रघुवंश / Raghuvansh PDF Download Free Hindi Book by Mahakavi Kalidas

पुस्तक का विवरण (Description of Book) :-

नाम / Name 📥रघुवंश / Raghuvansh
Author 🖊️
आकार / Size 3.8 MB
कुल पृष्ठ / Pages 📖89
Last UpdatedMarch 26, 2022
भाषा / Language Hindi
Category, ,

महाकवि कालिदास द्वारा रचित ‘रघुवंशमहाकाव्‍य’ संस्‍कृत महाकाव्‍यों में उत्‍कृष्‍ट स्‍थान रखता है तभी तो ‘बृहद्त्रयी’ में इसका प्रथम स्‍थान है। कवि ने रघुकुल की परंपरा को इसी काव्‍य द्वारा उजागर किया है, इसमें रघुकुल की सर्वश्रेष्‍ठ परंपरा को बड़े ही सरल उपमापूर्ण शब्‍दों में बताया गया है। प्रस्‍तुत काव्‍य को हिंदी भावानुवाद द्वारा रघुकुल की मर्यादा व प्रजा के प्रति संवेदनात्‍मक संबंधों को पाठकों की सुविधा के लिए सरल शब्‍दों में लिखा गया है। इस पुस्‍तक में राजा दिलीप, रघु, अज, दशरथ, श्रीराम आदि कुल 28 पीढ़ियों के राजाओं की राज-व्‍यवस्‍था व लोकप्रियता पर प्रकाश डाला गया है।


पुस्तक का कुछ अंश

छात्रावस्था से ही मुझे कालिदास के काव्यों के पारायण का व्यसन रहा है। अब तक भी रिक्त समय को काटने या मनोरंजन के लिए उपन्यास के स्थान पर मैं प्रायः कालिदास का कोई काव्य पढ़ा करता हूं। जितना ही अधिक मैंने कवि-सम्राट् के काव्यों का अनुशीलन किया, उतना ही अधिक उनका सौंदर्य और गौरव मेरे मन पर अंकित होता गया।
कई प्राचीन साहित्यालोचकों ने कालिदास के ग्रन्थों में सबसे उत्कृष्ट अभिज्ञानशाकुन्तल' को ठहराया है। शाकुन्तल में ललित शब्दों और कोमल भावनाओं का ऐसा अच्छा मिश्रण है कि उसकी उपमा मिलनी कठिन है। इस दृष्टि से उसका स्थान न केवल कालिदास के ग्रन्थों में या संस्कृत के वाड्मय में, अपितु विश्व के साहित्य में ऊँचा माना जाए तो उचित ही है। परन्तु दो कारणों से मैंने 'रघुवंश' को पहला स्थान दिया है। प्रथम कारण तो यह है। कि यह महाकाव्य है। उसमें वर्णनीय विषयों और रसों की इतनी विविधता है कि कवि को अपनी प्रतिभा के प्रकाशन का पूरा अवसर मिला है। दूसरा कारण यह है कि 'रघुवंश' में हम कालिदास के काल की अवस्था तथा भावना का विशद तथा उज्ज्वल चित्र देखते हैं। यह ठीक है कि 'रघुवंश' महाकाव्य में सम्राट् रघु और उसके वंशजों की कहानी चित्रित की गई है, परन्तु गम्भीर दृष्टि से पढ़नेवाला पाठक इस परिणाम पर पहुंचे बिना नहीं रह सकता कि उस चरित्रावाली की पृष्ठभूमि में महाकवि का समय विद्यमान है।
"मैंने 'रघुवंश' के 'लोकों का शब्दानुवाद नहीं किया। शब्दानुवाद से मैं कवि के आन्तरिक भाव को पाठकों तक नहीं पहुंचा सकता था। मैंने प्रयत्न किया है कि मैं कवि के आन्तरिक भावों को, सुबोध लोकभाषा में प्रतिबिम्बित कर दूं। फलत: यह 'रघुवंश' के उन्नीस समों के प्रत्येक शब्द अथवा प्रत्येक श्लोक का भावानुवाद भी नहीं है। यह कहना अधिक संगत होगा कि यथासम्भव तथा यथाशक्ति कवि के भाव और कवि की कथन-शैली की रक्षा करते हुए, सम्राट् खु के तेजस्वी चरित्र को चित्रित करने का प्रयत्न किया गया है।


