परलोक विज्ञान / Parlok Vigyan PDF Download Free Hindi Book by Arun Kumar Sharma

पुस्तक का विवरण (Description of Book of परलोक विज्ञान / Parlok Vigyan PDF Download) :-

नाम 📖परलोक विज्ञान / Parlok Vigyan PDF Download
लेखक 🖊️
आकार 22.8 MB
कुल पृष्ठ408
भाषाHindi
श्रेणी,
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परलोक का मुख्य माध्यम मृत्यु है। जब तक मृत्यु नहीं हो जाती तब तक परलोक के दर्शन नहीं हो सकते; किन्तु वेद, तन्त्र भली-भाँति यह उद्घोष करते हैं कि विना मृत्यु को प्राप्त हुए भी परलोक तथा परलोक के विज्ञान को जाना जा सकता है। योग-तन्त्र की सभी शाखाओं का दर्शन एक ही मत में समाहित है, वह यह कि मृत्यु को प्राप्त हुए विना ही परलोक के विज्ञान को जाना-समझा जा सकता है। प्रस्तुत पुस्तक में आदरणीय पं० अरुण कुमार शर्मा जी ने मानवों की परलोकसम्बन्धी जिज्ञासाओं का भली-भाँति समाधान किया है तथा कुछ ऐसे रहस्यों को आनवृत भी किया है, जो अभी तक रहस्य ही बने हुए थे; किन्तु इस पुस्तक को पढ़ने के बाद पाठकों की परलोकसम्बन्धी सभी जिज्ञासायें शान्त हो जायेंगी--ऐसा मुझे अनुमान ही नहीं; वरन्‌ पूर्ण विश्वास भी है। सौभाग्य से मुझे इस पुस्तक को सम्पादित करने का सुअवसर प्राप्त हुआ है। इस कठिन कार्य में मैं कहाँ तक सफल रहा हूँ, यह तो मैं नहीं जानता; किन्तु आदरणीय गुरुदेव के आशीर्वाद से ही मैं इस कार्य को सम्पादित कर सका हूँ।


पुस्तक का कुछ अंश

हिन्दुत्व का वैचारिक आधार
काल के प्रवाह में पड़कर हम आज भारत के अध्यात्म विज्ञान की प्राचीन परम्परा में से इतनी दूर हो गए कि हमें आधुनिक विज्ञान के चकाचौंध में कुछ सुझाई ही नहीं पड़ रहा है। सच तो यह है कि आज उसका ठोस और दृढ़ आधार ही गायब हो गया है। •जिसका आश्रय लेकर हम अपने चारों तरफ होने वाले परिवर्तनों और विज्ञान की होने वाली प्रगति और उन्नति की अनुकूल तथा प्रतिकूल अथवा स्वस्थ एवं अस्वस्थ प्रवृत्तियों का सही और वास्तविक मूल्यांकन अपनी आध्यात्मिक दृष्टि से करें और उसके आधार पर अपने और जगतके लिए वास्तविक रूपसे कल्याणकारी मार्ग का निर्देशन कर सकें। कहने की आवश्यकता नहीं यह बहुत बड़ा महान कार्य है और इस महान कार्य के लिए सच पूछा जाएतो एक तेजस्वी और बौद्धिक क्षमता से परिपूर्ण नेतृत्व की अपेक्षा है। लेकिन सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह है कि उसके निर्माण के लिए अभी तक न तो किसी सुव्यवस्थित शिक्षा पद्धति की स्थापना की गयी और न तो उसका विकास ही किया जा सका। इतना ही नहीं अभी तक किसी ऐसे सुदृढ़ केन्द्र का न निर्माण ही किया जा सका और न तो स्थापना ही की जा सकी किसी ऐसे ज्ञानपीठ की। जिससे अधुनातन ज्ञान के प्रखर आलोक में और धवल प्रकाशमें भारत के प्राचीन अध्यात्म विज्ञान के विषय में शोध और अनुसंधान कार्य निष्ठा पूर्वक एवं मनोयोगसे सम्पन्न किया जा सके। सचमुच यह सबसे बड़ा दुर्भाग्य है स्वतंत्र भारत का।
कहने की आवश्यकता नहीं जब तक हम इस महान चिर अपेक्षित और साथ ही उपेक्षित कर्तव्य का पूर्णरूपेण सम्पादन नहीं कर लेते तब तक हमारे देश का और हमारे राष्ट्र का कोई भविष्य नहीं हैं। उसकी कोई प्रगति नहीं है। कोई उन्नति नहीं है।


