जम्मू कश्मीर के जननायक महाराजा हरि सिंह / Jammu Kashmir Ke Jannayak Maharaja Hari Singh PDF Download Free Book by Kuldeep Chand Agnihotri

पुस्तक का विवरण (Description of Book) :-

नाम / Name 📥जम्मू कश्मीर के जननायक महाराजा हरि सिंह / Jammu Kashmir Ke Jannayak Maharaja Hari Singh
Author 🖊️
आकार / Size 3.2 MB
कुल पृष्ठ / Pages 📖579
Last UpdatedMarch 17, 2022
भाषा / Language Hindi
Category,

जमू-कश्मीर के अंतिम शासक और उत्तर भारत की प्राकृतिक सीमाओं को पुनः स्थापित करने का सफल प्रयास करनेवाले महाराजा गुलाब सिंह के वंशज महाराजा हरि सिंह पर शायद यह अपनी प्रकार की पहली पुस्तक है; जिसमें उनका समग्र मूल्यांकन किया गया है। महाराजा हरि सिंह पर कुछ पक्ष यह आरोप लगाते हैं कि वे अपनी रियासत को आजाद रखना चाहते थे और इसीलिए उन्होंने 15 अगस्त; 1947 से पहले रियासत को भारत की प्रस्तावित संघीय सांविधानिक व्यवस्था का हिस्सा नहीं बनने दिया; जबकि जमीनी सच्चाई इसके बिल्कुल विपरीत है। इस पुस्तक में पर्याप्त प्रमाण एकत्रित किए गए हैं कि महाराजा हरि सिंह काफी पहले से ही रियासत को भारत की सांविधानिक व्यवस्था का हिस्सा बनाने का प्रयास करते रहे। पुस्तक में उन सभी उपलब्ध तथ्यों की नए सिरे से व्याख्या की गई है; ताकि महाराजा हरि सिंह की भूमिका को सही परिप्रेक्ष्य में समझा जा सके। महाराजा हरि सिंह पर पूर्व धारणाओं से हटकर लिखी गई यह पहली पुस्तक है; जो जम्मू-कश्मीर के अनछुए पहलुओं पर प्रकाश डालती है।

पुस्तक का कुछ अंश

प्रस्तावना
जम्मू-कश्मीर (तब सिर्फ कश्मीर के नाम से लोकप्रिय) रियासत के आखिरी शासक महाराजा हरि सिंह को नियति ने एक ऐसी परिस्थिति में डाला था, जो जटिल और कठिन थी। यह एक ऐसा युग था, जब द्वितीय विश्वयुद्ध की समाप्ति के बाद, शीत युद्ध अपने चरम पर था। सीमाओं की दृष्टि से हरि सिंह का राज्य अत्यंत महत्त्वपूर्ण था, जिसकी सीमा सोवियत संघ, अफगानिस्तान, तिब्बत और चीन के साथ लगती थी। 1947 के बाद, समान सीमा होने के कारण पाकिस्तान भी एक असहज पड़ोसी बन गया। इस कारण कोई आश्चर्य की बात नहीं कि अनेक पश्चिमी शक्तियाँ जम्मू-कश्मीर के भविष्य को लेकर चिंतित थीं। एक और मुद्दा था कि वह एक हिंदू थे, जो इस भू-रणनीतिक स्थिति के महत्त्व को बढ़ा रहा था। साथ ही, जिसने महाराजा हरि सिंह के बोझ को भी बढ़ा दिया। यह मुद्दा था कि वह एक हिंदू थे और एक ऐसे राज्य पर शासन कर रहे थे जिसकी आबादी में 75 प्रतिशत से अधिक हिस्सा मुसलमानों का था। एक हिंदू शासक द्वारा बहुसंख्यक मुसलिम आबादी पर शासन करने की विशिष्टता के साथ ही एक विषम परिस्थिति भी थी। ऐसी ही स्थिति के कारण भारत के राजनैतिक नेतृत्व ने 1946-47 में अंग्रेजों के साथ कुछ समझौते किए थे, जिनके तहत अंग्रेजों को भारत छोड़कर जाना पड़ा और इस प्रकार अंग्रेजी शासन का पटाक्षेप हो गया था। यह बात हम भी जानते हैं कि मजहब के आधार पर देश के बँटवारे को स्वीकार करने के फैसले ने आगे आनेवाले वर्षों में कई समस्याओं को जन्म दिया और देश आज भी उनसे जूझ रहा है।
सन् 1947 की गरमियों में जम्मू-कश्मीर में एक ऐसा संकट खड़ा हुआ, जिसने पत्रकारों, इतिहासकारों, अन्य टिप्पणीकारों आदि सभी प्रकार के लोगों का ध्यान अप्रत्याशित और अतुलनीय रूप से अपनी ओर खींचा। कई कारणों से हरि सिंह ऐसे अनेक विचारों के निशाने पर रहे हैं। लेखकों और विशेष रूप से पाकिस्तान तथा पश्चिम में बैठे लेखकों की ओर से हरि सिंह को लेकर एक बेहद आम सवाल उठाया जाता है। आखिर एक हिंदू शासक को क्या अधिकार है कि वह एक ऐसे राज्य पर शासन करे, जहाँ मुसलमान प्रजा बहुमत में है? किंतु इस प्रकार की समीक्षा क्या उस ऐतिहासिक प्रक्रिया को अनदेखा करने की भूल नहीं करती, जिसके कारण कश्मीर का जन्म हुआ है। जैसा कि हम जानते हैं—सदियों तक चली प्रक्रिया के दौरान कश्मीर एक मुसलिम बहुल प्रांत बना। हमारे संदर्भ में इससे भी कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण यह है कि यह राज्य भले ही मुसलिम बहुल हो गया हो, फिर भी इस क्षेत्र ने काफी हद तक हिंदू क्षेत्र के रूप में अपनी मौलिक प्रकृति और पहचान को बनाए रखा है। जैसा कि ऑर्गेनाइजर ने एक बार लिखा था। ऐतिहासिक रूप से कश्मीर भारत का एक हिस्सा रहा है, कश्मीर का हिंदू साम्राज्य इतिहास के प्राचीनतम सम्राज्यों में से एक है। यह हिंदू धर्म की आध्यात्मिक स्थली है। (15 जनवरी, 1948)
एक कहानी की सहायता से इन बातों को और भी अच्छी तरह से रखा जा सकता है। डॉ. एस.सी. चटर्जी उन 11,000 यात्रियों में शामिल थे, जिन्होंने 1960 में अमरनाथ यात्रा की थी। उन्होंने कश्मीर अफेयर्स (जुलाई-अगस्त 1961) पर एक लेख लिखा, जिसका एक खंड संयोगवश किसी अध्ययन के लिए शोध के दौरान मेरे हाथ लग गया। पहलगाम की चर्चा करते हुए, चटर्जी ने लिखा थाः कश्मीर का यह प्रमुख हिल स्टेशन उस मध्य भाग में है, जिसे शिव भूमि यानि भगवान् शिव के प्रदेश के रूप में जाना जाता है। यहाँ की अधिकांश झीलों, मैदानों और पहाड़ियों के नाम भगवान् शिव के ही नाम पर हैं। करीब के गाँव में एक झरना उस चट्टान को पखारता है, जिस पर ऋषि भृगु की तसवीर है, जो भारतीय ज्योतिष के जनकों में से एक हैं...श्रीनगर से चार मील की दूरी पर पंद्रेनस्थान है, जो कश्मीर की पुरानी राजधानी थी, जिसकी स्थापना राजा अशोक ने की थी कुछ ही दूरी पर चट्टानों को काटकर बनाया गया एक मंदिर है, जिसे मेरू वर्धन स्वामी कहते हैं, इससे करीब दो मील आगे पत्थर की खदान है, जहाँ भगवान गणेश की एक भव्य प्रतिमा है।
कश्मीर की काशी के नाम से भी मशहूर बीजबेहड़ा से कुछ मील आगे, एक मंदिर हुआ करता था, जिसे 14वीं सदी में सिकंदर शाह ने ध्वस्त कर दिया। (अनंतनाग से) कुछ मील दूर भगवान् सूर्य का एक मंदिर है। इसका निर्माण 8वीं सदी में राजा ललितादित्य ने कराया था।
इस अर्थ में क्या कश्मीर भारत के अन्य राज्यों के जैसा ही नहीं था? यह हम भी जानते हैं कि जनसांख्यिकीय संरचना को बलपूर्वक परिवर्तित किया गया, किंतु क्या इसका मतलब यह है कि एक क्षेत्र को देश के अन्य हिस्सों से काट दिया जाए, क्या सिर्फ इस कारण वह उन सदियों पुराने संबंधों को तोड़ दे, जिन्हें बनने में सदियाँ लग गईं कि लोगों ने धर्म बदल लिया या उन्हें धर्म बदलने पर मजबूर किया गया।