समय और स्थान
कालिदास के जन्मस्थान और जन्मकाल के सम्बन्ध में आज भी वैसा ही अनिय बना हुआ है, जैसा आज से पचास वर्ष पूर्व था। प्राय: देश का प्रत्येक प्रदेश कालिदास की जन्मभूमि होने का दावा कर चुका है। कश्मीर, हिमाचलप्रदेश, मालवा, मगध, बंगाल तथा दक्षिण के पक्ष में प्रबल युक्तियों तथा प्रमाणों से युक्त लेख लिखे गये हैं। यह बात विशेष ध्यान देने योग्य है कि प्रदेश विशेष का समर्थन प्राय: उसी प्रदेश के निवासी विद्वानों ने किया है। यह उस व्यापक और गहरे प्रेम तथा आदर-भाव का सूचक है, जो भारतवासी मात्र के हृदय में कालिदास के लिए विद्यमान है।
वे उसे अपनाना चाहते हैं, उसका जन्मस्थान अपने प्रदेश में, यदि हो सके तो, अपने गांव में खोजना चाहते हैं। यदि महाकवि ने अपने किसी ग्रन्थ में जन्म स्थान के सम्बन्ध में कोई संकेत दिया होता तो विवाद की कुछ बात ही न रहती। इसके अभाव में प्रत्येक भारतवासी की यह अभिलाषा स्वाभाविक ही है कि वह कालिदास को स्वक्षेत्री सिद्ध करे। मैं स्थान-सम्बन्धी तर्क वितर्क में न पड़कर विद्वानों की सम्मतियों के आधार पर इस परिणाम पर पहुंचना अधिक सुन्दर और सार्थक समझता हूं कि कालिदास का जन्म स्थान सम्पूर्ण भारतवर्ष था- उसे जन्म देने का श्रेय किसी एक प्रदेश को न टेकर, समूचे देश को देना चाहिए।


अन्वेषकों ने कालिदास के जन्मस्थान का निर्णय करने के लिए जिन उपायों का सहारा लिया है, उनमें से एक यह भी है कि कालिदास की रचनाओं से कवि के प्रदेश सम्बन्धी परिचय तथा प्रेम की परख की जाए। अन्वेषकों ने मान लिया है कि रचनाओं की छानबीन से जिस प्रदेश के साथ कवि का महरा परिचय तथा प्रेम भासित होता हो, कवि का जन्म उसी प्रदेश में हुआ होगा। बड़े आश्चर्य की बात यह है कि इस उपाय के सूत्र को पकड़कर जब अन्वेषक लोग आगे बड़े तो उनमें से प्राय: प्रत्येक जन्म प्रदेश में पहुंच गया। मैं तो इसका मूल कारण यह समझता हूं कि कालिदास का देश-प्रेम और देश-परिचय असाधारण रूप से व्यापक और गहरा था। देश भ्रमण का कवि को जो अवसर मिला, उसने अपनी निरीक्षण शक्ति और अद्भुत प्रतिभा के बल से उससे पूरा उठाया। सम्पूर्ण भारतखंड के भिन्न-भिन्न प्रदेशों और उनकी विशेषताओं से जितना परिचय कालिदास का था, उतना शायद ही किसी अन्य कवि का हो। हिमालय की चोटियों, दक्षिण की नदियों और पूर्व तथा पश्चिम के वन-उपवनों का बहुत ही वास्तविक और विशेषतापूर्ण वर्णन महाकवि के काव्यों तथा नाटकों में मिलता है। उसे पढ़कर प्रतीत होता है कि कवि ने विस्काल तक बहुत समीप से उन स्थानों को देखा है। सामान्य व्यक्ति चिर निवास के बिना उतना के निरीक्षण नहीं कर सकता।




