काला मोती: ब्रह्मकण शक्ति / Kala Moti Brahmakan PDF Download Free Hindi Books by Shivendra Suryavanshi (Ring of Atlantis Book 6)

पुस्तक का विवरण (Description of Book of काला मोती: ब्रह्मकण शक्ति / Kala Moti Brahmakan PDF Download) :-

नाम 📖काला मोती: ब्रह्मकण शक्ति / Kala Moti Brahmakan PDF Download
लेखक 🖊️
आकार 8.8 MB
कुल पृष्ठ395
भाषाHindi
श्रेणी, ,
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सप्तशक्ति- ब्रह्मांड के निर्माण के लिये ईश्वर ने पहले सप्तशक्तियों का निर्माण किया। ये सप्तशक्तियां थीं- वायु, जल, अग्नि, पृथ्वी, आकाश, ध्वनि और प्रकाश। इन सभी सप्तशक्तियों ने मिलकर ब्रह्मांड में उपस्थित सभी ग्रहों की रचना की। परंतु अभी भी जीवन की उत्पत्ति संभव नहीं हो सकी थी। जीवन की उत्पत्ति के लिये ब्रह्मदेव ने एक कण की रचना की, जिसे बाद में ब्रह्मकण के नाम से जाना गया। इस ब्रह्मकण में जीवन की उत्पत्ति के अलावा इन सभी सप्तशक्तियों को नियंत्रित करने की शक्ति भी थी।

ब्रह्मांड की रचना के बाद ब्रह्मदेव ने इस ब्रह्मकण को एक काले मोती में समाहित कर समुद्र की अथाह गहराइयों में कहीं छिपा दिया? परंतु एक दिन एक नीली जलपरी की गलती से ‘काला मोती’ ग्रीक देवता पोसाइडन के हाथ लग गया। इसके बाद शुरु हुई रहस्य व रोमांच से भरी ऐसी कहानी, जिसने पृथ्वी ही नहीं वरन् ब्रह्मांड के कई ग्रहों को अपनी चपेट में ले लिया।

फिर शुरु हुई एक ऐसी प्रश्नावली जिसने सभी के मस्तिष्क को पूरी तरह से झकझोर कर रख दिया-
1) क्या हुआ जब ब्रह्मदेव का जन्म सहस्त्रदल कमल पर हुआ? क्या ब्रह्मदेव अपने जन्म के रहस्य को समझ सके?
2) क्या हुआ जब ब्रह्मकण से जन्मी लावण्या, अरिगंधा के राजकुमार मेघवर्ण को लेकर अथाह समुद्र की गहराइयों में चली गई?
3) क्या नीलाभ महादेव की शक्तियों को प्राप्त करने के लिये, काशी जाकर कालभैरव से आशीर्वाद प्राप्त कर सका?
4) क्या हुआ जब समयचक्र ने भविष्य को बदलना शुरु कर दिया?
5) क्या हुआ जब तिलिस्मा में घूम रही 12 राशियों ने अलग-अलग प्रकार से तिलिस्मा में प्रवेश किये लोगों पर आक्रमण कर दिया?
6) क्या था काँच की तितली का रहस्य, जो लोगों का अपहरण कर उनका रुप धर लेती थी?
7) क्या हुआ जब व्योम का युद्ध यमदेव व महाकाली से हुआ?
8) क्या सुयश व शैफाली कैलाश पर्वत पर लिपटी महादेव की जटाओं को खोलकर मायाजाल को पार कर सके?
9) क्या था भगवान श्री राम की बालरुप वाली मूर्ति का रहस्य, जिसे लेने के लिये नीलाभ को गरुणाक्ष पर्वत पर जाना पड़ा?
10) क्या था ब्लैकून के अंदर छिपे फीनीक्स पक्षी का रहस्य?
11) क्या था न्यूयार्क शहर में स्थित ‘एटर्नल फ्लेम’ का रहस्य, जो झरने के नीचे भी सदियों से जल रही थी?
12) क्या था सीरीनिया के जंगलों में छिपे ‘निम्फिया महल’ का रहस्य, जिसे देवी आर्टेमिस ने अपनी सबसे प्रिय सुनहरी हिरनी के लिये बनाया था?
13) क्या क्रिस्टी रोम के पौराणिक शहर ‘ट्रॉय’ के तिलिस्म को पार कर सकी?

तो दोस्तों इन सभी प्रश्नों के उत्तर को जानने के लिये आइये पढ़ते हैं, ब्रह्मदेव के जन्म से शुरु हुई एक ऐसी महागाथा, जिसने मनुष्य ही नहीं अपितु ईश्वर को भी हिलाकर रख दिया। जिसका नाम है-

“काला मोती-ब्रह्मकण शक्ति”

 

 

पुस्तक का कुछ अंश

 

लेखक की कलम से

ॐ नमः शिवाय

“प्रचंडं प्रकृष्टं प्रगल्भं परेशं। अखंडं अजं भानुकोटिप्रकाशं॥
त्रयः शूल निर्मूलनं शूलपाणिं। भजेऽहं भवानीपतिं भावगम्यं॥"

अर्थात् प्रचण्ड श्रेष्ठ, तेजस्वी, परमेश्वर, अखण्ड, अजन्मे, करोड़ों सूर्यों के समान प्रकाश वाले, तीनों प्रकार के शूलों को निर्मूल करने वाले, हाथ में त्रिशूल धारण किए, भाव के द्वारा प्राप्त होने वाले भवानी के पति श्री शंकर जी को मैं भजता हूँ।

तो दोस्तों इन्हीं कथनों के साथ मैं शिवेन्द्र सूर्यवंशी एक बार फिर आपके समक्ष अपनी नई पुस्तक ‘काला मोती’ को लेकर उपस्थित हूं। दोस्तों यह पुस्तक ‘रिंग ऑफ़ अटलांटिस’ सीरीज की छठी पुस्तक है। दोस्तों मैं चाहता था कि मेरी पहली ही रचना कालजयी हो, जो कि पाठक वर्ग को सदियों तक मेरे होने का अहसास कराती रहे। मेरे लिये मेरे पहले कथानक की रचना करना एक भव्य सपने के समान था। मुझे नहीं पता था कि लेखकों के इस असीम सागर में मैं अपनी उपस्थिति का अहसास दिला भी पाऊंगा कि नहीं? परंतु आप लोगों ने जिस प्रकार से मुझ जैसे एक नये लेखक की रचना का स्वागत किया है, उसके लिये मैं आपका हृदय से आभार व्यक्त करता हूं और यह आशा करता हूं कि जिस प्रकार आपने मेरी पिछली पुस्तकों को प्यार व सम्मान दिया है, उसी प्रकार से आप मेरी इस पुस्तक को भी अपने नेत्रों की कृपादृष्टि से अभिसिंचित कर मेरा उत्साहवर्धन करते रहेंगे।
दोस्तों इसके पश्चात् मैं आप सभी लोगों से दिल से क्षमा मांगता हूं क्योंकि पहली बार मैं अपनी पुस्तक को, उसके दिये हुए निर्धारित समय पर प्रकाशित नहीं कर सका। ऐसा मेरे परिवार में आई कुछ अकस्मात् परेशानियों के कारण हुआ था। बहुत से पाठकों ने मुझे सोशल मीडिया और ई-मेल के माध्यम से अपना संदेश भेजा और ‘काला मोती’ पुस्तक के प्रति अपनी चिंता व्यक्त की। मैं उन सभी लोगों को हृदय से आभार व्यक्त करता हूं, जिन्होंने मेरी परेशानियों को समझा और ऐसे बुरे समय में भी मेरा उत्साहवर्धन करते रहे।

दोस्तों आपकी अपेक्षाएं मेरी प्रत्येक अगली पुस्तक के लिये बढ़ती जा रहीं हैं और आपकी यही अपेक्षाएं मुझे प्रत्येक अगली पुस्तक को बेहतर और बेहतर लिखने की प्रेरणा दे रही है। मैं नहीं चाहता कि किसी भी पुस्तक को शीघ्र प्रकाशित करने के चक्कर में, मैं उसकी गुणवत्ता और कथानक से कोई समझौता करुं? मुझे पता है कि अच्छा कथानक वही होता है, जो किसी भी पाठक को प्रारंभ से अंत तक अपने सम्मोहनपाश में बांधे रखता है। इसलिये मैं इस सीरीज की आखिरी 2 पुस्तकें लिखने में अपनी समस्त शक्ति और कल्पनाशीलता को झोंक देना चाहता हूं, जिससे मैं इस कथानक का अंत सर्वश्रेष्ठ तरीके से कर सकूं। इस कार्य के फलस्वरुप मैंने इस पुस्तक में चैपटर एवं पृष्ठों की संख्या को थोड़ा और बढ़ा दिया है। परंतु मुझे ऐसा विश्वास है कि आपको इस पुस्तक का कोई भी दृश्य उबाऊ या थोपा हुआ नहीं लगेगा। बाकी इस पुस्तक को मैंने कैसा लिखा है? यह तो आप पाठकगण ही उचित तरीके से बता सकते हैं।
दोस्तों पिछले कुछ समय से आप में से कई पाठकों ने मेरी पुस्तकों का ‘पेपरबैक संस्करण’ खरीदने की इच्छा जताई थी, मैं बड़े हर्ष के साथ उन पाठकों को यह बताना चाहता हूं कि अब मेरी इस सीरीज की प्रत्येक पुस्तकें ‘सूरज पॉकेट बुक्स’ के माध्यम से, आपको ‘अमेजान’ व ‘फ्लिपकार्ट’ पर मिल सकते हैं, जिन्हें वहां से सर्च करके आप खरीद सकते हैं और उसे अपने पास संग्रह कर सकते हैं।
दोस्तों मेरी नई पुस्तकों की प्रकाशन तिथि के लिये आप मेरे फेसबुक पेज को लाइक या फॉलो कर सकते हैं, जिसकी डीटेल्स आपको नीचे मिल जायेगी।

फेसबुक पेजः @shivendrasuryavanshitheauthor

तो फिर तुरंत इस पुस्तक को पढ़ना शुरु करिये और इसे पढ़ने के बाद मुझे रिव्यू या कमेंट के माध्यम से इसके बारे में अवश्य सूचित करें।
आपकी प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा में .......
आपका दोस्त
शिवेन्द्र सूर्यवंशी
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प्राक्कथन

सप्तशक्ति- ब्रह्मांड के निर्माण के लिये ईश्वर ने पहले सप्तशक्तियों का निर्माण किया। ये सप्तशक्तियां थीं- वायु, जल, अग्नि, पृथ्वी, आकाश, ध्वनि और प्रकाश। इन सभी सप्तशक्तियों ने मिलकर ब्रह्मांड में उपस्थित सभी ग्रहों की रचना की। परंतु अभी भी जीवन की उत्पत्ति संभव नहीं हो सकी थी। जीवन की उत्पत्ति के लिये ब्रह्मदेव ने एक कण की रचना की, जिसे बाद में ब्रह्मकण के नाम से जाना गया। इस ब्रह्मकण में जीवन की उत्पत्ति के अलावा इन सभी सप्तशक्तियों को नियंत्रित करने की शक्ति भी थी।
ब्रह्मांड की रचना के बाद ब्रह्मदेव ने इस ब्रह्मकण को एक काले मोती में समाहित कर समुद्र की अथाह गहराइयों में कहीं छिपा दिया। परंतु एक दिन एक नीली जलपरी की गलती से ‘काला मोती’ ग्रीक देवता पोसाइडन के हाथ लग गया। इसके बाद शुरु हुई रहस्य व रोमांच से भरी ऐसी कहानी, जिसने पृथ्वी ही नहीं वरन् ब्रह्मांड के कई ग्रहों को अपनी चपेट में ले लिया।
फिर शुरु हुई एक ऐसी प्रश्नावली जिसने सभी के मस्तिष्क को पूरी तरह से झकझोर कर रख दिया-
1) क्या हुआ जब ब्रह्मदेव का जन्म सहस्त्रदल कमल पर हुआ? क्या ब्रह्मदेव अपने जन्म के रहस्य को समझ सके?
2) क्या हुआ जब ब्रह्मकण से जन्मी लावण्या, अरिगंधा के राजकुमार मेघवर्ण को लेकर अथाह समुद्र की गहराइयों में चली गई?
3) क्या नीलाभ महादेव की शक्तियों को प्राप्त करने के लिये, काशी जाकर कालभैरव से आशीर्वाद प्राप्त कर सका?
4) क्या हुआ जब समयचक्र ने भविष्य को बदलना शुरु कर दिया?
5) क्या हुआ जब तिलिस्मा में घूम रही 12 राशियों ने अलग-अलग प्रकार से तिलिस्मा में प्रवेश किये लोगों पर आक्रमण कर दिया?
6) क्या था काँच की तितली का रहस्य, जो लोगों का अपहरण कर उनका रुप धर लेती थी?
7) क्या हुआ जब व्योम का युद्ध यमदेव व महाकाली से हुआ?
8) क्या सुयश व शैफाली कैलाश पर्वत पर लिपटी महादेव की जटाओं को खोलकर मायाजाल को पार कर सके?
9) क्या था भगवान श्री राम की बालरुप वाली मूर्ति का रहस्य, जिसे लेने के लिये नीलाभ को गरुणाक्ष पर्वत पर जाना पड़ा?
10) क्या था ब्लैकून के अंदर छिपे फीनीक्स पक्षी का रहस्य?
11) क्या था न्यूयार्क शहर में स्थित ‘एटर्नल फ्लेम’ का रहस्य, जो झरने के नीचे भी सदियों से जल रही थी?
12) क्या था सीरीनिया के जंगलों में छिपे ‘निम्फिया महल’ का रहस्य, जिसे देवी आर्टेमिस ने अपनी सबसे प्रिय सुनहरी हिरनी के लिये बनाया था?
13) क्या क्रिस्टी रोम के पौराणिक शहर ‘ट्रॉय’ के तिलिस्म को पार कर सकी?
तो दोस्तों इन सभी प्रश्नों के उत्तर को जानने के लिये आइये पढ़ते हैं, ब्रह्मदेव के जन्म से शुरु हुई एक ऐसी महागाथा, जिसने मनुष्य ही नहीं अपितु ईश्वर को भी हिलाकर रख दिया। जिसका नाम है-
“काला मोती-ब्रह्मकण शक्ति”

