन। हर उम्र में कुछ न कुछ भूलते-भूलते मुझे माँ के इस ‘सुधभूलन’ वाले ताने की आदत सी हो गयी थी। सेल फोन शायद आफिस की टेबल पर या फिर वाशरूम में भूला होऊँगा, कल आकर देख लूँगा, वैसे भी एक दिन मेरे पास फोन ना होने से धरती घूमना तो नहीं बन्द कर देगी।

मैं खुद को समझाकर आगे बढ़ ही रहा था कि पीछे से आवाज आयी, “सागर, इज दैट योर फोन, आई गैस यू लेफ्ट इट इन द वाशरूम। ” मैंने देखा, मेरा कलीग केन मेरा फोन लिये लिफ्ट से बाहर आ रहा था। “थैंक्स केन।” मैंने अपना फोन लेकर अपने पॉकेट में रखा। ‘ओके, बाय’ कहते हुए केन अपने रास्ते निकल पड़ा और मैं अपने। हमारे देश में तो ‘फोन का क्या होता अगर उसे मैं नहीं मिलता, विषय पर घंटों चर्चा हो जाती, पर यहाँ किसी के पास वक्त नहीं है।

ऑफिस से ट्रेन स्टेशन तक की तकरीबन 20 मिनट की जर्नी और फिर ट्रेन की 10 मिनट की जर्नी। पूरे दिन की आपा-धापी में ये 30 मिनट ऐसे थे जिसमें मैं रोज सिर्फ अपनी जिंदगी से मुलाकात करता था। उस शाम, खामोश सड़क पर ताजा-ताजा पतझड़ और हल्की-सी बर्फबारी में ढेरों पीले और कत्थई रंग के पत्ते गिर आये थे। सड़क पर गिरे इन सूखे पत्तों को मैं गिनते हुए आगे बढ़ ही रहा था कि अचानक मेरे फोन पर एक मैसेज आया, “आर यू फ्री टू टॉक? सारिका।” इस मैसेज ने मेरे कदम रोक से दिए ऐसा हो भी क्यों न, सारिका उसकी बेस्ट फ्रेंड जो थी। सारिका से बात हुए काफी अरसा गया था। सारिका मेरी जिन्दगी में एक मैसेन्जर थी। किसी के साथ मेरे रिश्ते की गवाह थी वो।

हमने इंडियापा PDF | Indiyaapa PDF Book Free में डाउनलोड करने के लिए लिंक निचे दिया है , जहाँ से आप आसानी से PDF अपने मोबाइल और कंप्यूटर में Save कर सकते है। इस क़िताब का साइज 1 MB है और कुल पेजों की संख्या 122 है। इस PDF की भाषा हिंदी है। इस पुस्तक के लेखक   विनोद दुबे / Vinod Dubey   हैं। यह बिलकुल मुफ्त है और आपको इसे डाउनलोड करने के लिए कोई भी चार्ज नहीं देना होगा। यह किताब PDF में अच्छी quality में है जिससे आपको पढ़ने में कोई दिक्कत नहीं आएगी। आशा करते है कि आपको हमारी यह कोशिश पसंद आएगी और आप अपने परिवार और दोस्तों के साथ इंडियापा PDF | Indiyaapa को जरूर शेयर करेंगे। धन्यवाद।।
Q. इंडियापा PDF | Indiyaapa किताब के लेखक कौन है?
Answer.   विनोद दुबे / Vinod Dubey  
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