'कुमारसम्भव' के प्रारम्भ में कालिदास ने हिमालय का मानो नख शिस्त वर्णन कर दिया है। उधर 'रघुवंश' में स्यु की दिग्विजय यात्रा का वर्णन पढ़िए तो आप अनुभव करेंगे कि कवि को भारत के कोने-कोने की भौगोलिक और मानवीय विशेषज्ञताओं का विशद् परिचय है। 'मेघदूत' का अनुशीलन कीजिए तो आप भारत के उत्तर और दक्षिण के मुख्य दो पर्वतों को आपस में मिलानेवाले मेरुदण्ड का मार्मिक वर्णन पाएंगे। कालिदास के इस व्यापक और महरे परिचय का ही परिणाम है कि भारत के प्रत्येक प्रदेश का निवासी कवि के ग्रन्थों में अपने प्रदेश के इतने चिह्न पा लेता है कि उसे कालिदास के समक्षेत्री होने का विश्वास हो जाता है। यदि केवल किसी एक अंग पर दृष्टि न डालकर कवि के समस्त काव्यों पर पक्षपातहीन दृष्टि डाली जाए तो यही परिणाम निकलेगा कि कालिदास भारत का निवासी था। उसका जन्म कहां हुआ था, इस प्रश्न का उत्तर तो कालान्तर में कोई पुरातत्ववेत्ता ही दे सकेंगे, मैं तो इतना ही प्र कहना चाहता हूं कि महाकवि कालिदास भारत का निवासी था और यदि हम कालिदास के समय के भारतवर्ष को जानना चाहते हैं, तो उसका सर्वोत्कृष्ट चित्र कवि के काव्यों में विद्यमान है। दूसरा प्रश्न जन्मकाल का है। जन्मकाल के सम्बन्ध में भी विद्वानों के अनेक मत हैं। विक्रम संवत् के संस्थापक सम्राट् विक्रमादित्य से लेकर छठी शताब्दी के किसी विक्रमादित्य तक के समय में महाकवि की सत्ता को सिद्ध करने के प्रयत्न किए गए हैं। इस विषय में, कालिदास के ग्रन्थों में अथवा अन्यत्र कोई सीधा प्रमाण नहीं मिलता। ख्याति के अनुसार कलिदास सम्राट् विक्रमादित्य की सभा के नव-रूनों में से अन्यतम थे। यह ख्याति संस्कृत साहित्य में सत्य करके मानी जाती रही है।