 

◆◆◆
चैपटर-1

ब्रह्मज्ञान
सतयुग, क्षीर सागर
क्षीरसागर का दुग्ध के समान श्वेत जल, सागर की सतह पर हिलोरें मार रहा था। दूर-दूर तक लहरों की हलचल और उसकी तेज ध्वनि के सिवा कुछ भी सुनाई नहीं दे रहा था।
नीला आसमान अपनी छाया को, क्षीर सागर के श्वेत जल में निहार कर मुग्ध हो रहा था।
तभी वातावरण में एक सुनहरा दिव्य प्रकाश उत्पन्न हुआ, जो कि नीले आसमान से निकलकर, क्षीर सागर के श्वेत जल को, एक स्थान पर स्पर्श करने लगा।
दिव्य प्रकाश का श्वेत जल के स्पर्श करते ही, उस श्वेत जल के मध्य से, एक गुलाबी रंग की आकृति ने उभरना शुरु कर दिया।
कुछ ही देर में देखते ही देखते, वह गुलाबी आकृति पूर्ण रुप से, श्वेत जल की सतह पर आ गई।
अब उस गुलाबी आकृति ने, एक विशाल दिव्य कमल के पुष्प का आकार ले लिया, पर यह पुष्प अभी खिला नहीं था। यह तो मात्र एक पवित्र कली थी, जो किसी अद्भुत शक्ति के दिव्य प्रकाश से जन्म ले रही थी।
कली के प्रकट होते ही, श्वेत जल हवा में तेज हिलोरें मारने लगा।
श्वेत जल कमल की उस कली को उछलकर, इस प्रकार स्पर्श कर रहा था, मानों वह दुग्ध जल, उस पवित्र कली के पैर पखार रहा हो।
तभी वातावरण में ‘ऊँ’ की एक ध्वनि उत्पन्न हुई, जो कि कुछ ही पलों में सम्पूर्ण सृष्टि में फैल गई। यह ध्वनि निरंतर वातावरण में एक मधुर रस घोल रही थी।
लगातार ‘ऊँ’ के स्पंदन से, कमल की कली ने कुनमुनाकर अपनी आँखें खोलना शुरु कर दिया। एक-एक कर कली की पंखुड़ियां खुलती जा रहीं थीं।
कुछ ही देर में इस सहस्त्रदल कमल की एक हजार पंखुड़ियों ने, अपनी निद्रा भंग कर, इस अपूर्ण सृष्टि के दर्शन किये।
सभी पंखुड़ियों के खुल जाने के बाद, उस सहस्त्रदल कमल पर एक दिव्य पुरुष लेटे हुए दिखाई दिये, जिनकी पलकें अभी विश्राम की अवस्था में थीं।
प्रकाश की किरणें अभी भी प्रस्फुटित होकर, पवित्र कमल को स्पर्श कर रही थीं। उधर ‘ऊँ’ का निनाद भी अपने चरम पर था।
तभी क्षीर सागर की कुछ बूंदों ने, हवाओं के झूले पर बैठ, उस दिव्य पुरुष की पलकों का एक चुम्बन लिया।
अब उस दिव्य पुरुष ने अपने नेत्रों को खोल दिया।
कुछ क्षणों तक सृष्टि का अवलोकन करने के बाद, उन्होंने अपने सीप के समान अधरों को खोला- “मैं कौन हूं? मेरा जन्म क्यों हुआ? यह कौन सा स्थान है?”
तभी कमल पर पड़ रहा दिव्य प्रकाश कुछ कम हुआ और उससे एक ध्वनि वातावरण में गुंजायमान हुई- “मैं निराकार परम ब्रह्म हूं, मैंने ही तुम्हें इस सृष्टि की रचना को पूर्ण करने के लिये अवतरित किया है।”
“हे परम ब्रह्म, तो कृपा करके मेरा नामकरण करते हुए मेरा मार्गदर्शन कीजिये।” दिव्य पुरुष ने अपने दोनों हाथ जोड़ते हुए कहा।


“तुम्हारा अवतरण ब्रह्मज्ञान को अर्जित कर, सृष्टि को पूर्ण करने के लिये हुआ है, इसलिये आज से तुम्हारा नाम ब्रह्मदेव होगा। आज से समस्त संसार तुम्हें ब्रह्मदेव, सृष्टिकर्ता, ब्रह्मा आदि नामों से जानेगा। पर इस नामकरण को चरितार्थ करने के लिये, तुम्हें पहले ब्रह्मज्ञान लेना होगा।” परम ब्रह्म ने कहा- “उस ब्रह्मज्ञान के बिना, तुम्हारी उत्पत्ति अर्थरहित है।”
“तो फिर मुझे उस ब्रह्मज्ञान का श्रवण कराइये परम ब्रह्म।” ब्रह्मदेव ने कहा- “मैं उस ब्रह्मज्ञान को पाने के लिये व्यग्र हूं।”
“वह ब्रह्मज्ञान तुम्हें स्वयं से प्राप्त करना होगा ब्रह्मदेव। इसलिये अभी से तुम उस ब्रह्मज्ञान को तलाशना शुरु कर दो। जिस क्षण तुम्हें उस ब्रह्मज्ञान के दर्शन हो जायेंगे, तुम मेरी वाणी को फिर से सुन पाओगे।” यह कहकर परम ब्रह्म का दिव्य प्रकाश और वाणी कहीं वातावरण में लुप्त हो गई?
अब ‘ऊँ’ की प्रतिध्वनि भी वायुमण्डल में विलीन हो गई।
“पर परम ब्रह्म .... मुझे तो यह भी नहीं पता कि मुझे ब्रह्मज्ञान कहां से और कैसे प्राप्त होगा?” ब्रह्मदेव ने परम ब्रह्म से कहा।
पर अब कुछ भी कहना व्यर्थ था, परम ब्रह्म वहां से जा चुके थे।
कुछ देर की प्रतीक्षा के बाद ब्रह्मदेव समझ गये कि अब उन्हें स्वयं ही ब्रह्मज्ञान के रहस्य को तलाशना होगा।
अतः वह कमल के पुष्प की सभी पंखुड़ियों को निहारने लगे। सभी पंखुड़ियां आकार में छोटी-बड़ी थीं।
“यह सभी पंखुड़ियां छोटी-बड़ी क्यों हैं? अर्थात् प्रकृति में सबकुछ एक समान नहीं होता। ....... यह श्वेत जल, नील गगन, पाटल (गुलाबी) पंखुड़ियां, हरित दलपत्र ... सबकुछ भिन्न-भिन्न रंगों से बना है ..... वायु, जल, गगन, प्रकाश, ध्वनि ... यह सब प्रकृति में विद्यमान हैं ... पर इनका नियंत्रण कौन करता है? .... लगता है मुझे इन सब चीजों के बारे में जानने से पहले, अपनी उत्पत्ति के कारक के बारे में जानना होगा?”
ऐसे अनेकोंनेक प्रश्न थे, जो ब्रह्मदेव के मस्तिष्क को उलझा रहे थे। आखिरकार बहुत सोचने के बाद ब्रह्मदेव, उस सहस्त्रदल कमल की डंठल में प्रवेश कर गये।
ब्रह्मदेव जैसे-जैसे डंठल में आगे बढ़ रहे थे, वैसे-वैसे डंठल का आकार चौड़ा होता जा रहा था।
ब्रह्मदेव को उस डंठल में चलते हुए कई घंटे बीत गये। आखिरकार ब्रह्मदेव उस डंठल के उद्गम स्थल तक पहुंच ही गये।
वह डंठल एक ब्रह्मांड रुपी विशाल वृक्ष की बेल से निकला था।
इस विशाल वृक्ष की 7 शाखाएं थीं और हर एक शाखा में पत्तियों के स्थान पर करोड़ों ग्रह विचरण कर रहे थे।
उस विशाल ब्रह्मांडीय वृक्ष के आगे, ब्रह्मदेव को अपना शरीर, एक कण के समान प्रतीत हो रहा था।
“मैं तो यहां पर एक साधारण से पुष्प की उत्पत्ति के बारे में जानने के लिये आया था, पर अब तो यहां मुझे विशाल ब्रह्मांडीय वृक्ष दिख रहा है .... जो कि एक धरा पर लगा है। यानि कि अब मुझे इस ब्रह्मांडीय वृक्ष की जड़ में जाना होगा .... वहीं से मुझे इस वृक्ष के स्रोत पता चल सकता है।”
यह सोच ब्रह्मदेव ने धरा के कणों को टटोलकर देखा और फिर स्वयं उस ब्रह्मांडीय वृक्ष की जड़ों में प्रवेश कर गये।
ब्रह्मदेव वृक्ष की जड़ों को पकड़े हुए धरा के अंदर चले जा रहे थे। कुछ समय के बाद वृक्ष की वह जड़ें ब्रह्मदेव को लेकर, धरा के अंदर स्थित एक सुरंग में पहुंच गईं।
वह पूरी सुरंग भूरे रंग की चट्टानों से निर्मित थी। अब ब्रह्मदेव ने उस सुरंग की यात्रा शुरु कर दी।
लगभग एक घंटे तक अनवरत् चलने के बाद, वह सुरंग एक विशाल मैदान में निकली, जहां पर एक वर्गाकार सफेद पत्थर की बड़ी सी चट्टान रखी थी।
उस चट्टान में एक द्वार बना हुआ था।
चट्टान में द्वार देख, ब्रह्मदेव उस द्वार में प्रवेश कर गये। वह द्वार ब्रह्मदेव को एक वर्गाकार कमरे में ले आया, जिसके बीच में एक सफेद पत्थर की चौकी पर, एक विलक्षण बालक पालथी मारकर आसन की मुद्रा में बैठा था।
बालक की आयु 6 वर्ष के आसपास प्रतीत हो रही थी।
पूरा कमरा बिल्कुल श्वेत नजर आ रहा था। यहां तक कि उस बालक ने भी श्वेत वस्त्र ही धारण कर रखे थे।
उस बालक ने अपने सिर के घनेरे बालों से, किसी ऋषि की भांति अपने सिर पर एक छोटा सा जूड़ा बना रखा था। उस बालक के चेहरे पर दिव्यता विद्यमान थी, जिसका ओज उसके चेहरे के चारो ओर, एक गोलाकार आकृति में प्रस्फुटित हो रहा था।

