कामुकता का उत्सव | Kamukata Ka Utsav PDF Download Free Jayanti Rangnathan

पुस्तक का विवरण (Description of Book) :-

नाम / Name 📥कामुकता का उत्सव PDF | Kamukata Ka Utsav
Author 🖊️
आकार / Size 1 MB
कुल पृष्ठ / Pages 📖196
Last UpdatedSeptember 28, 2022
भाषा / Language Hindi
Category,
प्रकृति अपना हर काम आनन्द से करती है। हर मौसम, हर दिन और हर रात में एक प्रवाह है, आनन्द है। प्रकृति का हर जीव नयी संरचना मुग्ध होकर करता है। मुग्धता कभी गलत नहीं हो सकती। इसे इस तरह से समझना ज़रूरी है कि जिस क्रीड़ा से स्त्री और पुरुष निकट आते हैं, दो से एक बनते हैं और आनन्द से विभोर होते हैं, उसमें सही-गलत क्या हो सकता है? इश्क और वासना के बीच की दूरी सूत भर है। दोनों ही प्रकृति दत्त है। इन्सान की ज़रूरत भी। जब तक हम इस विषय पर खुलकर बोलेंगे नहीं, मनपसन्द लिखेंगे नहीं, पढ़ेंगे नहीं, तो अलमारी के बन्द कोनों और बिस्तर में तकिये के नीचे की तलहटी में अँधेरा बढ़ता ही जायेगा। / ‘कामुकता का उत्सव : जीवन में प्रणय, वासना और आनन्द' सम्पादक : जयंती रंगनाथन / संकलन में संकलित कहानीकार / मनीषा कुलश्रेष्ठ, प्रत्यक्षा सिन्हा, जयश्री रॉय, प्रियदर्शन, जयंती रंगनाथन, दिव्य प्रकाश दुबे, कमल कुमार, अंकिता जैन, विपिन चौधरी, गौतम राजऋषि, अणुशक्ति, नरेन्द्र सैनी, सोनी सिंह, प्रियंका ओम, इरा टाक, रजनी मोरवाल, डॉ. रूपा सिंह, अनु सिंह चौधरी, दुष्यन्त


<h3 id="h-description-of-book" class="has-text-color-white has-vivid-green-cyan-background-color has-background joli-heading"><strong>पुस्तक का कुछ अंश</strong></h3>