इस खंड का महत्त्व यह है कि इसके लेखक प्रो. कुलदीप चंद अग्निहोत्री ने हरि सिंह का एक ऐसा पक्ष सामने रखा है, जिस पर पहले शायद ही किसी ने भी थोड़ा-बहुत लिखा था। जैसा कि उन्होंने लिखा है, संभव है कि बड़ी संख्या में हिंदुओं ने इसलाम को अपना लिया हो, लेकिन हरि सिंह के शासनकाल में ऐसा एक भी मामला सामने नहीं आता, जिसमें धर्म बदलकर मुसलमान बने एक भी व्यक्ति ने पुराने धर्म को फिर से अपनाया हो या घर वापसी की हो। ऐसी निष्ठा से हरि सिंह अपनी प्रजा के साथ समानता और निष्पक्षता का व्यवहार करते थे।
प्रो. अग्निहोत्री पाठकों से हरि सिंह का परिचय सामान्य मनुष्य के रूप में भी कराते हैं। ऐसे समय में जब भारत की रियासतों के राजकुमार, जोकि अपनी अनियंत्रित एवं पतित जीवन-शैली के लिए जाने जाते थे, जिनके भ्रष्ट आचरण और सड़ाँध की कहानियाँ हर तरफ सुनी-सुनाई जाती थीं, उनके बीच हरि सिंह एक उल्लेखनीय अपवाद के रूप में नजर आते हैं। किसी को भी यह नहीं भूलना चाहिए कि वह भारत के सबसे बड़े रियासत के महाराजा थे। इसके बावजूद उनके आलोचकों को भी उनकी व्यक्तिगत जीवन-शैली पर कहने को ज्यादा कुछ नहीं मिला। अग्निहोत्री, श्रमसाध्य शोध से ज्ञात अनेक उदाहरणों को सामने रखते हैं, जिनसे यह स्पष्ट रूप से स्थापित हो जाता है कि हरि सिंह हृदय से एकदम सरल व्यक्ति थे। एक ऐसे व्यक्ति थे, जिनमें छल-कपट नहीं था। वह उन सिद्धांतों और मानकों पर अटल रहे, जिन्हें उन्होंने अपने और अपने परिवार के लिए तय कर लिया था। उन्हें इनसे डिगाना असंभव था। वह खर्च को लेकर अत्यधिक सावधान रहते थे और विरले ही राज्य के खर्च के साथ अपने खर्चों को मिलाया। वह कुछ अधिक ही उदार थे। इस खंड में अनेक घटनाओं की ओर ध्यान आकृष्ट किया गया है, जिनसे पता चलता है कि वह कितने नम्र थे और उनकी जीवन-शैली कितनी सादगी भरी थी। ऐसी अनेक कहानियाँ हैं, जो बताती हैं कि कैसे महाराजा अपनी मोटर गाड़ियों को रोककर आम लोगों को लिफ्ट दे दिया करते थे या यह देखकर कि किसी ताँगेवाले का घोड़ा इतना बूढ़ा हो चुका है कि वह अपने पेट नहीं पाल सकता है तो उसे नया घोड़ा खरीदने में मदद कर दिया करते थे।
हरि सिंह के इस मानवीय और सादगी भरे जीवन की बातें सुनकर किसी को भी यह अचरज हो सकता है कि आखिर क्यों उस समय की सरकार में प्रभावशाली और शक्तिशाली लोगों ने उन्हें हाशिए पर रखा हुआ था। क्यों उन्हें अपने राज्य से दूर रहने की हिदायत दी गई, और एक प्रकार से सुदूर बॉम्बे (मुंबई) में निर्वासित कर दिया गया, जहाँ से वह कभी लौट ना सकें। प्रो. अग्निहोत्री ने नई दिल्ली के इंपीरियल होटल में हरि सिंह की आखिरी रात का जीवंत वर्णन किया है। उन्होंने बताया है कि कैसे महारानी ने उनके साथ बॉम्बे जाने से इनकार कर दिया, और उसकी जगह कसौली जाने का फैसला किया। हमें उनके दयनीय आखिरी दिनों की भी जानकारी मिलती है, जब उन्होंने एक दस्तावेज तैयार करवाया और यह इच्छा जताई कि उनके अंतिम संस्कार में उनके परिवार के किसी भी व्यक्ति को शामिल न होने दिया जाए।
हरि सिंह की किस्मत भी कुछ ऐसी थी कि वह एक ऐसी स्थिति में फँस चुके थे, जिसमें भारत के दो सबसे शक्तिशाली और विख्यात नेता उनके बारे में अलग-अलग राय रखते थे। यदि इसे हल्के तौर पर रखें, तो प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू बस यह चाहते थे कि वह कश्मीर से बाहर रहें, क्योंकि सिर्फ यही रास्ता था, जिससे प्रधानमंत्री के पसंदीदा शेष मोहम्मद अब्दुल्लाह पूरी तरह कमान सँभाल सकते थे। दूसरी तरफ, गृहमंत्री सरदार पटेल ने ऐसा रुख अपनाया जिसका सार यह था कि ऐसा कोई निश्चित कारण नहीं था, जिससे कि भारत सरकार हरि सिंह की जगह शेख अब्दुल्लाह को चुन ले।
जैसे-जैसे समय बीता और परिस्थितियाँ सामने आईं तथा हम भी यह जानते हैं कि इसमें कोई संदेह नहीं रहा कि नेहरू गलती कर बैठे थे और शेख अब्दुल्लाह को समझने में उनसे भारी चूक हुई थी। इससे बड़ी विडंबना और क्या हो सकती है कि वही शेख अब्दुल्लाह जिन्हें भारत अपना सबसे भरोसेमंद मोहरा मान रहा था, उसे राज्य के प्रधानमंत्री पद से बेदखल कर सलाखों के पीछे डालना पड़ा। लगभग पाँच वर्षों के दौरान यह पूरी कहानी सामने आ गई। इसमें कोई शक नहीं कि नई दिल्ली में बैठकर नीति बनानेवालों से जम्मू-कश्मीर और विशेष रूप से हरि सिंह के मामले से निपटने में बहुत भारी गलती हुई।
अब्दुल्लाह ने हरि सिंह के जेल से रिहा होने के बाद जो बयान दिए उन पर सरसरी नजर भी डालें तो इस बात के संकेत मिल जाते हैं कि वह कह कुछ भी रहे हों, लेकिन उनके दिल और दिमाग में एक अलग ही योजना चल रही थी। कश्मीर से बाहर और नई दिल्ली में या देश के किसी भी अन्य हिस्से में, अब्दुल्लाह एक बहुत बड़े धर्मनिरपेक्ष व्यक्ति बन जाते थे। वह हमेशा पाकिस्तान प्रायोजित आक्रमण (1947) से कश्मीर की रक्षा करने के लिए भारत के प्रति गहरा आभार व्यक्त करते थे। इसके साथ ही, वह इस बात को जाहिर करने का एक भी मौका नहीं गवाते थे कि कश्मीर ने भारत के साथ मिलने का फैसला नेहरू और महात्मा गांधी को खुश करने के लिए नहीं, बल्कि अपनी आर्थिक जरूरतों के आधार पर किया। किंतु घाटी में लौटते ही, एक भी अवसर ऐसा नहीं होता था, जब वह लोगों को यह याद न दिलाते हों कि स्वतंत्रता ही कश्मीर के लोगों की स्पष्ट इच्छा और प्राथमिकता है। इस बात के संकेत पहले ही मिल गए थे कि अब्दुल्लाह कहाँ जाना चाहते थे। दुःख की बात है कि जिन लोगों को अब्दुल्लाह से निपटने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी, वे उनकी मंशा को भाँपने और योजनाओं का अंदाजा लगाने में नाकाम रहे।
यहाँ तक कि हरि सिंह के आलोचकों के विषय में भी कहा जाता है कि वे यह मानते थे कि उनके जमाने में राज्य की नौकरी भी योग्यता के आधार पर मिलती थी। धर्म को ध्यान में रखकर निर्णय नहीं लिये जाते थे। इसमें कोई शक नहीं कि यह अल्पसंख्यकों के पक्ष में दिखता था, जहाँ अल्पसंख्यकों से मतलब हिंदुओं से है, और इसका कारण यह था कि उनके पास उच्च शिक्षा थी। अब्दुल्लाह के शासन से इसकी तुलना करें तो उनके शासन में स्थिति एकदम उलट थी।