वह बालक इस समय ध्यान की मुद्रा में था, इसलिये ब्रह्मदेव उस बालक के सामने जाकर बैठ गये और अपने नेत्रों से उस दिव्य बालक की मनोहारी छवि को निहारने लगे।
कुछ क्षणों के बाद उस दिव्य बालक ने अपनी आँखें खोल दीं और ब्रह्मदेव की ओर उत्सुकता से देखने लगा।
“मेरा नाम ब्रह्मदेव है।” ब्रह्मदेव ने उस विलक्षण बालक के सम्मुख हाथ जोड़कर कहा- “मैं यहां ब्रह्मज्ञान की तलाश में आया हूं। आप कौन हैं दिव्य बालक? कृपया मुझे अपने बारे में बताएं।”
“मेरा नाम नारायण है, परंतु मुझे स्वयं नहीं पता कि मैं कौन हूं?” नारायण ने कहा- “और मैं कितने समय से यहां पर हूं? तो फिर मैं आपको ब्रह्मज्ञान कैसे दे सकता हूं? परंतु आप चाहें तो पूर्व दिशा से इसके बारे में पूछ सकते हैं।”
यह कहकर नारायण ने पूर्व दिशा की ओर इशारा किया।
नारायण का इशारा देख, ब्रह्मदेव ने अपने सिर को पूर्व दिशा की ओर घुमाने की चेष्टा की, परंतु वह असफल रहे।
“मैं अपना शीश पूर्व दिशा की ओर क्यों नहीं घुमा पा रहा?” ब्रह्मदेव के चेहरे पर उलझन के भाव उभरे।
“अगर आप इतना छोटा सा कार्य नहीं कर पा रहे हैं, तो आप ब्रह्मज्ञान को कैसे तलाश कर पायेंगे ब्रह्मदेव?” नारायण ने कहा।
नन्हे बालक के कटाक्ष सुन ब्रह्मदेव ने अपनी पूरी शक्ति लगाकर, अपने शीश को पूर्व दिशा की ओर घुमाया।
ब्रह्मदेव के अति कठोर प्रयास से, ब्रह्मदेव का सिर तो पूर्व दिशा में नहीं घूमा, परंतु पूर्व दिशा की ओर उनका एक सिर और उत्पन्न हो गया। अब ब्रह्मदेव के 2 सिर हो गये।
“यह मेरे 2 शीश कैसे हो गये?” ब्रह्मदेव ने आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहा।
“हमें तो नहीं पता ... पर हमें लगता है कि आपको ब्रह्मज्ञान प्राप्त होने लगा है।” नारायण ने मुस्कुराते हुए कहा।
अब ब्रह्मदेव को पूर्व दिशा में जलती हुई अग्नि दिखाई देने लगी थी।
अब नारायण, ब्रह्मदेव से बिना कुछ बोले, पश्चिम दिशा की ओर देखने लगे। उन्हें इस प्रकार पश्चिम दिशा की ओर देखते पाकर, ब्रह्मदेव ने अपने सिर पश्चिम दिशा की ओर घुमाया।
इस बार फिर ब्रह्मदेव का एक सिर और बढ़ गया। अब उनके 3 सिर हो गये थे। पश्चिम दिशा में ब्रह्मदेव को जल दिखाई दिया।
कुछ सोचने के बाद ब्रह्मदेव ने स्वतः ही अपना सिर पीछे यानि कि उत्तर दिशा की ओर किया। अब ब्रह्मदेव के 4 सिर हो गये।
उत्तर दिशा में विशाल आकाश नजर आ रहा था। तभी ब्रह्मदेव के सामने की ओर, यानि की दक्षिण दिशा में धरा तत्व नजर आने लगा।
“लगता है कि 4 दिशाओं में देखने के लिये परम ब्रह्म ने मुझे 4 शीश प्रदान किये हैं?” ब्रह्मदेव ने कहा।
“पर दिशाएं तो 10 होती हैं।” नारायण ने कहा- “पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण, ईशान, आग्नेय, वायव्य, नैऋत्य, ऊर्ध्व (ऊपर) और अधो (नीचे)। लगता है कि आपको बाकी दिशाओं में भी देखना चाहिये?”
नारायण के वचन सुन, जैसे ही ब्रह्मदेव ने ईशान, आग्नेय, वायव्य और नैऋत्य दिशा की ओर देखा, हर एक दिशा में देखने पर, उनके प्रत्येक शीश के मस्तिष्क में एक ऊर्जा प्रवेश कर गई।
अब सिर्फ 2 दिशाएं बची थीं- “ऊर्ध्व और अधो”।
अब ब्रह्मदेव ने ऊपर की ओर देखा, जिसके प्रभाव से उनके ऊपर भी एक शीश प्रकट हो गया। पर पांचवा शीश प्रकट होते ही विलोप भी हो गया।
“यह एक शीश प्रकट होने के बाद विलोप क्यों हो गया?” ब्रह्मदेव ने नारायण से पूछा।
“वह शीश अदृश्य अवस्था में रहेगा। जब आपको उसकी आवश्यकता होगी, तभी वह प्रकट होगा।” नारायण ने कहा।
नारायण के वचनों को सुन अब ब्रह्मदेव ने नीचे की ओर देखा। परंतु जैसे ही ब्रह्मदेव ने नीचे देखा, ब्रह्मदेव की आँखों से एक प्रकाश की तीव्र किरण निकलकर भूमि पर पड़ी।
उस प्रकाश की किरण ने एक मानव शरीर को जन्म दिया, जो कि उत्पन्न होते ही उठकर खड़ा हो गया।
“ब्रह्मदेव को वास्तुपुरुष का प्रणाम।” वास्तुपुरुष ने हाथ जोड़कर ब्रह्मदेव की ओर देखते हुए कहा- “हे परमपिता, मैं दसों दिशाओं में विराजमान वास्तुपुरुष हूं, मेरा जन्म आपके प्रत्येक निर्माण में सहयोग प्रदान करने के लिये हुआ है। इसलिये मैं आपको यह वचन देता हूं कि मैं सृष्टि के प्रत्येक निर्माण में उपस्थित रहूंगा और उस निर्माण को सदैव शुभ फलदायी देने के लिये प्रयत्नशील रहूंगा।”
यह कहकर वास्तुपुरुष हवा में विलीन हो गया।
वास्तुपुरुष के हवा में विलीन होते ही ब्रह्मदेव फिर से नारायण को देखने लगे। ऐसा लग रहा था, मानो वह नारायण से पूछना चाह रहे थे कि अब उन्हें क्या करना चाहिये?

उन्हें इस प्रकार से उलझन में पड़ा देख, नारायण बोल उठे- “आपने दसों दिशाओं में तो नियंत्रण प्राप्त कर लिया ब्रह्मदेव। अब आपको इन सप्तशक्तियों पर नियंत्रण प्राप्त करना होगा।”
“परंतु कैसे नारायण? मैं इन सप्त शक्तियों पर कैसे नियंत्रण कर सकता हूं?” ब्रह्मदेव ने उलझन भरे नेत्रों से नारायण की ओर देखते हुए पूछा।
“आप अपने गुरु या ईष्टदेव को याद करिये ब्रह्मदेव, वही आपको सप्तशक्तियों पर नियंत्रण करने का मार्ग प्रशस्त करेंगे।” नारायण के शब्द अर्थ से परिपूर्ण थे।
नारायण के शब्द सुन ब्रह्मदेव और विचलित हो गये क्योंकि उन्हें अपने गुरु के बारे में पता ही नहीं था। आखिरकार ब्रह्मदेव ने अपने चारो मुखों के नेत्रों को बंद कर लिया और मन में ही परम ब्रह्म का आहवान किया।
अब ब्रह्मदेव को अपने मन में फिर से वही ब्रह्मांडीय वृक्ष दिखाई देने लगा, परंतु इस बार उस ब्रह्मांडीय वृक्ष में नारायण का अद्भुत बालरुप भी झलक रहा था।
ब्रह्मदेव ने मन ही मन उस ब्रह्माडीय वृक्ष को प्रणाम किया और फिर अपने नेत्रों को खोल दिया, परंतु अब उनके चेहरे पर असीम शांति दिख रही थी। ऐसा लग रहा था कि जैसे वह सम्पूर्ण ब्रह्मांड को एक क्षण में समझ गये हों।
शायद यही ब्रह्मज्ञान था, जिसमें कमल की उत्पत्ति का कारक भी था और ब्रह्मांड की अद्भुत बेल के दर्शन भी।
अब ब्रह्मदेव, नारायण के सामने हाथ जोड़कर बैठ गये।
“हे नारायण, मैं आपको ही अपने गुरु रुप में स्वीकार करता हूं। मैंने आपके दिव्य दर्शन भी प्राप्त कर लिये। अब आप ही मुझे इन सप्तशक्तियों के नियंत्रण का रहस्य प्रदान करें, जिससे मैं सृष्टि का निर्माण आरंभ कर सकूं।” ब्रह्मदेव के शब्दों में अथाह भक्ति झलक रही थी।
ब्रह्मदेव के शब्दों को सुन नारायण मुस्कुराये और बोल उठे- “मैं आपको सप्तशक्तियों के नियंत्रण की शक्ति तो प्रदान कर दूंगा ब्रह्मदेव, परंतु आपने मुझे गुरु माना है, इसलिये उसके पहले आपको मुझे गुरुदक्षिणा प्रदान करनी होगी। गुरुदक्षिणा के बिना किसी भी गुरु का ज्ञान अपूर्ण होता है।”
नारायण के शब्द सुन इस बार ब्रह्मदेव विचलित नहीं हुए। वह मुस्कुराये और भूमि पर पालथी मारकर बैठ गये। ब्रह्मदेव ने अब अपनी आँखें कुछ क्षणों के लिये बंद कर लीं।
अब ब्रह्मदेव के सभी मस्तकों से एक ऊर्जा की तेज किरण निकलीं और उनके गोद में जाकर पड़ने लगी।
इस ब्रह्मऊर्जा ने एक दिव्य पुरुष को उत्पन्न कर दिया, जो कि देखने में लगभग नारायण के समान ही प्रतीत हो रहे थे।
ब्रह्मदेव ने उस दिव्य पुरुष को भूमि पर उतारा और स्वयं उठकर खड़े हो गये।
“इस सम्पूर्ण सृष्टि में आपकी भक्ति के समान कुछ नहीं होगा नारायण। परंतु आपकी शक्ति और भक्ति का ज्ञान भी प्रत्येक जीव के लिये आवश्यक होगा। अतः मैं गुरुदक्षिणा के रुप में आपको, आपकी भक्ति के प्रसार के लिये, अपने प्रथम मानस पुत्र को समर्पित करता हूं। आज से मेरे इस मानस पुत्र का नाम ‘नारद’ होगा और इनका सम्पूर्ण जीवन आपकी भक्ति के प्रसार में रत रहेगा।”
ब्रह्मदेव की बात सुनकर नारद, नारायण के सामने अपने हाथों को जोड़कर बैठ गये।
तभी ब्रह्मदेव के हाथों में एक वीणा दिखाई देने लगी, जो उन्होंने नारद को दे दी।
“इस वीणा का नाम ‘महती’ होगा नारद। इस वीणा से सदैव नारायण की ध्वनि उत्पन्न होगी।” ब्रह्मदेव ने कहा- “जाओ और जाकर सम्पूर्ण सृष्टि में नारायण की भक्ति का गुणगान करो।”
“जो आज्ञा परमपिता।” नारद ने कहा और वीणा को लेकर अदृश्य हो गये।
“हम आपकी गुरुदक्षिणा से अत्यंत प्रसन्न हुए ब्रह्मदेव।” नारायण ने कहा- “अब हम आपको इन सप्तशक्तियों के नियंत्रण की शक्ति सौंपते हैं।”
यह कहकर नारायण ने अपने दाहिने हाथ की तर्जनी उंगली को हवा में उठाया। अब नारायण के हाथ में सुदर्शन चक्र नजर आने लगा, जो द्रुत गति से उनकी उंगली के मध्य घूर्णन कर रहा था।
उस चक्र के मध्य सम्पूर्ण ब्रह्मांड दिखाई दे रहा था।
तभी उस चक्र के मध्य से एक कण निकला और हवा में तैरता हुआ ब्रह्मदेव के हाथ में पहुंच गया।
ब्रह्मदेव आश्चर्य से उस सूक्ष्म कण को देखने लगे।
“यह सृष्टि का प्रथम कण है ब्रह्मदेव, यह प्रथम कण आज से ब्रह्मकण के नाम से जाना जायेगा। इसी ब्रह्मकण के अंदर इन सप्तशक्तियों को नियंत्रित करने की शक्ति है और इसी ब्रह्मकण से आप इस सृष्टि का निर्माण भी कर सकते हैं।”
इसी के साथ एक तेज रोशनी उत्पन्न हुई, जिसकी वजह से ब्रह्मदेव के नेत्र एक क्षण के लिये बंद हो गये।
जब ब्रह्मदेव की आँखें खुलीं, तो उन्होंने स्वयं को वापस सहस्त्रदल कमल के ऊपर पाया। परंतु अब ब्रह्मदेव को ब्रह्मज्ञान और ब्रह्मकण दोनों ही प्राप्त हो चुके थे।
अतः ब्रह्मदेव ने एक बार फिर अपने हाथ में उपस्थित कण को देखा और फिर सृष्टि का निर्माण करने में जुट गये।
एक हजार वर्ष के अनवरत प्रयास के बाद ब्रह्मदेव ने संपूर्ण सृष्टि का निर्माण कर दिया।
अब उनकी दृष्टि वापस उस ब्रह्मकण पर थी।
“निर्माणकार्य तो पूरा हो गया, परंतु अब समस्या इस छोटे से मूलकण को सुरक्षित रखने की है। कहीं यह किसी बुरी शक्ति के प्रभाव में आ गया? तो बहुत मुश्किल हो जायेगी। इसलिये इसे किसी ऐसे सुरक्षित स्थान पर रखना होगा, जहां पर किसी भी जीव की दृष्टि इस पर ना पड़े।”
यह सोच ब्रह्मदेव अनंत सागर की गहराई की ओर चल दिये।
गहराई में पहुंचने के बाद ब्रह्मदेव ने एक अद्भुत सीप का निर्माण किया और उस ब्रह्मकण को एक छोटे से काले मोती में छिपाकर, सीप के अंदर रख दिया।
ब्रह्मदेव ने उस काले मोती को एक बार देखा और फिर पता नहीं क्या सोचकर अपने हाथ की अंगूठी को निकालकर उस सीप में रख दिया?
ब्रह्मदेव की वह अंगूठी, सुनहरे रंग की धातु से निर्मित थी, जिसके आगे एक गोल काले रंग का रत्न लगा था। पूरी अंगूठी तेज चमक बिखेर रही थी।
अब ब्रह्मदेव ने सीप को बंद किया और उसके चारो ओर एक सुरक्षा कवच बना दिया। सुरक्षा कवच के कारण अब वह सीप अदृश्य हो गया।
ब्रह्मदेव अब पूरी तरह से संतुष्ट दिखाई देने लगे। उन्हें लग रहा था कि अब इस ब्रह्मकण को कोई प्राप्त नहीं कर सकता? अतः वह वहां से वापस क्षीरसागर की ओर चल दिये।