स्वाभाविक तो यह था कि जब तक पृष्ट प्रमाणों से उस ख्याति का खण्डन न हो जाता, तब तक उसे ही स्वीकार किया जाता। परन्तु पश्चिम के समालोचकों ने संवत् के संस्थापक विक्रमादित्य की सता पर ही आशंका उठा दी। बस फिर क्या था मानसिक पराधीनता-काल के भारतीय विद्वान् विक्रमादित्य को केवल भूत-प्रेतों जैसा कल्पित व्यक्ति मानकर ताम्रपत्रों और शिलालेखों में से किसी अन्य विक्रमादित्य को ढूंढ़ निकालने का प्रयत्न करने लगे। कई विक्रमादित्य खोदकर निकाले गए, परन्तु यह बताने वाला कोई शिलालेख अब तक नहीं मिला कि उनमें से किसके समय में महाकवि ने कविता की ऐसी दशा में मैं तो यही समझता हूँ कि महाकवि कालिदास को विक्रमी संवत् के संस्थापक सम्राट विक्रमादित्य का समकालीन ही माना जाए। इस मन्तव्य के पक्ष में जनपति के अतिरिक्त साहित्य के पोषक प्रमाण भी विद्यमान है। केवल काल्पनिक युक्तियों के प्रहार से 2000 वर्ष पुरानी ख्याति का दुर्ग नहीं तोड़ा जा सकता। यदि हम एक बार इस मार्ग पर चल पड़े, तो हमें अपने सम्पूर्ण प्राचीन इतिहास से हाथ धोना पड़ेगा। हमारे मनु और मान्धाता, हमारे राम और कृष्ण और हमारे वाल्मीकि और व्यास पोषक शिलालेखों और ताम्रपत्रों के अभाव के कारण अविश्वास की आंधी से उड़ जाएंगे। इस कारण, अन्य किसी पुष्ट कल्पना के अभाव में, मैंने यही स्वीकार कर लिया है कि अब से 2013 वर्ष पूर्व विक्रमादित्य नाम का एक प्रतापी सम्राट् भारत में राज्य करता था। उसने विदेशी आक्रमणकारियों पर विजय प्राप्त करके स्मारक रूप में विक्रमी संवत् की स्थापना की थी। महाकवि कालिदास उसी की सभा का एक रन था।


कालिदास के समय का भारत

जब तक अत्यन्त पुष्ट प्रमाणों से कोई दूसरा मत सिद्ध नहीं हो जाता, तब तक इसी प्राचीन मत को प्रामाणिक मानना चाहिए कि 'युवंश' आदि काव्यों और अभिज्ञानशाकुन्तल' आदि जाटकों के निर्माता महाकवि कालिदास ने विक्रमी संवत् के संस्थापक महाराजा विक्रमादित्य के राज्य काल में अपनी अमर कृतियों की रचना की यदि कालिदास ने अन्य अनेक उत्तरकालीन कवियों की भांति थोड़ी सी भी आत्मपरिचय सम्बन्धी बातें कह दी होती, तो आज कुछ महानुभावों को एक विषय पर ऐसा संशयात्मक होने का अवसर न मिलता परन्तु एक संतोष की बात भी है। महाकवि के काव्यों में कवि के समय का सीधा निर्देश न होते हुए भी वह समय कैसा था? -इस प्रकार देने के लिए पर्याप्त सामग्री विद्यमान है। कालिदास के ग्रन्थों को पढ़िए तो आप उस समय के भावों की झलक ज्ञानचक्षुओं से देख सकते होआप 'युवंश' से उस समय की राजनीतिक भावनाओं, 'कुमारसम्भव' से धार्मिक विचारों और 'मेघदूत' से सामाजिक तथा
भौगोलिक परिस्थितियों का एक स्पष्ट चित्र खींच सकते हैं। तीनों काव्य मुख्य रूप से उस काल के राजाओं, राजपरिवारों और राजमहतों की अवस्थाओं का प्रदर्शन करने के अतिरिक्त प्रसंगवश थोड़ा-बहुत जनता के जीवन को भी चित्रित करते ही अनेक प्रतिभा सम्पन्न लेखकों ने कालिदास के ग्रंथों की सहायता से उस समय के समाज का पूर्ण चित्र खींचने का यत्न किया इस सारभूत प्रस्तावना में उसका दिग्दर्शन कराने को भी स्थान नहीं है। यहां तो मैं थोड़े-से शब्दों में उस चित्र की केवल परिधि-रेखाओं को ही खीव सकता हूं और वह भी इस रूप में कि उन्हें पड़ने से मेरे मन पर विक्रम के समय की कैसी रूपरेखा खिंची है।