पुस्तक का कुछ अंश

भूमिका

आज पच्चीस साल पुराना एक वाक़या याद आ रहा है। मुम्बई से अपने कुछ दोस्तों के साथ एक टीवी सीरियल की शूटिंग के लिए खजुराहो गयी थी। बहुत सुना था, देख पहली बार रही थी।
मन्दिर की दीवारों पर उकेरी गयी कला को देख कभी आश्यर्चचकित होते तो कभी दाँतों तले उँगली दबाते समय अचानक मेरा ध्यान गया था उस दढ़ियल फिरंगी पर। वहाँ खड़ा वह ख़ुद भी मन्दिर का ही एक अंश लग रहा था।
लम्बी दाढ़ी, पीली पड़ चुकी सफ़ेद क़मीज़, खाक़ी बरमुडा, नंगे पैर, आँखों में भारी चश्मा लगाये वो फिरंगी बड़ी तन्मयता से पत्थरों पर सजी प्रणयगाथा को काग़ज़ पर उकेर रहा था। जो बात मुझे दीवार पर समझ नहीं आ रही थी, उसके चित्रों को देख आ गयी। ओह…जैसे मिनट भर में उसने मैथ का कोई मुश्किल सवाल हल कर मेरे सामने रख दिया।
दोपहर ढल चुकी थी। उसके स्केच निश्चित ही प्रभावी थे। पत्थर की शिला पर सजी कन्या उसके पेंसिल के स्ट्रोक से जैसे सजीव हो उठी थी। उन्नत वक्ष वाली उस कन्या के चेहरे पर अद्भुत हँसी थी। उसके वक्ष पर जिस पुरुष का हाथ था, वह दूसरी तरफ़ एक कन्या पर झुककर उसके अंगों को चूम रहा था। उदात्त प्रणय के लेनदेन की इस क्रीड़ा में जैसे समूचा समाज आनन्दमग्न हो रहा था।
जैसे ही हम उस मन्दिर के सामने से हटे, देर तक मेरे दिमाग़ में दो बातें कौंधती रहीं। कन्या के चेहरे पर वो दिव्य हँसी और फिरंगी की आँखों में वो सतरंगी चमक।
मुम्बई लौटने के बाद अपनी कुछ महिला मित्रों को यह घटना बताते हुए, यह बताने की कोशिश की कि हम किसी वक़्त पर कितने सम्पन्न हुआ करते थे, धन से, मन से और तन से भी।
खजुराहो के नाम से सब फुसफुसाहटों में बात करने लगते हैं। ऐसा क्या देख लिया, नया क्या खोज लिया, तरह-तरह की बातें भी सामने आयीं। पर जिससे भी मैंने कहा कि सेक्स से सम्बन्धित तमाम सोच को हम हमेशा एक गहरी काली अलमारी में बन्द रखते हैं, वहाँ सूरज की तेज़ रोशनी में सबके सामने वो लड़की सेक्स से शरमा नहीं रही थी, आनन्द में थी…वो इस सूत्र को पकड़ नहीं पाया। लब्बोलुबाब यही कि हमारे यहाँ प्रणय, सेक्स और कामोत्तेजना की बातें खुलकर नहीं की जातीं। ख़ासकर उस समय अपने परिवार और दोस्तों के जमघट में सेक्स पर बात करना सहज नहीं था।
उसी दौरान मेरा साबक़ा एक ऐसे वर्ग से हुआ, जिसने मेरे सोचने की धारा को काफ़ी हद तक बदल दिया। मैं धर्मयुग छोड़कर सोनी टीवी में काम करने लगी। वहाँ पहली बार मैंने अपने साथ काम करने वालों को सेक्स पर खुलकर और आनन्द लेकर बोलते हुए सुना। हमारे साथ काम करने वाली रश्मि ऑफ़िस देर से आयी, बॉस ने सवाल किया, तो सपाट आवाज़ में कहा, ‘आइ वॉज फीलिंग हॉर्नी इन द मॉर्निंग…’
साथ का एक पुरुष कलीग लगभग रोज़ ही सिंगल नॉट रेडी टु मिंगल बालिकाओं को सेक्स के फ़ायदे गिनाने से नहीं चूकता। अपनी यौवनता का खुलकर प्रदर्शन करती युवतियाँ मेरे लिए एक चुनौती की तरह थीं। वे वीकएंड पर अपने साथी (स्त्री-पुरुष दोनों) के साथ ब्लू फ़िल्म मज़े लेकर देखतीं। उस पर बहस भी करतीं और अपने पार्टनर से अपनी फेवरेट पोज़ीशन के बारे में भी खुलकर बातें करतीं। ये दुनिया मेरे लिए नयी थी। मेरी सोच को विस्तार मिल गया।
काली, बन्द अलमारी को सूरज का उजाला और प्रकृति की छाँह मिल गयी। जब आप किसी विषय को एक सामान्य विषय की तरह पढ़ते हैं, देखते हैं, सोचते हैं तो आपका नज़रिया ही बदल जाता है।
स्टेशन पर दस रुपये की बिकने वाली मस्तराम की पुस्तक आज धड़ल्ले से अमेजॉन पर भी बिक रही है। सेक्सी भाभी, जलती जवानी, जवाँ होती पड़ोसिन आज भी तकिये के नीचे या फ़ोन के किसी एप में क़ैद हैं। लेकिन यह भी सच है कि काम साहित्य को पढ़ने और सुनने वालों में पिछले पाँच सालों में 43 प्रतिशत का इज़ाफ़ा हुआ है।
क्या हमें इस विषय पर खुलकर बात करने, पढ़ने, सुनने की ज़रूरत है? पिछले कुछ सालों से कुछ बातें मथ रही हैं, इसके बाद आप ख़ुद तय करें कि काम और सेक्स सम्बन्धों को हमें कहाँ तक ले जाना चाहिए?
पैशन, रोमांस, सेक्सुअल सम्बन्ध जब से आदम और हव्वा इस दुनिया में आये हैं, तभी से हैं। समाज का एक वर्ग मानता आया है कि सेक्स वंशवृद्धि और प्रकृति की निरन्तरता को बरकरार रखने के लिए नितान्त निजी क्षणों में की जाने वाली क्रीड़ा है। क्रीड़ा से अधिक शायद काम।