◆◆◆

जलपरी

20,100 वर्ष पहले .........
समुद्र की तली, स्वर्णाक्ष द्वीप, दक्षिण अटलांटिक महासागर
प्राचीन काल में नाइटिंगेल द्वीप का नाम स्वर्णाक्ष द्वीप था। यह एक बहुत ही छोटा सा द्वीप था। इतने बड़े महासागर में इस छोटे से द्वीप पर मनुष्य कहां से आये? यह भी एक रहस्य ही था।
पर द्वीप के वासियों का हिन्दू देवताओं की पूजा करना यह बताता था, कि अवश्य ही इनके पूर्वज प्राचीन भारत से रहे होंगे?
स्वर्णाक्ष द्वीप की रेत में सोने के कण पाये जाते थे, शायद इसीलिये इसका नाम स्वर्णाक्ष द्वीप रखा गया था। स्वर्णाक्ष द्वीप पर्वतों और घने जंगलों से परिपूर्ण था। इसलिये यहां पर खाने की चीजों का अभाव बिल्कुल भी नहीं था।
पीने के पानी के लिये भी यहां पर पर्याप्त झरने, झीलें एवं अन्य पानी के स्रोत थे।
यहां के घने जंगलों में छोटे-बड़े अनेकों प्रकार के जीव-जंतु थे, पर सबसे ज्यादा इस जंगल में पक्षी थे।
यह पक्षी आसमान में उड़कर दूर तक जाते थे और फिर लौटकर वापस इसी द्वीप पर आ जाते थे।
इस द्वीप में जंगलों के मध्य, एक छोटा सा राज्य था, जिसका नाम अरिगंधा था। अरिगंधा स्वर्णाक्ष द्वीप का एकमात्र राज्य था, जिसमें अनेकों छोटे-छोटे कबीले थे, जो अरिगंधा से संचालित होते थे।
इस द्वीप में मनुष्यों की कुल जनसंख्या मात्र 9,000 थी। इतनी कम जनसंख्या के कारण यहां पर प्राकृतिक संसाधन परिपूर्ण थे और सभी खुशहाल थे।
स्वर्णाक्ष द्वीप के आसपास के सागर का पानी बहुत ही साफ था। पानी के अंदर अनेकों रंग-बिरंगी मछलियां घूम रहीं थीं।
अरिगंधा का राजकुमार मेघवर्ण, समुद्र के किनारे एक चट्टान पर बैठा मछलियों का उछलना-कूदना देख रहा था।
मेघवर्ण की आयु इस समय 21 वर्ष की थी। कुछ समय बाद ही उसे अरिगंधा का राजा बनाया जाने वाला था, पर मेघवर्ण का मन राजा बनने का बिल्कुल भी नहीं था। उसे तो दूर-दूर तक जाकर इस विशाल पृथ्वी को घूमने का मन था।
पर स्वर्णाक्ष द्वीप का संपर्क, पृथ्वी के किसी भी अन्य देश से ना होने के कारण मेघवर्ण ऐसा करने में असमर्थ था।
मेघवर्ण ने अपने दादाजी से पृथ्वी के अन्य देशों की कहानियां सुन रखीं थीं और शायद यही कहानियां अब उसके मस्तिष्क में दूसरी दुनिया के प्रति कौतुहल भर रही थीं।
...............................................

इधर मेघवर्ण अपनी कल्पनाओं में सपने बुन रहा था, उधर स्वर्णाक्ष द्वीप के नीचे गहरे समुद्र में एक नीली जलपरी लहरों में अठखेलियां कर रही थी।
रंग-बिरंगी मछलियों के झुण्ड के साथ तैरती, वह जलपरी इस समय बहुत खुश थी, वह तो मानों आज लहरों से प्रतिस्पर्धा कर रही थी।
तभी उस नीली जलपरी को समुद्र की तली में एक विशाल लाल रंग का गोला दिखाई दिया।
समुद्र के अंदर ऐसा लाल गोला देख, वह जलपरी उस गोले की ओर आकर्षित हो गई। धीरे-धीरे लहरों में तैरती हुई, वह उस गोले की ओर बढ़ने लगी।
कुछ ही देर में वह नीली जलपरी उस लाल गोले के पास पहुंच गई। उसने धीरे से अपना हाथ आगे बढ़ाकर उस लाल गोले को छूने की कोशिश की।
पर जैसे ही जलपरी के हाथ उस गोले से छुए, वह पूरा गोला पानी की लहरों में तितर-बितर हो गया।
असल में वह गोला नहीं बल्कि लाल रंग की नन्हीं मछलियों का एक बड़ा सा झुण्ड था, जो कि किसी अदृश्य गोले के चारो ओर चिपका हुआ था, पर जलपरी के हाथ लगाते ही वह मछलियों का झुण्ड डरकर, इधर-उधर बिखर गया।
यह देख जलपरी ने उस स्थान को अपने हाथ से छूकर देखा। पर जैसे ही जलपरी ने उस अदृश्य गोले को छुआ, उसे तेज बिजली का झटका सा महसूस हुआ।
यह देख जलपरी थोड़ा पीछे हट गई और अजीब सी नजरों से उस स्थान को देखने लगी।
तभी जलपरी को अपने पीछे किसी आहट का अहसास हुआ। यह महसूस होते ही जलपरी तेजी से पीछे की ओर पलटी।
पर पीछे पलटते ही जलपरी की साँस हलक में अटक गई। उसके पीछे एक बड़ी सी शार्क मछली, पानी में खड़ी उसी को घूर रही थी।
शार्क को देख उस नीली जलपरी ने अपनी साँस भी रोक ली।
तभी शार्क बिजली की तेजी से उस नीली जलपरी पर झपटी। शार्क को अपनी ओर झपटता देख जलपरी ने पानी में नीचे की ओर, एक तेज गोता लगाया, जिसकी वजह से शार्क पानी को चीरती हुई, उस अदृश्य गोले से टकरा गई।
शार्क के टकराने से, उस अदृश्य गोले को एक तेज झटका लगा और उसमें उपस्थित एक बड़े से सीप का ढक्कन खुल गया।
उधर शार्क को अदृश्य गोले से टकराने की वजह से, बिजली का एक तेज झटका लगा, जिससे घबराकर, वह जलपरी को छोड़ उस स्थान से भाग गई।
शार्क के जाने के बाद वह जलपरी चारो ओर से घूमकर उस अदृश्य गोले को निहारने लगी। पर उसे गोले के अंदर कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था और गोले को छूने की हिम्मत वह फिर से जुटा नहीं पा रही थी।
इधर गोले में उपस्थित सीप के खुल जाने से फुटबाल के आकार का काला मोती, सीप से झांकने लगा था। ऐसा लग रहा था कि जैसे वह भी उस खूबसूरत सी नीली जलपरी को निहार रहा हो।
तभी उस काले मोती से कुछ सुनहरी किरणें निकलकर, अदृश्य गोले के एक भाग में गिरने लगीं।
अब उन सुनहरी किरणों ने, गोले में झांक रही नीली जलपरी के समान, दूसरी जलपरी को बनाना शुरु कर दिया।
कुछ ही देर में हूबहू नीली जलपरी के समान एक दूसरी जलपरी सीप के सामने खड़ी थी।
अदृश्य गोले के बाहर की जलपरी, जब गोले के अंदर कुछ भी देख पाने में असमर्थ हो गई, तो हारकर वह एक दिशा की ओर चली गई।
अब गोले के अंदर उपस्थित नवजन्मी नीली जलपरी आश्चर्य से अपने चारो ओर देख रही थी। उसे सिर्फ इतना समझ में आ रहा था कि उसका निर्माण, काले मोती ने किया है।
उस जलपरी ने अपने चारो ओर देखा। तभी उसकी निगाह सीप में उपस्थित सुनहरी अंगूठी पर गई। कुछ सोचने के बाद इस जलपरी ने, सुनहरी अंगूठी को उठाकर अपनी बांयें हाथ की अनामिका उंगली में पहन लिया।
जलपरी के अंगूठी पहनते ही, काला मोती से एक तीव्र प्रकाश की किरण निकली और उस जलपरी के शरीर में समा गई।
जलपरी ने आश्चर्य से उस तीव्र प्रकाश को देखा, परंतु उसे कुछ समझ में नहीं आया।
अब वह जलपरी उस अदृश्य गोले से निकलकर समुद्र में घूमने लगी। वह अपने आसपास के प्रत्येक जीव को अपलक निहार रही थी।


समुद्र की रंगीन सुंदरता उसे खूब भा रही थी। वह हर समुद्री पौधे को छूकर, उसे महसूस करने की कोशिश करने लगी।
तभी उसे अपने से कुछ दूरी पर एक नारंगी रंग का ऑक्टोपस घूमता दिखाई दिया।
उत्सुकतावश जलपरी उसकी ओर बढ़ गई।
वह ऑक्टोपस आकार में थोड़ा बड़ा था। ऑक्टोपस आश्चर्य से अपनी ओर आ रही जलपरी को देख रहा था। शायद पहली बार उसने किसी शिकार को अपनी ओर आते देखा था।
जलपरी जैसे ही उस ऑक्टोपस के पास पहुंची, उस ऑक्टोपस ने अपनी भुजाओं में जलपरी को पकड़ लिया।
अब उस जलपरी को समझ में आ गया कि हर रंगीन जीव अच्छा नहीं होता। जलपरी ऑक्टोपस की पकड़ से छूटने की कोशिश करने लगी, पर जब वह ऑक्टोपस की पकड़ से छूट नहीं पाई, तो ऑक्टोपस को खींचकर, समुद्र की सतह की ओर चल दी।
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उधर मेघवर्ण अभी भी अपनी कल्पनाओं में उलझा था कि तभी उसे समुद्र में एक जगह कुछ तेज हलचल होती दिखाई दी।
अब मेघवर्ण की दृष्टि समुद्र में उस ओर चली गई।
मेघवर्ण को पानी में एक जगह पर निकली हुई, एक मछली की नीली पूंछ दिखाई दी, जिसे शायद किसी ऑक्टोपस ने अपने शिकंजे में जकड़ रखा था।
यह देख मेघवर्ण ने अपनी तलवार उठाई और तेजी से पानी में छलांग लगाकर तैरता हुआ उस ओर बढ़ने लगा।
मेघवर्ण का पूरा शरीर पानी के अंदर था। पानी साफ होने की वजह से मेघवर्ण को पानी के अंदर का दृश्य बिल्कुल साफ नजर आ रहा था।
तभी मेघवर्ण उस मछली को देखकर चौंक गया, वह मछली कोई साधारण मछली नहीं, बल्कि एक जलपरी थी, जिसके शरीर को एक ऑक्टोपस ने अपनी भुजाओं से पकड़ रखा था।
वह जलपरी तेजी से ऑक्टोपस की पकड़ से छूटने का प्रयत्न कर रही थी।
यह देख मेघवर्ण ने ऑक्टोपस के ऊपर अपनी तलवार से आक्रमण कर दिया। एक पल में ही मेघवर्ण ने ऑक्टोपस की 2 भुजाओं को काट दिया।
ऑक्टोपस के नीले खून ने समुद्र के नीले पानी को और नीला कर दिया।
जलपरी की निगाह अब सिर्फ मेघवर्ण पर थी, जो कि पानी के अंदर तलवार लेकर, लगातार ऑक्टोपस पर प्रहार कर रहा था।
कुछ ही देर में जख्मी ऑक्टोपस समझ गया कि मेघवर्ण का मुकाबला नहीं किया जा सकता, इसलिये उसने जलपरी को छोड़ा और तेजी से पानी में तैरकर कहीं गायब हो गया?
ऑक्टोपस से छूटते ही जलपरी ने एक बार मेघवर्ण को देखा और फिर वह भी पानी में कहीं गायब हो गई?
मेघवर्ण को जलपरी से ऐसी आशा नहीं थी। उसे लग रहा था कि जलपरी उसे धन्यवाद देगी, पर वह तो बिना कुछ बोले ही चली गई।
मेघवर्ण अब पानी से निकला और अनमने मन से वापस उसी चट्टान पर आकर बैठ गया।
जलपरियों को उसने बस कहानियों में ही सुना था। आज पहली बार उसे किसी जलपरी को सामने से देखने का अवसर प्राप्त हुआ था।