अब्दुल्लाह की नेशनल कॉन्फ्रेंस ने जब पहली बार महाराजा हरि सिंह को कश्मीर छोड़ने और डोगरा शासन को समाप्त करने का दबाव बनाने के लिए आंदोलन शुरू किया, तो यह अनिवार्य रूप से राजनीतिक नियंत्रण प्राप्त करने की योजना का ही एक हिस्सा था। प्रो. अग्निहोत्री ने यहाँ तक कहा कि अब्दुल्लाह के मार्गदर्शन में शुरु किया गया कश्मीर छोड़ो आंदोलन वास्तव में अंग्रेज अधिकारियों के षड्यंत्र और उनकी सलाह का परिणाम था। उत्तर पश्चिमी सीमांत प्रांत में जिस प्रकार अब्दुल गफ्फार खान एक बड़ी योजना को लागू करने में आड़े आ रहे थे, उसी प्रकार हरि सिंह भी दीवार बनकर खड़े थे, जिस योजना का उद्देश्य इन दोनों ही राज्यों को पाकिस्तान का हिस्सा बनाना था। वर्ष 1948 के बाद के दिनों में, अब्दुल्लाह अकसर हरि सिंह पर उस गंभीर संकट के समय में अपने लोगों को छोड़कर भाग जाने का आरोप लगाते थे, जब 1947 की शरद ऋतु की शुरुआत के साथ ही पाकिस्तान प्रायोजित आक्रमण शुरु हो गया था। इत्तेफाक से अनेक मुद्दों में से यह भी एक मुद्दा था, जिसे प्रधानमंत्री नेहरू हरि सिंह के विरुद्ध उठाया करते थे। हालाँकि, प्रो. अग्निहोत्री ने इस खंड में जिन बातों को सामने रखा है, उनके अनुसार हरि सिंह पर लगाया गया यह आरोप तथ्यात्मक रूप से सही नहीं था। इन आरोपों के विपरीत, हरि सिंह चाहते थे कि वे अपनी फौज और भारतीय सेना के साथ मिलकर आक्रमणकारियों को मार भगाएँ। अग्निहोत्री कहते हैं कि यह नेहरू ही थे जो चाहते थे कि अब्दुल्लाह अग्रणी भूमिका निभाएँ, ताकि उन्हें कश्मीर के रक्षक के रूप में पेश किया जा सके।
सच है कि इतिहास में अगर-मगर के लिए कोई स्थान नहीं होता। फिर भी, हरि सिंह को अगर श्रीनगर में रहने दिया जाता और आक्रमणकारियों को बाहर निकालने में भारतीय सैनिकों की मदद दी जाती, तो क्या बाद में जो परिस्थितियाँ बनी, वह आश्चर्यजनक रूप से एकदम अलग नहीं होती। इसका जवाब हाँ हो सकता है। इस खंड ने जिस प्रकार यह भी बताया है कि सरदार पटेल चाहते थे कि हरि सिंह महारानी के साथ अपने राज्य का दौरा करें। पटेल जानते थे कि राज्य में उनकी अच्छी-खासी लोकप्रियता है। लेकिन शेख अब्दुल्लाह ने इसमें अड़ंगा डाल दिया और सच यह है कि यह झूठा प्रचार किया कि हरि सिंह और उनका परिवार आक्रमणकारियों से घाटी की रक्षा करने की बजाय उसे छोड़कर भाग गया है। यह सब जानते हैं कि आक्रमणकारियों का मुकाबला करने में अब्दुल्लाह और उनके नेशनल कॉन्फ्रेंस ने अपनी भूमिका निभाई। इसमें शक नहीं कि श्रीनगर की रक्षा करना महत्त्वपूर्ण था, लेकिन यह भी सच है कि उन्होंने इसे एक बड़े मंच में बदल दिया जिसके आधार पर आगे चलकर अब्दुल्लाह ने जम्मू-कश्मीर पर शासन करने के अपने अधिकार का दावा कर दिया, पूरी तसवीर और इन दो प्रमुख हस्तियों के द्वारा निभाई गई भूमिका को समझने के लिए, 1947 के अंत में तेजी से बदलती परिस्थितियों पर गौर करना भी महत्त्वपूर्ण है। जैसा कि प्रो. अग्निहोत्री कहते हैं, हरि सिंह की लोकप्रियता का एक बड़ा कारण उनकी ओर से उठाए गए सामाजिक सुधार के कदम थे, जिनकी बड़े पैमाने पर प्रशंसा की गई थी। अगर अब्दुल्लाह को सत्ता पर कब्जा जमाना था, तो हरि सिंह की लोकप्रियता को कम करना आवश्यक था।
हरि सिंह पर यह आरोप लगाया गया था कि उन्होंने भारतीय संघ के साथ अपने राज्य के अधिमिलन (विलय) पर फैसला करने में देरी की। इस दृष्टि से अनेक अध्ययनों ने उन पर आरोप लगाए हैं कि उन्होंने भारत के लिए एक ऐसी समस्या खड़ी कर दी, जिसका हल भारत आज भी तलाश रहा है। हालाँकि, अग्निहोत्री जोर देकर कहते हैं कि ऐसा कोई महत्त्व रखनेवाला प्रमाण नहीं मिलता, जिससे यह कहा जा सके कि हरि सिंह ने कभी स्वतंत्रता या पाकिस्तान के साथ जाने पर विचार भी किया हो। उन्होंने निर्णय लेने में समय लिया, लेकिन उन्हें सदैव इस बात का भी एहसास था कि उनके पास भारत के साथ विलय का ही एकमात्र विकल्प है। वह जिन परिस्थितियों में फँसे थे, उन पर विचार करने के बाद उनकी मनोस्थिति को भी समझा जा सकता है। लगभग हर बड़ा ब्रिटिश अधिकारी चाहता था कि हरि सिंह पाकिस्तान के साथ विलय कर लें। पश्चिमी जगत् का प्रेस खुलकर भारत के विरुद्ध लिख रहा था। ऐसे में कोई भी कल्पना कर सकता है कि 1947 की गरमियों के दौरान हरि सिंह कितने दबाव का सामना कर रहे होंगे। अग्निहोत्री के मुताबिक, हरि सिंह से अंग्रेजों की नाराजगी वास्तव में गोलमेज सम्मेलन (1930) के बाद से ही बनी हुई थी। उस सम्मेलन में हरि सिंह ने अपने संबोधन में उल्लेखनीय रूप से कहा था कि अंग्रेजों को भारत की राजनैतिक माँगों पर अधिक उदार रवैया अपनाने की जरूरत है।
सन् 1953 की शुरुआत में, डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी और शेख अब्दुल्लाह के बीच हुए पत्रों के आदान-प्रदान की बातें सब जानते हैं। इस संवाद के दौरान डॉ. मुखर्जी को लिखी अब्दुल्लाह की एक चिट्ठी है, जिसमें उन्होंने हरि सिंह पर अनिर्णय तथा श्रीनगर पर हुए आक्रमण (1947-48) का सामना करने की जगह भाग जाने का आरोप लगाया था। अब्दुल्लाह को दिया गया डॉ. मुखर्जी का जवाब (दिनांक 23 फरवरी, 1953) दिलचस्प है। अब्दुल्लाह की ओर से की गई हरि सिंह की आलोचना पर डॉ. मुखर्जी ने कहा—
हम जब किसी व्यक्ति की निंदा करते हैं, उस समय भी हमें उसकी अच्छी बातों को नहीं भूलना चाहिए, सिर्फ यही एक महाराजा थे, जिनमें 20 वर्ष पहले इतना साहस था कि लंदन में गोलमेज सम्मेलन के दौरान खड़े हो सके और कहा कि अंग्रेजों को भारत के राजनीतिक स्वतंत्रता के सपने के प्रति प्रगतिशील रुख अपनाना चाहिए। इतिहास इस बात का गवाह है कि अपने इसी कार्य के लिए वह भारत के ब्रिटिश प्रशासकों की आँखों में चुभने लगे उनकी इस पहल से भारत सरकार और आप अपना मुख्य उद्देश्य प्राप्त करने में सफल रहे। आपने श्रीनगर से उनके भाग जाने का जिक्र किया है यह आरोप सही और उचित नहीं है मैंने दस्तावेजों को पढ़ा है यह असत्य है। लॉर्ड माउंटबेटन तथा अन्य नेताओं की स्पष्ट इच्छा के कारण महाराजा को श्रीनगर छोड़ने के लिए कहा गया था, क्या आपने उन्हें सितंबर, 1947 में पत्र नहीं लिखा था, जब आपने उन्हें भरोसा दिलाया था कि आप और आपकी पार्टी कभी उनके खिलाफ द्रोह की भावना नहीं रखते हैं, क्या आपने मार्च 1948 में नहीं लिखा था, जब महाराजा के पूर्ण सहयोग का सम्मान किया था और इस भावना (उनके प्रस्ताव का) की प्रशंसा की थी, आप पूरी तरह से यह समझते थे कि लोगों के हित के अनुसार महाराजा को यह बलिदान देना ही होगा और अपने फायदे के लिए तथा जिसे आप जम्मू-कश्मीर के लोगों का हित मानते थे, उसके लिए उनका पूरी तरह से इस्तेमाल करने के बाद आपको यह शोभा नहीं देता कि पूरा दोष उन पर मढ़ दें।