इस संसार में जितने भी प्राणी हैं उनमें केवल मनुष्य ही एकमात्र विचारशील प्राणी है। केवल मनुष्य ही आदर्श नियमों का निर्माण करता है और केवल मनुष्य ही वर्तमान के आधार पर भूत एवं भविष्य को एक श्रृंखला में जोड़ने का प्रयास करता है। आदर्श नियमों द्वारा सामूहिक जीवन का नियमन मनुष्य की ही विशेषता है और इसी विशेषता का परिणाम है कि प्रत्येक काल और स्थानमें मनुष्य ने जीवन दर्शन का प्रतिपादन किया है।

हिन्दू मानव ने जिस जीवन दर्शन को विकसित किया वही अपने संबंधित सामयिक पक्ष के साथ हिन्दुत्व के रूप में अविर्भूत हुआ। वेदों के प्रणेताओं उपनिषदों के मनीषियों धर्म शास्त्रों के रचयिताओं स्मृतिकारों और समय-समय पर आविर्भूत होने वाले समाज सुधारकों ने जिस वैयक्तिक तथा सामाजिक जीवन दर्शन को प्रतिपादित किया है वही 'हिन्दुत्व' है । हिन्दुत्व वैयक्तिक तथा सामाजिक जीवन के प्रति एक दृष्टिकोण विशेष है। अध्यात्म विज्ञान के अनुसार हिन्दुओं ने सामाजिक संगठन से संबंधित समस्याओं पर काफी गम्भीरता से ध्यान दिया है और मानव जीवन के संगठन को जहाँ तक सम्भव हो सका उत्तमोत्तम बनाने का प्रयास किया है। इसी प्रयास में हिन्दुत्व की आधारभूत धारणाओं और उनसे नियमित हिन्दू सामाजिक संगठन की प्रणाली की रूपरेखा भी विकसित हुई है। हिन्दू जोवन-यापन में मानवी तथा मानवीय जीवन की आवश्यकताओं, अभिरुचियों, उद्देश्यों तथा आकांक्षाओं के समन्वय का प्रयास किया गया है। इस समन्वय के दो आधार हैं- एक इहलौकिक जीवन की आवश्यकताएँ, और दूसरा इस जीवन और जगत से परे जीवन की आवश्यकताएँ तथा उद्देश्य एक हिन्दू के लिए यह संसार, यह जगत एक रंगमच है और मानव जीवन एक साधन मात्र ।


वह साधन जिससे जीवन-स्वातंत्र्य यानी मुक्ति मोक्ष, कैवल्य अथवा निर्वाण की प्राप्ति होती है। शरीरी आवश्यकताओं की पूर्ति जैविक गुण भी है और आवश्यकता भी। मानवीयता नितान्त शारीरिक आवश्यकताओं की पूर्ति से आगे उठा हुआ एक कदम है। क्योंकि शरीर नश्वर है। अमर है तो केवल आत्मा आत्मा को निरन्तर प्रबुद्ध करते हुए जीवन-स्वातन्त्र्य की प्राप्ति का प्रयास ही मानवीयता है। इस दृष्टिकोण की वांछनीयता इस तथ्य में निहित है कि मानव जीवन केवल शरीरी आवश्यकताओं की पूर्ति तक ही सीमित नहीं है। मानवीयता निहित है शास्त्र प्रणीत धर्म के अनुसार जीवन व्यतीत करने में मानवीयता की माँग है मोक्ष-मुक्ति, कैवल्य और निर्वाण और इनकी प्राप्ति होती है धर्म से अत: जीवन धर्म से बँधा है। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का समन्वय और साधना कर्म से होती है। कर्म प्रधान है। कर्म के समन्वयसे धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की साधना ही पुरुषार्थ है। पुरुषार्थ आवश्यक है क्योंकि मानव जीवन का उद्देश्य केवल पुरुष ही बने रहना नहीं है। मानव जीवन का उद्देश्य है मानवी स्तर से मानवीयता की ओर अग्रसर होना। जिसका तात्पर्य है पुरुष से पुरुषोत्तम और नर से नरोत्तम होना । यदि ऐतिहासिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो अभी तक दो ही व्यक्ति पुरुष से पुरुषोत्तम और नर से नरोत्तम हुए। पहले व्यक्ति हैं राम और दूसरे हैं कृष्ण राम पुरुषोत्तम थे और कृष्ण थे नरोत्तम।


भारतीय संस्कृति और उसकी विशेषता वास्तव में भारतीय संस्कृति पूर्ण रूपसे अध्यात्म पर प्रतिष्ठित है और उसी का विभिन्न मार्गों से प्रतिनिधित्व भी करती है।
'संस्कृति' शब्द का अर्थ है मनकी और हृदय की वृत्तियों को संस्कार द्वारा सुधारना और उदात्त बनाना। विश्व में जितनी भी संस्कृतियां हैं-उनमें सबसे प्रचीन और सर्वोपरि संस्कृति एक मात्र भारतीय संस्कृति है।

संस्कृति और सभ्यता में भेद सभ्यता और संस्कृति सर्वथा सम्बद्ध होते हुए भी एक दूसरे से भिन्न हैं। संस्कृति अभ्यन्तरिक होती है और सभ्यता बाह्य तत्व है। संस्कृति को अपनाना अत्यन्त कठिन है। परन्तु सभ्यता का तत्काल अनुकरण किया जा सकता है। वास्तव में संस्कृति का मूल सूत्र न धर्म है न भाषा है और न तो है भौगोलिक खण्ड। यह सूत्र तो है जीवन भाग के वास्तविक उपकरण, सामाजिक व्यवस्था और इन सबकी सहायतासे बना मानस लोक।


पहली विशेषता: भारतीय संस्कृति ने स्वार्थ सिद्धि की अपेक्षा पर सेवा और समाजसेवा तथा स्वार्थ को अपेक्षा परमार्थ पर अधिक जोर दिया है। उसने व्यक्ति को समाज में समष्टि में और भगवान में लीन होने का उपदेश दिया है। और मार्ग भी बतलाया है। जो मार्ग, जो विधि, जो क्रिया हमें परमेश्वर की ओर ले जाती है वह है भारतीय संस्कृति ।

दूसरी विशेषता: भारतीय संस्कृति का ध्येय मनुष्य का चरम लक्ष्य बतलाकर उसे प्राप्त करने का उपाय और मार्ग प्रदर्शित करना है। शारीरिक, मानसिक तथा आत्मिक शक्ति का विकास इस लक्ष्य के साधन के मार्ग हैं। प्राचीन भारत में तीनों शक्तियों का सामंजस्यपूर्ण विकास ही मानव जीवन का उद्देश्य माना गया था। भारतीय संस्कृति का एकमात्र लक्ष्य है-मानव की आध्यात्मिक उन्नति ।
सुकर्म ही आत्मा और मनको पवित्र तथा निर्मल बनाने का मुख्य साधन है जन्म-मरण का बंधन ही जीवात्मा को परमानन्द प्राप्त करने के लिए प्रेरित करता है। यह अनन्त सुख और अक्षय आनन्द मोक्ष ही है। प्रत्येक जीवात्मा इसे प्राप्त कर सकती है। जीवन्मुक्त महापुरुष ही मोक्ष में शाश्वत शान्ति और परमानन्द उपलब्ध करने में समर्थ हैं। इसलिये भारत के ऋषियों ने शारीरिक, मानसिक तथा आत्मोन्नति को ही इस उद्देश्य की पूर्ति का साधन बतलाया है।
अतएव प्राचीन भारत में शारीरिक शक्ति के विकास के लिए ऐसा नियम और इस प्रकार का जीवन क्रम बनाया गया था जिससे शारीरिक विकास के साथ-साथ मानसिक विकास और आत्मिक विकास में किसी प्रकार की बाधा न पड़े। शरीर के भिन्न-भिन्न अंगो को पुष्ट करने के लिये व्यायाम, यम, नियम, प्राणायाम, आसन, ब्रह्मचर्य का विधान किया गया है। ये साधन शारीरिक उन्नति के साथ-साथ चंचल चित्त-वृत्ति का निरोध कर मनुष्य को एकाग्र बनाते हैं। जो आत्मोन्नति में सहायक सिद्ध होते हैं। प्राणायाम फेफड़ों को अधिक शक्तिशाली बनाकर हृदय को बल प्रदान करता है। जिससे मानसिक शक्ति के विकास में सहायता मिलती है। इस प्रकार प्राचीन भारत ने शारीरिक शक्ति के विकास की एक ऐसी योजना बनाई थी जिससे मानसिक और आत्मिक विकास में भी स्वतः काफी सहायता मिल सकती हैं। शारीरिक विकास की ऐसी व्यवस्था संसार के अन्य किसी देश की संस्कृति में नहीं पाई जाती। यह भारतीय संस्कृति की दूसरी विशेषता है।


तीसरी विशेषता: जब तक आत्मा को नहीं समझा जाता तब तक ज्ञान अधूरा ही रहता है। भारतीय संस्कृति के अनुसार आत्मा को समझकर उसे जीवन-मरण के बंधन से मुक्त करना हो मानव जीवन का एक मात्र ध्येय है। किस प्रकार इस हाड़-माँस के पुतले में हम समा गए? और जब निकलेंगे तो कहाँ जाएँगे? हम कौन हैं? कहाँ से आए हैं? और कहाँ जाएँगे? आदि समस्याओं का समाधान आवश्यक है। भारतीय संस्कृति में मैं कौन हूँ? की खोज में लगे रहने का उपदेश दिया गया है। और उपदेश दिया है-प्राणिमात्र में भगवद् दर्शन का।
भारतीय संस्कृति के अनुसार आत्माको समझकर जीवन मरण बंधन से उसे मुक्त करना ही मानव जीवन का एक मात्र ध्येय है। यह भारतीय संस्कृति की तीसरी विशेषता है।


चौथी विशेषता: मंत्र द्रष्टा ऋषियों के अनुसार सत्य और ऋतू (जीवन की सुव्यवस्था) ही सृष्टि के आदि उपादान कारण हैं। सत्याचरण हमारे देश के वातावरण में सदैव से व्याप्त है। सच्चरित्रता और सदाचरण भारतीयों की विशेषता है। भारत में आस्तिक वाद, नास्तिक वाद, द्वैत वाद, अद्वैत वाद, प्रभूति, विभिन्न मत-मतान्तरों के लिए बराबर स्थान रहा है। भारत में विचार स्वतंत्रता तो इतनी रही हैं कि महाभारत के वन पर्व में कहा है जो धर्म दूसरे धर्म को बाधा पहुंचाता है वह धर्म नहीं अधर्म है। धर्म तो वह है जो धर्म-विरोधी नहीं होता। अतएव भारत ने चरित्र बलको धर्म की कसौटी बतलाया है। इस कसौटी पर जो लोग सफल उतरे उन्हें भारत ने आदर और गौरव की दृष्टि से देखा। भले ही उनकी विचारधारा सर्वमान्य और सर्वप्रिय न हो। भारत में अपने चरित्र बलके कारण ईश्वर को न मानने वाले महापुरुष भी न केवल आदर और मर्यादा के मापन हो सके हैं वरन् उन्हें समाज में उच्चतर स्थान भी मिला है। ईश्वर में विश्वास न रखने से मान-मर्यादा में विरोध उपस्थित न हो सका है क्योंकि भारतीय संस्कृति का मूलाधार सत्य और ऋत् रहा है।

हमने परलोक विज्ञान / Parlok Vigyan PDF Book Free में डाउनलोड करने के लिए लिंक निचे दिया है , जहाँ से आप आसानी से PDF अपने मोबाइल और कंप्यूटर में Save कर सकते है। इस क़िताब का साइज 22.8 MB है और कुल पेजों की संख्या 408 है। इस PDF की भाषा हिंदी है। इस पुस्तक के लेखक   अरुण कुमार शर्मा / Arun Kumar Sharma   हैं। यह बिलकुल मुफ्त है और आपको इसे डाउनलोड करने के लिए कोई भी चार्ज नहीं देना होगा। यह किताब PDF में अच्छी quality में है जिससे आपको पढ़ने में कोई दिक्कत नहीं आएगी। आशा करते है कि आपको हमारी यह कोशिश पसंद आएगी और आप अपने परिवार और दोस्तों के साथ परलोक विज्ञान / Parlok Vigyan को जरूर शेयर करेंगे। धन्यवाद।।
Q. परलोक विज्ञान / Parlok Vigyan किताब के लेखक कौन है?
Answer.   अरुण कुमार शर्मा / Arun Kumar Sharma  
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