उस जलपरी का चेहरा तो मानो मेघवर्ण की आँखों में बस गया था। नीली आँखें, लहराते काले बाल, सीप से होंठ, लहरों में बल खाती नीली पूंछ .... सबकुछ सपनों सरीखा ही तो था।
तभी मेघवर्ण को पानी की लहरों पर, फिर से वही नीली जलपरी दिखाई दी। इस बार वह उससे कुछ दूरी पर पानी में तैरती हुई उसे ही निहार रही थी।
यह देख मेघवर्ण को ऐसा लगा, जैसा उसका सपना बस अब साकार होने ही वाला है।
मेघवर्ण ने जलपरी को देख धीरे से अपना हाथ हिलाया, पर जलपरी ने इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। वह तो बस मेघवर्ण को देखे जा रही थी।
यह सिलसिला कुछ देर तक ऐसे ही चलता रहा। दोनों ही बस एक दूसरे को देख रहे थे।
कुछ देर के बाद जलपरी, मेघवर्ण के थोड़ा और पास आ गई।
“क्या तुम बात कर सकती हो?” मेघवर्ण ने हिम्मत दिखाते हुए जलपरी से पूछा।
मेघवर्ण के शब्द सुन जलपरी जैसे व्यग्र हो गई। उसने पहले अपने आसपास देखा और फिर मेघवर्ण के और समीप आ गई।
यह देख मेघवर्ण ने फिर से पूछा- “क्या तुम बोलना जानती हो?”
“हां .... मैं बोल सकती हूं और मैं तुम्हारी भाषा भी समझ सकती हूं।” इस बार जलपरी ने जवाब दिया।
जलपरी को बोलते देख मेघवर्ण बहुत खुश हो गया।
“तुम्हारा नाम क्या है? और तुम कहां रहती हो?” मेघवर्ण ने जलपरी से पूछा।
“नाम! .... ये क्या होता है?” जलपरी ने कहा।
जलपरी की बात सुन मेघवर्ण चौंक गया- “हम सभी एक दूसरे को संबोधित करने के लिये उनका नाम लेकर पुकारते हैं .... जैसे कि मेरा नाम मेघवर्ण है। .... वैसे ही तुम्हारा भी तो कोई नाम होगा?”
“मेघवर्ण ...... ।” जलपरी ने मेघवर्ण के नाम को दोहराया- “पर मेरा तो कोई नाम नहीं है?”
“क्यों? तुम्हारा माता-पिता तुम्हें क्या कहकर पुकारते हैं?” मेघवर्ण ने जलपरी से पूछा।
“माता-पिता! ये कौन होते हैं?” जलपरी ने कहा।
“बड़े आश्चर्य की बात है कि तुम्हें यह भी नहीं पता कि माता-पिता कौन होते हैं?” मेघवर्ण ने आश्चर्य से कहा- “अरे जिसने तुम्हें जन्म दिया .... तुम्हें इस धरती पर ...... म... म ... मेरा मतलब है कि सागर में लाये। मैं उनकी बात कर रहा हूं।”
“पर मेरा जन्म तो एक काले मोती से हुआ है .... क्या वह काला मोती ही मेरा माता-पिता है?” जलपरी तो कुछ समझ ही नहीं पा रही थी।
“काले मोती से!” मेघवर्ण, जलपरी के शब्द सुन अब थोड़ा उलझा-उलझा सा महसूस करने लगा- “यह कैसे संभव है? भला कोई मोती कैसे किसी को जन्म दे सकता है? .... अच्छा यह बताओ कि तुम्हारा जन्म कब हुआ?”
“अभी थोड़ी देर पहले।” जलपरी ने कहा और मेघवर्ण के पैरों को निहारने लगी। उसे मेघवर्ण के पैर अपनी पूंछ से थोड़ा अलग लग रहे थे।
“थोड़ी देर पहले?” अब मेघवर्ण के आश्चर्य का ठिकाना ही नहीं रहा- “तो फिर तुम इतनी बड़ी कैसे हो गई? .... अच्छा छोड़ो .... जाने दो इस रहस्य को। पर ... पर ... तुम्हारा कोई नाम होना बहुत जरुरी है। ...... रुको मैं ही तुम्हारा कुछ अच्छा सा नाम रखता हूं .... क्या रखूं? ... क्या रखूं? ..... हां, तुम बहुत खूबसूरत हो इसलिये मैं तुम्हारा नाम लावण्या रखता हूं। हां यह नाम तुम्हारे ऊपर जंचता है।”
“लावण्या!” जलपरी ने अपने नाम को दोहराकर देखा और फिर से मेघवर्ण के पैरों को देखने लगी।
तभी जलपरी के निचले शरीर में बदलाव होने लगा। देखते ही देखते जलपरी की पूंछ गायब हो गई और उसकी जगह पर इंसानी पैर दिखाई देने लगे।
अब वह एक खूबसूरत लड़की नजर आने लगी थी।
यह देख मेघवर्ण के आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा और वह बोल उठा- “अरे वाह! क्या तुम जादू भी जानती हो? ..... मेरा मतलब कि तुमने अपने शरीर को किस प्रकार से परिवर्तित किया?”
“मुझे नहीं पता? .... मैंने तो बस तुम्हारे पैरों को देखा था, हो सकता है कि उसी की वजह से ऐसा हुआ हो?” लावण्या ने कहा।
“शायद ये सब उस काले मोती की वजह से हो रहा है?” मेघवर्ण ने कहा- “क्या तुम मुझे वह काला मोती दिखा सकती हो?”
“हां-हां क्यों नहीं? पर तुम्हें इसके लिये मेरे साथ समुद्र के अंदर चलना होगा।” लावण्या ने खुशी से कहा और उठकर खड़ी हो गई।
“क्या तुम बता सकती हो कि हमें समुद्र में कितना नीचे तक जाना है? क्योंकि मैं समुद्र के अंदर ज्यादा देर तक साँस नहीं ले सकता।” मेघवर्ण ने उदास होते हुए कहा।

यह सुन लावण्या को ज्यादा कुछ समझ नहीं आया, उसने तो मेघवर्ण का हाथ पकड़ा और पानी में छलांग लगा दी।
मेघवर्ण तो बस लावण्या के स्पर्श को ही महसूस कर रहा था। वह तो कुछ क्षणों के लिये यह भी भूल गया कि वह लावण्या के साथ जा कहां रहा है?
समुद्र के पानी को स्पर्श करते ही लावण्या का शरीर का निचला भाग फिर से जलपरी में परिवर्तित हो गया।
अब वह तेजी से मेघवर्ण का हाथ पकड़े, समुद्र की तली की ओर जा रही थी।
अभी वह कुछ दूर ही पहुंची थी कि मेघवर्ण की साँसों ने उसका साथ छोड़ना शुरु कर दिया। मेघवर्ण अब तेजी से अपने हाथ पैर हिलाते हुए छटपटा रहा था।
यह देख लावण्या, मेघवर्ण के पास आई और धीरे से उसके चेहरे को छुआ।
लावण्या के छूते ही मेघवर्ण के शरीर का निचला भाग, किसी जलपुरुष के समान बन गया और अब वह आसानी से पानी में साँस भी ले पा रहा था।
समुद्र की अथाह गहराई में इस प्रकार खुल कर साँस लेना, मेघवर्ण के लिये एक अनोखा अनुभव था। अब वह अपनी नजरें उठाकर चारो ओर देख रहा था।
प्रकृति का खूबसूरत रंग देखने के बाद, अब मेघवर्ण की निगाहें सिर्फ और सिर्फ लावण्या के चेहरे की ओर थीं, जो कि उसे खींचते हुए समुद्र की गहराई की ओर जा रही थी।
अब मेघवर्ण की पृथ्वी देखने की इच्छा उसी प्रकार समाप्त हो गई थी, जिस प्रकार से किसी अमूल्य हीरे को पाने के बाद लोहार की लोहे के प्रति इच्छा समाप्त हो जाती है।
मेघवर्ण भी अब अपने अमूल्य रत्न को निहारता सागर की अथाह गहराई की ओर जा रहा था।
◆◆◆
अगाध प्रेम

20,100 वर्ष पहले .........
पोसाईडन महल, ऐजीयन सागर, ग्रीक प्रायद्वीप
नीले रंग के समुद्र के जल में नोफोआ, अपने मगरमच्छ पर बैठा, तेजी से पोसाईडन महल की ओर जा रहा था।
नोफोआ, पोसाईडन का एक जलीय गुप्तचर था, जो सागर में घटने वाली किसी भी अजीब घटना को पोसाईडन तक पहुंचाता था। इसलिये पोसाईडन, नोफोआ को सागर की आँख भी कहता था।
देखने में हल्के हरे रंग का नोफाआ, कई जलीय जंतुओं से बना विचित्र जीव लगता था। उसके हाथ की उंगलियों के बीच मेढक के समान जालीदार संरचना व कान के पीछे मछलियों की भांति गलफड़, उसे पानी में भी आसानी से साँस लेने में मदद करते थे।
पानी के बड़े से बड़े जीव भी नोफोआ को देख अपना रास्ता बदल देते थे।
कुछ ही देर में नोफोआ, समुद्र की तली में बने पोसाईडन महल तक जा पहुंचा।
पोसाईडन महल पूरी तरह से मूंगे, मोतियों और कुछ सुनहरी धातुओं से बना हुआ था। उस विशालकाय महल की भव्यता, समुद्र में भी ग्रीक देवताओं की शक्ति का बखान कर रही थी।
नोफोआ मगरमच्छ से उतरकर, हर बार की तरह घंटा बजाकर, पोसाईडन के दरबार में पहुंच गया।
इस समय पोसाईडन अपने समुद्री रत्न जड़े सिंहासन पर विराजमान था। पोसाईडन के घुंघराले बाल पानी में लहरा रहे थे। पोसाईडन की पोशाक भी पानी में अपनी स्वर्णिम चमक बिखेर रही थी।
नोफोआ, पोसाईडन के सामने सिर झुकाकर खड़ा हो गया।
“आज तो बहुत दिनों के बाद आये नोफोआ। बताओ क्या समाचार लाये हो?” पोसाईडन की तेज आवाज वातावरण में गूंजी।
पोसाईडन की आवाज सुन नोफोआ ने अपना सिर ऊपर उठाया और फिर धीरे से बोला- “ऐ समुद्र के देवता, कल जब मैं दक्षिण अटलांटिक महासागर में घूम रहा था, तो मैंने एक स्थान पर पानी में कुछ हलचल होते महसूस किया। उस तेज हलचल की तरंगें तो मेरे शरीर से स्पर्श कर रहीं थीं, परंतु मुझे उस स्थान पर कुछ दिखाई नहीं दे रहा था? मैंने उस स्थान को छूकर देखा, तो मुझे बिजली का एक तेज झटका लगा। ..... मुझे महसूस हुआ कि वहां पर कोई अदृश्य गोल चीज उपस्थित है, जिसमें अपूर्व शक्ति भरी हुई है। अभी मैं उसके बारे में सोच ही रहा था कि तभी मुझे उस स्थान पर, लहरों में कुछ अजीब सी आकृतियां बनती-बिगड़ती दिखाई दीं। उन आकृतियों को देखकर मैं हैरान रह गया क्योंकि सभी आकृतियां वाद्य यंत्रों की थीं। ऐसा लग रहा था कि जैसे वह अदृश्य स्थान किसी संगीतज्ञ का है और वह वहां पर अलग-अलग प्रकार के वाद्य यंत्रों की रचना कर रहा है। मेरे लिये यह सभी घटनाएं किसी आश्चर्य से कम नहीं थीं, इसलिये मैं यह सब आपको बताने चला आया।”