स्थितियाँ आखिर इस मोड़ तक क्यों पहुँच गईं? संभवतः सबसे आसान और समझ में आनेवाला उत्तर एक बार फिर श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने ही संसद् में अपने भाषण में दिया। भारत की विदेश नीति तथा पाकिस्तान के साथ संबंधों की दशा-दिशा निर्धारित करने की दृष्टि से साल 1950 की 6 और 7 दिसंबर की तारीख यादगार रहेगी। तिब्बत पर चीन के आक्रमण, कोरिया के संकट आदि के मुद्दे पर अनेक वक्ताओं ने अपनी बात रखी। वक्ताओं में, एच.एन. कुंजरू, एन जी रंगा, एम आर मसानी और डॉ. मुखर्जी प्रमुख थे।
जैसा कि हम जानते हैं जम्मू-कश्मीर में बढ़ते संकट से जिस प्रकार निपटा गया उसकी व्यापक आलोचना की जा रही थी। विशेष रूप से प्रधानमंत्री नेहरू को निशाना बनाया जा रहा था। चर्चा का एक प्रमुख मुद्दा प्रधानमंत्री की यह चिंता थी कि जम्मू-कश्मीर के संदर्भ में भारत की नीति को लेकर दुनिया के अन्य देश भारत के बारे में क्या सोचेंगे। अंतरराष्ट्रीयता के मुताबिक एक खास तरह की कार्रवाई की जानी चाहिए थी, लेकिन व्यावहारिकता और भारत के हित के अनुसार दूसरी कार्रवाई की आवश्यकता थी। उस समय अधिकांश लोगों की राय यही थी कि अधिमिलन पर हस्ताक्षर हो जाने के बाद जनमत संग्रह का कोई औचित्य नहीं रह जाता है। भारत के साथ अधिमिलन में सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह थी कि हरि सिंह ने उसी ढाँचे के तहत कार्रवाई की थी, जिसकी घोषणा ब्रिटिश सरकार ने की थी। ऐसे अन्य दस्तावेज भी हैं, जो बताते हैं कि नेहरू को भी यही महसूस हो रहा था। लेकिन अंतरराष्ट्रीयता को लेकर अपनी चिंता के कारण उन्होंने जनभावना के विरुद्ध फैसला कर लिया। नेहरू की योजना के अनुसार अब्दुल्लाह अधिक उपयुक्त, अधिक भरोसेमंद थे। लेकिन संसद् में डॉ. मुखर्जी ने क्या कहा था, उस पर लौटते हैं।
हमें भटकने की नीति से हर हाल में अपने आपको रोकना चाहिए, हमें निर्णय पर पहुँचना ही होगा। हमें सबको खुश करने की संभावना तलाशने से भी बचना होगा। यह एक खतरनाक खेल है। हमें अकसर उस बूढ़े चक्कीवाले की कहानी याद आती है, जो बेशक नैतिक सिद्धांतों पर चल रहा था, जिसने जर्जर पुल को अपने बेटे और अपने खच्चर के साथ पार करने की कोशिश की थी, कभी वह स्वयं खच्चर पर चढ़ जाता, तो लोगों के कहने पर बेटे को खच्चर पर बिठा देता, फिर अपने और बेटे के साथ खच्चर पर सवार हो गया, आखिर में खच्चर को कंधे पर उठा लिया, जिसका नतीजा यह हुआ कि वह खच्चर से हाथ धो बैठा।
प्रो. अग्निहोत्री के इस बेहतरीन शोध और मनोरंजक लेख का सबसे महत्त्वपूर्ण योगदान शायद यह है कि संभवतः पहली बार जम्मू-कश्मीर में संकट की कहानी को महाराजा हरि सिंह के परिप्रेक्ष्य और कोण से भी देखा गया है, जिनकी निसंदेह रूप से एक प्रमुख भूमिका थी। यह स्पष्ट होता है कि वह षड्यंत्रों, साजिशों और गलत फैसलों के कारण हार गए।
डॉ. मुखर्जी ने जब भारत सरकार द्वारा सबको खुश करने के प्रयासों की चर्चा की तो ऐसा लगता है कि वह लोगों के एक वर्ग के तुष्टिकरण की नीति की ओर संकेत कर रहे थे। हरि सिंह की जगह शेख अब्दुल्लाह को चुनते समय, नेहरू स्पष्ट रूप से अब्दुल्लाह द्वारा अपने आप को जम्मू-कश्मीर के मुसलिम आवाम के नेता के तौर पर पेश किए जाने से प्रभावित थे।
हरि सिंह ने जब भारत के साथ अधिमिलन के दस्तावेजों पर दस्तखत किए, तब उन्होंने तटस्थ रहते हुए निर्णय लिया। देरी अवश्य हुई, लेकिन शंका कभी नहीं थी। हरि सिंह के साथ जिस प्रकार का व्यवहार किया गया वह यही दिखाता है कि जो लोग कश्मीर के मामलों से निपट रहे थे, वे जमीनी हकीकत से कोसों दूर थे। अन्य राज्यों और रियासतों की तरह ही, जम्मू-कश्मीर का पूरा इलाका भी बरसों से भारत का अंग रहा है। इतिहास का हर लेखाजोखा और वर्णन इस तथ्य की पुष्टि करता है। हरि सिंह ने इतिहास के साथ तालमेल बिठाते हुए कार्य किया और सिर्फ इस कारण भारत के साथ विलय का निर्णय लिया, क्योंकि उन्होंने किसी अन्य विकल्प पर विचार ही नहीं किया था। बेशक कोई और विकल्प था भी नहीं। इस दृष्टि से, नेहरू जिस जनमत-संग्रह की बात पर बार-बार जोर दे रहे थे, उसके पीछे की एक वजह यह थी कि हरि सिंह हिंदू थे और उनकी प्रजा मुसलमान बहुल थी। 1947 की राजनीतिक समस्याओं के प्रति इस प्रकार का रुख अपनाने के कारण भारत को एक बड़ी कीमत चुकानी पड़ी और वह संकट आज भी बना हुआ है।
—रघुवेंद्र तंवर
प्रोफेसर, एमेरिटस
कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र एवं निदेशक, हरियाणा इतिहास और संस्कृति अकादमी, कुरुक्षेत्र

भूमिका
जम्मू-कश्मीर को लेकर जितना लिखा गया है, शायद भारत की किसी भी रियासत को लेकर इतना न लिखा गया हो। जब किसी विषय पर जरूरत से ज्यादा लिखा, बोला या कहा जाए, स्वाभाविक ही संदेह होता है कि या तो सच्चाई को छिपाने का प्रयास किया जा रहा है, या फिर उसे इतना उलझाने का प्रयास किया जा रहा है कि बाद में सत्य तक पहुँचना ही मुश्किल हो जाए। कई बार अपने अपराध बोध से विचलित होकर इतना जोर से चिल्लाया जाता है कि उस शोर में सत्य दबकर रह जाए। अपराध बोध से मुक्ति का एक और तरीका भी होता है। अपने पक्ष में ही दूसरे लोग खड़े कर लिये जाएँ, ताकि भीड़ देखकर स्वयं को ही लगने लगे कि मेरा पक्ष और निर्णय ठीक था। यह अपनी अंतरात्मा को दबाने की कठिन तांत्रिक साधना ही कही जा सकती है।