वह समय अत्यन्त समृद्धिशाली था। भारत के शासकों का आसपास के देशों पर आतंक था। देश के अन्दर शक्ति और विभूति का दौर दौरा था। प्रजा संतुष्ट थी और राजभक्त थी। चोर और दस्यु भय खाते थे और सामान्य नागरिक सुख से अपना जीवन व्यतीत करते थे नगरों में विविध प्रकार की कलाएं विकसित होती थीं और ग्रामों के निवासी अन्न उपजाकार देश को • जीवन-दान देते थे। कर-रूप में केवल भूमि का पष्ठांग लिया जाता था जिसका अधिकांश प्रजा पर ही व्यय कर दिया जाता था। शासकवर्ग अपने को प्रजा का रक्षक और सेवक मानता था और अत्याचार से भय खाता था।
उस समय देश में भारतीय धर्म अपने पौराणिक रूप में प्रचलित था। बौद्धधर्म क्षीण हो गया। था, जैनधर्म भी परिमित क्षेत्र में ही जीवित था। प्राचीन आर्यधर्म पौराणिक कलेवर में लोकसम्मत था प्रतीत होता है कि मुख्यता भगवान के शंकररूप को दी जाती थी।


तपोवन की यात्रा

रघुवंश के संस्थापक यशस्वी रघु के पिता महाराज दिलीप ने पृथ्वी के सबसे प्रथम सम्राट् वैवस्वत मनु के उज्ज्वल वंश में जन्म लिया था। दिलीप बहुत बलवान और तेजस्वी राजा था, मानो साक्षात् क्षात्र धर्म का अवतार हो। वह जैसा बलवान था, वैसा ही बुद्धिमान, विद्वान् और कर्मशील था। प्रजा उसे पिता के समान मानती थी। विरोधी और आततायी उसके दंड से डरते थे। समुद्र-रूपी खाई से घिरे हुए पृथ्वी-रूपी किले का वह इस सुगमता से शासन करता था, मानो एक नगरी का शासन कर रहा हो।
जैसे यज्ञ की संगिनी दक्षिणा है, उसी प्रकार राजा दिलीप के साथ अटूट सम्बन्ध से बंधी हुई • रानी सुदक्षिणा थी, जिसने मगधवंश में जन्म लिया था। राजा को अन्य सब सुख प्राप्त थे, केवल सन्तान का सुख नहीं था। सन्तान की प्राप्ति के लिए अनुष्ठान करने का विचार करके राजा ने राज्य की देख-रेख का भार मन्त्रियों के कन्धों पर डाल दिया और महारानी को साथ ले गुरु वसिष्ठ के आश्रम की ओर प्रयाण किया। सुसज्जित रथ में बैठे हुए राजा और रानी ऐसे शोभायमान हो रहे थे, जैसे घने सावन के बादल में बिजली और बरसाती पवन शोभा पाते हैं। उनकी आश्रम यात्रा बहुत ही मनोरंजक और मंगलसूचक रही। फूलों के पराग को चारों दिशाओं में बिखेरने • वाला, साल के रस से सुगन्धित सुखकारी वायु उनकी सेवा कर रहा था। मोरों की पडज के सहश स्वरवाली केकाएं उनके कानों को आनन्दित कर रही थीं और हरिणों के जोड़े रास्ते के समीप ही खड़े होकर उनकी ओर निहार रहे थे। उन हरिणों की आंखों में राजा और रानी एक-दूसरे की आंखों की छवि देखकर प्रसन्न हो रहे थे। मार्ग में अहीर बस्तियों के जो मुखिया लोग, ताजे मक्खन की भेंट लेकर उपस्थित होते थे, उनसे वे दोनों जंगली वनस्पतियों के नाम पूछते थे। इस प्रकार मार्ग के सुन्दर दृश्य देखते हुए महारानी सुदक्षिणा और महाराज दिलीप दिन छिपने के समय महर्षि वसिष्ठ के आश्रम में पहुंच गए। वसिष्ठ मुनि के आश्रम में उस समय सन्ध्याकाल की चहल-पहल थी। तपस्वी लोग समिधा,