इतना कहकर नोफोआ चुप हो गया और सिर झुकाकर पोसाईडन के अगले आदेश की प्रतीक्षा करने लगा।
नोफोआ के शब्द सुन पोसाईडन के चेहरे पर भी आश्चर्य के भाव उभर आये।
“ठीक है नोफोआ, मैं तुम्हारे साथ स्वयं उस स्थान पर चलता हूं। जरा मैं भी तो मिलूं, उस विचित्र संगीतज्ञ से।” यह कहते हुए पोसाईडन अपने स्थान से खड़ा हो गया।
पोसाईडन अब चलता हुआ, दरबार में एक ओर रखे एक बड़े से ग्लोब के पास पहुंच गया। वह ग्लोब पूर्णतया पानी से बने पृथ्वी के एक मॉडल जैसा था, जो कि पानी में होकर भी अपनी अलग ही उपस्थिति दर्ज कर रहा था।
उस पानी के ग्लोब के पास, एक छोटी सी सोने की टेबल पर, लकड़ी में लगे कुछ लाल रंग के फ्लैग रखे थे।
अब पोसाईडन ने एक बार नोफोआ की ओर देखा।
नोफोआ ने पोसाईडन का इशारा समझ, टेबल से एक फ्लैग को उठाया और उस पानी के ग्लोब पर, ध्यान से देखते हुए एक स्थान पर लगा दिया।
“यही वह जगह है देवता, जहां मैंने उस अद्भुत स्थान को देखा था।” नोफोआ ने कहा।
पोसाईडन ने ध्यान से उस जगह को देखा और फिर अपना त्रिशूल उठाकर पानी में घुमाया। अब पोसाईडन के सामने उस ग्लोब का एक बड़ा रुप दिखाई देने लगा, जिसमें नोफोआ के चिन्हित स्थान पर एक जलद्वार दिखाई दे रहा था।
पोसाईडन ने नोफोआ को पीछे आने का इशारा किया और स्वयं उस जल द्वार में प्रवेश कर गया। पोसाईडन के जाने के बाद नोफोआ भी उस जल द्वार में प्रवेश कर गया।
उस जल द्वार का दूसरा हिस्सा, ठीक उसी स्थान पर निकला, जहां नोफोआ ने उस अद्भुत वाद्य यंत्रों को देखा था।
अब नोफोआ और पोसाईडन ने उस स्थान का निरीक्षण करना शुरु कर दिया।
तभी पोसाईडन और नोफोआ को, समुद्र के अंदर किसी स्थान से, किसी वाद्य यंत्र की मधुर ध्वनि सुनाई दी।
उस मधुर ध्वनि को सुन दोनों ही चौंक गये। परंतु जैसे ही नोफोआ उस ध्वनि की दिशा में चलने को हुआ, पोसाईडन ने नोफोआ का हाथ पकड़कर उसे रोक लिया।
नोफोआ ने आश्चर्य से पोसाईडन की ओर देखा, परंतु पोसाईडन कुछ बोलने की जगह, अपने होंठो ही होंठो में कुछ बुदबुदाया। पोसाईडन के ऐसा करते ही पोसाईडन और नोफोआ दोनो ही पानी में अदृश्य हो गये।
नोफोआ समझ गया कि क्यों पोसाईडन ने उसे रोका था? अब दोनो ही उस ध्वनि की दिशा में चल दिये।
कुछ ही देर में दोनों को पानी में बहुत से विशाल वाद्य यंत्र तैरते हुए दिखाई दिये। वह सभी वाद्य यंत्र आकार और प्रकार में साधारण वाद्य यंत्रों से कुछ अलग थे।
कोई बांसुरी, कोई शहनाई, कोई वायलिन, तो कोई पियानो जैसा प्रतीत हो रहा था। कुछ वाद्य यंत्र तो कई वाद्य यंत्रों का मिला जुला प्रतिरुप दिखाई दे रहे थे।
“यह तो बहुत ही विचित्र वाद्य यंत्र हैं .... ऐसे वाद्य यंत्र तो हमने कहीं भी नहीं देखे?” पोसाईडन ने उन वाद्य यंत्रों को पास से जाकर देखा।
तभी उन्हें सुनाई देने वाली ध्वनि थोड़ी और तेज हो गई। उसे सुन पोसाईडन और नोफोआ, फिर से उस ध्वनि की दिशा में आगे बढ़ने लगे।
कुछ आगे जाने के बाद, दोनों को एक मछली का झुण्ड दिखाई दिया। सभी मछलियां अलग-अलग रंग और आकार की थीं।
उन सभी ने इस प्रकार वहां भीड़ लगा रखी थी, मानों कि दर्शक ओलंपिक के खेलों का आनंद उठाने आये हों।
वह वाद्य यंत्र की मधुर ध्वनि उन मछलियों के झुण्ड के बीच से ही आ रही थी।
पोसाईडन और नोफोआ बिना किसी प्रकार की ध्वनि उत्पन्न किये धीरे-धीरे उस स्थान की ओर बढ़े।
पास पहुंचकर दोनों ने ही मछलियों के झुण्ड के बीच में झांककर देखा। बीच में देखते ही वह हैरान हो गये। मछलियों के झुण्ड के बीच, एक गिटार सरीखा वाद्य यंत्र स्वयं पानी में बज रहा था और उसकी मधुर ध्वनि पर एक जलपरी और एक जलपुरुष नृत्य कर रहे थे।
उस अद्भुत नृत्य को देख, एक पल के लिये तो पोसाईडन भी कल्पनाओं में सागर में खो गया।
वह दोनों मेघवर्ण और लावण्या थे, जो कि इन अंजान नजरों से बेखबर, अपनी ही दुनिया में खोए हुये थे।
कभी पानी में एक दूसरे का हाथ पकड़कर गोल-गोल नाचना, तो कभी अपनी पूंछ को जल में पटककर बड़े बुलबुले बनाना। बड़ा ही विचित्र था उनका नृत्य, पर जो भी हो, दोनों इस नृत्य और वाद्य यंत्र की मधुर ध्वनि से बहुत ही आनंदित हो रहे थे।

आखिरकार पोसाईडन और नोफोआ ने प्रकट होकर, इस अद्भुत नृत्य का पटाक्षेप किया।
पोसाईडन और नोफोआ को देख सबसे पहले सभी दर्शक वहां से भाग गये। वह एक पल में समझ गये कि अब वहां रुकना खतरे से खाली नहीं है।
अब मेघवर्ण और लावण्या की निगाह भी पोसाईडन और नोफोआ पर पड़ चुकी थी। दोनों ही पोसाईडन को नहीं पहचानते थे, इसलिये आश्चर्य से उन्हें देख रहे थे।
सभी वाद्य यंत्र अब हवा में गायब हो गये।
मेघवर्ण ने खतरा भांपते हुए लावण्या को अपने पीछे कर लिया।
“कौन हो तुम दोनों? क्या तुम्हें पता नहीं कि तुम इस समय किसके सामने खड़े हो?” नोफोआ ने आगे बढ़ते हुए कहा।
नोफोआ के शब्द सुन मेघवर्ण ने ‘ना’ में सिर हिला दिया।
नोफोआ और पोसाईडन दोनों के लिये ही ये आश्चर्य भरी बात थी, क्योंकि पानी में रहने वाला जीव और पोसाईडन को नहीं जानता। यह बात कहां दोनों के गले से उतरनी थी?
“तुम दोनों इस समय समुद्र के देवता, महाशक्तिशाली पोसाईडन के सामने खड़े हो। तुरंत झुककर इनका अभिवादन करो।” नोफोआ ने पोसाईडन के सम्मान में कसीदे पढ़ते हुए कहा।
पोसाईडन के शब्द सुन मेघवर्ण समझ गया कि खतरा बड़ा है। अतः उसने खतरे को भांपते हुए पानी में झुककर पोसाईडन का अभिवादन किया।
मेघवर्ण को ऐसा करते देख लावण्या ने भी ऐसा ही किया।
“मेरा नाम मेघवर्ण और इसका नाम लावण्या है। हमें क्षमा करें देवता, हम सच में आपके विषय में नहीं जानते थे, अन्यथा हम आपका अपमान नहीं करते।” मेघवर्ण ने विनम्रता से कहा।
अब जाकर पोसाईडन को थोड़ा बेहतर महसूस हुआ।
“तुम दोनों के पास कौन सी शक्तियां हैं? जिससे तुमने इन वाद्ययंत्रों का निर्माण किया था।” पोसाईडन ने मेघवर्ण को देखते हुए पूछा।
“मेरे पास कोई शक्ति नहीं है देवता और इसका जन्म अभी होने के कारण इसे भी अपनी शक्तियों के बारे में कुछ पता नहीं है?” मेघवर्ण ने कहा।
मेघवर्ण के शब्द सुन अब पोसाईडन का ध्यान पूरा का पूरा लावण्या पर आ गया। अब वह लावण्या को देखते हुए बोला- “तो तुम्हें भी नहीं पता कि तुम्हारे पास क्या शक्ति है? ... कोई बात नहीं, मैं स्वयं तुम्हारी शक्तियों का स्रोत जान लेता हूं।”
यह कहकर पोसाईडन ने अपने हाथ में पकड़े त्रिशूल को पानी में गोल-गोल घुमाया। ऐसा करते ही उस स्थान का पूरा पानी, किसी भंवर की भांति गोल-गोल नाचने लगा और उस पानी के मध्य रखा, वह चमत्कारी सीप, काला मोती सहित नजर आने लगा।
पानी का नाचना अब बंद हो गया, परंतु पोसाईडन और नोफोआ की निगाहें अब काला मोती पर थीं, जो कि पानी में अपनी अद्भुत छटा बिखेर रहा था।
अब नोफोआ, काला मोती की ओर बढ़ा, पर जैसे ही वह कुछ आगे गया, उसे बिजली का तेज झटका लगा। इस तेज झटके से नोफोआ कुछ दूर जा गिरा।
“देवता, इस काला मोती के चारो ओर एक अदृश्य दीवार है, जिसे मैं पार नहीं कर पा रहा।” नोफोआ ने उठते हुए कहा।
अब पोसाईडन ने गुस्से से अपना त्रिशूल, मेघवर्ण के गले पर रखते हुए, लावण्या से कहा- “अब तुम स्वयं हमें लाकर वह काला मोती दोगी। समझ गई? .... और अगर तुमने जरा सी भी चालाकी की तो मैं मेघवर्ण को मार दूंगा।”
मेघवर्ण के गले पर त्रिशूल देख, लावण्या की आँखें गुस्से से जल उठीं और इससे पहले कि कोई कुछ समझ पाता, हवा में एक विशाल दीवार उत्पन्न हुई और नोफोआ के ऊपर जा गिरी।
यह देख पोसाईडन ने गुस्से से अपने त्रिशूल की नोक, मेघवर्ण के गले में चुभा दी। मेघवर्ण के गले से एक तेज चीख निकली और खून की एक पतली लकीर, पानी में घुलने लगी।
“तुम काला मोती लाती हो कि मैं इसे मार दूं?” अब पोसाईडन ने अपना भयंकर क्रोध दिखाते हुए कहा।
लावण्या के चेहरे पर छाये क्रोध के भाव, मेघवर्ण का खून देखकर अब दर्द में परिवर्तित हो गये। लावण्या की आँखों से अब अश्रुधारा निकलकर समुद्र के पानी में मिलने लगी।
अद्भुत चमत्कार था, लावण्या के हर एक आँसू पानी में घुलते ही सफेद मोती में परिवर्तित हो जा रहे थे।
उधर नोफोआ भी किसी प्रकार से दीवार के नीचे से निकल आया था। नोफोआ को काफी चोट आई थी, फिर भी वह खड़ा हो गया।

लावण्या के चेहरे के आँसू देख, पोसाईडन ने एक बार फिर अपने त्रिशूल का दबाव मेघवर्ण के गले पर बढ़ाया।
मेघवर्ण की एक बार फिर चीख निकल गई। इस बार लावण्या पूरी तरह से घबरा गई। उसने पोसाईडन को रुकने का इशारा किया और आँसू बहाती हुई, काला मोती की ओर बढ़ गई।
लावण्या ने सीप के अंदर से फुटबाल के आकार का काला मोती उठा लिया। काला मोती के सीप से उठाते ही, वह अदृश्य सुरक्षा कवच स्वतः ही गायब हो गया।
सुरक्षा कवच को गायब होते देख, नोफोआ ने शीघ्रता दिखाते हुए लावण्या के हाथ से वह काला मोती ले लिया, पर जैसे ही काला मोती, पूरी तरह से नोफोआ के हाथ में गया, नोफोआ पत्थर का बन गया।
यह देख पोसाईडन चौंक गया।
“लगता है कि तुम ऐसे नहीं मानोगी .... मुझे मेघवर्ण को मारना ही पड़ेगा।” पोसाईडन ने लावण्या को घूरते हुए कहा।
“नहींऽऽऽऽऽऽऽऽ रुक जाओ।” लावण्या ने चीखकर कहा और कातर दृष्टि से, दर्द से कराह रहे मेघवर्ण को देखने लगी।
लावण्या ने काला मोती को नोफोआ के हाथों से ले लिया। काला मोती को लेते ही नोफोआ फिर से अपने असली शरीर में आ गया, पर इस बार वह लावण्या से थोड़ा डरा-डरा सा दिखाई देने लगा।
अब लावण्या ने रोते हुए अपने हाथ में पहनी अंगूठी को नोफोआ को दे दिया और उसे इस अंगूठी को अपने हाथ में पहनने का इशारा किया।
नोफोआ कुछ समझा तो नहीं, परंतु उसने उस सुनहरी अंगूठी को अपने हाथ में पहन लिया। जब नोफोआ ने अंगूठी को पहन लिया तो लावण्या ने फिर से काला मोती को नोफोआ के हाथ पर रख दिया, परंतु इस बार नोफोआ को कुछ नहीं हुआ?
यह देख पोसाईडन समझ गया कि इस चमत्कारी अंगूठी को पहनने वाला इंसान ही इस काला मोती को धारण कर सकता है।
अब पोसाईडन ने मेघवर्ण के गले से अपना त्रिशूल हटा लिया और उसे लावण्या की ओर धकेल दिया।
लावण्या ने झपटकर मेघवर्ण को संभाल लिया और उसके गले पर बने जख्मों पर अपना हाथ रख दिया।
लावण्या की आँखों से अभी भी आँसुओं की अविरल धारा बह रही थी। इस समय उसे काला मोती के जाने का दुख नहीं था, उसे तो बस अपने मेघवर्ण की जान बच जाने की खुशी थी।
अब लावण्या ने आखिरी बार पोसाईडन को देखा और फिर मेघवर्ण को लेकर पानी में तैरती हुई, उस स्थान से दूर अनन्त सागर की गहराइयों में चली गई।
उधर पोसाईडन ने एक बार फिर जल द्वार उत्पन्न किया और नोफोआ को लेकर वापस अपने महल की ओर चल दिया।
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पिछली पुस्तक का सारांश

हैलो दोस्तों,
यह पुस्तक ‘रिंग ऑफ अटलांटिस’ सीरीज की छठी पुस्तक है। क्या आपने इस पुस्तक को पढ़ने के पहले इसके पिछले पांच भागों को पढ़ा है? अगर नहीं .... तो इस पुस्तक का पूर्ण आनन्द उठाने के लिये कृपया इसके पिछले सभी निम्न भागों को अवश्य पढ़ लें-
1) सन राइजिंग - एक रहस्यमय जहाज
2) अटलांटिस - एक रहस्यमय द्वीप
3) मायावन - एक रहस्यमय जंगल
4) तिलिस्मा - अविश्वसनीय मायाजाल


5) देवशक्ति - अद्भुत दिव्यास्त्र
अगर आप किसी कारणवश पिछली पुस्तकों को नहीं पढ़ना चाहते तो आइये इन सभी पुस्तकों के सारांश को पढ़कर उन पुस्तकों की यादों को ताजा कर लें-
शैफाली एक 13 वर्षीय अंधी लड़की है, जो अपने माता-पिता के साथ सन राइजिंग नामक पानी के जहाज पर यात्रा कर रही है। बचपन से अंधी होने के बावजूद भी शैफाली को अजीब-अजीब से सपने आते हैं। सन राइजिंग पर और भी बहुत से लोग सफर कर रहे होते हैं।
क्रिस्टी का ऐलेक्स को इग्नोर करना, जेनिथ का तौफीक से अपने प्यार का इजहार करना और जैक व जॉनी का आपस में शर्त लगाना, कुछ ऐसी ही घटनाओं के साथ सन राइजिंग पर न्यू इयर की रात लॉरेन नामक एक डान्सर का कत्ल हो जाता है। अभी लॉरेन के कत्ल की गुत्थी सुलझ भी नहीं पाई थी कि तभी सन राइजिंग के चालक दल की गलती की वजह से, सन राइजिंग अपना रास्ता भटककर बारामूडा त्रिकोण के क्षेत्र में फंस जाता है। सन राइजिंग का सम्पर्क अब बाहरी दुनिया से पूर्णतया कट चुका था।
उड़नतश्तरी और विशाल भंवर से बचने के बाद, जहाज के असिस्टेंट कैप्टेन रोजर का हेलीकॉप्टर भी एक अंजाने द्वीप को देखते हुए दुर्घटनाग्रस्त हो जाता है। उधर सुयश के कपड़े एक ब्लू व्हेल मछली, पानी उछालकर भिगो देती है, जिससे ब्रैंडन को सुयश की पीठ पर बना एक सुनहरे रंग का सूर्य का टैटू दिख जाता है।
उसी रात शैफाली के सोते समय, कोई उसके सिर के पास प्राचीन लुप्त शहर अटलांटिस का सोने का सिक्का रख जाता है। बाद में हरे रंग के विचित्र कीड़े को देखते हुए जहाज पर कुछ अजीब सी घटनाएं भी घटती हैं, जिसके बाद सन राइजिंग के स्टोर रुम में रखी लॉरेन की लाश कहीं गायब हो जाती है? उधर न्यूयार्क बंदरगाह पर राबर्ट और स्मिथ के पास एक व्यक्ति आकर स्वयं को सन राइजिंग का सेकेण्ड असिस्टेंट कैप्टेन असलम बताता है। वह कहता है कि कोई उसे बेहोश कर, उसकी जगह लेकर सन राइजिंग पर चला गया है। जिसके बाद इस केस को हल करने के लिये जेरार्ड, सी.आई.ए के काबिल एजेंट व्योम को इस मिशन पर भेज देता है।
उधर सुयश को बार-बार वही रहस्यमयी द्वीप दिखाई देता है और जब उस द्वीप का रहस्य जानने के लिये लारा उस द्वीप की ओर जाता है, तो वह भी रहस्यमय परिस्थितियों में अपनी जान गंवा बैठता है। दूसरी ओर व्योम सन राइजिंग को ढूंढते हुए उसी रहस्यमय द्वीप के पास पहुंच जाता है, पर उस द्वीप का रहस्य जानने में व्योम भी दुर्घटना का शिकार हो जाता है।
उधर रात में लोथार को सन राइजिंग पर मरी हुई लॉरेन दिखाई देती है, जिसे देखकर लोथार अजीब सी हरकतें करते हुए समुद्र में कूद जाता है। सभी की लाख कोशिशों के बाद लोथार भी मारा जाता है। तभी सभी को पानी पर दौड़ता हुआ एक सुनहरा मानव दिखाई देता है, जो कि एक दिशा की ओर इशारा करके गायब हो जाता है। अगले दिन ऐमू नामक एक रहस्यमय तोता फिर से जहाज को भटका देता है। उधर अंजान कातिल, लॉरेन की हत्या का रहस्य जान चुके लैब असिस्टेंट थॉमस को भी मार देता है।
अगले दिन सन राइजिंग एक भयानक तूफान के बीच फंस जाता है और सभी की लाख कोशिशों के बाद भी वह समुद्र में डूब जाता है। किसी प्रकार 12 लोग बचकर उस रहस्यमय द्वीप पर पहुंच जाते हैं।
उस रहस्यमय द्वीप पर एक भयानक जंगल होता है, जो अलग-अलग प्रकार के खतरे उत्पन्न करता रहता है। शैफाली को विचित्र पेड़ का फल देना, जेनिथ के ऊपर मगरमच्छ मानव का हमला करना, भविष्य के पत्थरों का मिलना और फिर ड्रेजलर का अजगर के द्वारा मारा जाना, यह सभी घटनाएं उस जंगल को रहस्यमई और खतरनाक दोनों ही बना रहे थे।
वहीं दूसरी ओर वेगा पर एक रहस्यमय बाज हमला कर देता है, जिससे डर कर वेगा का भाई युगाका वेगा को एक जोडियाक वॉच देता है, जिसमें 12 राशियों की शक्तियां थीं, जो वेगा को मुसीबत के समय छिप कर उसे बचातीं।
दूसरी ओर अंटार्कटिका की धरती पर जेम्स और विल्मर को बर्फ की खुदाई के दौरान एक विचित्र दुनिया दिखाई देती है। कुछ अजीब से तिलिस्मी रास्तों को पार करने के बाद जेम्स और विल्मर वहां मौजूद देवी शलाका और उनके 7 भाईयों को जगा देते हैं, जो कि 5000 वर्ष से वहां शीतनिद्रा में सो रहे थे।
उधर जंगल में नयनतारा पेड़ के द्वारा जन्म से अंधी शैफाली की आँखें आ जाती हैं। जंगल में आगे बढ़ने पर सभी को शलाका मंदिर दिखाई देता है, जहां पर सुयश एक छोटे से तिलिस्म को पार कर, देवी शलाका की मूर्ति को छू लेता है। तभी सुयश के शरीर पर बने टैटू से सतरंगी किरणें आकर टकराती हैं और सुयश के टैटू में एक अंजानी शक्ति प्रवेश कर जाती है।
उधर जब रोजर का हेलीकॉप्टर धुंध में फंसकर अराका द्वीप पर गिरता है, तो रोजर को पायलेट की लाश, एक शेर ले जाता दिखाई देता है। शेर का पीछा करने पर रोजर एक लड़की आकृति से मिलता है। आकृति का चेहरा देवी शलाका से मिलता दिखाई देता है। आकृति रोजर को अराका के कई रहस्यों के बारे में बताती है।
उधर सुयश को एक आदमखोर पेड़ पकड़ लेता है, पर सुयश अपने टैटू में समाई विचित्र शक्ति से इस मुसीबत से बच जाता है। दूसरी ओर कुछ दिन पहले आकृति रोजर को सुनहरा मानव बनाकर सन राइजिंग को भटकाने के लिये भेजती है। रास्ते में रोजर पानी में बेहोश हुए व्योम को बचाकर अराका द्वीप के किनारे रख देता है। बाद में सुयश एक अंजान खंडहर में मिले सिंहासन की वजह से, समय के चक्र को तोड़ 5020 वर्ष पहले के काल में हिमालय पर पहुच जाता है। हिमालय पर उसे अपनी ही शक्ल का एक इंसान आर्यन दिखाई देता है जो शलाका और अन्य 11 लोगों के साथ एक रहस्यमयी विद्यालय ‘वेदालय’ में पढ़ रहा होता है। वहां सुयश को 15 अद्भुत लोक के बारे में पता चलता है।
वहीं दूसरी ओर लुफासा, मकोटा के आदेशानुसार अपनी इच्छाधारी शक्ति का प्रयोग कर हर रोज सन राइजिंग से एक लाश लाकर पिरामिड में रखता है, परंतु एक दिन जब वह पिरामिड में जाकर देखता है तो उसे पिरामिड के अंदर अंधेरे का देवता जैगन बेहोश पड़ा दिखाई देता है।
उधर ब्रूनो के गायब होने के बाद सुयश की टीम का सामना एक जंगली सुअर से होता है, जिसकी वजह से असलम एक दलदल में गिर कर मारा जाता है, परंतु मरने से पहले असलम अपना काला बैग सुयश को दे जाता है। असलम के काले बैग में एक लॉकेट होता है, जो स्वतः ही जेनिथ के गले में बंध जाता है।
उधर अगले दिन वेगा पर टुंड्रा हंस और बुल शार्क हमला करती हैं। लेकिन वेगा के हाथ में बंधी जोडियाक वॉच वेगा की रक्षा करती है। दूसरी ओर व्योम एक व्हेल का पीछा करता हुआ, उस द्वीप के एक ऐसे अंजान हिस्से में पहुंच जाता है, जहां एक कम्प्यूटर प्रोग्राम कैस्पर द्वारा एक तिलिस्म का निर्माण हो रहा होता है। व्योम उस कमरे में रखी एक ट्रांसमिट मशीन से ट्रांसमिट होकर सामरा राज्य के अंदर पहुंच जाता है।
उधर जंगल में युगाका ऐलेक्स को बेहोश करके ऐलेक्स बनकर सुयश की टीम में शामिल हो जाता है। पर शैफाली युगाका को पहचान जाती है और वह युगाका से कुछ क्षणों के लिये उसकी वृक्ष शक्ति छीन लेती है। दूसरी ओर देवी शलाका के कमरे में बंद जेम्स को दीवार में एक रहस्यमयी द्वार दिखाई देता है। जेम्स उस द्वार के माध्यम से हिमालय पहुंच जाता है, जहां हनुका नामक एक यति जेम्स को पकड़कर हिमलोक के कारागार में डाल देता है। उधर व्योम ट्रांसमिट होकर सामरा द्वीप में उपस्थित महावृक्ष के पास पहुंच जाता है। दूसरी ओर कलाट, युगाका को लेकर समुद्र के अंदर मौजूद अटलांटिस की धरती पर जाता है। जहां पर ‘सागरिका’ एक पहेली के माध्यम से कलाट को एक संदेश देती है। उस संदेश में विनाश की एक आहट छिपी हुई थी।
उधर जॉनी एक जलपरी की मूर्ति से निकलती शराब को पीकर बंदर में परिवर्तित हो जाता है और उछलकर जंगलों में भाग जाता है। रात में जंगल में बने एक पार्क में सोते समय, वहां उपस्थित मेडूसा की मूर्ति सजीव होकर, शैफाली को एक महाशक्ति मैग्ना के सपने दिखाती है, जिसमें मैग्ना एक ड्रैंगो पर सवार होकर, समुद्र की तली में मौजूद, एक स्वर्ण महल से, तिलिस्म तोड़कर एक शक्तिशाली पंचशूल प्राप्त करती है। उसी रात जेनिथ को नक्षत्रा के द्वारा तौफीक की सच्चाई के बारे में पता चलता है। वह जान जाती है कि तौफीक ही सनराइजिंग पर घूमने वाला वह रहस्यमय कातिल है।
इधर शलाका जेम्स को ढूंढने के लिये हिमालय पर पहुंचती है, पर रुद्राक्ष और शिवन्या शलाका को एक दिन के लिये वहीं रोक लेते हैं। दूसरी ओर जंगल में एक भौंरा विशालकाय चक्रवात का रुप लेकर ब्रैंडन को अपने में लपेटकर हवा में गायब हो जाता है। उधर लुफासा, मकोटा के आदेशानुसार हिमालय पर मौजूद, एक शिव मंदिर से ‘गुरुत्व शक्ति’ लाने के लिये जाता है। लुफासा गरुण का रुप धरकर हिमालय से गुरुत्व शक्ति ले जाने में सफल हो जाता है। इस वजह से रुद्राक्ष और शिवन्या के परेशान होने पर, गुरु नीमा महाशक्तिशाली हनुका को लुफासा से गुरुत्व शक्ति छीनकर लाने को कहते हैं। महाबली हनुका व लुफासा के मध्य युद्ध होता है, परंतु उस युद्ध के फलस्वरुप गुरुत्व शक्ति की डिबिया आसमान से अराका द्वीप में गिर जाती है।
दूसरी ओर अलबर्ट की सूझबूझ से सभी घास के मैदान में लगी आग को पार करते हैं, पर आखिर में क्रिस्टी, जैक को उस आग में धक्का देकर मार देती है। सभी के पूछने पर क्रिस्टी बताती है कि जैक ने ही उसके पिता को मारा था। आगे बढ़ने पर सुयश की टीम पर एक स्पाइनासोरस आक्रमण कर देता है। यहां जेनिथ नक्षत्रा की शक्तियों का प्रयोग कर उस स्पाइनासोरस को मार देती है।
उधर व्योम को रिंजो-शिंजो के माध्यम से एक झील के अंदर रखा हुआ पंचशूल दिखाई देता है, जिसे छूने के बाद व्योम का पूरा शरीर जल जाता है। व्योम मरणासन्न हालत में झील के बाहर गिरता है। तभी आसमान से गुरुत्व शक्ति की आखिरी बूंद व्योम के मुंह में आकर गिर जाती है। गुरुत्व शक्ति के माध्यम से व्योम ठीक होकर उस पंचशूल को भी प्राप्त कर लेता है। पंचशूल को उठाने के बाद व्योम की कलाई पर एक सुनहरे रंग का सूर्य का टैटू बन जाता है।
उधर वेगा पर बारी-बारी से एक ईल मछली, काला नाग व खतरनाक सांड हमला करते हैं, परंतु इस हमले में धरा बेहोश हो जाती है। वेगा, मयूर और धरा को अपने घर ले जाता है। दूसरी ओर अलबर्ट को एक उड़ने वाला टेरोसोर लेकर उड़ जाता है। उधर ऐलेक्स एक पेड़ के कोटर से होते हुए, 20 फुट गहरे कमरे में गिर जाता है। जहां पर उसे एक 3 सिर वाला सर्प विषाका बेवकूफ बनाकर अपनी मणि और सुनहरी बोतल लेकर भाग जाता है। दूसरी ओर क्रिस्टी अपनी फूर्ति और तेज दिमाग से नदी किनारे बने एक खतरनाक रेत मानव को खत्म कर देती है। उधर व्योम विचित्र परिस्थितयों में त्रिकाली को बचाते हुए मकोटा के सेवक गोंजालो को बुरी तरह से घायल कर देता है। जिससे त्रिकाली व्योम की शक्तियों पर मोहित हो, उससे रक्षासूत्र बंधवा कर शादी कर लेती है।
दूसरी ओर सुयश की टीम पहाड़ों के बीच बने ‘मैग्नार्क द्वार’ को पार करके रेड आंट के क्षेत्र में प्रवेश कर जाते हैं, जहां पर खून की बारिश होती है, पर जेनिथ की वजह से यह मुसीबत भी पार हो जाती है।
उधर रुपकुण्ड झील के रास्ते कलिका, यक्ष युवान के प्रश्नों का उत्तर देते हुए प्रकाश शक्ति को प्राप्त कर लेती है। दूसरी ओर त्रिशाल भी मानसरोवर झील के अंदर से होकर शक्तिलोक पहुंच जाता है, जहां एक-एक कर वह भगवान विष्णु के 5 अस्त्रों की सहायता से एक मायाजाल को पार करके ध्वनि शक्ति प्राप्त कर लेता है।
दूसरी ओर कैस्पर, मैग्ना को याद करते हुए कैस्पर क्लाउड में बने श्वेत महल आ जाता है। जहां पर उसकी मुलाकात विक्रम और वारुणी से होती है। कैस्पर, श्वेत महल का नियंत्रण वारुणि के हाथ में दे देता है। उधर सुयश सहित सभी बर्फ की घाटी में पहुंच जाते हैं, जहां एक छोटे से पेंग्विन की मदद से शैफाली को एक सीप के अंदर मैग्ना की ड्रेस मिल जाती है। आगे बढ़ने पर सुयश की टीम पर एक बर्फ का ड्रैगन हमला कर देता है। जेनिथ एक बार फिर से नक्षत्रा की शक्ति का उपयोग करके, उस बर्फ के ड्रैगन को हरा देती है।
वहीं दूसरी ओर वेगा, वीनस से अपने प्यार का इजहार करता है कि तभी कि तभी आसमान से एक विशाल उल्का पिंड आकर अटलांटिक महासागर में गिरता है। उल्का पिंड गिरने की वजह से, भूकंप का एक जोरदार झटका आता है। धरा और मयूर, वेगा और वीनस से विदा ले उल्का पिंड के पीछे चले जाते हैं।