जम्मू-कश्मीर को लेकर जब मैं पंडित जवाहर लाल नेहरू के भाषण, आलेख और स्पष्टीकरण पढ़ता हूँ तो वे मुझे एक साथ ये सभी तांत्रिक साधनाएँ करते दिखाई देते हैं, लेकिन सच्चाई ऐसी चीज है, जो इन सभी तांत्रिक साधनाओं के बावजूद पीछा नहीं छोड़ती। बीसवीं शताब्दी में जब जम्मू-कश्मीर को लेकर सक्रिय भूमिका निभानेवाले सभी पात्रों के पाप उन्हीं पर भारी पड़ने लगे तो उनके लिए जरूरी हो गया था कि उनके झूठ को ही सत्य का दरजा दे दिया जाए और उनके पाप को ही पुण्य मान लिया जाए। हर युग का इतिहास साक्षी है कि जब सत्य का सामना करना बहुत मुश्किल हो जाता है तो उससे बचने के लिए किसी-न-किसी को सलीब पर लटकाना अनिवार्य हो जाता है, ताकि भविष्य में इतिहास के प्रश्नों के उत्तर दिए जा सकें। 1947 में जम्मू-कश्मीर में जो कुछ हो रहा था, उसका उत्तरदायी ठहराने के लिए महाराजा हरि सिंह से आसान शिकार और कौन हो सकता था? हरि सिंह के अपने ही चिराग-ए-खानदान कर्ण सिंह जम्मू-कश्मीर के रीजेंट बन गए और हरि सिंह बंबई में निष्कासित जीवन जीने के लिए अभिशप्त हुए। जिस महाराजा हरि सिंह के हस्ताक्षर से जम्मू-कश्मीर रियासत ने देश की संघीय लोकतांत्रिक संवैधानिक व्यवस्था को स्वीकार किया, बाद में उन्हीं को कठघरे में खड़ा कर दिया गया। दुर्भाग्य से महाराजा हरि सिंह के बारे में अभी तक जो कहा—सुना जा रहा है, वह न्याय के तमाम सिद्धांतों को ताक पर रखते हुए जारी फतवे मात्र हैं और उन्हीं फतवों को अब इतिहास मानने का आग्रह किया जा रहा है।
दुर्भाग्य से 1947 के बाद से जम्मू-कश्मीर रियासत के अंतिम दिनों में महाराजा हरि सिंह को लेकर जो भी शोध कार्य हुआ है, वह उन्हीं अधकचरी अवधारणाओं पर आधारित है, जो मीडिया ने और भारत सरकार के उस समय के अधिकारियों ने फैला रखी थीं। यह कार्य अभी तक भी जारी है।
महाराजा हरि सिंह के व्यक्तित्व व कृतित्व पर बहुत ही कम लिखा गया है, लगभग न के बराबर और जो लिखा भी गया है, वह उनकी मृत्यु के बाद लिखा गया है। इस विषय पर अब तक चार पुस्तकें अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित हुई हैं। इनमें से प्रो. सोमनाथ वाखलु की Hari Singh – The Maharaja, The Man The Times को कुछ सीमा तक महाराजा हरि सिंह की जीवनी कहा जा सकता है।
दूसरी पुस्तक Maharaja Hari Singh (1895-1961) जम्मू विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो. मनोहर लाल कपूर की है। यह पुस्तक महाराजा हरि सिंह और उनके प्रशासन पर विभिन्न विद्वानों द्वारा लिखे गए निबंधों व संस्मरणों का संकलन है, जिसका प्रकाशन महाराजा की जन्म शती के अवसर पर किया गया था।
तीसरी पुस्तक Jammu under the reign of Maharaja Hari Singh प्रो. सुरजीत सिंह सूदन द्वारा महाराजा हरि सिंह की शासन व्यवस्था का किया गया विश्लेषणात्मक अध्ययन है, जिसे मोटे तौर पर जम्मू संभाग तक ही सीमित रखा गया है। चौथी पुस्तक प्रो. हरबंस सिंह की Maharaja Hari Singh-The Troubled Years प्रकाशित हुई है। यह पुस्तक मोटे तौर पर 1947-48 के संक्रमण काल में रियासत में महाराजा हरि सिंह की भूमिका और जम्मू-कश्मीर पर हुए पाकिस्तानी आक्रमण के समय रियासती सेना के शौर्य का वर्णन करती है।
इसके अतिरिक्त कुछ अन्य महत्त्वपूर्ण पुस्तकों की चर्चा करना जरूरी है, जिनमें महाराजा हरि सिंह के जीवन के कुछ पक्षों पर प्रकाश पड़ता है। इनमें महाराजा हरि सिंह के काल से संबंधित चार व्यक्तियों की आत्मकथा है।। इनमें से दो पुस्तकों का जिक्र प्राथमिकता से किया जाना चाहिए। पहली, महाराजा हरि सिंह के सुपुत्र डॉ. कर्ण सिंह की आत्मकथा, जो अंग्रेजी में दो खंडों में प्रकाशित हुई थी। बाद में इसका संपूर्ण खंड भी प्रकाशित हुआ। इस पुस्तक का हिंदी अनुवाद ‘आत्मकथा’ के नाम से ही प्रकाशित हुआ। दूसरी पुस्तक जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री शेख मोहम्मद अब्दुल्ला की उर्दू भाषा में (जिसका अंग्रेजी अनुवाद भी प्रकाशित हो चुका है) लिखी आत्मकथा, ‘आतिश-ए-चिनार’ है। दोनों पुस्तकों में महाराजा हरि सिंह की छाया सर्वत्र दिखाई देती है। रियासत के पूर्व दीवान मेहरचंद महाजन की अंग्रेजी में लिखी आत्मकथा Looking Back भी इसी कोटि की है। राज्य के मुख्यमंत्री रह चुके मीर कासिम ने भी My life and times नाम से अपनी जीवनी लिखी है, जिसमें हरि सिंह के जीवन के कुछ पक्षों पर रोशनी पड़ती है। इसके अतिरिक्त मलिका पुखराज की आत्मकथा Song sung true के नाम से छपी है, जिसमें महाराजा हरि सिंह के जीवन के अनेक पहलुओं पर प्रकाश पड़ता है। प्रसिद्ध पत्रकार क्रिस्टोफर थामस की अंग्रेजी पुस्तक Faultline Kashmir में एक पूरा अध्याय Last Maharaja के नाम से मिलता है। इस लंबे अध्याय में महाराजा के जीवन और व्यक्तित्व पर महत्त्वपूर्ण सामग्री मिलती है। लेकिन दुर्भाग्य से अभी तक महाराजा हरि सिंह का समग्र अध्ययन नहीं किया गया है। मैंने अपने शोध कार्य में उपरोक्त सभी ग्रंथों का प्रयोग किया है, लेकिन जैसा कि डॉ. कर्ण सिंह लिखते हैं, ‘‘मेरी पुस्तक पढ़े बिना आप जम्मू-कश्मीर का सही इतिहास नहीं लिख सकते।’’(हरबंस सिंह की पुस्तक Maharaja Hari Singh-The Troubled Years के विमोचन के अवसर पर दिया गया भाषण) जाहिर है कि उनकी पुस्तक का अभिप्राय उनकी आत्मकथा से ही है। महाराजा हरि सिंह का मूल्यांकन करने के लिए मैंने उनकी इस पुस्तक को बार बार पढ़ा ही नहीं, बल्कि अपनी इस पुस्तक में उससे पर्याप्त सहायता भी ली है, लेकिन इतना तो वे भी मानेंगे कि हरि सिंह को लेकर उनके किए गए मूल्यांकन से सहमत होना तो अनिवार्य नहीं है। महाराजा हरि सिंह के विभिन्न समयों पर लिखे गए पत्र और शासनकाल में दिए गए कुछ भाषण अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं, जिनमें से कुछ किन्हीं किताबों के परिशिष्टों में स्थान प्राप्त कर चुके हैं, लेकिन सभी पत्रों को एक स्थान पर एकत्रित कर प्रकाशित करना जरूरी है, ताकि उनका समग्र मूल्यांकन हो सके।
वैसे तो जम्मू-कश्मीर पर कोई भी पुस्तक लिखी गई हो, उसमें हरि सिंह की छाया सर्वत्र दिखाई देगी ही। जम्मू-कश्मीर पर जो ग्रंथ लिखे गए हैं, उनमें तीन पक्ष प्रमुख हैं। पहला पक्ष तो अंग्रेज अधिकारियों का है, जिन्होंने महाराजा हरि सिंह के शासनकाल का वर्णन किया है। लेकिन ये विश्लेषण उस समय के अंग्रेज शासकों की रीति-नीति को ध्यान में रखकर ही लिखे गए हैं। यानी विश्लेषण उस उद्देश्य की पूर्ति के लिए सहायक हो, यही ध्यान रखा गया है। इसके अतिरिक्त दो पक्ष और हैं। भारतीय पक्ष और पाकिस्तानी पक्ष। पाकिस्तानी पक्ष मानता है कि महाराजा भारत में जाना चाहते थे। इसमें कोई संदेह नहीं कि जब मामला इतना संवेदनशील हो तो दोनों पक्षों के लिए निष्पक्ष रहना किसी सीमा तक संभव नहीं होगा, लेकिन ताज्जुब है एक बात से सभी सहमत दिखाई देते हैं कि महाराजा हरि सिंह जम्मू-कश्मीर को आजाद रखना चाहते थे, जबकि इस धारणा को पुष्ट करने के लिए इक्का-दुक्का परिस्थितिजन्य कमजोर साक्ष्य के अतिरिक्त कोई ठोस प्रमाण उपलब्ध नहीं है। लेकिन फिर भी यह धारणा बिना जिरह के ही जम्मू-कश्मीर संबंधी विपुल साहित्य में स्थायी निवास बना चुकी है। मेरा यह शोध कार्य इसी पृष्ठभूमि में से उपजा है। मैंने अपने इस शोध कार्य में किसी अप्रयुक्त सामग्री का प्रयोग किया हो, ऐसा मेरा दावा नहीं है। अभी तक उपलब्ध सामग्री के आधार पर ही मैंने नए सिरे से उसकी व्याख्या की है। इस व्याख्या के कारण ही महाराजा हरि सिंह को लेकर मेरे निष्कर्ष, अब तक के स्थापित निष्कर्षों से भिन्न हैं। मुझे लगता है अब समय आ गया है कि महाराजा हरि सिंह को कठघरे से निकालकर इतिहास में उन्हें उनका सम्मानजनक स्थान दिया जाए।