लेकिन इस वर्ग की तुलना में एक ज़्यादा बड़ा वर्ग पैशन और सेक्स को शारीरिक आनन्द से जोड़ता आया है। इस आनन्द को अनुभूत करने के लिए काम साहित्य यानी इस विषय पर कहानी, कविता लिखी जानी लगीं। हज़ारों साल पहले रत्यात्मक कविता लिखी गयी थी, ‘इस्ताम्बुल 2461’, मेसोपोटामिया में राजा शू सिन ने अपनी दुल्हन को प्रेम और वासना में लिपटी कविता लिखी थी। इस कविता को पहली रत्यात्मक कविता माना जाता है।
जिस समय दुनिया के बाक़ी देश युद्ध, भुखमरी और असहिष्णुता के घेरे से निकल ही नहीं पा रहे थे, हम हिन्दुस्तानी उदात्त प्रेम और वासना के चरम पर थे।
बात हज़ार साल से भी ज़्यादा पुरानी है। मध्य भारत से लेकर दक्षिण भारत तक के कलाकार प्रेम, वासना, कामना और संसर्ग को पत्थरों पर उकेर रहे थे, मन्दिर की दीवारें सज रही थीं प्रणय और समागम की सजीव मूर्तियों से। ओसियन (राजस्थान), खजुराहो (मध्यप्रदेश), एलोरा (महाराष्ट्र), भौरमदेव (छत्तीसगढ़), विरुपक्षा मन्दिर, हंपी (कर्नाटक), हलेबीडु (कर्नाटक) में आज भी न जाने कितनी गाथाएँ छिन्न-भिन्न हुई पड़ी हैं। उस वक़्त के कला और कौतुकप्रिय राजाओं ने समाज के साथ-साथ अपने कलाकारों को भी यह आज़ादी दी कि वे स्त्री-पुरुष के कामकला का सहजता से वर्णन करें। एक ही प्रांगण में हिन्दू, जैन और बुद्ध धर्म के अनुयायी अपने इष्ट देवों का आह्वान करते थे। समाज की इस व्यवस्था से किसी को भ्रम नहीं था। न ही किसी क़िस्म का बैर।
साल तो हज़ारों बीत गये, पर सोच हमारी उससे भी कुछ हज़ार साल पीछे चली गयी। यह कल्पना करना मुश्किल है कि ऐसे उन्नत समाज ने कब पीछे की ओर मुड़कर चलना शुरू किया होगा?
आज जब पश्चिम हमारी तरफ़ ताकता है कि क्या इन कामुक शिलाओं और मूर्तिकला के जनक हम ही थे? तो हम ख़ुद पर अचरज भी करते हैं और शर्म भी।
बन्द समाज और कुन्द दिमाग़ों ने सेक्स को गन्दी बात तो बना दिया, पर क्या हम ऐसा मानते हैं? सेक्स को आनन्द कहने से चिढ़ने वाले इस समाज को यौन हिंसा से बेशक परहेज़ नहीं है। इसके लिए वे किसी भी हद तक कुकर्म कर सकते हैं।
यहाँ हम आनन्द की बात कर रहे हैं, इसलिए इसी विषय पर टिके रहते हैं। इस आनन्द पर बात करना, पढ़ना, सुनना और करना अगर ग़लत है, तो प्रकृति के चरित्र पर ही कुछ सवालिया निशान खड़े हो जायेंगे, जिसने पुरुष और स्त्री को सृष्टि की संरचना के लिए बनाया। प्रकृति अपना हर काम आनन्द से करती है। हर मौसम, हर दिन और हर रात में एक प्रवाह है, आनन्द है। प्रकृति का हर जीव नयी संरचना मुग्ध होकर करता है।
मुग्धता कभी ग़लत नहीं हो सकती। इसे इस तरह से समझना ज़रूरी है कि जिस क्रीड़ा से स्त्री और पुरुष निकट आते हैं, दो से एक बनते हैं और आनन्द से विभोर होते हैं, उसमें सही-ग़लत क्या हो सकता है?
इश्क़ और वासना के बीच की दूरी सूत भर है। दोनों ही प्रकृति दत्त है। इन्सान की ज़रूरत भी।
जब तक हम इस विषय पर खुलकर बोलेंगे नहीं, मनपसन्द लिखेंगे नहीं, पढ़ेंगे नहीं, तो अलमारी के बन्द कोनों और बिस्तर में तकिये के नीचे की तलहटी में अँधेरा बढ़ता ही जायेगा।
हिन्दी के चिरपरिचित लेखक-लेखिकाओं से काम साहित्य लिखवाने के पीछे यही सोच थी। यह काम पहले भी हुआ है। पर जिसने भी लिखा है, उसे बेशर्मी से कठघरे में खड़ा कर दिया गया। इस संग्रह के दौरान सबसे बात करते हुए मैंने दो बातें शिद्दत से महसूस कीं, सेक्स पर समाज का एक वर्ग खुलकर बात करने को तैयार है। सेक्स को सेक्स न कहकर स्त्री-पुरुष का प्रणय सम्बन्ध या अन्तरंगता कह लें। पर शब्द मुखर होने लगे हैं। दूसरा, सबकी यही राय है कि जब तक स्तरीय लेखन सामने नहीं आयेगा, इस विषय को पढ़ने वाला वर्ग पटरियों पर से पुस्तकें उठाता रहेगा।
यह भी सच है कि कामुक या रत्यात्मक साहित्य कहना या लिखना आसान नहीं है। पैशन को महसूस करना आसान है, लिखना नहीं। साथ ही इस बात का भी ध्यान रखना कि क़लम बहके नहीं, मुश्किल है। पर संग्रह में शामिल सभी रचनाकार इसमें अव्वल साबित हुए।
‘कामुकता का उत्सव’ की परिकल्पना में शुरू से वाणी प्रकाशन की निर्देशक अदिति माहेश्वरी-गोयल मेरे साथ रहीं। हम दोनों लम्बे समय से महसूस कर रहे थे कि हिन्दी के पाठकों के समक्ष ऐसी एक किताब परोसी जानी चाहिए, जो रोशनी की ट्रे में सुलगता हुआ अहसास हो। उत्तेजित करने वाली हो, पर अश्लील नहीं। रंगीनियाँ, पैशन और उत्तेजना से भरपूर हो, पर वल्गर नहीं।
इन कहानियों को पढ़ते समय अपनी सोच को नयी हवा दें। बीच के हज़ार साल जो हमसे छीन लिए गये हैं, उन्हें पाटने में हमें फिर से हज़ार साल नहीं लगने चाहिए।
–जयंती रंगनाथन

अनुक्रम

एडोनिस का रक्त और लिली के फूल
—मनीषा कुलश्रेष्ठ
अतर
—प्रत्यक्षा सिन्हा
एक रात
—जयश्री रॉय
चाची
—प्रियदर्शन
रोजा पू
—जयंती रंगनाथन
मन की उलझन
—दिव्य प्रकाश दुबे
सखी-सहेली
—कमल कुमार
माया
—अंकिता जैन
साँप
—विपिन चौधरी
अनगिनत परिधियों वाला वृत
—गौतम राजऋषि
हंटिंग ज़ोन
—अणुशक्ति
छत, सेक्स और साबुन
—नरेन्द्र सैनी
खेल
—सोनी सिंह
विष्णु ही शिव हैं
—प्रियंका ओम
गोवा का पुराना चर्च, रिज़र्व सीट और एक अकेला दिल
—इरा टाक
नटिनी
—रजनी मोरवाल
आय विल कॉल यू!
—डॉ. रूपा सिंह
प्यार का रंग पानी
—अनु सिंह चौधरी
नवरात्र पूजा
—दुष्यन्त
हमने कामुकता का उत्सव PDF | Kamukata Ka Utsav PDF Book Free में डाउनलोड करने के लिए लिंक निचे दिया है , जहाँ से आप आसानी से PDF अपने मोबाइल और कंप्यूटर में Save कर सकते है। इस क़िताब का साइज 1 MB है और कुल पेजों की संख्या 196 है। इस PDF की भाषा हिंदी है। इस पुस्तक के लेखक   जयन्ती रंगनाथन / Jayanti Rangnathan   हैं। यह बिलकुल मुफ्त है और आपको इसे डाउनलोड करने के लिए कोई भी चार्ज नहीं देना होगा। यह किताब PDF में अच्छी quality में है जिससे आपको पढ़ने में कोई दिक्कत नहीं आएगी। आशा करते है कि आपको हमारी यह कोशिश पसंद आएगी और आप अपने परिवार और दोस्तों के साथ कामुकता का उत्सव PDF | Kamukata Ka Utsav को जरूर शेयर करेंगे। धन्यवाद।।
Q. कामुकता का उत्सव PDF | Kamukata Ka Utsav किताब के लेखक कौन है?
Answer.   जयन्ती रंगनाथन / Jayanti Rangnathan  
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