उधर तौफीक को रात में एक पेड़ की कोटर में मौजूद ‘वेदान्त रहस्यम’ नामक एक पुस्तक मिलती है। जिसमें सुयश को, अष्टकोण में बंद एक नन्हा बालक दिखाई देता है। बाद में शलाका बताती है कि वेदान्त रहस्यम आर्यन ने ही लिखी थी। आगे बढ़ने पर सभी एक ज्वालामुखी के जाल में फंस जाते हैं। जहां शैफाली को ज्वालामुखी के लावे के अंदर एक ड्रैगन का सोने का सिर मिलता है। शैफाली के आँसुओं से वह ड्रैगन का सिर पिघलकर, ज्वालामुखी के लावे में मिल जाता है।
उधर आकृति, लैडन नदी के किनारे जाकर एक सुनहरी हिरनी का अपहरण कर लेती है, जो कि देवी आर्टेमिस को सबसे प्रिय थी। वहां उसे लैडन नदी में सोया हुआ मैग्ना का ड्रैंगो भी दिखाई देता है। उधर दूसरी ओर त्रिशाल और कलिका दोनों मिलकर, राक्षस कालबाहु को पकड़ने राक्षसलोक जाते हैं, पर वहां उन्हें विद्युम्ना अपने मायाजाल भ्रमन्तिका में फंसा देती है, परंतु भ्रमन्तिका में फंसने के पहले त्रिशाल और कलिका वहां रावण की मूर्ति में मौजूद एक स्त्री के कंकाल को अपनी शक्तियों से मुक्ति दे देते हैं।
दूसरी ओर ऐलेक्स को स्थेनो बताती है कि शैफाली ही पिछले जन्म में मैग्ना थी। वह कहती है कि विषाका जो बोतल लेकर भागा था, वह मैग्ना की स्मृतियां थीं। स्थेनो, ऐलेक्स को माया का दिया हुआ वशीन्द्रिय शक्ति का घोल पिलाकर नागलोक में स्थित त्रिआयाम में भेज देती है। जहां ऐलेक्स नागफनी और राक्षस प्रमाली को हराकर त्रिआयाम से मैग्ना की स्मृतियां लाने में सफल हो जाता है।
उधर सुयश और उसकी टीम एक खोखले पहाड़ में फंस जाते हैं। उस खोखले पहाड़ में हेफेस्टस और हरमीस की मूर्तियां लगी होती हैं। यहां भी एक प्रकार का तिलिस्म होता है, जिसे सभी मिलकर अपने दिमाग से पार कर लेते हैं। आगे बढ़ने पर सुयश को एक नन्हे खरगोश के माध्यम से एक अंगूठी मिलती है, जो कि शैफाली के हाथ में बिल्कुल फिट हो जाती है।
उधर व्योम के सामने उसकी और त्रिकाली की शादी का राज खुल जाता है। वहां कलाट, व्योम और त्रिकाली को त्रिशाल व कलिका को छुड़ाने के लिये भ्रमन्तिका में जाने को कहता है। वहीं दूसरी ओर ऐलेक्स, सुयश की टीम के पास वापस पहुंचने में कामयाब हो जाता है। वह मैग्ना की स्मृतियां बोतल से निकाल शैफाली को दे देता है, जिससे शैफाली को पूर्वजन्म की सारी बातें याद आ जाती हैं। दूसरी ओर वारुणी कैस्पर को एक विचित्र जीव को दिखाती है। कैस्पर उस विचित्र जीव को देखकर बताता है कि पृथ्वी पर कोई बड़ा संकट आने वाला है?
दूसरी ओर सुयश की टीम को रास्ते में एक नहर मिलती है, जिसे पार करना अत्यंत ही मुश्किल था, पर सभी के सम्मिलित प्रयास से वह नहर के जलकवच को पार कर लेते हैं। उधर शलाका, विल्मर को सुनहरी ढाल दे देती है, परंतु बदले में वह विल्मर की उस स्थान की स्मृति छीन लेती है। वहीं दूसरी ओर आकृति की कैद में बंद, रोजर को सनूरा छुड़ा देती है। रोजर भागते समय, मेलाइट व सुर्वया को भी अपने साथ लिए जाता है।
उधर सुयश अपनी टीम के साथ उड़ने वाली झोपड़ी के मायाजाल को तोड़ कर, सभी को लेकर तिलिस्मा में प्रवेश कर जाता है। जहां तिलिस्मा का निर्माता कैश्वर सभी को एक नीलकमल की पहली पंखुड़ी तोड़ने के लिये कहता है। सभी के सम्मिलित प्रयास से वह तिलिस्मा के पहले द्वार को पार कर जाते हैं।
दूसरी ओर फेरोना ग्रह का कमांडर प्रीटेक्स, राजा एलान्का को बताता है कि उसने युवराज ओरस को पृथ्वी पर देख लिया है और उसे प्राप्त करने के लिये, उसने एण्ड्रोवर्स पावर को भेज दिया है। वहीं दूसरी ओर तिलिस्मा में सुयश की टीम के सामने एक नेवला व ऑक्टोपस मायाजाल बुनकर उन्हें फंसाने की कोशिश करते हैं, पर सभी आसानी से उस द्वार को पार कर लेते हैं।
हमने काला मोती: ब्रह्मकण शक्ति / Kala Moti Brahmakan PDF Book Free में डाउनलोड करने के लिए लिंक निचे दिया है , जहाँ से आप आसानी से PDF अपने मोबाइल और कंप्यूटर में Save कर सकते है। इस क़िताब का साइज 8.8 MB है और कुल पेजों की संख्या 395 है। इस PDF की भाषा हिंदी है। इस पुस्तक के लेखक   शिवेन्द्र सूर्यवंशी / Shivendra Suryavanshi   हैं। यह बिलकुल मुफ्त है और आपको इसे डाउनलोड करने के लिए कोई भी चार्ज नहीं देना होगा। यह किताब PDF में अच्छी quality में है जिससे आपको पढ़ने में कोई दिक्कत नहीं आएगी। आशा करते है कि आपको हमारी यह कोशिश पसंद आएगी और आप अपने परिवार और दोस्तों के साथ काला मोती: ब्रह्मकण शक्ति / Kala Moti Brahmakan को जरूर शेयर करेंगे। धन्यवाद।।
Q. काला मोती: ब्रह्मकण शक्ति / Kala Moti Brahmakan किताब के लेखक कौन है?
Answer.   शिवेन्द्र सूर्यवंशी / Shivendra Suryavanshi  
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