अध्ययन की सुविधा के लिए इस प्रबंध को तीन खंडों में विभाजित किया गया है। तीनों खंडों को आगे अनेक अध्यायों में बाँटा गया है।

प्रथम खंड
प्रथम अध्याय : डोगरा राजवंश की जय यात्रा
द्वितीय अध्याय : महाराजा हरि सिंह / प्रारंभिक जीवन
तृतीय अध्याय : हरि सिंह का ब्रिटिश सत्ता से संघर्ष /राजतिलक से 1935 तक
चतुर्थ अध्याय : महाराजा हरि सिंह और ब्रिटिश सरकार—आमने-सामने (1935 से 1947)
द्वितीय खंड
पंचम अध्याय : महाराजा हरि सिंह का संघर्ष और अधिमिलन का प्रश्न
षष्टम अध्याय : सुरक्षा परिषद् में जम्मू-कश्मीर और महाराजा हरि सिंह की अवहेलना
सप्तम अध्याय : महाराजा हरि सिंह का निष्कासन
अष्टम अध्याय : महाराजा हरि सिंह /निष्कासन से पदमुक्ति तक
नवम अध्याय : राज्य प्रबंध और विकास कार्य
तृतीय खंड
दशम अध्याय : अंतिम यात्रा
एकादश अध्याय : व्यक्तित्व और मूल्यांकन
द्वादश अध्याय : उपसंहार

इस शोध कार्य में जिन विद्वानों का सहयोग प्राप्त हुआ, उनका धन्यवाद ज्ञापन करना अनिवार्य है। जम्मू-कश्मीर अध्ययन केंद्र के सक्रिय सहयोग के बिना यह कार्य पूरा हो ही नहीं सकता था। केंद्र के निदेशक आशुतोष भटनागर से अनेक बार लंबे संवाद हुए, जिससे मुझे सही निष्कर्षों पर पहुँचने में सहायता मिली। उनके पास जम्मू-कश्मीर को लेकर जानकारियों का भंडार है। इसके अतिरिक्त इस पुस्तक की भाषा को संतुलित करने का कष्टसाध्य कार्य भी उन्होंने बड़ी लगन से किया। मुझे किसी भी पुस्तक की जरूरत होती थी तो रंजन चौहान उसको उपलब्ध करवाने का भरसक प्रयास करते थे। जम्मू-कश्मीर अध्ययन केंद्र की जम्मू शाखा के अशोकजी जम्मू प्रवास में मेरे मार्गदर्शक ही थे। जम्मू विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग के अध्यक्ष प्रो. शैलेंद्र जामवाल स्वयं भी जम्मू-कश्मीर मसलों के विशेषज्ञ हैं, इसके अतिरिक्त उनके पास रियासत से ताल्लुक रखनेवाली सामग्री का भंडार है। वह भंडार उन्होंने मुझे सहज भाव से उपलब्ध करवाया। अंत में दिए गए प्रथम और द्वितीय परिशिष्ट इन्हीं की पुस्तक Jammu & Kashmir From Autocracy to Democracy से लिए गए हैं। कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग में विभागाध्यक्ष रहे प्रो. रघुवेंद्र तंवर ने जम्मू-कश्मीर के आधुनिक इतिहास को खँगाला है। उन्होंने भी इस संबंधी कुछ सामग्री मुझे उपलब्ध करवाई। इस विषय पर उनसे अनेक बार चर्चा भी हुई। कहा भी गया है—एक घड़ी, आधी घड़ी, आधी हूँ ते आध। संतन सेती गोसटी, जो कीने सो लाभ।
ये विद्वान् इतिहास के ऐसे ही संत हैं, जिनकी गोसटी से मुझे लाभ हुआ है। जम्मू-कश्मीर की ओर मेरी रुचि इंद्रेश कुमारजी ने जाग्रत् की थी। यह पुस्तक भी उसी का प्रतिफल कही जा सकती है। प्रसिद्ध इतिहासकार डॉ. सतीश मित्तलजी से समय-समय पर मैंने पुस्तक की विषयवस्तु के अनेक प्रसंगों पर चर्चा की। उससे मुझे अपने निष्कर्षों तक पहुँचने में सहायता मिली। मध्य एशिया के मनोविज्ञान को जानने के लिए पंजाब खादी व ग्रामोद्योग बोर्ड के अध्यक्ष हरजीत सिंह ग्रेवाल से घंटों वार्त्तालाप होता रहा। उन्होंने अपने जीवन के कुछ महत्त्वपूर्ण साल मध्य एशिया में बिताए हैं। उस वार्त्तालाप से कश्मीर के संदर्भ में ग्रेट गेम को समझने में सहायता मिली। जम्मू-कश्मीर की स्थिति पर हिमाचल प्रदेश केंद्रीय विश्वविद्यालय धर्मशाला के रजिस्ट्रार सेवा निवृत्त ब्रिगेडियर जगदीश रांगड़ा से भी चर्चा हुई। उन्होंने अपने सैनिक जीवन के कुछ साल जम्मू-कश्मीर में भी बिताए हैं। प्रसिद्ध अर्थशास्त्री डॉ. सुदेश गर्ग, हिन्दुस्थान समाचार के पत्रकार समन्वय नंद, पंजाब सरकार के अतिरिक्त महाधिवक्ता राम स्वरूप प्रिंसिपल डॉ. विवेक कुमार, अरविंद गर्ग, मेरा बेटा तपन और उसकी माँ रजनी पुस्तक की तैयारी में मेरा उत्साहवर्धन करते रहे। हिंद भूषण, संजय सिंह ने पुस्तक की तैयारी में तकनीकी सहायता प्रदान की। सभी का आभार।
—कुलदीप चंद अग्निहोत्री
कुलपति, हिमाचल प्रदेश केंद्रीय विश्वविद्यालय
धर्मशाला (हिमाचल प्रदेश) 176215

1
डोगरा राजवंश की जय यात्रा
1. डोगरा वंश के पुरखे
जिस डोगरा वंश की विजय यात्रा का हम उल्लेख कर रहे हैं, वह इस ग्रंथ के लिए मुख्य रूप से महाराजा गुलाब सिंह से प्रारंभ होती है।1 इस वंश के संस्थापक शलाका पुरुष हरि देव थे। हरि देव के बाद गुज्जर सिंह हुए और उनके बाद हुए ध्रुव देव। ध्रुव देव से वंश की विस्तृत जानकारी उपलब्ध होने लगती है। ध्रुव देव के चार पुत्र थे। रणजीत देव, बलवंत देव, नसीरुद्दीन देव और सूरत सिंह। इनमें से रणजीत देव के आगे दो पुत्र हुए। ब्रज राज देव और दलेल सिंह। इसी प्रकार सूरत सिंह के चार पुत्र हुए। मियाँ मोता, जोरावर सिंह, मियाँ दुल्ला और दीवान सिंह। इनमें से आगे ब्रज राज देव के एक पुत्र था, संपूर्ण सिंह। दलेल सिंह का बेटा चेत सिंह था। जोरावर सिंह का बेटा किशोर सिंह था। चेत सिंह के दो बेटे थे। देवी सिंह और रघुवीर सिंह। किशोर सिंह के तीन बेटे हुए। गुलाब सिंह, ध्यान सिंह और सचेत सिंह। ‘‘जम्मू से लगभग बीस किलोमीटर पश्चिम दिशा में भारत-पाक सीमा पर स्थित है रामगढ़ का ऐतिहासिक गाँव। यह गाँव इन तीन भाइयों—गुलाब सिंह, ध्यान सिंह और सुचेत सिंह का पैतृक गाँव था, जो धूमकेतु की तरह पंजाब के राजनैतिक इतिहास में उभरे थे और जिन्होंने जम्मू-कश्मीर में एक सशक्त डोगरा राज्य स्थापित किया। इन तीन भाइयों का पिता मियाँ किशोर सिंह स्मैलपुर में अपनी पैतृक जागीर में जाकर बस गया था, लेकिन उसका बड़ा बेटा मियाँ गुलाब सिंह जम्मू के राजा के संरक्षक मियाँ मोटा को किसी कारण से नाराज कर रामगढ़ में जाकर बस गया था, जहाँ उसने अपने लिए एक हवेली का निर्माण किया था। यहीं पर दोनों भाइयों गुलाब सिंह और ध्यान सिंह की शादी रकवाल वंश की दो बहनों के साथ हुई, जो जागीरदार की बेटियाँ थीं। यहीं से दोनों भाइयों ने लाहौर प्रस्थान किया था, ताकि वहाँ जाकर वे महाराजा रणजीत सिंह की प्रसिद्ध सैनिक टुकड़ी चारयारी यानी चार हजारी में प्रवेश पा सकें। यह चार हजार घुड़सवारों की टुकड़ी थी और इसे पंजाब राज्य का स्तंभ गिना जाता था।’’2 लेकिन किशोर सिंह के इन पुत्रों की जय यात्रा प्रारंभ करने के लिए भी जरूरी है, उससे पूर्व के इतिहास पर एक विहंगम दृष्टि डाली जाए।
इतिहास में दूर तक डुबकी लगानेवाले मानते हैं कि आज से तीन हजार साल पहले अयोध्या के सूर्यवंशी महाराजा सुदर्शन के वंशज जम्बूलोचन ने जम्मू को बसाया था। तारीख-ए-डुग्गर देश के लेखक दीवान नरसिंह दास नरगिस के अनुसार जम्मू में तीन हजार साल की निरंतरता में एक ही राजवंश शासक रहा है, लेकिन इसको लेकर डोगरी साहित्य और संस्कृति पर निरंतर लिखते रहनेवाले शिवनाथ अपनी आँखें बंद नहीं कर सकते। उनके अनुसार, ‘‘यह कैसे संभव है कि एक ही राजवंश जम्मू में साढ़े तीन हजार वर्ष से आज तक निरंतर राज्य करता चला आ रहा हो?’’3 शिवनाथ के संशय अपनी जगह, लेकिन इसमें कोई संशय नहीं है कि उन्नीसवीं शताब्दी ने जब दस्तक दी, तब महाराजा रणजीत सिंह ने पूरे पंजाब में अपना राज्य स्थापित कर लिया था और उस समय के जम्मू नरेश जीत देव ने रणजीत सिंह को खिराज देना स्वीकार कर अपना राज्य बचा लिया था, लेकिन बकरे की माँ कब तक खैर मनाती। 1808 में एक बार फिर पंजाब की ओर से जम्मू पर हमला हुआ। इस बार इस आक्रमण का नेतृत्व भाई हुक्म सिंह कर रहे थे। हमले की बात सुनकर गुलाब सिंह भी दुश्मन का मुकाबला करने आ जुटे। उस समय उनकी उम्र मुश्किल से सत्रह साल थी। गुलाब सिंह की बहादुरी हुक्म सिंह से छिपी नहीं रह सकी, पर इससे भी जम्मू,पंजाब के साम्राज्य का हिस्सा होने से नहीं बच सका, लेकिन गुलाब सिंह इस युद्ध में अपना शौर्य दिखाने के बाद सत्रह साल की उम्र में नए अवसरों की तलाश में पंजाब के मैदानों की ओर निकल पड़े और अंततः 1809 में महाराजा रणजीत सिंह की सेना में उन्होंने अपना मुकाम हासिल किया। जे.डी. कनिंघम गुलाब सिंह की शुरुआत महाराजा रणजीत सिंह की सेना में एक प्यादे सैनिक से करते हैं, लेकिन दीवान किरपा राम सत्य के ज्यादा नजदीक ठहरते हैं। उनके अनुसार, ‘‘गुलाब सिंह को 275 रुपए मासिक तनख्वाह पर रेजीमेंट कमांडर नियुक्त किया गया था।’’4 1812 में महाराजा रणजीत सिंह ने जम्मू की जागीर अपने युवराज खड़क सिंह के नाम कर दी और 1816 में इसे अपने राज्य में मिला लिया। जम्मू से भागे राजा जीत देव ने ब्रिटिश इंडिया में पनाह ली। 1819 में कश्मीर को विदेशी अफगानों से मुक्त करवाकर रणजीत सिंह ने जम्मू राज्य का विस्तार किया, लेकिन इस कश्मीर विजय अभियान में गुलाब सिंह भी उनके साथ थे। 1820 में रणजीत सिंह ने किशोर सिंह को जम्मू राज्य का राज्यपाल नियुक्त कर दिया। 1822 में किशोर सिंह के देहांत के बाद महाराजा रणजीत सिंह ने गुलाब सिंह को नया राज्यपाल बनाया।
2. गुलाब सिंह का राजतिलक
16 जून, 1822 को महाराजा रणजीत सिंह ने स्वयं अपने हाथों से गुलाब सिंह को जम्मू का परवाना दिया, जिसके अनुसार, ‘‘इस पावन अवसर पर मैं अत्यंत प्रसन्नता एवं स्नेहसिक्त हृदय से गुलाब सिंह को, उस द्वारा निष्ठा व चेतन मन से की गई सेवा के एवज में, चकला जम्मू का राज्य प्रदान करता हूँ। यह राज्य अंतराल से गुलाब सिंह के पूर्वजों के पास ही रहा है। गुलाब सिंह और उनके भाई ध्यान सिंह व सुचेत सिंह छोटी आयु में ही मेरे दरबार में आए थे और उन्होंने अत्यंत स्वामिभक्ति व निष्ठा से मेरी और राज्य की सेवा की। इनके पूर्वजों ने भी लंबे समय तक मेरे पिता श्री महां सिंह, जिनकी याद से ही मन प्रसन्न होता है, की अत्यंत विश्वास से सेवा की थी। इन तीनों भाइयों ने मुझे संतुष्ट करने में और समर्पण भाव से सेवा करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। वे सदा ही मेरे विश्वासपात्र और राज्य के प्रति निष्ठावान बने रहे। उन्होंने काबुल की सेना के साथ युद्धों में, सीमांत पर विद्रोह के दमन और उनको सजा देने में, मुल्तान के पतन और कश्मीर की विजय के अभियानों में अपना रक्त बहाया है। इनकी इन्हीं सेवाओं व अन्य सेवाओं को ध्यान में रखते हुए मैं चकला जम्मू का राज्य राजा गुलाब सिंह और उनके उत्तराधिकारियों को प्रदान करता हूँ। मैं अपने इस निष्ठावान एवं विश्वासपात्र सेवक का स्वयं, प्रभुसत्ता के प्रतीक रूप में मस्तक पर तिलक लगाते हुए राजतिलक कर रहा हूँ। प्रसन्न भाव से मैं इस अवसर पर राजा सुचेत सिंह एवं उसके उत्तराधिकारियों को भी उसकी सेवा के बदले रामनगर का राज्य प्रदान करता हूँ। वे स्वयं और उसके उत्तराधिकारी, इस राज्य की आय का अपने खाते में समावेश कर सकते हैं, लेकिन ये राज्य इनको इस शर्त पर ही प्रदान किए गए हैं कि ये भाई लाहौर दरबार के प्रति सदा उतने ही निष्ठावान रहेंगे, जितने अब तक रहे हैं। ये हमारे उत्तराधिकारियों के प्रति भी उतने ही समर्पित व निष्ठावान रहेंगे। इनके उत्तराधिकारी भी हमारे व हमारे उत्तराधिकारियों के प्रति निष्ठावान रहेंगे। साक्षी रूप में मैं स्वयं अपने हाथों से अपना यह परवाना केशर के साथ प्रदान करता हूँ। दिनांक 4 आषाढ़ 1879 विक्रमी संवत्।5 इस प्रकार जम्मू, लाहौर दरबार की सहायक रियासत स्वीकार कर ली गई।
3. राजा जीत देव द्वारा गुलाब सिंह को मान्यता
लेकिन गुलाब सिंह जानते थे कि जम्मू राज्य के लोग अभी भी राजा जीत देव को राज्य का स्वाभाविक उत्तराधिकारी और शासक स्वीकार करते हैं। इसलिए उसने ब्रिटिश इंडिया में शरण लिए जीत देव से समझौता कर लिया और उसे अपने पक्ष में राज्य त्याग देने के लिए राजी कर लिया। राजा जीत देव ने स्वयं गुलाब सिंह के पक्ष में घोषणा की। फारसी में लिखी इस घोषणा के अनुसार, ‘‘मैं राजा साहब रणजीत देवजी का पौत्र राजा जीत सिंह अपने जीवन काल में ही इस अवसर पर आंतरिक प्रेम और स्नेह के कारण, अपने पूर्वजों द्वारा अर्जित और संरक्षित तमाम इलाके का स्वामित्व, धर्म और नियम के अनुसार अपने बरखुरदार राजा-ए-राजगान राजा गुलाब सिंहजी, राजा साहब ध्यान सिंहजी और राजा सुचेत सिंहजी के पक्ष में अपने पूर्वजों, ठाकुरों और गुरुओं की शपथ लेकर समर्पित करता हूँ।’’ इस प्रकार गुलाब सिंह वंश परंपरा के हिसाब से भी जम्मू नरेश बने, लेकिन ध्यान रखना होगा जम्मू राज्य लाहौर दरबार के विशाल साम्राज्य का ही हिस्सा था और गुलाब सिंह उसके प्रतिनिधि के तौर पर ही वहाँ के शासक थे। ध्यान सिंह और सुचेत सिंह तो लाहौर में ही रहते थे, लेकिन गुलाब सिंह ज्यादा समय जम्मू के अपने राज्य में रहकर ही शासन व्यवस्था को सुधारने के काम में व्यस्त रहते थे। कभी कभार बुलाने पर ही लाहौर जाते थे, लेकिन गुलाब सिंह उस प्रकार के राजा नहीं थे, जो अपने राज्य की सीमाओं में ही खोकर रह जाते। वे राज्य विस्तार के लिए उत्सुक एक महत्त्वाकांक्षी नरेश थे। कश्मीर घाटी की ओर वे बढ़ नहीं सकते थे, क्योंकि वहाँ रणजीत सिंह ने अलग सूबेदार नियुक्त किया हुआ था। गुलाब सिंह के राज्य में उसको शामिल नहीं किया गया था। तब उन्होंने आसपास के दूसरे इलाकों की ओर ध्यान दिया।6 इस प्रकार शुरू हुआ जम्मू राज्य के विस्तार का इतिहास।
4. राजा गुलाब सिंह द्वारा राज्य विस्तार
जिन दिनों पंजाब के शासक महाराजा रणजीत सिंह मुगलों की गुलामी से ज्यादा से ज्यादा क्षेत्र को आजाद करवाने की कोशिश कर रहे थे और कश्मीर तक में उन्होंने खालसा पंथ का केसरिया निशान झुला दिया था, उन्हीं दिनों महाराजा गुलाब सिंह भी जम्मू संभाग के छोटे-छोटे राज्यों को अपने राज्य में समाहित करके अफगानिस्तान तक की सीमा के क्षेत्र को आजाद करवाने में लगे हुए थे। ‘‘अगले पंद्रह सालों में इन तीनों भाइयों ने आसपास के सभी छोटे-बड़े रजवाड़ों को जीत लिया। जोरावर सिंह के नेतृत्व में गुलाब सिंह की सेनाओं ने लद्दाख और बल्तीस्तान को पराजित किया और तिब्बत तक पर आक्रमण कर दिया।’’7 उन्होंने भारत की सीमाओं को उसके स्वाभाविक स्वरूप में पुनः स्थापित करने का निर्णय किया।
इसके लिए उन्होंने एक चतुर कूटनीतिज्ञ की तरह साम दाम दंड भेद—सभी तरीकों का इस्तेमाल किया। रावी और जेहलम के बीच का पूरा डुग्गर क्षेत्र जम्मू राज्य में समाहित हो चुका था। इन क्षेत्रों को मुक्त करवाने के बाद उन्होंने रूस, चीन और अफगानिस्तान की सीमा को छूते हुए विशाल जम्मू-लद्दाख राज्य की स्थापना की। गुलाब सिंह ने, ‘‘जनरल जोरावर सिंह और दूसरे वीर डोगरा फौजी अफसरों और सिपाहियों की सहायता से लद्दाख, जंस्कार, बल्तीस्तान और इस्कर्दू को जीता और एक विशाल साम्राज्य की स्थापना की। उसे स्वायत्त शासन देकर, उत्तर में भारत की सीमाओं का विस्तार किया।’’8 गुलाब सिंह पर रणजीत सिंह का बहुत विश्वास था और गुलाब सिंह भी रणजीत सिंह के प्रति निष्ठा रखते थे। अत रणजीत सिंह ने गुलाब सिंह के इन विजय अभियानों का विरोध नहीं किया, क्योंकि गुलाब सिंह यह सब लाहौर दरबार के नाम पर ही कर रहे थे। राज्य पर प्रभुसत्ता तो लाहौर दरबार की ही थी।
5. रणजीत सिंह का देहांत और प्रथम पंजाब युद्ध
लेकिन 27 जून, 1839 को महाराजा रणजीत सिंह का 59 वर्ष की आयु में देहांत हो गया। उसके बाद ईस्ट इंडिया कंपनी ने अपने राज्य विस्तार और व्यापारिक हितों के लिए पंजाब पर नजरें जमा दीं। महाराजा रणजीत सिंह की मौत के बाद पश्चिमोत्तर भारत में उनका विशाल साम्राज्य खंडित होने लगा। दरबार में उत्तराधिकार के लिए रणजीत सिंह के परिवार में ही घमासान मचा। षड्यंत्रों के घात-प्रतिघात होने लगे। महलों के इन षड्यंत्रों में गुलाब सिंह के भाई इन षड्यंत्रकारियों का शिकार होकर मारे गए। उनके परिवार के सदस्य मारे जा रहे थे। ध्यान सिंह का दिन-दिहाड़े कत्ल किया गया। गुलाब सिंह का बेटा मारा गया। इतना ही नहीं, रानी जिंदा ने गुलाब सिंह को भी बंदी बना लिया और उन्हें मारने की साजिश रची। यह तो उनकी अच्छी किस्मत थी कि वे अपनी कूटनीति से लाहौर से सही-सलामत वापस जम्मू पहुँच सके।9 इधर लाहौर दरबार में विभिन्न सरदारों की आपसी कलह शांत नहीं हो रही थी। एक के बाद एक सभी को परस्पर विद्वेष के चलते मारा जा रहा था।
महाराजा सेना के हाथों की कठपुतली बनकर रह गए। अंत में महारानी जिंदा के भाई जवाहर सिंह भी कत्ल कर दिए गए। इस कत्ल ने महारानी जिंदा के मन में सरदारों को समाप्त करने और उनसे बदला लेने की भावना पैदा कर दी। उसे लगा कि यदि लाहौर रियासत की सेना को अंग्रेजों से भिड़ा दिया जाए तो दरबार में से इन सरदारों का दबदबा समाप्त हो जाएगा और वह अंग्रेज सरकार की सहायता से राज कर सकेगी। कंपनी बहादुर भी रणजीत सिंह के साम्राज्य की ओर ललचाई नजरों से देख रही थी। लाहौर दरबार के भाग्य विधाता या तो सतलुज के पार से देख रही ब्रिटिश गिद्ध नजरों को समझ नहीं पा रहे थे या फिर वे स्वयं ही आत्महत्या के रास्ते पर चल चुके थे। नवंबर, 1845 को रियासत-ए-लाहौर के प्रधानमंत्री लाल सिंह बन चुके थे और सेना का कमांडर इन चीफ तेजा सिंह था। दुर्भाग्य से ऐसा कहा जाता है कि ये दोनों अंग्रेजों को घर का भेद देनेवाले सिद्ध हुए। शाह मोहम्मद अपने जंगनामा में इसका संकेत करता है। महारानी जिंदा की साजिश का उल्लेख उसने इस तरह किया है1

हमने जम्मू कश्मीर के जननायक महाराजा हरि सिंह / Jammu Kashmir Ke Jannayak Maharaja Hari Singh PDF Book Free में डाउनलोड करने के लिए लिंक निचे दिया है , जहाँ से आप आसानी से PDF अपने मोबाइल और कंप्यूटर में Save कर सकते है। इस क़िताब का साइज 3.2 MB है और कुल पेजों की संख्या 579 है। इस PDF की भाषा हिंदी है। इस पुस्तक के लेखक   कुलदीप चंद अग्निहोत्री / Kuldeep Chand Agnihotri   हैं। यह बिलकुल मुफ्त है और आपको इसे डाउनलोड करने के लिए कोई भी चार्ज नहीं देना होगा। यह किताब PDF में अच्छी quality में है जिससे आपको पढ़ने में कोई दिक्कत नहीं आएगी। आशा करते है कि आपको हमारी यह कोशिश पसंद आएगी और आप अपने परिवार और दोस्तों के साथ जम्मू कश्मीर के जननायक महाराजा हरि सिंह / Jammu Kashmir Ke Jannayak Maharaja Hari Singh को जरूर शेयर करेंगे। धन्यवाद।।
Q. जम्मू कश्मीर के जननायक महाराजा हरि सिंह / Jammu Kashmir Ke Jannayak Maharaja Hari Singh किताब के लेखक कौन है?
Answer.   कुलदीप चंद अग्निहोत्री / Kuldeep Chand Agnihotri  
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