कुशा और फल इकट्ठे करके जंगल से लौट रहे थे; ऋषि पत्नियों द्वारा बिखेरे हुए अन्न से खिंची हुई मृगों की टोलियां कुटियों के दरवाजों पर इकट्ठी हो रही थीं, मुनि कन्याएं आश्रम वृक्षों को सींचकर दूर हट गई थीं, ताकि पक्षी निर्भय होकर थामलों में से पानी पी सकेंग होग से उठा हुआ शुआं बाहर से आनेवाले अतिथियों को पवित्र कर रहा था। आश्रम में पहुंचने पर राजा दिलीप ने सारथि को आज्ञा दी कि घोड़ों को आराम दो। वे स्वयं रथ से उतर गए और फिर रानी को उतार लिया। सभ्यता के नियमों से परिचित तपस्वी लोगों ने सपत्नीक राजा का यथोचित आदर-सत्कार किया। जब ऋषि वसिष्ठ सायंकाल के सन्ध्योपासना से निवृत हो गए, तब राजा और रानी उनकी सेवा में उपस्थित हुए। ऋषि के समीप उस समय उनकी पत्नी अरुन्धती विराजमान थी, मानो स्वाहा यज्ञ की अग्नि के समीप विराज रही हो। राजा और राजपत्नी ने ऋषियुगल के चरणों में सिर झुकाकर प्रणाम किया। ऋषियुगल ने उन्हें आशीर्वाद दिया।

ऋषि को जब यह सन्तोष हो गया कि अतिथि पूजा से राज-युगल की थकान उतर गई है, तब उन्होंने राज्य के कुशल-क्षेम के सम्बन्ध में प्रश्न किए। राजा ने उत्तर दिया- हे गुरो, आपके प्रसाद से राज्य में सब कुशल है। आपके मन्त्रबल ने मेरे तीरों को व्यर्थ -सा सिद्ध कर दिया है। आपके यज्ञों में, अग्निकुण्ड में डाला हुआ हवि मेघों से जल बनकर बरस जाता है, जिससे सदा सुभिक्ष बना रहता है। मेरी प्रजा सौं साल तक जीती हैं और निर्भय होकर रहती हैं। यह आपके ब्रह्मतेज का ही फल है। यह सब कुछ होते हुए भी, हे, गुरुवर, रत्नों को पैदा करने वाली यह द्वीप सहित भूमि मेरे मन को संतुष्ट नहीं कर सकती, क्योंकि आपकी इस बहू की गोद संतान-रूपी न से शून्य हैं।

हमने रघुवंश / Raghuvansh PDF Book Free में डाउनलोड करने के लिए लिंक निचे दिया है , जहाँ से आप आसानी से PDF अपने मोबाइल और कंप्यूटर में Save कर सकते है। इस क़िताब का साइज 3.8 MB है और कुल पेजों की संख्या 89 है। इस PDF की भाषा हिंदी है। इस पुस्तक के लेखक   महाकवि कालिदास / Mahakavi Kalidas   हैं। यह बिलकुल मुफ्त है और आपको इसे डाउनलोड करने के लिए कोई भी चार्ज नहीं देना होगा। यह किताब PDF में अच्छी quality में है जिससे आपको पढ़ने में कोई दिक्कत नहीं आएगी। आशा करते है कि आपको हमारी यह कोशिश पसंद आएगी और आप अपने परिवार और दोस्तों के साथ रघुवंश / Raghuvansh को जरूर शेयर करेंगे। धन्यवाद।।
Q. रघुवंश / Raghuvansh किताब के लेखक कौन है?
Answer.   महाकवि कालिदास / Mahakavi Kalidas  
Download

_____________________________________________________________________________________________
आप इस किताब को 5 Stars में कितने Star देंगे? कृपया नीचे Rating देकर अपनी पसंद/नापसंदगी ज़ाहिर करें।साथ ही कमेंट करके जरूर बताएँ कि आपको यह किताब कैसी लगी?
Buy Book from Amazon
5/5 - (18 votes)

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *