सोफी का संसार | Sophie Ka Sansar PDF Download Free in Hindi : Jostein Gaarder

पुस्तक का विवरण (Description of Book of सोफी का संसार | Sophie Ka Sansar PDF Download) :-

नाम | Name 📥 सोफी का संसार | Sophie Ka Sansar PDF Download
लेखक | Author 🖊️ जॉस्टिन गार्डर | Jostein Gaarder
आकार | Size 2.16 MB
कुल पृष्ठ | Pages 📖 519
श्रेणी | Category दार्शनिक / Philosophicalउपन्यास / Upnyas-Novel
भाषा | Language हिंदी | Hindi
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‘सोफी का संसार’ एक रहस्यपूर्ण और रोचक उपन्यास है, साथ ही पश्चिमी दर्शन के इतिहास और दर्शन की मूलभूत समस्याओं के विश्लेषण पर एक गहन तथा अद्वितीय पुस्तक भी। आधुनिक भारत के प्रसिद्ध दार्शनिक प्रोफेसर दयाकृष्ण के अनुसार दो प्रश्नों को सार्वभौमिक स्तर पर दर्शन के मूलभूत प्रश्न कहा जा सकता है। पहला प्रश्न है : ‘मैं कौन हूँ?’ और, दूसरा है : ‘यह विश्व अस्तित्व में कैसे आया?’ अन्य दार्शनिक प्रश्न इन्हीं दो मूल प्रश्नों के साथ जुड़े हुए हैं। इन प्रश्नों से पाठक का परिचय उपन्यास के पहले ही अध्याय में एक रहस्यात्मक और रोचक प्रसंग के माध्यम से हो जाता है। किसी जटिल सैद्धान्तिक रूप में प्रस्तुत करने की बजाय 14-15 वर्ष की किशोरी सोफी को दैनिक जीवन के व्यावहारिक स्तर पर इन प्रश्नों को पूछने के लिए प्रेरित किया गया है। विश्व के अनेक दार्शनिकों और विचारकों ने इन प्रश्नों पर गम्भीर चिन्तन किया है। ‘सोफी का संसार’ पाश्चात्य दार्शनिक जिज्ञासाओं के 2500 वर्ष लम्बे इतिहास को स्मृति, कल्पना तथा विवेक के अद्भुत संयोजन के माध्यम से प्रस्तुत करता है। सुकरात से पहले के दार्शनिकों—येल्स, ऐनेक्सीमांदर, ऐनेक्सीमेनीज, परमेनिडीज, हैरेक्लाइटस, डैमोक्रिटीस इत्यादि दार्शनिकों की चर्चा से प्रारम्भ करते हुए यह उपन्यास अफलातून (प्लेटो), अरस्तू, आगस्तीन, एक्विनाज, देकार्त, स्पिनोजा, लाइब्निज, लॉक, बर्कले, ह्यूम, कांट, हेगेल, किर्केगार्ड, माक्र्स, डारविन तथा सात्र्र तक सभी महत्त्वपूर्ण दार्शनिकों की जिज्ञासाओं तथा चिन्तन-विधियों की विश्लेषणात्मक समीक्षा प्रस्तुत करता है। नार्वेजन भाषा में लिखे गए इस दार्शनिक उपन्यास का अनुवाद विश्व की 60 से अधिक भाषाओं में हो चुका है और पिछले दो दशकों में इसकी पाँच करोड़ से अधिक प्रतियाँ बिक चुकी हैं।

पुस्तक का कुछ अंश (सोफी का संसार | Sophie Ka Sansar PDF Download)

प्रस्तावना
1980 के दशक के अन्तिम वर्षों का समय था। जॉस्टिन गार्डर ओस्लोए नॉर्वे के एक जूनियर कॉलेज में दर्शनशास्त्र के अध्यापक थे। वह अपने दर्शन शिक्षण कार्य के प्रति सम्पूर्णतया समर्पित थे। किशोर छात्रों में दर्शन के अमूर्त प्रश्नों के प्रति बढ़ रही अरुचि और उदासीनता उनके लिए स्वाभाविक चिन्ता का विषय थी। एक दिन उन्होंने अपनी हताशा तथा उद्विग्नता के क्षणों में अपने छात्रों से प्रश्न किया कि वे क्या पढ़ना पसन्द करते हैं? छात्रों ने समवेत स्वर में उत्तर दिया कि उनका मन रहस्यमय उपन्यास (Mystery Novels) पढ़ने में लगता है। यह सुनकर निराश होने की अपेक्षा गार्डर ने तत्काल निश्चय किया कि एक रहस्यमय उपन्यास लिखकर वह अपने किशोर छात्रों में मानवीय जीवन से सम्बन्धित अपरिहार्य एवं गूढ़ प्रश्नों में रुचि जगाने का प्रयास करेंगे। उनकी मान्यता थी कि इन जटिल एवं अमूर्त दार्शनिक प्रश्नों की महत्ता को नकारने से तथा इनसे भागकर हम समृद्ध मानवीय विरासत में अपनी भागीदारी के दावे का अधिकार खो देते हैं।
इस तरहए गार्डर ने रहस्यात्मक उपन्यास ‘सोफी का संसार’ लिखकर पाश्चात्य दर्शन के विकास का सजीव चित्रण निहायत मौलिक रूप में प्रस्तुत किया है। इस उपन्यास की रचना में उन्होंने जादुई कथा–संरचनाए सांस्कृतिक इतिहास–लेखन तथा दार्शनिक चिन्तन की विधाओं का एक अद्भुत सर्जनात्मक संयोजन किया है। ‘सोफी का संसार’ के लेखन में गार्डर ने पाश्चात्य दर्शन के विकास के इतिहास के महत्त्वपूर्ण प्रसंगों की चर्चा के माध्यम से विश्वए जीवन और मानवीय अस्तित्व से जुड़े रहस्यों पर अपनी गहन विवेचना को पाठकों के सम्मुख विचार हेतु प्रस्तुत किया है।
उपन्यास का प्रारम्भ विद्यालय से घर लौटने पर 14 वर्षीय सोफी को लेटर–बॉक्स यपत्र–डिब्बेद्ध में एक विचित्र रहस्यपूर्ण लिफाफा मिलने के साथ होता है जिसमें कागज के एक छोटे से पुर्जे यपरचीद्ध पर उसके लिए एक निराला प्रश्न है : ‘तुम कौन हो?’ ‘सोफी’ अथवा ‘सोफिया’ यूनानी भाषा का वह शब्द है जिसका प्रयोग पाश्चात्य दर्शन की प्रत्येक परिचयात्मक टैक्स्ट बुक यपाठ्यपुस्तकद्ध में दर्शन की प्राथमिक परिभाषा या परिचय देने के लिए किया जाता है। ‘फिलो–सोफी’ दो यूनानी शब्दों के योग से बना शब्द है। ‘सोफी’ का अर्थ है : ‘प्रज्ञा’ए ‘बुद्धिमत्ता’ यॅपेकवउद्ध और ‘फिलो’ का अर्थ है : ‘प्रेमी’ यस्वअमतद्ध। सारांश यह कि ‘फिलो–सोफी’ का अभिप्राय प्रज्ञा अथवा बुद्धिमत्ता से प्रेम है। दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि सोफी का संसार बुद्धिमत्ता और प्रज्ञा का संसार है और जिसे भी इस संसार से प्रेम है वह दार्शनिक यफिलॉस्फरद्ध है। ‘मैं कौन हूँ?’ प्रश्न का उत्तर आत्म–ज्ञान प्राप्त किए बिना सम्भव नहीं है। सोफी के लिए इस प्रश्न का उत्तर ढूँढ़ना सरल तो नहीं लेकिन महत्त्वपूर्ण हो जाता है। उसे यह विलक्षण प्रतीत होता है कि वह यह भी नहीं जानती कि वह कौन है। इसी उधेड़बुन में वह फिर से बाहर लेटर–बॉक्स को देखने जाती है और इस बार उसे अपने लिए एक और लिफाफा मिलता है जिसके भीतर एक छोटे पुर्जे पर एक नया प्रश्न है : “यह संसार कहाँ से आया?” जीवन में पहली बार सोफी को महसूस होने लगता है कि इन प्रश्नों का उत्तर खोजे बिना उसके लिए ज़िन्दा रहना उचित नहीं है। यह दो अजीब पत्र सोफी के लिए उसके पन्द्रहवें जन्मदिन के उपलक्ष्य में उपहार–स्वरूप मिलनेवाले पत्रों की एक ऐसी श्रृंखला की शुरुआत है जो उसके जन्मदिवस तक निरन्तर चलती है।
दर्शनशास्त्र के इतिहास पर इस पत्राचार–पाठ्यक्रम का संचालन दर्शन के एक विचित्र रहस्यमयी शिक्षक द्वारा किया जाता है जिसका नाम एल्बर्टो नौक्स है। इस अजब पत्राचार–पाठ्यक्रम में प्राचीन यूनानी दार्शनिकों द्वारा उठाए गए प्रश्नों और उनकी युक्तियों की चर्चा से प्रारम्भ करके बीसवीं शताब्दी के दार्शनिकों द्वारा विचारित समस्याओं तथा स्थापित सिद्धान्तों एवं तर्कों की सुस्पष्ट विवेचना की गई है। इस पुस्तक के हिन्दी भाषा में उपलब्ध होने से हिन्दी–भाषी छात्रों तथा अध्यापकों के लिए पाश्चात्य दर्शन पर एक अत्यन्त रोचक और महत्त्वपूर्ण पुस्तक के माध्यम से मूलभूत दार्शनिक प्रश्नों और तर्कों के साथ एक विवेकपूर्ण साक्षात्कार का अवसर प्राप्त हो रहा है। हिन्दी भाषा में पाश्चात्य दर्शन पर सरल परन्तु विचारोत्तेजक पुस्तकों की कमी को देखते हुए इस पुस्तक को एक अद्वितीय प्रेरक कृति के रूप में पढ़ा जा सकता है।
अपनी विचार–विलास–क्रीड़ा में ‘सोफी का संसार’ जादुई अन्दाज के साथ दार्शनिकों द्वारा दी गई युक्तियों–प्रतियुक्तियोंए संवाद–प्रतिसंवादए तर्क–वितर्क का सुयोजित अन्वेषणए विश्लेषण तथा मूल्यांकन की गाथा है। इस पुस्तक में तीन विशिष्ट मानवीय क्षमताओंए स्मृति यइतिहासद्धए कल्पना यगल्पद्ध तथा विवेक यदर्शनद्ध का ताना–बाना अनूठे ढंग से बुना गया है। यह उपन्यास पाठक को मानवीय जीवन के उद्देश्य और सार्थकता सम्बन्धी प्रश्नों पर विचार करने की ललक को प्रोत्साहित करता है। पाश्चात्य जगत में विकसित दर्शन को सम्पूर्ण मानवीय बौद्धिक परम्पराओं का एक अंश स्वीकार करते हुए गार्डर यूरोपोन्मुखी व्याधि से अपने आपको मुक्त रखने के प्रयास में काफी हद तक सफल रहे हैं।
‘सोफी का संसार’ हमें अपने विचार करने की क्षमता और महत्ता के प्रति अधिक सजग और संवेदनशील बनाने में सहायक है। ज्ञानए संस्कृतिए नैतिकताए सौन्दर्यबोध सम्बन्धी पुराने और समकालीन विवादों की विवेचनाए विशेषतया हमारे दैनिक जीवन के लिए उनकी प्रासंगिकता और सार्थकता को बड़े रोचक एवं सुबोधगम्य आख्यानों में प्रस्तुत किया गया है। इस उपन्यास की रहस्यात्मकता की विशिष्टता इसकी कथा की अद्भुत संरचना में है। कथानक की संरचना इस ढंग से विकसित की गई है कि पाठक के लिए कल्पित तथा वास्तविक संसार और चरित्रों में भेद करना आसान नहीं रहता।
प्रतीति और यथार्थ में भेद करने की कठिनाई को इस उपन्यास में दाशर्निक चिन्तन और साहित्यिक सत्य के पारस्परिक जटिल सम्बन्धों की विवेचना करते हुए प्रस्तुत किया गया है। इस पुस्तक से पहले बिल ड्यूरान्त द्वारा लिखित पुस्तक ‘ए स्टोरी ऑफ फिलॉसफी’ यदर्शन की कहानीद्ध पाठकों में बहुत लोकप्रिय हुई थी। इस पुस्तक में उन्होंने चुनिन्दा दार्शनिकों की जीवनियों में से दिलचस्प हवाले लेकर दर्शन के इतिहास को एक कहानी की भाँति लिखने पर बल दिया था। तुलना में कहा जा सकता है कि जॉस्टिन गार्डर ने अस्तित्वात्मक तथा प्रत्ययात्मक स्तर पर प्रस्तुत जटिल उलझनों के मूल स्रोतों तथा दार्शनिक युक्तियों की तार्किक संरचनाओं को स्पष्ट करते हुए सुकरात पूर्व–चिन्तकों से लेकर बीसवीं शताब्दी के विख्यात दार्शनिक सार्त्र तक पाश्चात्य दर्शन की लम्बी यात्रा का वृत्तान्त प्रस्तुत किया है। इस वृत्तान्त से यह स्पष्ट होता है कि मानवीय परिस्थिति को बेहतर ढंग से समझने के लिए दार्शनिक चिन्तन में शामिल होने और बने रहने के लिए विचार–मीमांसा एक अनिवार्य बौद्धिक कर्म है।
पिछले दो दशकों में मैंने इस पुस्तक के अंग्रेज़ी संस्करण का उपयोग अपने छात्रों के साथ दर्शन और साहित्य सम्बन्धी पाठ्यक्रमों में पंजाब विश्वविद्यालय चंडीगढ़ तथा जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय दिल्ली में किया है। मैं अपने उन सभी छात्रों का धन्यवाद करना चाहता हूँ जिन्होंने पुस्तक को न सिर्फ पूरी रुचि से पढ़ा बल्कि मुझे निरन्तर आश्वस्त किया कि उन्होंने इसे दार्शनिक अध्ययन और चिन्तन के लिए एक अत्यन्त उपयोगी प्रेरणा स्रोत पाया। यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि पंजाबए हिमाचलए हरियाणाए दिल्लीए राजस्थानए उत्तर प्रदेशए उत्तराखंड और मध्य प्रदेश के अनेक विश्वविद्यालयों में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा संचालित महाविद्यालयों तथा विश्वविद्यालयों के शिक्षकों के लिए आयोजित ओरिएन्टेशन तथा रिफ्रेशर कोर्सों में भी दर्शन में रुचि लेने वाले विभिन्न विषयों के अध्यापकों के साथ समय–समय पर मुझे इस पुस्तक की चर्चा के अनेक अवसर निरन्तर प्राप्त हुए तथा मैंने उन्हें इसके पाठ की संस्तुति की। मानविकी विषयों तथा सामाजिक अध्ययनों के इन सभी विद्वानों से मुझे प्राय: जानकारी मिली कि इस पुस्तक को उन्होंने अपनी दर्शन–सम्बन्धी जिज्ञासाओं के समाधान के अतिरिक्त अपने विशिष्ट–विषय को एक नई दृष्टि से उच्चतर गहन अध्ययन के लिए भी अत्यन्त उपयोगी पाया। विशेष धन्यवाद मेरे साथ मातृत्व और स्त्री–विमर्श पर कार्य कर रही शोध–छात्रा ज़ैरूनिशा का जिसके साथ अनुवाद कार्य के समय अक्सर चर्चा का लाभ मिला–अनुवाद का शीर्षक भी उसी चर्चा का परिणाम है। मुझे आशा और विश्वास है कि प्रस्तुत अनुवाद हिन्दी माध्यम से दर्शनशास्त्र पढ़नेवाले छात्रों में पाश्चात्य दर्शन की सम्यक समझ विकसित करने के लिए उपयोगी सिद्ध होगा।
सत्यपाल गौतम
दर्शन अध्ययन केन्द्र
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालयए दिल्ली
जो तीन हजार वर्षों के अनुभव से कोई प्रेरणा प्राप्त नहीं
करता, वह [बस कैसे न कैसे अपनी जीविका चला रहा है]
पानी पीने के लिए रोज़ वु़आँ खोद रहा है।
–गेटे
अनुक्रम
  • ईडन की बगिया
    किसी क्षण अवश्य ही कुछ शून्य से निकलकर आया होगा…
  • जादुई टोपी
    अच्छा दार्शनिक होने के लिए हमें चाहिए सिर्फ विस्मित होने की क्षमता…
  • पौराणिक कथाएँ (मिथक)
    अच्छाई और बुराई की शक्तियों के बीच अनिश्चित अस्थिर सन्तुलन…
  • प्राकृतिक दार्शनिक
    शून्य से केवल शून्य ही प्रकट हो सकता है…
  • डिमॉक्रिटस
    दुनिया का सबसे कुशल खिलौना…
  • नियति
    ‘भविष्यवक्ता’ किसी ऐसी चीज का पूर्व–दर्शन करने का प्रयास कर रहा है
    जो वास्तव में बिलकुल पूर्व–दर्शनीय नहीं है…
  • सुकरात
    सबसे बुद्धिमान वह (स्त्री) है जो यह जानती है कि उसे कुछ नहीं मालूम…
  • एथेंस
    भग्नावशेषों में से कई ऊँची इमारतें खड़ी हो गई हैं…
  • अफलातून
    आत्म–जगत में लौटने की ललक…
  • मेजर का केबिन
    दर्पण से लड़की ने आँखें मारीं दोनों आँखों की पलकें झपकाकर…
  • अरस्तू
    एक कुशल प्रबन्धक जो हमारी धारणाओं को स्पष्ट करना चाहता था…
  • यूनानवाद
    आग से एक चिनगारी…
  • पोस्टकार्ड्स
    मैं अपने ऊपर कड़ा सेंसरशिप लागू कर रहा हूँ…
  • दो संस्कृतियाँ
    शून्य में तैरने से परे रहने का एकमात्र रास्ता…
  • मध्य युग
    रास्ते के अन्त तक न जाना किसी गलत रास्ते पर जाने से भिन्न है…
  • पुनर्जागरण
    नश्वर वेश में दिव्य वंश–परम्परा…
  • बैरोक
    वह साज़ो–सामान जिससे सपने बुने जाते हैं…
  • देकार्त
    वह निर्माण स्थल से सारा मलबा साफ करना चाहता था…
  • स्पिनोज़ा
    ईश्वर कठपुतली नचानेवाला नहीं है…
  • लॉक
    इतना कोरा और खाली जितना अध्यापक के आने से पहले ब्लैकबोर्ड…
  • ह्यूम
    तो फिर इसे आग की लपटों के हवाले कर दो…
  • बर्कले
    जलते सूरज के गिर्द चक्कर काटते आक्रान्त ग्रह की तरह…
  • जरकले
    एक पुराना जादुई शीशा जिसे पड़दादी माँ ने एक जिप्सी औरत से खरीदा था…
  • प्रबोधन काल
    सुई बनाने के तरीके से लेकर तोप ढालने के तरीके तक…
  • कांट
    मेरे ऊपर सितारों भरा आकाश और नैतिक नियम मेरे भीतर…
  • रोमांटिसिज्म
    रहस्य का मार्ग ले जाता है भीतर की ओर…
  • हेगल
    तर्कोचित वह है, जो व्यावहारिक है…
  • किर्केगार्ड
    यूरोप दिवालियेपन की राह पर है…
  • मार्क्स
    एक प्रेत यूरोप का पीछा कर रहा है…
  • डार्विन
    जीवन में बहता हुआ एक जहाज, आनुवंशिक कोशाणुओं (जीन्स) का खज़ाना लिये।
  • फ्रायड
    दुर्गन्धित अहंकारी मनोवेग, जो उस (स्त्री) में प्रकट हुआ…
  • हमारा अपना समय
    मनुष्य स्वतन्त्र होने के लिए अभिशप्त है…
  • द गार्डन पार्टी
    एक सफेद कौवा…
  • प्रति–बिन्दु
    दो या अधिक लय एक साथ गुंजायमान होती हुई…
  • द बिग बैंग (बड़ा धमाका)
    हम भी सितारों की धूल हैं…
  • ‘सोफी का संसार’ के बीसवीं जयन्ती संस्करण की भूमिका

 

ईडन की बगिया
किसी क्षण अवश्य ही कुछ शून्य से निकलकर आया होगा…
सोफी एमंडसन स्कूल से अपने घर की ओर आ रही थी। वापसी के शुरूवाले हिस्से में जोआना उसके साथ थी। वे रोबोट्स पर चर्चा कर रही थीं। जोआना सोचती थी कि मनुष्य का मस्तिष्क एक उन्नत कम्प्यूटर जैसा ही है, पर सोफी उससे पूरी तरह सहमत नहीं थी। निश्चय ही एक व्यक्ति महज मशीन ही तो नहीं होता न!
सुपर मार्केट पहुँचने के बाद वे अपने अलग–अलग रास्तों पर चल पड़ीं। सोफी एक पसर रहे उपनगर के बाहरी हिस्से में रहती थी, और वहाँ से स्कूल की दूरी, जोआना की तुलना में, दुगुनी थी। उसके घर के आगेवाले बाग से परे कोई और मकान नहीं थे, जिससे ऐसा लगता था कि उनका मकान दुनिया के आखिरी छोर पर है, जहाँ से आगे वन शुरू हो जाते थे।
नुक्कड़ से घूमकर वह क्लोवर क्लोज में आ गई। सड़क के आखिरी सिरे पर एक तीखा मोड़ था, जिसे कैप्टेन्स बैन्ड्ड कहते थे। सप्ताहान्त को छोड़कर लोग उस तरफ अक्सर नहीं जाते थे।
मई के शुरुआती दिन थे। कुछ बागों में फलदार वृक्ष डैफोडिल्स के घने गुच्छों से घिरे हुए थे। बर्च के वृक्षों पर पहले से ही हलके हरे पत्ते आने लगे थे।
कितनी अद्भुत बात थी कि वर्ष के इस समय न जाने कैसे हर चीज फूट निकलती थी। क्या बात थी कि बर्फ के आखिरी निशान गायब होते और मौसम में हलका गुनगुनापन आते ही, मरी हुई धरती से हरी वनस्पति का विशाल कलेवर बाहर उमड़ पड़ता था!
जैसे ही सोफी ने अपने बाग का दरवाजा खोला, उसने मेल–बॉक्स में झाँका। प्राय: भारी मात्रा में बेकार की डाक होती और कुछ बड़े लिफाफे उसकी माँ के नाम होते। एक ऐसा ढेर जिसे वह रसोई की मेज पर पटक देती और फिर ऊपर अपने कमरे में होमवर्क शुरू करने के लिये जा पहुँचती।
कभी–कभी उसके पिता के नाम बैंक से भी कुछ पत्र होते पर उसके पिता एक साधारण पिता नहीं थे। सोफी के पिता एक बड़े तेलवाहक जहाज के कैप्टन थे और वर्ष का अधिकतर समय बाहर यात्रा पर ही रहते थे। जब कभी कुछ सप्ताहों के लिए वह घर पर होते, तो सोफी और उसकी माँ के लिए घर को सुखद और आरामदेह बनाने के लिए घर में चीजों को सजाते–सँवारते रहते। किन्तु जब वह समुद्री अभियान पर होते तो कहीं बहुत दूर जा चुके प्रतीत होते।
मेल–बॉक्स में केवल एक ही पत्र था और वह था सोफी के नाम। सफेद लिफाफे पर लिखा था : ‘सोफी एमंडसन, 3 क्लोवर क्लोज’। बस इतना ही, भेजनेवाला कौन है, यह कहीं नहीं लिखा था। इस पर कोई डाक टिकट भी नहीं थी।
सोफी ने गेट बन्द करते ही लिफाफा खोला। अन्दर लिफाफे के साइज के बराबर कागज की एक स्लिप थी। लिखा था : तुम कौन हो?
और कुछ नहीं, केवल तीन शब्द, हाथ से लिखे हुए, और उनके बाद एक बड़ा प्रश्नचिह्न?
उसने लिफाफे को दोबारा देखा। पत्र तो निश्चय ही उसी के लिए था। आखिर मेल–बॉक्स में इसे किसने डाला होगा?
सोफी जल्दी–जल्दी लाल मकान में चली आई। हमेशा की तरह आज भी उसकी बिल्ली, शेरेकन, फुर्ती से झाड़ियों से निकलकर आगे बढ़ती पैड़ी पर कूदी और इससे पहले कि सोफी घर का दरवाजा बन्द करती अन्दर आ गई।
जब सोफी की माँ का मूड ठीक नहीं रहता, तो वह घर को मैनेजरी, जंगली जानवरों का संग्रहालय कहती। निश्चय ही सोफी के पास यह संग्रहालय था और वह इससे काफी खुश थी। इसकी शुरुआत हुई थी तीन सुनहरी मछलियों से–गोल्डटॉप, रैड राइडिंग हुड और ब्लैक जैक। उसके बाद वह दो ऑस्ट्रेलियाई बजरीगर मिट्ठू ले आई, जिनके नाम स्मिट और स्म्यूल थे, फिर गोविन्दा नामक कछुआ आया और अन्त में मार्मालेड जैसी बिल्ली, शेरेकन। यह सब उसे इसलिए दिए गए थे, क्योंकि उसकी माँ कभी भी अपने काम से दोपहरी बीतने के भी काफी देर तक घर नहीं लौट पाती थी और उसके पिता तो अधिकांश समय बाहर ही रहते थे, सारी दुनिया में समुद्री यात्राएँ करते हुए।
सोफी ने अपना स्कूल–बैग फर्श पर एक कोने में लटका दिया और एक बड़े कटोरे में कैट–फूड भरकर शेरेकन के सामने रख दिया। फिर वह रहस्यमय पत्र अपने हाथ में लिये हुए रसोई में स्टूल पर बैठ गई।
तुम कौन हो?
उसे इसकी कोई समझ नहीं थी। हाँ, वह सोफी एमंडसन, अवश्य थी, किन्तु सच में वह थी कौन? वास्तव में इसका सुराग नहीं लगा पाई थी अब तक। अगर उसे कोई दूसरा नाम दे दिया गया होता, तो क्या होता? जैसे ऐनी नट्सेन, तो तब क्या वह कोई और हो जाती?
तब अचानक उसे याद आया कि शुरू में उसके पिता चाहते थे कि उसे लिलेमोर के नाम से जाना जाए। सोफी ने कल्पना करने का प्रयास किया कि वह लिलेमोर एमंडसन के रूप में अपना परिचय दे रही है और हाथ मिला रही है, किन्तु उसे यह सब गलत लगा। वह तो कोई और थी जो सबको अपना परिचय दिए जा रही थी।
वह कूद कर बाथरूम में चली गई, उस विचित्र पत्र को अपने हाथ में लिये हुए। अब वह दर्पण के सामने खड़ी रहकर अपनी आँखों की प्रतिछाया को एकटक देख रही थी।
‘मैं सोफी एमंडसन हूँ,’ उसने कहा।
दर्पण में मौजूद लड़की ने कोई भी प्रतिक्रिया नहीं की कि थोड़ा–सा भी हिलती–डुलती। जो कुछ भी सोफी करती, वह भी हूबहू वैसा ही करती। सोफी ने दर्पण में अपनी प्रतिछाया को चपल गति से हराने की चेष्टा की, किन्तु वह भी उतनी ही तेज निकली।
‘तुम कौन हो,’ सोफी ने पूछा।
सोफी को इसका भी कोई प्रत्युत्तर नहीं मिला, हाँ उसे क्षणिक भ्रम तो जरूर हुआ कि यह प्रश्न उसने पूछा था या उसकी प्रतिछाया ने।
सोफी ने अपनी वर्तनी शीशे में नाक पर लगाई और कहा, ‘तुम मैं हो।’
जब उसे इसका भी कोई उत्तर नहीं मिला, तो उसने वाक्य को पलटा कर कहा, ‘मैं तुम हूँ।’
सोफी एमंडसन प्राय: अपनी शक्ल–सूरत से असन्तुष्ट रहती थी। उसे अक्सर बतलाया जाता कि उसकी आँखें सुन्दर हैं बादाम के आकार–सी, किन्तु लोग शायद सिर्फ ऐसा इसलिए कहते थे क्योंकि उसकी नाक कुछ ज्यादा ही छोटी थी और मुँह ज्यादा बड़ा। उसके कान भी आँखों के कुछ ज्यादा नजदीक थे। सबसे खराब थे उसके सीधे लटकते बाल, जिनके साथ कुछ भी करना असम्भव था। कभी–कभी उसके पिता उसके बालों को सहलाते और उसे क्लॉड डेबुसी के एक संगीत रचना की तरज़ पर ‘अलसी जैसे बालोंवाली लड़की’ कहते। पिताजी के लिए तो यह ठीक था, क्योंकि उन्हें ऐसे सीधे–सपाट केशों के साथ जीने की कोई मजबूरी नहीं थी। सोफी के केशों पर न तो किसी खुशबूदार क्रीम और न ही किसी स्टाइलिंग जेल का कोई प्रभाव पड़ता। कभी–कभी सोफी सोचती कि वह कितनी भद्दी है, कहीं ऐसा तो नहीं कि वह जन्म से ही ऐसी बदशक्ल हो। उसकी माँ सदैव उसे जन्म देते समय हुई अपनी प्रसव–पीड़ा का ज़िक्र करती रहती थी। किन्तु क्या उसकी बदसूरती इसी कारण थी?
कितना अजीब था कि उसे यह भी नहीं मालूम कि वह असल में कौन थी? और क्या यह अनुचित नहीं था कि उससे इस बारे में कभी भी नहीं पूछा गया कि वह कैसी दिखना चाहती है? उसकी छवि तो बस उस पर मढ़ दी गई थी। वह अपने मित्रों को तो चुन सकती थी, किन्तु यह निश्चित था कि उसने स्वयं को खुद नहीं चुना था। उसने तो यह भी नहीं चुना था कि वह एक मानुषी बनेगी।
मनुष्य होना क्या है?
सोफी ने एक बार फिर से शीशे में खड़ी लड़की पर निगाह डाली।
‘मैं सोचती हूँ अब ऊपर जाकर जीव–विज्ञान का होमवर्क करूँगी,’ उसने लगभग क्षमायाचना के भाव से कहा। पर बाहर हॉल में आई, तो फिर सोचने लगी। ‘नहीं, इससे तो बेहतर होगा कि मैं बाग में जाऊँ।’
‘किट्टी, किट्टी, किट्टी।’
सोफी ने बिल्ली को भगाकर दरवाजे की पैड़ियों पर निकाल दिया और बाहर का दरवाजा बन्द कर दिया।
अब सोफी बाहर बजरीवाले रास्ते पर उस रहस्यमय पत्र को हाथ में लिये खड़ी थी कि एक बड़ा ही विचित्र भाव उसके शरीर में दौड़ गया। उसे लगा जैसे वह एक गुड़िया है जिसे कोई जादुई छड़ी घुमाकर अचानक सजीव बना दिया गया है।
क्या यह अद्भुत नहीं था कि ठीक इस पल वह इस दुनिया में मौजूद है आश्चर्यजनक जोखिमपूर्ण संसार में इधर–उधर घुमते हुए!
शेरेकन कँकरीले रास्ते को हलके से फुदककर पार कर गई और लाल करांट की घनी झाड़ियों में जा छुपी। सफेद मूँछों जैसे बालों से लेकर हिलती पूँछ तक प्राणवान ऊर्जा से भरी हुई, एक चपल छरहरी बिल्ली, यहाँ बाग में थी, पर उसके मन में सोफी जैसे विचार नहीं थे।
जैसे ही सोफी ने अपने ज़िन्दा होने के बारे में सोचना शुरू किया, तुरन्त ही उसके मन में यह भी आया कि वह सदैव जीवित नहीं रहेगी। अभी मैं दुनिया में मौजूद हूँ, उसने सोचा, किन्तु एक दिन तो मैं यहाँ से चली जाऊँगी।
क्या मृत्यु के बाद जीवन है? यह एक अन्य प्रश्न था जिसके विषय में बिल्ली अपनी अनभिज्ञता में प्रसन्न थी।
सोफी की दादी माँ का देहान्त हुए कोई ज्यादा समय नहीं हुआ था। छ: महीने से अधिक समय तक सोफी उन्हें हर रोज याद किया करती थी। कितना अनुचित है कि जीवन को समाप्त होना ही पड़ता है।
सोफी कँकरीले रास्ते पर सोचती हुई खड़ी थी। अपने जीवित होने को लेकर उसने और भी जोर से सोचने की चेष्टा की ताकि भूल सके कि वह सदैव जीवित नहीं रहेगी। किन्तु यह असम्भव था। जैसे ही वह अपने जीवित होने के अहसास पर ध्यान एकाग्र करती उसी क्षण अपने मरने की बात भी दिमाग में आ जाती। दूसरी तरह से सोचने की कोशिश करने पर भी वैसा ही हुआ। एक दिन वह मर जाएगी, इस बारे में तीव्रता से सोचने पर ही वह अभी अपने जीवित होने की अद्भुत सुन्दरता और अच्छाई का भरपूर आनन्द महसूस कर सकती थी। यह अनुभूति एक सिक्के के दो पहलुओं जैसी थी, जिसे वह बराबर उलट–पुलट रही थी। और जैसे ही सिक्के का एक पहलू बड़ा और ज्यादा साफ होता वैसे ही दूसरा पहलू भी उतना ही बड़ा और साफ नजर आने लगता।
उसे लगा कि जीवित होने का अनुभव आप यह महसूस किए बिना नहीं कर सकते कि आप को मरना है। यह महसूस करना कि आपको मर जाना है तब तक नामुमकिन है जब तक आप यह न सोचें कि जीवित होना कितना अद्भुत है, कितना अविश्वसनीय रूप से विस्मयकारी।
सोफी को याद आया कि दादी माँ भी उस दिन कुछ ऐसा ही कहा था जब डॉक्टर ने उन्हें बताया था कि वह बीमार हैं। ‘मैंने आज से पहले यह कभी महसूस नहीं किया कि जीवन कितना अद्भुत है।’ दादी ने कहा था।
कैसी विडम्बना है! यह समझने के लिए कि जीवित रहना कैसा सुन्दर उपहार है लोगों को बीमार होना पड़ता है या फिर उन्हें अपने मेल–बॉक्स में एक रहस्यमय पत्र को प्राप्त करना होता है।
शायद उसे जाकर देखना चाहिए कि कोई और पत्र तो नहीं आए हैं। सोफी जल्दी–जल्दी गेट के पास गई और हरे रंग के मेल–बॉक्स में झाँका। यह देखकर वह चौंक गई कि उसमें एक सफेद लिफाफा और पड़ा था, बिलकुल पहले जैसा। किन्तु जब उसने पहला लिफाफा निकाला था, तब तो मेल–बॉक्स बिलकुल खाली हो गया था। इस लिफाफे पर भी उसका नाम लिखा था। उसने इसे फाड़कर खोल लिया और अन्दर से एक कागज निकाला, यह भी बिलकुल पहलेवाले साइज का था।
दुनिया कहाँ से आई? इस कागज पर लिखा था।
मुझे नहीं मालूम! सोफी ने सोचा। सच तो यह है इस बारे में कोई कुछ भी नहीं जानता फिर भी उसे लगा कि यह प्रश्न उचित ही था। उसने अपने जीवन में पहली बार अनुभव किया कि कम–से–कम यह पूछे बिना कि दुनिया कहाँ से आई, दुनिया में रहना उपयुक्त नहीं है।
इन रहस्यमय पत्रों से सोफी का दिमाग चकराने लगा। उसने फैसला किया कि वह अपनी माँद में जाकर बैठेगी।
माँद सोफी की छिपने की सबसे अधिक गुप्त जगह थी। जब वह बहुत गुस्से में होती या बहुत दुखी होती या फिर अत्यन्त प्रसन्न होती थी तो वह आकर इसी जगह छिप जाती थी। आज तो वह पूरी तरह दिग्भ्रमित थी।
लाल मकान के चारों ओर बहुत बड़ा बाग था, उसमें बहुत–सी फूलों की क्यारियाँ, फलों की झाड़ियाँ, विभिन्न प्रकार के फलों के वृक्ष, एक लम्बा–चौड़ा लॉन था जिसमें एक झूला और एक समर हाउस था जिसे दादाजी ने दादी माँ के लिए बनवाया था, यह उन दिनों की बात है जब उनकी पहली बच्ची जन्म के कुछ सप्ताहों के अन्दर ही चल बसी थी। उस बच्ची का नाम मेरी था। उसकी कब्र के पत्थर पर यह शब्द लिखे थे : ‘छोटी मेरी हमारे पास आई, हमारा अभिवादन किया, और फिर चली गई।’
बाग के एक कोने में रसभरी की झाड़ियों के पीछे एक घना झुरमुट था जहाँ न फूल लगते थे और न ही बेरियाँ। वास्तव में यह वह एक पुरानी बाड़ थी जो किसी समय बाग की बाउंड्री के रूप में लगाई गई थी, पर क्योंकि इसे पिछले बीस वर्षों से काटा–छाँटा नहीं गया था, यह बढ़ती–बढ़ती इतनी घनी और उलझ गई थी कि कुछ भी इसके आरपार नहीं जा सकता था। दादी माँ कहा करती थीं कि पिछले युद्ध के दौरान इसी झाड़ी के कारण लोमड़ियों के लिए चूजे उठा ले जाना बेहद कठिन हो गया था, जबकि वे बाग में खुले घूमते थे।
सोफी को छोड़कर बाकी सबके लिए यह झाड़ी उतनी ही बेकार थी जितना बाग के दूसरे छोर पर खरगोशों का बाड़ा। किन्तु ऐसा इसलिए था कि कोई भी सोफी का गोपनीय भेद जानता नहीं था।
सोफी को झाड़ियों में बने छोटे से छेद की बहुत पहले से जानकारी थी। वह रेंगती हुई छेद के पार निकली तो झाड़ियों के बीच बनी एक बड़ी खोखर में जा पहुँची। यह जगह एक छोटी माँद जैसी थी। वह निश्चिन्त थी कि यहाँ उसे कोई भी नहीं ढूँढ़ सकेगा।
दोनों लिफाफों को हाथ में थामे सोफी बाग में दौड़ती गई, फिर हाथों और पाँवों के बल घुटनियों चलती हुई वह झाड़ियों में घुस गई। इस गुप्त माँद में इतनी जगह थी कि सोफी उसमें सीधी खड़ी हो सकती थी, किन्तु आज वह टेढ़ी–मेढ़ी जड़ों के एक ढेर पर बैठ गई। वहाँ बैठकर वह पत्तों और टहनियों के बीच बने छोटे–छोटे छिद्रों से बाहर देख सकती थी। हालाँकि कोई भी छेद किसी छोटे सिक्के से बड़ा नहीं था, फिर भी वह सारे बाग पर अच्छी नजर रख सकती थी। जब वह छोटी थी तो उसे वहाँ पेड़ों के बीच उसे ढूँढ़ते फिरते से माता–पिता को देखने में बड़ा मजा आता था। उसके लिए यह एक खेल था।
सोफी सदा ही यह सोचती थी कि यह बाग एक अलग ही दुनिया है। जब भी वह बाइबिल में ईडन की बगिया की बात सुनती तो उसे लगता कि यह गुप्त स्थान भी वैसा ही है जहाँ बैठकर वह छोटे से स्वर्ग का सर्वेक्षण कर रही है।
दुनिया का निर्माण कैसे हुआ?
इस बारे में वह कुछ भी नहीं जानती थी। सोफी को इतना मालूम था कि धरती अन्तरिक्ष में एक छोटा–सा ग्रह है। लेकिन अन्तरिक्ष कहाँ से आया?
ऐसा सम्भव था कि अन्तरिक्ष सदा से ही रहा हो, इस सूरत में उसे यह पता लगाने की जरूरत नहीं है कि यह कहाँ से आया। पर क्या कोई चीज हमेशा से ही होती है और हमेशा ही बनी रह सकती है? उसके मन की गहराई में इस विचार के विरोध का भी कोई आधार था। निश्चय ही दुनिया में मौजूद हर चीज का आरम्भ कभी न कभी तो हुआ ही होगा। इसलिए अन्तरिक्ष भी सम्भवतया किसी समय किसी दूसरी चीज से बनाया गया होगा।
किन्तु यदि अन्तरिक्ष किसी दूसरी चीज से बना, तो वह दूसरी चीज भी किसी अन्य चीज से बननी चाहिए। सोफी ने महसूस किया कि वह मूल समस्या को सिर्फ टालती जा रही है। किसी बिन्दु पर कोई चीज शून्य से बनी होनी चाहिए। क्या यह बात उस असम्भव विचार की तरह नहीं है कि इस संसार का अस्तित्व सदा से रहा है बिना किसी प्रारम्भ के?
उन्होंने स्कूल में सीखा था कि ईश्वर ने दुनिया को बनाया है। सोफी ने स्वयं को सान्त्वना देने का प्रयास किया कि सम्भवत: यही इस समस्या का सबसे बढ़िया समाधान है। किन्तु उसने फिर से सोचना शुरू कर दिया। वह यह तो स्वीकार कर सकती थी कि ईश्वर ने अन्तरिक्ष बनाया, किन्तु फिर स्वयं ईश्वर कहाँ से आया? क्या उसने स्वयं को शून्य से बनाया था? एक बार फिर उसके मन की गहराई में कुछ था जो इस विचार का विरोध कर रहा था। माना कि ईश्वर सब प्रकार की चीजें बना सकता है किन्तु वह स्वयं को तब तक नहीं बना सकता जब तक उसके पास बनाने के लिए ‘स्व’ न हो। तो बस एक सम्भावना शेष बची रह जाती है : ईश्वर का अस्तित्व सदा रहा है। ईश्वर स्वयंभू है। किन्तु इस सम्भावना को तो वह पहले ही अस्वीकार कर चुकी थी। हर चीज का, जो भी अस्तित्ववान है, एक आरम्भ तो होना ही चाहिए।*
उफ, कैसी उलझन है!
उसने दोनों लिफाफे फिर खोल डाले :
तुम कौन हो?
दुनिया कहाँ से आई?
नाहक परेशान करनेवाले सवाल? और हाँ, यह पत्र कहाँ से आया, यह बात भी लगभग उतनी ही रहस्यमय थी।
वह कौन है जिसने सोफी के जीवन को झँझोड़ कर रख दिया था और अचानक ही उसे विश्व की सबसे गूढ़ पहेलियों के सामने ला खड़ा किया था?
सोफी तीसरी बार फिर अपने मेल–बॉक्स के पास गई। कुछ क्षण पहले ही डाकिया आज की डाक डाल गया था। सोफी ने इसमें से बेकार चिट्ठियों का बड़ा–सा ढेर बाहर निकाला, जिसमें कुछ पत्र–पत्रिकाएँ थीं और कुछेक पत्र उसकी माँ के लिए थे। एक पोस्टकार्ड था, उष्णकटिबन्धीय समुद्री तट का चित्र बना था इस पर। उसने कार्ड को उलटा। इस पर नॉर्वे की डाक–टिकट लगी थी और इस पर डाक–चिह्न था ‘यू एन बटालियन।’ क्या इसे पापा ने भेजा था? किन्तु वह तो इस समय एकदम किसी दूसरी जगह पर थे? और हैंडराइटिंग (हस्त–लेखन) भी उनकी नहीं थी।
जब सोफी ने देखा कि पोस्टकार्ड पर लिखा है–‘हिल्डे मोलर नैग, मार्फत सोफी एमंडसन, 3 क्लोवर क्लोज…’ तो उसकी नब्ज तेज चलने लगी। बाकी पता बिलकुल सही था। कार्ड पर लिखा था :
‘प्रिय हिल्डे, 15वें जन्मदिन की शुभकामनाएँ। मुझे भरोसा है तुम यह समझ जाओगी कि मैं तुम्हें ऐसा उपहार देना चाहता हूँ जो तुम्हारे बड़े होने में मदद करेगा। इस कार्ड को सोफी की मार्फत भेजने के लिए क्षमा करना। यह सबसे आसान तरीका था। पिता की ओर से प्यार।
सोफी दौड़ती हुई वापस मकान में पहुँची और रसोई में चली गई। उसके दिमाग में गहन उथल–पुथल हो रही थी। यह हिल्डे कौन थी, जिसका पन्द्रहवाँ जन्मदिन उसके अपने जन्मदिन से एक महीने पहले पड़ रहा था?
सोफी ने टेलीफोन डायरेक्टरी निकाली। मोलर नाम के बहुत सारे आदमी थे, और कई नैग नाम के भी। किन्तु पूरी डायरेक्टरी में मोलर नैग के नाम से कोई नहीं था।
उसने रहस्यमय कार्ड को दोबारा ध्यान से देखा। कार्ड तो सही लगता था। इस पर टिकट भी लगा था और डाकखाने की मुहर भी थी।
आखिर कोई पिता अपनी बेटी के जन्मदिन की बधाई का कार्ड सोफी के पते पर क्यों भेजेगा जबकि कार्ड किसी दूसरे पते पर जाना चाहिए था। किस तरह एक पिता जानबूझकर उसके जन्मदिन का कार्ड दूसरी जगह भेजकर अपनी बेटी को धोखा देना चाहेगा? यह सबसे आसान तरीका कैसे हो सकता है? और सबसे बड़ी बात यह थी कि वह ‘हिल्डे’ नाम की लड़की का पता कैसे लगा पाएगी?
सोफी के सामने चिन्ता करने के लिए अब एक और समस्या खड़ी हो गई थी। उसने अपने गड्डमड्ड विचारों को व्यवस्थित करने की कोशिश की।
आज तीसरे पहर, दो घंटों की छोटी समयावधि में, उसके सामने तीन उलझनें परोस दी गई थीं। पहली समस्या थी–वे दो सफेद लिफाफे उसके मेल–बॉक्स में किसने रखे। दूसरी पहेली वे कठिन प्रश्न थे जो इन लिफाफों में रखे कागजों में लिखे थे। तीसरी परेशानी थी, यह हिल्डे मोलर नैग कौन हो सकती है, और उसका जन्मदिन बधाई कार्ड सोफी को नॉर्वे से क्यों भेजा गया है। उसे विश्वास था कि यह तीनों समस्याएँ किसी–न–किसी रूप में आपस में जुड़ी हुई हैं। ऐसा होना ही चाहिए, क्योंकि आज तक तो वह पक्की तरह से एक साधारण जीवन ही जीती आ रही थी।
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* वैदिक नासदीय सूक्ति भी इसी प्रकार की जिज्ञासाओं के परस्पर विरोधी समाधानों की सिद्धि–असिद्धि की सम्भावनाओं पर सन्देह व्यक्त करती है।
जादुई टोपी
अच्छा दार्शनिक होने के लिए हमें चाहिए सिर्फ विस्मित होने की क्षमता…
सोफी को पक्का विश्वास था कि गुमनाम पत्र–लेखक उसे फिर पत्र लिखेगा। उसने फैसला किया कि इन पत्रों के विषय में वह फिलहाल किसी से कुछ नहीं कहेगी।
स्कूल में अध्यापकों द्वारा पढ़ाए जा रहे विषयों पर अपना ध्यान केन्द्रित करने में उसे काफी कठिनाई आई। उसे लगा जैसे वे केवल फालतू विषयों पर ही बात कर रहे थे। आखिर वह इस बारे में बात क्यों नहीं करते कि मानव होना क्या है–या कि दुनिया क्या है और कैसे अस्तित्व में आई?
उसने पहली बार यह महसूस करना शुरू किया कि स्कूल में ही नहीं बल्कि सभी अन्य जगहों पर भी लोगों का मन छोटी–छोटी हल्की–फुल्की चीजों की चर्चा करने में ही रमता है। बड़ी–बड़ी भारी महत्त्वपूर्ण समस्याएँ भी हैं जिनका समाधान किया जाना आवश्यक है।
क्या किसी के पास इन प्रश्नों के उत्तर थे? सोफी ने महसूस किया कि विषम क्रियाओं को याद करने की तुलना में इन पर विचार करना कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण था।
अन्तिम क्लास के बाद जैसे ही घंटी बजी, वह स्कूल से इतनी तेजी से बाहर आई कि जोआना को उसके साथ–साथ चलने के लिए दौड़ना पड़ा।
थोड़ी देर बाद जोआना ने पूछा, ‘क्या आज शाम तुम ताश खेलना पसन्द करोगी?’
सोफी ने अपने कन्धे उचका दिए।
‘अब ताश के खेलों में मेरी कोई रुचि नहीं रही है।’
जोआना को इस पर आश्चर्य हुआ।
‘ठीक है, ताश में रुचि नहीं है तो चलो, बैडमिंटन खेलते हैं।’
सोफी ने फुटपाथ टकटकी लगाकर देखा और ऊपर अपनी सहेली की ओर नज़र उठाई।
‘नहीं, अब मुझे नहीं लगता कि मेरी बैडमिंटन में भी कोई रुचि है।’
‘मजाक मत करो।’
सोफी जोआना की वाणी में कड़वाहट का स्पर्श भाँप गई।
‘क्या तुम मुझे बताओगी कि वह क्या है जो अचानक इतना महत्त्वपूर्ण हो गया है?’
सोफी ने सिर्फ अपना सर हिला दिया, ‘यह…यह एक रहस्य है।’
‘कहीं तुम्हें किसी से प्यार तो नहीं हो गया है?’ दोनों लड़कियाँ थोड़ी देर बिना कुछ कहे, साथ–साथ चलती रहीं। जब वे फुटबॉल मैदान के पास पहुँचीं, तो जोआना ने कहा, ‘मैं इस मैदान से होकर जाऊँगी।’
मैदान के पार! यह जोआना के लिए सबसे छोटा रास्ता था, किन्तु वह इस रास्ते से तभी जाती थी जब किसी मेहमान के लिए उसे जल्दी घर पहुँचना हो या दाँतों के डॉक्टर के साथ उसका अपॉइंटमेंट होता।
सोफी को पछतावा हुआ कि उसने जोआना के साथ सही बर्ताव नहीं किया। लेकिन इसके सिवाय वह कह भी क्या सकती थी? यह कि वह अचानक इस खोज में डूब गई थी कि वह स्वयं कौन है? और दुनिया कैसे बनी, और इसीलिए अब उसके पास बैडमिंटन खेलने के लिए समय नहीं था? क्या जोआना यह सब समझ सकती थी?
सबसे मार्मिक, सजीव और जरूरी, और एक अर्थ में, सर्वाधिक स्वाभाविक प्रश्नों पर गम्भीर होना इतना कठिन क्यों था?
मेल–बॉक्स खोलते समय, उसने अपने हृदय को तेज–तेज धड़कते पाया। पहले तो उसे बैंक का एक पत्र और अपनी माँ के लिए कई बड़े ब्राउन लिफाफे दिखे। धत् तेरे की! वह तो उत्सुकता से प्रतीक्षा कर रही थी कि अज्ञात पत्र भेजनेवाले से उसे एक पत्र और मिलेगा।
जैसे ही उसने गेट बन्द किया, तो बड़े लिफाफों में से एक पर उसे अपना नाम दिखा। जैसे ही इसे पलटा, तो पीछे लिखा देखा : ‘दर्शनशास्त्र का कोर्स, ध्यान से संभालें।’
सोफी बजरी बिछे रास्ते पर दौड़ती गई और अपना स्कूल बैग पैड़ियों पर ही फेंक दिया। दूसरे पत्रों को पायदान के नीचे सरका कर वह दौड़ती हुई बाग में पीछे जाकर अपने गुप्त स्थान की शरण लेने चल दी। इतना बड़ा पत्र खोलने के लिए यही एकमात्र ठीक जगह थी।
शेरेकन उसके पीछे–पीछे दौड़ती चली आई किन्तु अब तक सोफी उसके इस व्यवहार की आदी हो चुकी थी। वह निश्चिन्त थी कि बिल्ली कभी भी उसका रहस्य किसी को भी नहीं बता पाएगी।
लिफाफे के अन्दर टाइप किए हुए तीन पृष्ठ थे जिन्हें एक क्लिप से जोड़ा गया था। सोफी ने पढ़ना शुरू किया।
दर्शनशास्त्र क्या है?
प्रिय सोफी,
अनेक लोगों के अपने–अपने शौक होते हैं। कुछ लोग पुराने सिक्के या विदेशी डाक–टिकट इकट्ठा करते हैं, तो कुछ सुई से कशीदाकारी करते हैं। और कुछ ऐसे हैं जो अपना खाली समय किसी ख़ास खेल में लगाते हैं।
बहुत से लोग पढ़ने का आनन्द लेते हैं। किन्तु पढ़ने की रुचियों में अनेक भिन्नताएँ हैं। कुछ लोग केवल समाचार–पत्र या कॉमिक्स पढ़ते हैं, कुछ उपन्यास पढ़ते हैं, जबकि कई अन्य लोग खगोल विज्ञान, वन्य जीवन या तकनीकी आविष्कारों के बारें में पुस्तकें पसन्द करते हैं।
यदि मेरी रुचि घोड़ों या बहुमूल्य पत्थरों में है तो मैं यह अपेक्षा नहीं कर सकता कि दूसरे लोग भी इन रुचियों के प्रति मेरी ही तरह उत्साहित होंगे। यदि मैं टी.वी. पर खेलों के सारे कार्यक्रमों को बड़ी प्रसन्नता से देखता हूँ तो मुझे यह सच्चाई भी स्वीकार कर लेनी चाहिए कि कुछ लोगों के लिए यह बोरियत भरे भी होंगे।
क्या कुछ ऐसा नहीं है जिसमें हम सबकी रुचि हो? क्या ऐसा कुछ भी नहीं है जिससे हर किसी का सरोकार हो–इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वे कौन लोग हैं और दुनिया में कहाँ रहते हैं? हाँ, प्रिय सोफी, कुछ ऐसे प्रश्न हैं जिनमें निश्चय ही प्रत्येक की रुचि होनी चाहिए। निश्चित रूप से उन्हीं प्रश्नों के बारे में यह कोर्स है।
जीवन में सबसे महत्त्वपूर्ण क्या है? यदि हम यह प्रश्न किसी ऐसे व्यक्ति से पूछें जो भुखमरी का शिकार हो, तो उत्तर होगा भोजन। यदि यही प्रश्न किसी ठंड से मरनेवाले व्यक्ति से किया जाए तो उत्तर होगा, गरमाहट। यदि हम यही प्रश्न किसी ऐसे आदमी से करें जो अकेला, अलग–थलग, नितान्त एकाकी है, तो सम्भवत: उत्तर होगा लोगों की संगत और उनका साथ।
किन्तु ऐसी आधारभूत जरूरतें पूरी हो जाने के बाद भी क्या कुछ और भी है जिसे सब पाना चाहें, जिसकी सबको जरूरत है? दार्शनिक सोचते हैं कि ऐसा उनका विश्वास है कि आदमी केवल रोटी से जिन्दा नहीं रह सकता। ठीक है, भोजन सबको चाहिए। और सभी को प्यार और देखभाल भी। किन्तु कुछ और भी है, इस सबसे अलग, जिसकी हम सभी को जरूरत है, और वह है यह पता लगाना कि हम कौन हैं और यहाँ क्यों मौजूद हैं?
हम यहाँ क्यों हैं? इस प्रश्न में रुचि लेना डाक–टिकट इकट्ठे करने में रुचि लेने जैसा नहीं है। जो लोग ऐसे प्रश्न पूछते हैं वे सभी एक ऐसी चर्चा में भाग ले रहे हैं जो इस ग्रह पर उस समय से चली आ रही है जब से मनुष्य यहाँ रह रहा है। यह ब्रह्मांड, यह पृथ्वी और जीवन अस्तित्व में कैसे आए? यह प्रश्न इस प्रश्न से भी बड़ा और अधिक महत्त्वपूर्ण है कि पिछले ओलिम्पिक्स में सबसे ज्यादा स्वर्ण पदक किसने जीते? दर्शनशास्त्र की ओर बढ़ने या पहुँचने का सबसे बढ़िया रास्ता है कुछ दार्शनिक प्रश्नों को पूछना।
दुनिया कैसे बनी? जो घटित होता है, क्या उसके पीछे कोई इच्छा या अर्थ है? क्या मृत्यु के बाद जीवन है? हम इन प्रश्नों के उत्तर कैसे दे सकते हैं? और सबसे महत्त्वपूर्ण कि हमें अपना जीवन कैसे जीना चाहिए? लोग इन प्रश्नों को युगों–युगों से पूछते आए हैं। दुनिया में ऐसी कोई संस्कृति नहीं जिसमें इन प्रश्नों को कभी न कभी न उठाया गया हो कि आदमी क्या है, दुनिया कहाँ से आई।
पूछने के लिए मूल रूप से बहुत अधिक प्रश्न दार्शनिक नहीं हैं। सर्वाधिक महत्त्व के कुछ प्रश्न हम पहले ही पूछ चुके हैं। किन्तु इतिहास हमें इनमें से प्रत्येक प्रश्न के अलग ढंग से भिन्न–भिन्न उत्तर प्रदान करता है। अत: उत्तर ढूँढ़ने और पाने की अपेक्षा दार्शनिक प्रश्नों को पूछना कहीं अधिक आसान है।
आज भी हर व्यक्ति को इन्हीं प्रश्नों के अपने निजी उत्तर खोजने हैं। क्या ईश्वर का अस्तित्व है? मृत्यु के बाद जीवन है? आप इन प्रश्नों के उत्तर विश्व–ज्ञानकोश में देखकर नहीं पा सकते। और न ही विश्व–ज्ञानकोश हमें यह बतला सकता है कि हमें अपना जीवन कैसे जीना चाहिए। यह जान कर कि अन्य लोगों ने अपने विश्वास कैसे विकसित किए हैं, हमें सहायता मिलती है। अपने जीवन–दर्शन की रचना कर पाने में।
दार्शनिकों द्वारा सत्य की खोज किसी जासूसी कहानी जैसी है। कुछ लोग सोचते हैं कि एंडरसन हत्यारा था, कई अन्य सोचते हैं कि हत्यारा नीलसन या जेनसन था। पुलिस कभी–कभी किसी वास्तविक जुर्म की पहेली को सुलझा लेती है। किन्तु यह भी सम्भव है कि वह कभी इसकी जड़ तक पहुँच ही न पाए, यद्यपि कहीं न कहीं समाधान मौजूद होता है। इस तरह यद्यपि किसी प्रश्न का उत्तर देना कठिन हो, फिर भी उसका एक–और केवल एक–सही उत्तर हो सकता है। मृत्यु के बाद या तो किसी प्रकार का अस्तित्व है–या नहीं है।
युगों पुरानी अनेक पहेलियों को विज्ञान ने सुलझा दिया है। एक समय था जब चाँद का अँधेरा हिस्सा रहस्य में छिपा हुआ था। यह कोई उस तरह की समस्या नहीं थी जिसका समाधान चर्चा से निकल सके या उसे एक आदमी की कल्पना पर ही छोड़ दिया जाए। किन्तु आज हमें सही–सही मालूम है कि चाँद का अँधेरा हिस्सा कैसा दिखता है और अब कोई भी ‘विश्वास नहीं कर सकता’ कि चाँद में आदमी रहते हैं या यह कि चाँद कच्चे पनीर का बना हुआ है।
दो हजार से अधिक वर्ष पूर्व एक यूनानी दार्शनिक हुआ था। उसका विश्वास था कि दर्शनशास्त्र का स्रोत मनुष्य की विस्मय करने की क्षमता में है। मनुष्य ने सोचा कि जीवित रहना ऐसा अद्भुत अनुभव है कि उससे दार्शनिक प्रश्न अपने आप उभरने लगते हैं।
यह एक जादुई करिश्मा देखने की तरह है। हम समझ नहीं पाते कि यह कैसे होता है या किया जाता है। इसलिए हम पूछते हैं–कोई जादूगर दो सफेद रेशमी रुमालों को जिन्दा खरगोश में कैसे बदल देता है?
अनेक लोग दुनिया का अनुभव उसी अविश्वसनीयता से करते हैं जैसे तब करते हैं जब एक जादूगर टोपी को खाली दिखलाकर फिर उसी में से अचानक एक खरगोश निकालकर दिखला देता है।
खरगोश के मामले में तो हम जानते हैं कि जादूगर ने हमारे साथ कोई चाल खेली है। हम जानना यह चाहते हैं कि आखिर उसने इसे किया कैसे? किन्तु जब दुनिया की बात आती है, तो मामला थोड़ा भिन्न होता है। हम जानते हैं कि दुनिया हाथ की सफाई का खेल या धोखा नहीं है क्योंकि हम यहाँ दुनिया के अन्दर मौजूद हैं, हम इसका एक अंग हैं। वास्तव में, हम वह सफेद खरगोश हैं जिसे जादूगर द्वारा टोपी से बाहर निकाला जाता है। हमारे और सफेद खरगोश के बीच इतना अन्तर है कि खरगोश को मालूम नहीं होता कि वह एक जादुई खेल में भाग ले रहा है जबकि हम महसूस करते हैं कि हम किसी गहन रहस्य का अंग हैं और यह जानना चाहते हैं कि यह सब कैसे हो रहा है।
पुनश्च : जहाँ तक सफेद खरगोश की बात है बेहतर यह होगा कि उसकी तुलना पूरे विश्व से की जाए। विश्व में हमारी स्थिति उन सूक्ष्म कीटाणुओं की तरह हैं जो खरगोश के चिकने रोएँदार बालों में गहरे नीचे रहते हैं। किन्तु दार्शनिक लोग सदैव ही फर के बारीक रेशों के ऊपर चढ़कर जादूगर की आँखों में गहरे झाँकने की कोशिश करते रहे हैं और कर रहे हैं।
सोफी, क्या तुम अभी भी यहीं हो? शेष आगे…
सोफी थककर चूर हो चुकी थी। अभी भी यहीं हो? उसे यह भी ध्यान नहीं रहा कि वह लगातार उस पत्र को पढ़ती गई थी, एक पल भी श्वास लेने के लिए रुके बिना। आखिर यह पत्र कौन लाया था? यह वह आदमी नहीं हो सकता जिसने हिल्डे मोलर नैग के लिए जन्मदिनवाला कार्ड भेजा था क्योंकि उस कार्ड पर डाक–टिकट और डाक की मुहर दोनों थे। ब्राउन लिफाफा मेल–बॉक्स में बिलकुल उसी तरह डाला गया था जैसे पहले के दो सफेद लिफाफे।
सोफी ने घड़ी की ओर देखा। पौने तीन बजे थे। उसकी माँ तो अगले दो घंटे से भी अधिक समय तक काम से घर पहुँचनेवाली नहीं थी।
सोफी रेंग कर बाग में लौट आई और मेल–बॉक्स की ओर दौड़ पड़ी। शायद उसमें कोई और पत्र हो।
उसे अपने नाम वाला एक और ब्राउन लिफाफा मिला। इस बार उसने इधर–उधर देखा किन्तु वहाँ कोई भी दिखलाई नहीं दिया। सोफी दौड़ती हुई जंगल के छोर तक जा पहुँची और रास्ते पर दूर तक नजर डाली।
वहाँ कोई नहीं था। अचानक उसे ऐसा लगा कि जंगल में कहीं एक टहनी टूटी हो। किन्तु वह पूरे विश्वास के साथ कुछ नहीं कह सकती थी और यूँ भी किसी ऐसे के पीछे दौड़ना बेकार था जो भाग जाने पर उतारू था।
सोफी घर में चली आई। फिर जल्दी–जल्दी सीढ़ियाँ चढ़कर अपने कमरे में गई और बिस्किट्स वाला वह डिब्बा निकाल लिया जिसमें सुन्दर–सुन्दर नग रखे थे। उसने उन्हें फर्श पर डाल दिया और दोनों बड़े लिफाफों को टिन में रख दिया। फिर, टिन को दोनों हाथों से मजबूती से पकड़े हुए, बाग में दौड़ गई। बाहर जाने से पहले उसने शेरेकन के लिए कुछ खाना रख दिया।
‘किट्टी, किट्टी, किट्टी।’
अपने गुप्त स्थान पर एक बार फिर पहुँचकर उसने दूसरा ब्राउन लिफाफा खोला और उसमें से टाइप किए हुए नए पृष्ठ निकाल लिये और पढ़ने लगी।
एक विचित्र प्राणी
हैलो अगेन, जैसे कि तुम देख सकती हो दर्शनशास्त्र का यह छोटा कोर्स आसान किस्तों में आएगा। कुछ और प्रारम्भिक टिप्पणियाँ यह हैं :
मैंने पहले भी कहा कि अच्छा दार्शनिक होने के लिए जिस एकमात्र चीज की जरूरत है वह है विस्मित होने की क्षमता। यदि मैंने नहीं कहा, तो मैं इसे फिर से कहता हूँ : अच्छा दार्शनिक होने के लिए हमारे पास होनी चाहिए सिर्फ विस्मित होने की क्षमता।
शिशुओं में यह क्षमता होती है। इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं है। कुछ महीने गर्भ में रहने के बाद, वे रपटते हुए एक बिलकुल नए यथार्थ–जगत में बाहर आ जाते हैं। पर जैसे जैसे वे बड़े होते हैं उनमें विस्मय की यह क्षमता क्षीण होने लगती है। ऐसा क्यों होता है? क्या तुम जानती हो?
अगर कोई शिशु पैदा होते ही बातचीत कर सकता तो संभवतया हमें बता सकता कि वह किस अद्भुत दुनिया में आ गया है। उसकी तरह हम भी अपने इर्द–गिर्द विस्मय से देखते।
जैसे वह धीरे–धीरे शब्द प्राप्त करता है, बच्चा सिर उठाकर देखता है और हर बार कुत्ता देखने पर कहता है ‘बाउ–वाऊ’। वह अपने वाकर में उछलता–कूदता है, अपनी बाँहें लहराता है : ‘बाउ–वाऊ! बाउ–वाऊ!’ हम जो उम्र में बड़े और अधिक बुद्धिमान हैं, बच्चे के उत्साह से कुछ परेशान हो जाते हैं। ‘ठीक है, ठीक है, यह एक बाउ–वाऊ हैं,’ हम कहते हैं। ‘अब कृपया शान्त हो जाओ।’ हम मुग्ध नहीं होते। हमने पहले भी कुत्ता देखा है।
थोड़ा और बड़ा होने पर वह अब कुत्ते के पास से गुजरता है तो अब उत्तेजित नहीं होता। पर इससे पहले वह शायद सैकड़ों बार ‘बाउ–वाऊ’ के आश्चर्य मिश्रित आनन्द को दोहरा चुका होता है। यही बात हाथी या एक हिप्पोपोटेमस के बारे में भी होती है किन्तु बच्चे के ठीक से बोलना सीखने से बहुत पहले–और दार्शनिक रूप से सोचना सीखने से बहुत पहले–दुनिया उसके लिए मात्र एक आदत बन गई होती है।
यदि तुम मुझसे पूछो, तो मैं कहूँगा–यह एक बड़ी दुखद स्थिति है।
मेरी चिन्ता यही है प्रिय सोफी, तुम बड़ी होकर उन लोगों जैसी न बन जाओ जो दुनिया को, जैसी यह है, वैसी ही स्वीकार करके चलते हैं। अत: इसे सुनिश्चित करने के लिए हम विचारों के विषय में कुछ प्रयोग करेंगे और उसके बाद ही इस कोर्स में आगे चलेंगे।
तुम सोचोगी मैं तो एक असाधारण प्राणी हूँ। हाँ, मैं एक रहस्यमय प्राणी हूँ।
तुम्हें लगता है मानो तुम एक वशीकरण नींद से जागी हो। मैं कौन हूँ, तुम पूछती हो। तुम जानती हो कि तुम इस ब्रह्मांड में एक ग्रह पर इधर–उधर भटक रही हो। किन्तु यह ब्रह्मांड है क्या?
यदि तुम स्वयं को इस तरह खोज निकालो तो, समझ लो मंगलग्रह वासी जैसे रहस्यमय प्राणी को खोज लोगी। तुम न केवल बाह्य अन्तरिक्ष के एक प्राणी को देख पाओगी, तुम्हें अपने अन्दर गहरे कहीं यह अनुभव होगा कि तुम स्वयं भी एक असाधारण प्राणी हो!
मेरी बात समझ में आई न सोफी? अच्छा आओ हम विचार का दूसरा प्रयोग करते हैं।
वैसे ऐसा कभी नहीं होगा कि तुम किसी दूसरे ग्रह के प्राणी से मिलो! हमें तो यह भी नहीं मालूम कि अन्य ग्रहों पर जीवन है भी या नहीं। किन्तु शायद किसी दिन तुम्हारा स्वयं से सामना हो जाए। एक दिन अचानक तुम ठिठक जाओ और स्वयं को पूरी तरह एक नई रोशनी में देखो। एक दिन जंगल में चलते हुए। यह भी हो सकता है तुम्हारे साथ।
किन्तु एक दिन सबेरे, मम्मी, पापा और दो या तीन साल का छोटा टॉमस रसोई में बैठे नाश्ता कर रहे हैं। थोड़ी देर बाद मम्मी उठकर सिंक की तरफ जाती है और पापा हाँ, पापा–ऊपर उड़ने लगते हैं और छत के नीचे हवा में तैरते हैं जबकि छोटा टॉमस उन्हें देख रहा है। सोचो, तब टॉमस ने क्या कहा होगा? शायद वह अपने पापा की ओर इशारा करके कहता है : ‘पापा उड़ रहे हैं।’ टॉमस निश्चय ही इस दृश्य से आश्चर्यचकित होगा, लेकिन वह तो प्राय: चकित हो जाता है। पापा हर रोज इतनी अजीब–अजीब चीजें करते हैं कि नाश्ते की मेज पर थोड़ी–सी उड़ान में उनको कोई अन्तर नहीं पड़ता। हर दिन पापा एक अजीब मशीन द्वारा दाढ़ी बनाते हैं, कभी–कभी वह छत पर चढ़ जाते हैं और टी.वी. एरियल को घुमाते हैं–या वह गाड़ी का बोनेट खोल, अपना सिर उसमें धँसा देते हैं और जब सिर बाहर निकालते हैं तो मुँह पर कालिख लगी होती है।
अब मम्मी की बारी है। वह टॉमस की सुनकर एकदम तेजी से मुड़ती है। तुम सोचो, पापा को रसोई की मेज के ऊपर तैरते देखकर उनकी प्रतिक्रिया क्या होगी?
मुरब्बे का मर्तबान उसके हाथ से छूट जाता है और वह डरकर चीखती हैं। पापा के अपनी कुर्सी पर वापस आ जाने पर सम्भवत: उन्हें डॉक्टरी देखभाल की जरूरत पड़े। (उन्हें अब तक बेहतर टेबल मैनर्स सीख लेने चाहिए थे) तुम सोचो, टॉमस और उसकी माँ की प्रतिक्रिया अलग–अलग क्यों है?
इस सबका कुछ सम्बन्ध आदत से है। (इस पर ध्यान दो) मम्मी ने यही सीखा है कि लोग उड़ नहीं सकते जबकि टॉमस को अभी यह जानना है। वह अभी यह नहीं जानता कि आप दुनिया में क्या कर सकते हैं और क्या नहीं कर सकते।
किन्तु सोफी, दुनिया की बात करें? क्या खयाल है तुम्हारा, क्या दुनिया वह सब कर सकती है जो वह कर रही है? दुनिया भी तो अन्तरिक्ष में तैर रही है।
दुख की बात तो यही है कि हम जैसे–जैसे बड़े होते हैं, न केवल गुरुत्वाकर्षण की शक्ति के ही आदी होते जाते हैं अपितु बहुत थोड़े समय में ही दुनिया हमारे लिए एक आदत बन जाती है। ऐसा लगता है कि बड़े होने की लालसा में हम दुनिया के प्रति आश्चर्य करने की क्षमता खो देते जाते हैं। और ऐसा होने के दौरान हम महत्त्वपूर्ण, मूलभूत केन्द्रीय क्षमता खो बैठते हैं–‘ऐसी क्षमता जिसे दार्शनिक पुन: स्थापित करने का प्रयास करते हैं। कहीं हमारे अन्दर कोई चीज हमें बतलाती रहती है कि जीवन एक बहुत बड़ा रहस्य है। इसका हमने एक समय अनुभव किया था, यह उस समय की बात है जब हमने अभी विचार करना तक नहीं सीखा था।
मैं इसे और संक्षेप में कहता हूँ : यद्यपि दार्शनिक प्रश्नों से हम सभी का सरोकार है, किन्तु इससे हम सब दार्शनिक नहीं बन जाते। अनेक कारण से अधिकांश लोग रोजमर्रा के जीवन में इतना उलझ जाते हैं कि संसार के प्रति उनका विस्मयकारी भाव पृष्ठभूमि में खो जाता है।
(वे रेंगते हुए खरगोश के मुलायम फर में गहरे अन्दर तक उतर जाते हैं, वहाँ आराम से खो जाते हैं, और फिर सारा जीवन वहीं बने रहते हैं) जैसे–जैसे वे बड़े होते जाते हैं आश्चर्यचकित होने की उनकी क्षमता घटती प्रतीत होती है। ऐसा क्यों होता है? क्या तुम इसका कारण जानती हो?
कल्पना करो तुम एक दिन जंगल में घूमने निकलती हो। अचानक तुम्हें अपने सामने एक अन्तरिक्ष यान दिखलाई देता है। एक छोटा–सा मंगलग्रह वासी उस अन्तरिक्ष यान से बाहर आता है और तुम्हारे सामने खड़ा हो जाता है। अब वह तुम्हें देख रहा है…
उस स्थिति में तुम्हारे मन में क्या विचार आएँगे? कोई बात नहीं, इसे भूल जाओ, यह महत्त्वपूर्ण नहीं है। किन्तु क्या तुमने कभी इस तथ्य पर विचार किया है कि तुम स्वयं एक मंगलग्रह वासी हो?
बच्चों के लिए यह दुनिया और इसकी हर चीज नई है, कुछ ऐसी जो आश्चर्य को जन्म देती है। वयस्कों के साथ ऐसा नहीं है। अधिकांश वयस्क लोग इस दुनिया को जैसी है वैसी ही स्वीकार करके सन्तुष्ट हो जाते हैं।
लेकिन निसंदेह दार्शनिक इसके उल्लेखनीय अपवाद हैं। दार्शनिक कभी भी दुनिया का बिलकुल आदी नहीं होता। उसे दुनिया कुछ अनुचित–चौंकानेवाली, एक पहेली जैसी दिखती है। इस प्रकार दार्शनिकों और बच्चों में एक महत्त्वपूर्ण समान क्षमता है। तुम चाहो तो कह सकती हो कि एक दार्शनिक जीवन भर एक नन्हें बच्चे जैसा जिज्ञासु बना रहता है।
सोफी इसलिए अब तुम्हें स्वयं तय करना है। क्या तुम ऐसी बच्ची हो जो अभी तक दुनिया से ऊबी नहीं है? या तुम एक ऐसी दार्शनिक हो जो प्रण कर चुकी है कि वह कभी ऐसी नहीं बनेगी?
यदि तुम अपना सिर झटक दो, और अपने आपको बच्ची और दार्शनिक दोनों में से कोई भी न मानो तो इसका मतलब यह हुआ कि तुम दुनिया की इतनी आदी हो चुकी हो कि अब यह तुम्हें आश्चर्य–चकित नहीं करती। सावधान! तुम खतरे में हो। और यही कारण है कि तुम्हें दर्शनशास्त्र का यह कोर्स प्राप्त हो रहा है। दुनिया के किसी भी दूसरे लोगों की तरह मैं तुम्हें कभी भी जिज्ञासाहीन, उदासीन नहीं बनने दूँगा। मैं चाहता हूँ कि तुम्हारा जिज्ञासु मन सदैव सक्रिय रहे।
इसकी कोई फीस नहीं लगेगी इसलिए यदि तुम इसे पूरा नहीं करती तो तुम्हें कोई पैसा वापस भी नहीं मिलेगा। फिर भी किसी भी समय यदि तुम इस कोर्स को छोड़ना चाहो तो तुम ऐसा करने के लिए स्वतन्त्र हो। उस सूरत में तुम्हें मेरे लिए एक सन्देश मेल–बॉक्स में छोड़ना होगा। एक जीवित मेढक से काम हो जाएगा। कोई हरी चीज रहे तो ठीक, नहीं तो डाकिया डर जाएगा।
सार रूप में कहूँ : एक जादूई टोपी से एक सफेद खरगोश बाहर निकाला जाता है। चूँकि यह बहुत बड़ा खरगोश है, इसलिए जादू के करतब को दिखाने में अरबों वर्ष लग गए हैं। सभी नश्वर प्राणी खरगोश के बालों के बिलकुल किनारों पर पैदा होते हैं जहाँ वे ऐसी स्थिति में होते हैं कि जादू के करतब की असम्भवता पर आश्चर्य कर सकते हैं। किन्तु जैसे ही उनकी उम्र बढ़ती जाती है वे फर के अन्दर गहरे जाने में लग जाते हैं। और अन्दर पहुँचकर वे वहीं बने रहते हैं। वे वहाँ इतने आराम में होते हैं कि धीरे–धीरे वापस बाहर आने की जोखिम कभी नहीं उठाते। केवल दार्शनिक ही भाषा और अस्तित्व के बाहरी छोरों की चरम सीमा पर पहुँचने के जोखिम भरे अभियान पर निकलते हैं। उनमें से कुछ रास्ते में गिर पड़ते हैं, किन्तु कुछ दुस्साहसपूर्वक इस अभियान में डटे रहते हैं और उन लोगों पर चिल्लाते रहते हैं, जो आराम की कोमल नींद में गहरे पड़े हुए हैं, जिन्होंने स्वयं को जायकेदार भोजन और पेय–पदार्थों से ठोंस लिया है।
‘देवियो और सज्जनो,’ दार्शनिक चिल्लाकर कहते हैं, ‘हम अन्तरिक्ष में तैर रहे हैं।’ किन्तु नीचे रहनेवालों में से कोई भी उनकी परवाह नहीं करता।
चरम आराम की स्थिति में नीचे पाताल की गहराई में रहनेवाले लोग चिढ़कर कहते हैं कि ‘कैसे परेशानी पैदा करनेवाले लोग हैं ये?’ कृपया मक्खन इधर सरका दीजिए? आज हमारे शेयरों के भाव कितना ऊपर चढ़े? आज टमाटरों का भाव क्या है? क्या आपने सुना है कि राजकुमारी डायना फिर माँ बननेवाली हैं?
उस दिन तीसरे पहर जब सोफी की माँ घर लौटी तो सोफी किसी गहरे मानसिक आघात की स्थिति में थी। उसने रहस्यमय दार्शनिक के पत्रों वाला डिब्बा गुप्त स्थान पर सुरक्षित छिपा दिया था। सोफी ने अपना होमवर्क शुरू करने की कोशिश की किन्तु वह बैठी–बैठी केवल वही सोचती रही कि उसने पढ़ा क्या था।
इतनी जोर से उसने पहले कभी नहीं सोचा था। अब वह बच्ची नहीं रह गई थी–किन्तु वह अभी इतनी बड़ी भी नहीं हुई थी। सोफी ने महसूस किया कि उसने खरगोश की आरामदेह फर के अन्दर जाना पहले ही शुरू कर दिया था, बिलकुल वही खरगोश जो विश्व की जादुई टोपी से बाहर निकाला गया था। किन्तु दार्शनिक ने उसे रोक दिया था। उसने–क्या यह कोई स्त्री थी–सोफी की गरदन को पीछे से पकड़ लिया था और उसे ऊपर उठाकर फर के छोर पर लाकर छोड़ दिया था जहाँ वह बच्ची के रूप में खेला करती थी। और वहाँ से एक बार वह फिर दुनिया देख रही थी मानो बिलकुल पहली बार देख रही हो।
इसमें कोई सन्देह नहीं कि दार्शनिक ने उसे बचा लिया था। अज्ञात पत्र लेखक ने उसे दैनिक जीवन की छोटी–छोटी निरर्थक हल्की–फुल्की बातों से बचा दिया था।
जब पाँच बजे मम्मी घर आई, तो सोफी ने उसे खींच कर लिविंग रूम की आरामकुर्सी में धकेल दिया।
‘मम्मी, क्या तुम ऐसा नहीं सोचती कि जीवित होना कितना आश्चर्यजनक है!’ उसने शुरुआत की।
सोफी की बात सुनकर माँ एकदम चौंक गई कि एकाएक उसने कोई उत्तर नहीं दिया। रोज जब वह घर आती थी तो सोफी प्राय: होमवर्क कर रही होती थी।
‘हाँ मुझे भी कभी–कभी ऐसा लगता है।’ माँ ने कहा।
‘कभी–कभी? हाँ, किन्तु क्या तुम यह नहीं सोचती कि दुनिया का इस तरह बने रहना कितना अद्भुत है।’
‘अच्छा, सोफी, इस तरह बोलना बन्द करो।’
‘क्यों? शायद तुम यह सोचती हो कि दुनिया बिलकुल सामान्य है?’
‘क्यों, क्या यह नहीं है?’
सोफी ने महसूस किया कि दार्शनिक सही था। बड़े होने पर लोग यह मान लेते हैं कि दुनिया सदा से ऐसी ही थी और फिर अपने नीरस अस्तित्व के वशीकरण में ऐसे सो जाते हैं जैसे लोरी गाकर सुला दिए गए हों।
‘तुम दुनिया की इतनी आदी हो गई हो कि अब तुम्हें कुछ भी आश्चर्य–चकित नहीं करता।’
‘तुम यह सब क्या बोल रही हो?’
‘मैं कह रही हूँ कि तुम सब चीजों की बेहद आदी हो गई हो।’ दूसरे शब्दों में ‘एकदम मन्द।’
‘तुम्हारा मेरे साथ इस तरह बात करना मुझे पसन्द नहीं।’
‘ठीक है। मैं इसे दूसरी तरह से कहती हूँ। तुमने अपने आपको उस सफेद खरगोश की फर में बहुत गहराई में लाकर रख दिया है, जिसे इस समय भी विश्व की जादुई टोपी से बाहर निकाला जा रहा है। और एक मिनट में तुम आलू उबलने रख दोगी उसके बाद तुम अखबार पढ़ोगी, और फिर आधे घंटे की नींद के बाद तुम टी.वी. पर खबरें देखने लगोगी।’
उसकी माँ के चेहरे पर चिन्ता का भाव उभर आया। वह वाकई रसोई में गई और आलू उबलने रख दिए। कुछ देर बाद वह लिविंग रूम में आ गई और इस बार माँ थी जिसने सोफी को आरामकुर्सी में धकेल दिया।
‘देखो कुछ है जिसके बारे में मुझे तुमसे आवश्यक बात करनी है।’ माँ ने शुरू किया। माँ की आवाज से सोफी समझ गई कि यह कोई गम्भीर मामला था।
‘तुमने कोई नशीली दवा वगैरह तो नहीं ली है, ली है बेटी?’
सोफी का मन हँसने को हुआ किन्तु फिर वह समझ गई कि इस समय यह सवाल क्यों उठाया जा रहा था।
‘तुम्हारा दिमाग फिर गया है क्या?’ सोफी ने कहा। ‘नशीली दवा तो तुम्हें और भी मन्द कर देती है।’
इसके बाद उस शाम नशीली दवाओं या सफेद खरगोशों की कोई चर्चा नहीं हुई।
पौराणिक कथाएँ (मिथक)
अच्छाई और बुराई की शक्तियों के बीच अनिश्चित अस्थिर सन्तुलन…
अगली सुबह सोफी के लिए कोई पत्र नहीं था। खत्म न हो रहे दिन भर वह स्कूल में सारा समय बुरी तरह बोर रही। रीसेस के दौरान उसने जोआना के साथ अच्छी–भली होने की ओर विशेष ध्यान दिया। घर लौटते समय उनकी चर्चा का विषय था कि जंगल में मिट्टी सूख जाने पर वे शीघ्र ही वहाँ जाकर कैम्प लगाकर रहेंगी।
कुछ समय बाद, जो अनन्त काल जैसा लम्बा लग रहा था, वह एक बार फिर मेल–बॉक्स के सामने थी। पहले उसने वह पत्र खोला जिस पर मैक्सिको की डाक–मुहर लगी थी। यह उसके पिताजी ने भेजा था। उन्होंने लिखा था कि उन्हें घर आने की कितनी तीव्र इच्छा हो रही थी, और उन्होंने कैसे अपने चीफ ऑफिसर को शतरंज में पहली बार हराया था। इस सबके अतिरिक्त उन्होंने लगभग उन सारी किताबों को पढ़ डाला था जिन्हें वह अपने साथ शरद अवकाश के बाद जहाज पर ले आए थे।
और फिर, वहाँ था–वह ब्राउन लिफाफा जिस पर उसका नाम लिखा था। अपने स्कूल बैग और बाकी डाक को घर में पटककर, सोफी सीधे अपनी माँद की ओर दौड़ गई। लिफाफे से उसने टाइप किए पन्ने बाहर निकाले और पढ़ना शुरू किया–
संसार का पौराणिक कथा–चित्र
हैलो, सोफी! हमें बहुत–कुछ करना है, इसलिए आओ बिना कोई देर किए शुरू करें।
दर्शनशास्त्र से हमारा अभिप्राय सोचने के उस नितान्त नए तरीके से है जिसका विकास ईसा से छह सौ वर्ष पूर्व यूनान में हुआ। तब तक लोगों ने अपने सभी प्रश्नों के उत्तर अपने विभिन्न धर्मों से प्राप्त किए थे। लोगों को यह धार्मिक स्पष्टीकरण पीढ़ी–दर–पीढ़ी पौराणिक कथाओं के रूप में मिलते रहे थे। एक पौराणिक कथा (मिथक) देवताओं के बारे में ऐसी कहानी होती है जो यह स्पष्ट करने या समझाने का प्रयास करती है कि जीवन के वर्तमान स्वरूप का कारण क्या है।
हजारों वर्षों की अवधि में दार्शनिक प्रश्नों के मिथकीय अथवा पौराणिक कथाओं रूपी स्पष्टीकरणों का सारी दुनिया में प्रचुर मात्रा में प्रसार हुआ। यूनानी दार्शनिकों ने यह सिद्ध करने का प्रयास किया कि इन मिथकीय स्पष्टीकरणों पर विश्वास नहीं किया जा सकता।
यह समझने के लिए कि प्रारम्भिक दार्शनिकों ने विचार करने के किस तरीके को अपनाया यह आवश्यक है कि पहले हम संसार के पौराणिक कथा–चित्र को समझने की चेष्टा करें। उदाहरण के लिए हम कुछ नार्डिक (नॉर्वे, स्वीडन, डेनमार्क, फिनलैंड आदि) पौराणिक कथाएँ ले सकते हैं (उलटे बॉस बरेली को ले जाने की जरूरत नहीं है)।
तुमने शायद थोर और उसके हथौड़े के विषय में सुना होगा। नॉर्वे में ईसाई धर्म के आगमन के पूर्व लोग विश्वास करते थे कि थोर दो बकरियों द्वारा खींचे जानेवाले रथ में बैठकर आकाश में भ्रमण किया करता था। जब वह मारने के लिए अपने हथौड़े को ऊपर उठाता था तो उससे बादलों में गरज होती थी और बिजली कड़कती थी। नॉर्वे की भाषा में थंडर (Thunder)—Thor-don— का अर्थ होता है थोर की दहाड़। स्वीडन की भाषा में थंडर (Thunder), आस्का (aska) मूल रूप आस–अका (as-aka) है जिसका अर्थ आकाश में ‘देवताओं की यात्रा’ है।
जब बादलों की गड़गड़ाहट होती है और बिजली कड़कती है तो वर्षा भी होती है, जो वाइकिंग के किसानों के लिए बहुत आवश्यक थी। इसलिए थोर की पूजा उपजाऊपन के देवता के रूप में होती थी।
अत: वर्षा सम्बन्धी पौराणिक–कथावाला (मिथकीय) स्पष्टीकरण यह था कि थोर अपना हथौड़ा घुमा रहा है। और जब बारिश होती है तो खेतों में दाना अंकुरित होता है और खुशहाली आती है।
खेत में पौधे कैसे उगते हैं और फसल कैसे तैयार होती है–यह नहीं समझा गया था। किन्तु यह स्पष्टत: किसी रूप में वर्षा से जुड़ा था। और चूँकि हर कोई विश्वास करता था कि वर्षा का कुछ लेना–देना थोर से है, अत: थोर नोर्स देवताओं में सबसे महत्त्वपूर्ण बन गया था।
थोर के महत्त्वपूर्ण होने का एक कारण और भी था, वह कारण था कि वह सारी दुनिया की व्यवस्था से जुड़ा था।*
वाइकिंग लोग मानते थे कि आबाद दुनिया एक द्वीप है जिसके लिए बाहरी खतरों की धमकी बराबर बनी रहती है। दुनिया के इस हिस्से को वे मिडगार्ड कहते थे, जिसका अर्थ होता है बीच का राज्य। मिडगार्ड के बीच में था असगार्ड, यानी देवताओं का साम्राज्य।
मिडगार्ड के बाहर उतगार्ड्स का राज्य था, यानी धोखेबाज दैत्यों का साम्राज्य, जो दुनिया को नष्ट करने के लिए हर समय मक्कारी की चालें चलते रहते थे। इस प्रकार के बुराई के राक्षसों को प्राय: ‘अराजकता की शक्तियाँ’ कहकर भी जाना जाता था। न केवल नोर्स पौराणिक कथाओं में अपितु लगभग सभी सभ्यताओं में, लोगों ने पाया कि अच्छाई और बुराई की शक्तियों के बीच एक नाजुक सन्तुलन है।
राक्षसों द्वारा मिडगार्ड का विनाश करने का एक तरीका यह हो सकता था कि वे उर्वरता की देवी फ्रेजा का अपहरण कर लें। यदि उन्होंने ऐसा कर डाला तो खेतों में कुछ भी पैदा नहीं होगा और फिर औरतों के बच्चे भी नहीं होंगे। इसलिए इन राक्षसों पर नियन्त्रण रखना बहुत जरूरी था।
राक्षसों से इस युद्ध में थोर एक महत्त्वपूर्ण पात्र था। थोर का हथौड़ा वर्षा लाने के अलावा और भी बहुत–कुछ कर सकता था; यह अराजकता की खतरनाक ताकतों के खिलाफ लड़ाई में सबसे महत्त्वपूर्ण हथियार था। इससे उसे लगभग असीमित शक्ति मिलती थी। उदाहरण के लिए, थोर इसे राक्षसों पर फेंक सकता था और उन्हें कत्ल कर सकता था। और उसे इसके खो जाने का डर भी नहीं था क्योंकि यह सदा ही वापस उसी के पास आ जाता था, बूम–रेंग की तरह।
यह इस बात का एक मिथकीय स्पष्टीकरण था कि प्रकृति का सन्तुलन कैसे बनाए रखा जाता है और अच्छाई और बुराई के बीच लगातार ही संघर्ष क्यों बना रहता है। और बिलकुल इसी स्पष्टीकरण को दार्शनिकों ने अस्वीकार कर दिया।
किन्तु यह सिर्फ स्पष्टीकरणों का ही प्रश्न नहीं था।
प्लेग या दुर्भिक्ष जैसी महामारी फैलने पर मनुष्य हाथ पर हाथ धरे ठाली बैठे नहीं रह सकते थे और न ही देवताओं के हस्तक्षेप की प्रतीक्षा कर सकते थे। उन्हें बुराई के विरुद्ध संघर्ष में कुछ न कुछ काम तो करना ही पड़ता था। यह उन्होंने किया विभिन्न धार्मिक संस्कार या अनुष्ठान करके यानी कर्मकांड के रूप में।
नोर्स काल में सबसे महत्त्वपूर्ण धार्मिक अनुष्ठान होता था भेंट। एक देवता को भेंट चढ़ाने का परिणाम यह होता था कि आप उस देवता की शक्ति बढ़ा रहे हैं। उदाहरण के लिए, मनुष्यों को देवताओं की शक्ति बढ़ाने के लिए उन्हें भेंट चढ़ानी होती थी ताकि वे अराजकता की ताकतों पर विजय प्राप्त कर सकें। अपने उद्देश्य की पूर्ति वे देवता के लिए एक जानवर की बलि चढ़ाकर कर सकते थे। थोर को प्राय: एक बकरी की भेंट चढ़ाई जाती थी। ओडिन को दी गई भेंटें कभी–कभी नर–बलि का रूप ले लेती थीं।
नोर्डिक देशों की सर्वाधिक ख्यात पौराणिक कथा ‘द ले ऑफ थ्रिम’ नामक ऐडिक कविता है। यह बताती है कि एक बार जब थोर नींद से जागा तो उसने देखा कि उसका हथौड़ा गायब था। यह देखकर वह इतना क्रुद्ध हुआ कि उसकी दाढ़ी हिलने लगी और क्रोध से उसके हाथ काँपने लगे। अपने एक परम भक्त लोकी को साथ लेकर वह फ्रेजा के पास गया और उससे पूछा कि क्या वह अपने पंख लोकी को उधार दे देगी ताकि वह जोतनहैम, यानी राक्षसों के देश में जाकर यह पता लगा सके कि उन लोगों ने थोर का हथौड़ा तो नहीं चुरा लिया है।
जोतनहैम पहुँचकर लोकी राक्षसों थ्रिम के राजा से मिलता है जो निश्चय ही गर्वपूर्वक शेखी बघारता है कि उसने हाथौड़ा जमीन में इक्कीस मील नीचे छिपा दिया है। साथ ही वह यह भी कह देता है कि देवताओं को हथौड़ा तब तक नहीं मिलेगा जब तक वे फ्रेजा को उसकी दुलहन के रूप में नहीं दे देंगे।
क्या तुम इसकी तसवीर बना सकती हो, कल्पना कर सकती हो, सोफी? अचानक अच्छे देवता अपने आपको पूरी तरह बन्धक की स्थिति में पाते हैं। राक्षसों ने देवताओं के सबसे उपयोगी, स्वरक्षा के अस्त्र पर कब्जा कर लिया है। यह स्थिति कतई भी स्वीकार किए जाने योग्य नहीं है। जब तक राक्षसों के पास थोर का हथौड़ा है, तब तक उनके पास देवताओं और मानवों पर पूरा नियन्त्रण है। हथौड़े के बदले में वे फ्रेजा की माँग कर रहे हैं। किन्तु यह भी समान रूप से अस्वीकार्य है। यदि देवताओं को अपनी उर्वरता की देवी राक्षसों को देनी पड़ जाती है–देवी, जो सारे जीवन की रक्षक है–तो खेतों से हरियाली यानी वनस्पति गायब हो जाएगी और सारे देवता तथा प्राणी मर जाएँगे। यह तो एक ऐसे घातक गतिरोध की स्थिति है जिससे बाहर निकलने का रास्ता लगभग नहीं है।
पौराणिक कथा बतलाती है कि लोकी असगार्ड वापस आ जाता है और फ्रेजा से कहता है कि वह शादी का जोड़ा पहन ले क्योंकि उसे (बड़े शोक की बात है) राक्षसों के राजा से शादी करनी है। फ्रेजा को बहुत गुस्सा आता है, और वह कहती है कि यदि वह एक राक्षस से शादी करने के लिए राजी हो जाती है तो लोग कहेंगे कि वह तो बिलकुल पागल हो गई है मर्दों को हासिल करने के लिए।
तब हैमडाल नामक देवता के मन में एक विचार आता है। वह सुझाव देता है कि थोर एक दुलहन जैसी पोशाक पहन ले। सर पर बाल लगाकर और अपनी चोली में दो पत्थर लगा ले ताकि वह बिलकुल स्त्री लगे। जाहिर था, थोर इस विचार के प्रति उत्साहित नहीं हुआ, किन्तु अन्तत: वह इसे स्वीकार कर लेता है, क्योंकि यह ही वह तरीका है जिससे उसका हथौड़ा उसे वापस मिल सकता है।
इस प्रकार थोर दुलहन की पोशाक पहन लेता है और लोकी उसकी सेविका का वेश धारण कर लेती है।
यदि इसे वर्तमान शब्दावली में रखें, तो थोर और लोकी देवताओं का ‘आतंक–विरोधी दस्ता’ है। स्त्रियों के वस्त्रों में रूप बदलकर उनका लक्ष्य राक्षसों के गढ़ में सेंध लगाना है और थोर के हथौड़े को वापस प्राप्त करना है।
जब देवता जोतनहैम में पहुँचते हैं तो राक्षस शादी की दावत तैयार करने में लग जाते हैं। किन्तु दावत के दौरान, दुलहन–(यानी थोर)–पूरा एक बैल और आठ सामन मछलियाँ खा जाती है। वह तीन बैरल बीयर पी जाती है। इससे थ्रिम को आश्चर्य होता है। इन ‘कमांडो’ का सच्चा रूप लगभग पूरी तरह सामने आ जाता है। किन्तु लोकी यह स्पष्ट करके खतरे को टलवा देती है कि फ्रेजा जोतनहम आने की बड़ी उत्सुकता से प्रतीक्षा कर रही थी और इसीलिए उसने पिछले एक सप्ताह में कुछ नहीं खाया।
किन्तु जब थ्रिम चूमने के लिए दुलहन के चेहरे से घूँघट उठाता है तो वह थोर की जलती हुई आँखों को देखकर भौचक्का रह जाता है। एक बार फिर लोकी स्थिति को सँभाल लेती है, वह कहती है कि शादी के प्रति लालायित होने के कारण दुलहन एक हफ्ते से सोई ही नहीं है। इस पर थ्रिम आदेश देता है कि हथौड़े को सीधे वहाँ लाया जाए और विवाह संस्कार के समय दुलहन की गोद में रख दिया जाए।
जब थोर को हथौड़ा मिलता है तो वह अट्टहास कर उठता है। वह पहले तो हथौड़े से थ्रिम को मार डालता है, और फिर सभी राक्षसों और उनके सम्बन्धियों का खात्मा कर देता है और इस तरह इस बीभत्स बन्धक नाटक का सुखद अन्त होता है। थोर–जो देवताओं का बैटमैन या जेम्स बॉण्ड है–एक बार फिर बुराई की शक्तियों पर विजय पा लेता है।
पौराणिक कथा के विषय में इतना ही, सोफी। किन्तु इसके पीछे सच्चा अर्थ क्या है? यह कथाएँ केवल मनोरंजन के लिए नहीं बनाई गई थी। पौराणिक कथा कुछ स्पष्ट भी करना चाहती है। एक सम्भाव्य अर्थ यह हो सकता है :
जब अकाल पड़ता था तो लोग यह जानना चाहते थे कि वर्षा क्यों नहीं हुई। क्या राक्षसों ने थोर का हथौड़ा तो नहीं चुरा लिया था?
शायद ऐसी पौराणिक कथाएँ यह समझने का एक प्रयास थी कि वर्ष में मौसम कैसे बदलते हैं। जाड़ों में प्रकृति मर जाती है क्योंकि थोर का हथौड़ा जोतनहैम में है। किन्तु बसन्त ऋतु में वह इसे वापस पा जाने में सफल हो जाता है। इस प्रकार यह पौराणिक कथा लोगों को मौसम परिवर्तन के बारे में कुछ स्पष्टीकरण देने का प्रयास करती थी जिसे वे समझ नहीं पा रहे थे।
किन्तु मिथक साधारण स्पष्टीकरण नहीं थे। लोग मिथकों से जुड़े धार्मिक संस्कार भी सम्पन्न करते रहते थे। हम कल्पना कर सकते हैं कि अकाल पड़ने या फसल सूख जाने की हालत में लोगों की प्रतिक्रिया क्या होती होगी; वे पौराणिक कथाओं में वर्जित घटनाओं के इर्द–गिर्द कुछ नाटक बुन लेते थे। शायद गाँव का एक आदमी एक दुलहन जैसी पोशाक पहन लेता था–स्तनों के स्थान पर पत्थर लगा लेता था–ताकि राक्षसों से हथौड़ा वापस जीता जा सके। ऐसा करके, लोग बारिश लाने के लिए कुछ उद्यम कर रहे थे ताकि उनके खेतों में फसलें पैदा हो सकें।
दुनिया के दूसरे हिस्सों से ऐसे और भी अनेक उदाहरण हैं जो बतलाते हैं कि लोगों ने मौसमों से जुड़ी पौराणिक कथाओं को कैसा नाटकीय रूप दे दिया ताकि प्रकृति की प्रक्रियाओं की गति तेज की जा सके।**
अभी तक हमने नोर्स पौराणिक कथाओं की दुनिया की एक संक्षिप्त झलक देखी है। किन्तु थोर और ओडिन, फ्रेयर और फ्रेजा, होडर और बाल्डर और कई अन्य देवताओं सम्बन्धी अनगिनत पौराणिक कथाएँ हैं। इस प्रकार के पौराणिक कथा सम्बन्धी विचार सारी दुनिया में फले–फूले, किन्तु बाद में दार्शनिकों ने आकर उनकी तोड़फोड़ करनी शुरू कर दी।
पौराणिक कथाओं की दुनिया की एक तसवीर उस समय यूनान में भी विद्यमान थी जब पहली बार वहाँ दर्शनशास्त्र विकसित हो रहा था। यूनानी देवताओं की कहानियाँ कई सदियों से पीढ़ी–दर–पीढ़ी लोगों तक पहुँचती रही थी। मैं यदि थोड़े से ही यूनानी देवताओं के नाम लूँ तो उनमें जियस और अपोलो, हेरा और ऐथेने, डायोनीसस और ऐस्लेपियस, हिरेक्लीज और हैफेस्टोस के नाम प्रमुख कहे जा सकते हैं।
ईसा से 700 वर्ष पूर्व, यूनान की अधिकांश पौराणिक कथाएँ होमर और हीशियड द्वारा लिखी जा चुकी थीं। इससे एक बिलकुल नई स्थिति पैदा हो गई। अब चूँकि पौराणिक कथाएँ लिखित रूप में उपलब्ध थीं, उन पर चर्चा करना सम्भव था।
प्रारम्भिक यूनानी दार्शनिकों ने होमर की पौराणिक कथाओं की आलोचना इसलिए की क्योंकि इनमें देवता नश्वर प्राणियों से बहुत मिलते–जुलते थे और वे उन्हीं की तरह अहंकारी और धोखेबाज थे। इसलिए पहली बार यह आलोचना की गई कि पौराणिक कथाएँ महज़ मानवीय विचार ही तो हैं।
इस दृष्टिकोण का प्रणेता दार्शनिक ज़ेनोफेन्स था, जो ईसा से 570 वर्ष पूर्व हुआ था। उसने कहा, मनुष्यों ने देवताओं को अपनी ही छवि के अनुरूप बनाया है। उसका मानना था कि देवता पैदा होते हैं, उनके शरीर होते हैं और हमारी तरह ही सम्प्रेषण के लिए भाषा और पहनने के लिए कपड़े भी होते हैं। इथियोपियावासियों का मानना था कि देवता काले होते हैं और उनकी नाक चपटी होती है। थ्रेशियावासी की कल्पना अनुसार देवताओं की आँखें नीली होती हैं और उनके बाल बढ़िया होते हैं। यदि बैल, घोड़े और शेर चित्र बना सकते तो वे देवताओं को बैलों, घोड़ों और शेरों की तरह ही चित्रित करते।
इसी काल में यूनानियों ने कई शहर–राज्यों की स्थापना यूनान और यूनानी उपनिवेशों दक्षिण इटली तथा एशिया माइनर में की, जहाँ शारीरिक परिश्रम दास करते थे, तथा नागरिक अपना सारा समय संस्कृति और राजनीति में लगाने के लिए स्वतन्त्र थे।
ऐसे शहरी वातावरणों में लोग पूरी तरह से बिलकुल नए तरीके से सोचने लगे? मात्र अपने लिए ही सही, कोई भी नागरिक यह प्रश्न उठा सकता था कि समाज का संगठन किस प्रकार किया जाए। इस तरह बिना प्राचीन पौराणिक कथाओं का आश्रय लिये नागरिक दार्शनिक प्रश्न पूछ सकते थे।
हम इस विकास क्रम को पौराणिक कथाओं के माध्यम से मिथकीय सोचने के तरीके को त्यागकर अनुभव और तर्क पर आधारित चिन्तन के तरीके को अपनाने की प्रवृति कह सकते हैं। प्रारम्भिक यूनानी दार्शनिकों का मुख्य लक्ष्य प्राकृतिक प्रक्रियाओं की प्राकृतिक, न कि अलौकिक, व्याख्याएँ ढूँढ़ना था।
सोफी अपनी माँद से बाहर आई और बाग में इधर–उधर टहलती रही। उसने स्कूल में मिली सीख, विशेषत: कक्षा में सीखा विज्ञान, भूल जाने की कोशिश की।
यदि वह इस बाग में प्रकृति के विषय में कुछ भी जाने बिना, बड़ी हुई होती तो बसन्त ऋतु का अनुभव उसके लिए कैसा होता?
किसी दिन अचानक बारिश क्यों होने लगती है? क्या वह इस विषय में किसी प्रकार के स्पष्टीकरण को ढूँढ़ने का कोई प्रयास करती? क्या वह कोई फन्तासी बुनती कि पहाड़ों की बर्फ कहाँ चली गई और सूरज सबेरे क्यों उगा?
हाँ, वह निश्चय ही फन्तासी बनाएगी। उसने एक कहानी गढ़ना शुरू कर दिया।
जाड़े ने सारी जमीन को अपनी बर्फीली पकड़ में इसलिए ले लिया क्योंकि शैतान मुरियत ने सुन्दर राजकुमारी सिकिता को ठंडे कारागार में बन्दी बनाकर डाल दिया है। किन्तु एक दिन सबेरे बहादुर राजकुमार ब्रेवेटो आया और उसने उसे छुड़ा लिया। मुक्त होने पर सिकिता इतनी प्रसन्न हुई कि वह घास के मैदानों में नाचने लगी और वह गाना गाने लगी जो उसने नम कारागार में बनाया था। पृथ्वी और पेड़ उससे इतने अभिभूत हुए कि सारी बर्फ आँसुओं में बदल गई। किन्तु तभी सूरज आया और उसने सारे आँसू पोंछ डाले। चिड़ियों ने सिकिता के गाने की नकल की, और जब सुन्दर राजकुमारी ने अपने सुनहरे बालों के लच्छे खोले तो उनमें से कुछ लच्छे जमीन पर गिर पड़े और वे पृथ्वी पर खेतों में लिली के फूल बन गए।
सोफी को अपनी सुन्दर कहानी पसन्द आई। यदि बदलते मौसमों का कोई अन्य स्पष्टीकरण उसे मालूम न होता, तो निश्चय ही अन्त में वह अपनी ही कहानी में विश्वास कर लेती।
उसने समझ लिया कि लोगों ने हमेशा ही प्रकृति की प्रक्रियाओं को स्पष्ट करने की आवश्यकता का अनुभव किया है। लगता था कि वे शायद ऐसे स्पष्टीकरणों के बिना रह नहीं सकते थे। और यह कि हमारे पूर्वजों ने विज्ञान नाम की प्रयोगात्मक चिन्तन–विधि के अस्तित्व से पहले ही ऐसी अनेक पौराणिक कथाएँ बना डालीं थी।
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* भारतीय पौराणिक कथाओं के सन्दर्भ में देवराज इन्द्र का चरित्र और महत्त्व सम्भवतया थोर के समानान्तर ही है। सुर (देव)–असुर संग्राम भी अच्छाई–बुराई के संघर्ष ही कहे जा सकते हैं।
** भारतीय पौराणिक कथाओं की यूनानी पौराणिक कथाओं से तुलना करने पर स्पष्ट होता है कि पुरातन काल में मानव–प्रकृति, मानव–समाज तथा मानव–मानव के पारस्परिक सम्बन्धों पर चिन्तन मिथकीय था और सम्भवतया अन्य संस्कृतियों में भी मिथकीय चिन्तन का वर्चस्व था। मिथकीय चिन्तन मानवीय चिन्तन की प्रारम्भिक चेष्टाओं में से एक है।

प्राकृतिक दार्शनिक
शून्य से केवल शून्य ही प्रकट हो सकता है…
जब दोपहर बाद माँ काम से घर लौटी तो सोफी ग्लाइडर में बैठी विचार कर रही थी कि दर्शनशास्त्र के कोर्स तथा हिल्डे मोलर नैग, जिसे अपने पिता से जन्मदिन शुभ कामना सन्देश प्राप्त नहीं होगा, के बीच सम्भावित सम्बन्ध क्या हो सकता है।
माँ ने बाग के दूसरे छोर से पुकारा, ‘सोफी! तुम्हारे लिए एक पत्र है।’
यह सुनकर उसकी साँस ऐसी रुकी कि रुकी ही रह गई। वह तो पहले ही मेल–बॉक्स खाली कर चुकी थी, इसलिए यह पत्र दार्शनिक का ही होना चाहिए। हाय, अब वह अपनी माँ को क्या कहेगी!
‘इस पर कोई मुहर नहीं लगी है। यह सम्भवत: एक प्रेम–पत्र है।’
सोफी ने पत्र ले लिया।
‘तुम इसे खोल नहीं रही हो?’
उसे कोई बहाना ढूँढ़ना था।
‘क्या कभी तुमने किसी ऐसी लड़की के बारे में सुना है जो तब प्रेम–पत्र खोल रही हो जब उसकी माँ उसे कनखियों से देख रही हो?’
चलिए, माँ को सोचने देते हैं कि यह एक प्रेम–पत्र था। हालाँकि यह बहुत ही असमंजस भरा था, किन्तु यह और भी ज्यादा खराब होता कि उसकी माँ को पता चल जाता कि वह एक नितान्त अजनबी के साथ एक पत्राचार कोर्स कर रही है, एक ऐसे दार्शनिक के साथ जो उसके साथ आँख–मिचौनी खेल रहा था।
यह छोटे सफेद लिफाफों में से एक था। जब सोफी ऊपर अपने कमरे में पहुँची तो उसके लिए तीन नए प्रश्न थे :
क्या कोई ऐसा सार–तत्व है जिससे सब चीजें बनी हैं?
क्या पानी मदिरा में बदल सकता है?
मिट्टी और पानी जीवित मेढक कैसे पैदा कर सकते हैं?
सोफी को ये सवाल यूँ तो काफी बेवकूफाना लगे, किन्तु फिर भी वे सारी शाम उसके दिमाग में भिनभिनाते रहे। अगले दिन वह स्कूल में पूरे दिन भर यही सोचती रही, एक–एक को लेकर बारी–बारी से।
क्या कोई ‘सार–तत्त्व’ है जिससे सब चीजें बनी हैं? यदि कोई ऐसा सार–तत्त्व है, तो वह अचानक बदल कर कैसे एक फूल या एक हाथी बन जाता है?
वही आपत्ति दूसरे प्रश्न पर भी लागू होती थी कि क्या पानी मदिरा में बदल सकता है। सोफी को वह नीति कथा मालूम थी कि किस प्रकार यीशु ने पानी को मदिरा में बदल दिया था, किन्तु उसने इसे कभी भी गम्भीरता से नहीं लिया था। और यदि यीशु ने वास्तव में पानी को मदिरा में बदल दिया था तो यह एक चमत्कार के रूप में किया गया था, जो सामान्यतया नहीं किया जाता। सोफी जानती थी कि न केवल मदिरा में, अपितु बहुत सारी दूसरी बढ़नेवाली चीजों में भी बहुत–सा पानी होता है। किन्तु यदि एक खीरे में 95: पानी होता है तो इसमें इसके अतिरिक्त कोई दूसरी चीज और भी है क्योंकि खीरा खीरा होता है, सिर्फ पानी नहीं।
और फिर इसके अलावा मेढक वाला प्रश्न भी तो था। उसके दर्शनशास्त्र के अध्यापक ने मेढकों के बारे में वास्तव में यह अनोखा प्रश्न उठाया था।
सोफी सम्भवत: यह तो स्वीकार कर सकती थी कि एक मेढक में मिट्टी और पानी होता है, ऐसी हालत में मिट्टी में एक से अधिक (सार) तत्त्व होने चाहिए। यदि मिट्टी में अनेक भिन्न प्रकार के तत्त्व होते हैं तो स्पष्टत: यह सम्भव था कि मिट्टी और पानी मिलकर एक मेढक पैदा कर सकते हैं। यानी कि मिट्टी और पानी मेढक के अंडे और टैडपोल के रास्ते से होकर गुजरते हैं। क्योंकि एक मेढक पत्तागोभी की क्यारी से पैदा नहीं हो सकता, भले ही आप इसमें कितना भी पानी डालें।
उस दिन सोफी जब स्कूल से घर लौटी तो मेल–बॉक्स में एक भारी लिफाफा उसका इन्तजार कर रहा था। सोफी उसे लेकर अपनी माँद में जा छुपी, जैसे उसने पिछले दिनों किया था।
दार्शनिकों की जिज्ञासा (प्रोजेक्ट)
हम फिर वहीं आ गए। हम सफेद खरगोश या ऐसी ही चीजों के चक्कर में न पड़ते हुए सीधे अपने पाठ पर आते हैं।
मैं संक्षेप में प्राचीन यूनानियों के समय से अभी तक लोगों ने दर्शनशास्त्र के विषय में जो भी सोचा है कि एक मोटी–मोटी रूपरेखा रखूँगा किन्तु हम इन विचारों को उनके व्यवस्थित रूप में बारी–बारी से लेंगे।
चूँकि यह दार्शनिक हम से बिलकुल ही भिन्न युग में रहते थे–और सम्भवत: उनकी संस्कृति भी हमारी संस्कृति से पूरी तरह भिन्न थी–अच्छा यह होगा कि हम प्रत्येक दार्शनिक का प्रोजेक्ट देखें यानी उसकी जिज्ञासा को पहचानने तथा समझने का प्रयास करें। इससे मेरा अर्थ है कि हमें यह देखने का प्रयास करना चाहिए कि एक विशिष्ट दार्शनिक खासतौर पर क्या जानना चाहता था उसकी विशिष्ट जिज्ञासा क्या थी? एक दार्शनिक यह जानना चाह सकता है कि पौधे और जानवर कैसे अस्तित्व में आए। दूसरा शायद यह जानना चाहे कि ईश्वर है कि नहीं या यह कि क्या मनुष्य में कोई अमर आत्मा होती है?
एक बार यह सुनिश्चित कर लेने पर कि किसी एक विशेष दार्शनिक की जिज्ञासा क्या है, उसकी विचारधारा का अनुगमन करना आसान होगा, क्योंकि यह आवश्यक नहीं है कि कोई भी एक दार्शनिक दर्शनशास्त्र की समग्रता से अपना सरोकार बनाए।
दार्शनिक को सन्दर्भित करते हुए, मैंने कहा उसकी (पुरुष की) विचारधारा क्योंकि यह मनुष्यों की कहानी भी है। अतीत में पुरुषों ने स्त्रियों को दोनों ही रूपों में, यानी स्त्री रूप में, और एक चिन्तनशील प्राणी के रूप में भी, अपने अधीनस्थ रखा था/है, यह एक दुख की बात है क्योंकि इसके परिणामस्वरूप मानवीय सभ्यता के अत्यन्त महत्त्वपूर्ण अनुभव का बहुत बड़ा भाग खो या लुप्त हो गया है। वर्तमान (बीसवीं) शताब्दी के आगमन के पहले स्त्रियों को दर्शन के इतिहास में अपने लिए स्थान बनाने के अवसर से वंचित रखा गया।
मेरा इरादा तुम्हें कोई होम–वर्क देने का नहीं है–न तो गणित के कठिन प्रश्न, और न ही कोई ऐसी अन्य चीज! और अंग्रेजी भाषा की क्रियाओं का मिलान करना मेरी रुचि के क्षेत्र के बाहर है। हाँ, मैं तुम्हें समय–समय पर करने के लिए कुछ थोड़ा काम देता रहूँगा। यदि तुम इन शर्तों को स्वीकार करो, तो हम शुरू करेंगे।
प्राकृतिक दार्शनिक
आदिकालीन यूनानी दार्शनिकों को कभी–कभी प्राकृतिक दार्शनिक कहा जाता है क्योंकि वे मुख्यत: प्राकृतिक जगत और इसकी प्रक्रियाओं से सरोकार रखते थे।
हम पहले ही यह पूछ चुके हैं कि कोई भी वस्तु कहाँ से आई। आजकल बहुत से लोग यह सोचते हैं कि किसी एक समय कोई चीज शून्य से बाहर निकलकर आई। यह विचार यूनानियों के बीच इतना प्रचलित नहीं था। किसी न किसी कारणवश वे यह मानकर चलते थे कि ‘कुछ ऐसा’ है जो सदैव से ही अस्तित्ववान है।
इसलिए, शून्य से कोई चीज कैसे प्रकट हो सकती है, यह उनके लिए सबसे महत्त्वपूर्ण प्रश्न नहीं था। इसके विपरीत, दूसरी ओर, वे यह देखकर चकित थे कि पानी में जीवित मछली कैसे पैदा हो जाती है, और मृत जमीन से बड़े–बड़े पेड़ और चमकीले रंग के फूल कैसे पैदा होते हैं। इसका जिक्र किया जाना तो ज़रूरी ही नहीं कि यह कैसा अचम्भा है कि एक शिशु अपनी माँ के गर्भ में उपस्थित और पैदा हो जाता है।
दार्शनिकों ने स्वयं अपनी आँखों से देखा कि प्रकृति निरन्तर ही एक रूपान्तरण की अवस्था में रहती है। किन्तु यह रूपान्तरण होता कैसे है?
उदाहरण के लिए, एक चीज कैसे किसी सार–तत्व से बदलकर एक सजीव प्राणी बन जाती है?
सभी प्रारम्भिक दार्शनिकों का लगभग एक जैसा विश्वास था कि सारे परिवर्तन के मूल में एक विशिष्ट मौलिक सार–तत्व होना चाहिए। यह कहना कठिन है कि वे ऐसे विचार तक कैसे पहुँचे? हमें केवल इतना मालूम है कि इस विचार का क्रमश: विकास हुआ कि कोई एक ऐसा आधारभूत सार–तत्व होना चाहिए जो प्रकृति में हो रहे सभी परिवर्तनों के पीछे प्रच्छन्न कारण के रूप में बना रहता है। ऐसी ‘कोई चीज’ होनी चाहिए जिससे सब चीजें नि:सृत होती हैं और वापस उसी में लौट जाती हैं।
हमारे लिए, रोचक विषय वास्तव में यह नहीं है कि प्रारम्भिक दार्शनिक किन समाधानों तक पहुँचे, अपितु यह कि उन्होंने कौन से प्रश्न किए और वे किस प्रकार के उत्तर तलाश रहे थे। हमारी रुचि वास्तव में इसमें ज्यादा है कि वे किस ढंग से सोचते थे बजाय इसके कि वे क्या सोचते थे।
हमें मालूम है कि उन्होंने भौतिक जगत में जिन रूपान्तरणों को होते हुए देखा उन्होंने उन्हीं से सम्बन्धित प्रश्न उठाए। वे प्रकृति में अन्तर्निहित नियमों की तलाश कर रहे थे। वे बिना पौराणिक कथाओं की ओर लौटे वह सब कुछ समझ लेना चाहते थे जो उनके चारों ओर घटित हो रहा था। और सबसे महत्त्वपूर्ण, वे स्वयं प्रकृति का अध्ययन करके इसकी वास्तविक प्रक्रियाओं को समझना चाहते थे। यह लक्ष्य देवताओं की कहानियाँ कहकर बादलों की गरज और बिजली के कौंधने, शिशिर और वसन्त ऋतु को मिथकीय प्रतीकों की सहायता या माध्यम से समझने या स्पष्ट करने के कार्य से बिलकुल भिन्न था।
इस प्रकार धीरे–धीरे दर्शन ने स्वयं को धर्म से जुड़े मिथकीय कल्पनात्मक बिम्बों से मुक्त कर लिया। हम यह कह सकते हैं कि प्राकृतिक दार्शनिकों ने वैज्ञानिक तर्क की दिशा में प्रारम्भिक कदम उठाए और इस प्रकार वे उस अध्ययन के अग्रदूत बन गए जो बाद में विज्ञान बनने जा रहा था।
प्राकृतिक दार्शनिकों ने क्या सोचा और क्या लिखा, हमारे पास इसके कुछ टुकड़े ही बचे हैं। जो भी थोड़ा–सा हम जानते हैं वह अरस्तू के लेखों में पाया जाता है; अरस्तू का जीवन–काल इन दार्शनिकों से दो शताब्दी बाद का है। वह केवल उन निष्कर्षों की ओर संकेत करता है जिन तक यह दार्शनिक पहुँचे थे। किन्तु जो हम अब जानते हैं वह हमें यह स्थापित करने में सक्षम बनाता है कि सबसे प्रारम्भिक यूनानी दार्शनिकों की जिज्ञासा (प्रोजेक्ट) आधारभूत विधायी सार–तत्त्व और प्रकृति में परिवर्तन सम्बन्धी प्रश्नों से सम्बन्धित थी।
मिलेटस के तीन दार्शनिक
जिस प्रथम दार्शनिक की जानकारी हमें मिलती है उसका नाम थेल्स है, वह एशिया माइनर के एक यूनानी उपनिवेश, मिलेटस का रहनेवाला था। उसने मिस्र समेत कई देशों की यात्रा की थी; कहा जाता है कि मिस्र में उसने पिरामिड की ऊँचाई की गणना की। इसके लिए उसने पिरामिड की छाया को उस समय (क्षण) नापा जब उसकी छाया पिरामिड की अपनी लम्बाई के बराबर थी। उसने 585 वर्ष ईसा पूर्व एक सूर्य ग्रहण की, सही गणना के आधार पर, सत्य भविष्यवाणी की थी।
थेल्स का विचार था कि हर चीज का स्रोत पानी है। हमें स्पष्ट तो मालूम नहीं कि ऐसा कहने से उसका अभिप्राय क्या था; हो सकता है उसका विश्वास हो कि सभी प्रकार के जीवन का उद्गम जल से है–और यह कि समाप्त होने पर जीवन और अस्तित्व पानी की ओर लौट जाता है।
मिस्र में अपनी यात्रा के दौरान उसने निश्चय ही अवलोकन किया होगा कि नील नदी के डेल्टा में, बाढ़ के पानी के उतरते ही फसलें उगना शुरू कर देती हैं। शायद उसने यह भी देखा होगा कि जहाँ भी बारिश होती रहती है वहाँ मेढक और कीड़े–मकोड़े निकल आते हैं।
यह भी सम्भव है थेल्स ने विचार किया हो कि पानी कैसे बर्फ या भाप बन जाता है–और फिर वापस पानी बन जाता है।
यह सम्भावना भी व्यक्त की गई है कि थेल्स कहता था–‘सब चीजों में देवता समाए हुए हैं।’ हम केवल अनुमान ही लगा सकते हैं कि ऐसा कहने से उसका अभिप्राय क्या था। शायद, यह देखकर कि कैसे फूलों, फसलों से लेकर कीड़ों और कॉक्रोचों तक हर चीज का स्रोत काली मिट्टी है, उसने कल्पना की हो कि सारी मिट्टी (पृथ्वी) अत्यन्त सूक्ष्म, अदृश्य ‘जैव–कीटाणुओं’ से भरी हुई है। यह निश्चित है कि देवताओं के बारे में अपनी धारणा प्रस्तुत करते हुए थेल्स होमर के देवताओं की बात न करके कुछ अलग कह रहा था।
अगला दार्शनिक जो सुनने में आता है, ऐनाक्सीमान्दर था, जो मिलेटस का निवासी था और उसका जीवनकाल भी लगभग थेल्स का समय ही था। उसका विचार था कि हमारी दुनिया उन अनन्त दुनियाओं में से एक है जिनका विकास होता है और जो किसी असीम कहलाने वाली सत्ता में तिरोहित हो जाती हैं। यह समझा पाना आसान नहीं है कि उसका असीम से क्या अभिप्राय था, किन्तु यह साफ है कि वह किसी ज्ञात सार–तत्त्व की बात उस तरह नहीं सोच रहा था जिसकी परिकल्पना थेल्स ने की थी। शायद उसका मतलब था कि सब चीजों का स्रोत होनेवाला सार–तत्त्व कोई ऐसी चीज होगी जो उसकी निर्मित चीजों से भिन्न और असीम है। क्योंकि सभी निर्मित वस्तुएँ सीमित हैं, अत: उनके पहले और उनके बाद आनेवाली चीज ‘असीम’ होनी चाहिए। उसके लिए यह साफ था कि यह बुनियादी सामग्री पानी जैसी कोई साधारण चीज नहीं हो सकती।
मिलेटस का तीसरा दार्शनिक ऐनाक्सीमेनीज (570–526 ई.पू.) था। उसका विचार था कि सब चीजों का स्रोत ‘हवा’ या ‘भाप’ होना चाहिए। ऐनाक्सीमेनीज थेल्स के पानी के सिद्धान्त की अच्छी जानकारी रखता था। किन्तु पानी कहाँ से आता है? ऐनाक्सीमेनीज का विचार था कि पानी गाढ़ी की हुई हवा है। हम देखते हैं कि जब वर्षा होती है, तो पानी हवा के दाब से निकलता है। उसके विचारानुसार जब पानी को और भी दबाया जाता है तो यह धरती या मिट्टी हो जाता है, हो सकता है उसने देखा हो कि किस प्रकार पिघलती हुई बर्फ के साथ मिट्टी और रेत दबकर निकलते हैं। उसका यह भी विचार था कि अग्नि परिशुद्ध हवा थी। ऐनाक्सीमेनीज के अनुसार, इसलिए धरती, पानी और अग्नि का उद्गम हवा थी।
पानी और धरती के फलों के बीच की दूरी सम्भवतया अधिक नहीं है। शायद ऐनाक्सीमेनीज सोचता था कि धरती, हवा और अग्नि, यह सब चीजें जीवन के निर्माण के लिए आवश्यक थीं, किन्तु सभी चीजों का स्रोत हवा अथवा भाप ही थी। अत: थेल्स के समान ही, वह भी सोचता था कि सभी प्राकृतिक परिवर्तनों के पीछे, स्रोतस्वरूप, एक अन्तर्निहित सार–तत्व था।
शून्य से शून्य ही प्रकट हो सकता है
मिलेटस के यह तीनों ही दार्शनिक सब चीजों के स्रोत के रूप में केवल एक आधारभूत सार–तत्व के अस्तित्व में विश्वास रखते थे। किन्तु कोई सार–तत्व अचानक ही कैसे बदल सकता था? हम इसे परिवर्तन की समस्या कह सकते हैं।
ईसा से लगभग 500 वर्ष पूर्व, दक्षिणी इटली में ईलिया नामक यूनानी उपनिवेश में दार्शनिकों का एक समूह था। यह ‘ईलियावासी’ उपर्युक्त प्रश्न में रुचि रखते थे।
इनमें सबसे महत्त्वपूर्ण दार्शनिक परमेनीडीज (540–480 ई.पू.) था। परमेनीडीज सोचता था कि हर अस्तित्ववान चीज सदा से ही अस्तित्व में रही है। यूनानियों के लिए यह विचार अजनबी नहीं था। वे कमोबेश यह मानकर चलते थे कि दुनिया की प्रत्येक अस्तित्ववान वस्तु सदैव ही बनी रही है। शून्य से कुछ भी निकलकर नहीं आ सकता, परमेनीडीज का यह विचार था। और जो अस्तित्ववान है वह कभी शून्य नहीं हो/बन सकता।
परमेनीडीज इस विचार को और आगे लेकर चला। वह सोचता था ऐसी कोई चीज नहीं है जो वास्तव में बदलती हो। ऐसी कोई चीज नहीं है जो (अपने स्वरूप/स्वभाव से) बदलकर दूसरी बन जाए।
परमेनीडीज ने अवश्य ही यह अनुभव किया होगा कि प्रकृति निरन्तर परिवर्तन की अवस्था में बनी रहती है। उसने अपनी ज्ञानेन्द्रियों से प्रत्यक्ष देखा कि चीजें बदलती रहती हैं। किन्तु वह इसे उसके समकक्ष नहीं रख पाया जो उसका तर्क उसे बतलाता था। जब उसके सामने अपनी ज्ञानेन्द्रियों या अपने तर्क के बीच किसी एक का चयन करने की विवशता प्रस्तुत हुई तो उसने तर्क का वरण किया।
तुम यह कथित वाक्य तो जानती हो ‘मैं इस पर तभी विश्वास करूँगा जब मैं इसे देख लूँगा।’ किन्तु परमेनीडीज ने चीजों को देखकर भी उन पर विश्वास नहीं किया। वह मानता था कि अनेक अवसरों पर हमारी ज्ञानेन्द्रियाँ हमारे सम्मुख दुनिया की गलत तसवीर पेश करती हैं, एक ऐसी तसवीर जो हमारे तर्क से मेल नहीं खाती। उसने माना कि दार्शनिक के नाते उसका मुख्य कार्य अनुभूत भ्रम के सभी ढकोसलों की कलई खोलना है।
मानव तर्क में इस अडिग आस्था को तर्कवाद (रेश्नलिज्म) कहते हैं। एक तर्कवादी ऐसा व्यक्ति है जो यह मानता है कि दुनिया में हमारे ज्ञान का मूल स्रोत मानवीय तर्क है।
सभी चीजें बहती हैं
परमेनीडीज का एक समकालीन हिरेक्लिटस (540–480 ई.पू.) था; वह एशिया माइनर में इफीसस का रहनेवाला था। उसका विचार था कि निरन्तर परिवर्तन या बहाव, वास्तव में प्रकृति का सबसे आधारभूत लक्षण था। हम शायद यह कह सकते हैं कि अनुभूत सत्य में हिरेक्लिटस की आस्था परमेनीडीज से कहीं अधिक थी।
‘हर चीज बहती है,’ हिरेक्लिटस कहता था। हर चीज निरन्तर परिवर्तनशील और गतिशील है, सदा (एक–सी) बनी रहनेवाली कोई चीज नहीं है। अत: हम ‘उसी नदी में दूसरी बार पैर नहीं रख सकते।’ जब मैं दूसरी बार नदी में पैर रखता हूँ तो न तो मैं और न ही नदी पहले जैसी होती है।
हिरेक्लिटस के अनुसार विपरीतताएँ दुनिया के लक्षण हैं। यदि हम कभी बुरे नहीं होते तो हमें यह कभी ज्ञात नहीं होगा कि अच्छा होना क्या होता है। यदि हमने कभी भूख नहीं जानी तो हम तृप्ति में आनन्द नहीं ले पाते। यदि कभी युद्ध न हो, तो हम शान्ति की महत्ता नहीं जान पाएँगे। और यदि कभी शिशिर ऋतु नहीं होती है, तो बसन्त ऋतु भी कभी नहीं देख पाते।
दुनिया की व्यवस्था में, अच्छाई और बुराई दोनों का ही अवश्यम्भावी स्थान है, ऐसा हिरेक्लिटस का विश्वास था। विपरीतताओं की इस निरन्तर अन्तर्क्रिया, अन्तर्खेल के बिना दुनिया अस्तित्ववान् नहीं रह सकती।
‘ईश्वर दिन और रात है, जाड़ा और गरमी है, युद्ध और शान्ति है, भूख और तृप्ति है,’ वह कहता था। यद्यपि उसने ‘ईश्वर’ शब्द का प्रयोग किया यह किन्तु साफ था कि वह पौराणिक कथाओं के देवताओं की बात नहीं कर रहा था। हिरेक्लिटस के लिए, ईश्वर–या देवता–कोई ऐसी शक्ति थी जिसने सारी दुनिया को अपने अन्दर समाहित किया हुआ था। प्रकृति के निरन्तर रूपान्तरणों और अन्तरों में ईश्वर को बिलकुल स्पष्ट देखा जा सकता था।
‘ईश्वर’ शब्द प्रयोग करने के बजाय हिरेक्लिटस प्राय: यूनानी शब्द ‘लोगोस’ का प्रयोग करता था, जिसका अर्थ तर्क होता है। यद्यपि हम मनुष्य सदैव एक–सा नहीं सोचते या समान मात्रा में तर्क नहीं करते, लेकिन हिरेक्लिटस का मानना था कि एक ‘विश्वव्यापी या सर्वव्यापक तर्क’ जैसा कुछ होना चाहिए जो प्रकृति में होनेवाली हर चीज को दिशा–निर्देश दे रहा है।
यह ‘विश्वव्यापी तर्क’ या सर्वव्यापक कानून कुछ ऐसा है जो हम सब में समान रूप में है और यह क्षमता ही सबका दिशा–निर्देश करती है। किन्तु फिर भी हिरेक्लिटस को लगता था कि अधिकांश लोग अपने निजी तर्क के अनुसार जीते रहते हैं, कुल मिलाकर वह अपने साथी मनुष्यों का तिरस्कार करता था। वह कहा करता था, ‘अधिकांश लोगों की राय शिशुओं के खिलौनों जैसी हैं।’
अत: सारी प्रकृति के निरन्तर परिवर्तनों और विपरीतताओं के बीच हिरेक्लिटस एक सत्ता अथवा एकता देखता था। इस ‘कुछ वस्तु/सत्ता’ को, जो हर वस्तु/स्थिति का स्रोत थी, वह उसे ईश्वर अथवा लोगोस कहता था।
चार मूल तत्त्व
एक तरह से, परमेनीडीज और हिरेक्लिटस एक–दूसरे के सीधे–सीधे विलोम थे। परमेनीडीज के तर्क ने यह स्पष्ट कर दिया कि कोई चीज बदल नहीं सकती। हिरेक्लिटस के इन्द्रिय–जनित ज्ञान ने भी इतना तो स्पष्ट कर दिया कि प्रकृति निरन्तर परिवर्तन की अवस्था में बनी रहती है। इनमें से सही कौन था? क्या हम तर्क से शासित हों या हमें अपनी ज्ञानेन्द्रियों पर निर्भर होना चाहिए?
परमेनीडीज और हिरेक्लिटस दोनों ही दो बातें कहते हैं।
परमेनीडीज कहता है :
(अ) कोई चीज बदल नहीं सकती, और
(ब) हमारा इन्द्रियजनित अनुभव, इसलिए भरोसे के लायक नहीं है।
हिरेक्लिटस दूसरी ओर कहता है :
(अ) प्रत्येक चीज बदलती है (सब चीजें बहाव में हैं) और
(ब) हमारे इन्द्रियजनित अनुभव निर्भर करने योग्य हैं।
दार्शनिकों में आपस में इससे अधिक असहमति नहीं हो सकती। किन्तु सही कौन था? सिसली के एम्पीडोक्लीज (490–430 ई.पू.) ने यह तय करने की जिम्मेदारी अपने ऊपर ली कि जिस उलझन में हम आ पड़े हैं, उससे बाहर निकलने का रास्ता दिखलाए।
उसका विचार था कि परमेनीडीज़ और हिरेक्लिटस दोनों ही अपने एक–एक दावे पर जोर देने में सही थे, किन्तु दूसरे में गलत।
एम्पीडोक्लीज के अनुसार उनकी आधाभूत असहमति का कारण यह था कि दोनों ही दार्शनिकों ने केवल एक तत्त्व की उपस्थिति को ही माना था। यदि यह बात सही होती तो इन दो के बीच की दूरी (यानी तर्क क्या आदेश देता है और ‘हम अपनी आँखों से क्या देखते हैं’) पाटी नहीं जा सकती।
पानी स्पष्टत: बदलकर एक मछली या तितली नहीं बन सकता। वास्तव में पानी बदल ही नहीं सकता। शुद्ध पानी शुद्ध पानी ही बना रहेगा। अत: परमेनीडीज यह मानने में सही था कि ‘कुछ भी नहीं बदलता।’
किन्तु इसके साथ ही एम्पीडोक्लीज हिरेक्लिटस से इस विचार पर सहमत था कि हमें अपनी इन्द्रियों से प्राप्त प्रमाण पर विश्वास करना चाहिए। जो हम देखते हैं हमें उस पर विश्वास करना चाहिए और जो हम देख रहे हैं वह यही तो है कि प्रकृति बदलती रहती है।
एम्पीडोक्लीज ने निष्कर्ष निकाला कि मात्र एक आधारभूत सार–तत्त्व के विचार को अस्वीकार करना अनिवार्य था। अकेले न तो पानी और न हवा बदलकर झाड़ी का गुलाब या तितली बन सकते हैं। प्रकृति का स्रोत सम्भवत: अकेला एक ‘तत्त्व’ नहीं हो सकता।
एम्पीडोक्लीज का मानना था कि कुल मिलाकर प्रकृति चार तत्त्वों या ‘जड़ों’ से बनी है, जैसा वह उन्हें परिभाषित करता था। यह चार जड़ें थीं : पृथ्वी, हवा, अग्नि और पानी।
सारी प्राकृतिक क्रियाएँ इन चार तत्त्वों के एक साथ मिल जाने या अलग हो जाने के कारण होती थीं। क्योंकि सब चीजें पृथ्वी, हवा, अग्नि और पानी के मिश्रण से ही तो बनी थीं। हाँ, उनका अनुपात भिन्न–भिन्न होता है। वह कहता था जब एक फूल या एक जानवर मरता है तो चारों तत्त्व फिर अलग–अलग हो जाते हैं। किन्तु हम इन परिवर्तनों को अपनी खुली आँखों से नोट कर सकते हैं। किन्तु पृथ्वी (मिट्टी) और पानी, अग्नि और पानी बराबर बने रहते हैं, यह उन यौगिकों से ‘अछूते’ रहते हैं जिनका यह भाग होते हैं। इसलिए यह कहना सही नहीं है कि ‘हर चीज’ बदलती है। मूल रूप से, कुछ भी नहीं बदलता। होता यह है कि चारों तत्त्व मिलते हैं और अलग हो जाते हैं–केवल कभी फिर से दुबारा मिलने के लिए।
हम इसकी तुलना एक पेंटिंग से कर सकते हैं। यदि पेंटर के पास एक ही रंग है–उदाहरण के लिए, लाल–तो वह हर पेड़ पेंट नहीं कर सकता। किन्तु यदि उसके पास पीला, लाल, नीला और काला रंग है तो वह सैकड़ों अलग–अलग रंगों की पेंटिंग बना सकता है, क्योंकि वह इन रंगों को कम या अधिक मात्रा एवं अनुपात में मिला सकता है।
रसोई से एक उदाहरण भी इसी चीज को स्पष्ट करता है। यदि मेरे पास केवल आटा है और मुझे बनाना है केकय तो केवल आटे से केक बनाने के लिए मुझे जादूगरी आनी आवश्यक है। किन्तु यदि मेरे पास अंडे, आटा, दूध और चीनी हैं, तब मैं कितने ही प्रकार के अलग–अलग केक बना सकता हूँ।
यह कोई केवल आकस्मिक बात नहीं थी कि एम्पीडोक्लीज ने पृथ्वी, हवा, अग्नि और पानी को प्रकृति की ‘जड़ों’ की तरह चुना। उससे पहले के कई दार्शनिकों ने यह दिखलाने का प्रयास किया था कि आदि सार–तत्व पानी, हवा या अग्नि में से ही कोई एक होना चाहिए। थेल्स और ऐनाक्सीमेनीज ने यह इशारा किया था कि पानी और हवा दोनों ही भौतिक जगत के आवश्यक तत्त्व थे। यूनानी मानते थे कि अग्नि भी अत्यावश्यक है। उन्होंने उदाहरण के लिए सब जीवित प्राणियों के लिए सूर्य के महत्त्व को पहचाना था और वे यह भी जानते थे कि जानवर और मनुष्य दोनों ही के शरीर में ऊष्मा होती है।
एम्पीडोक्लीज ने लकड़ी के एक टुकड़े को जलते हुए देखा होगा। कोई चीज विखंडित होती है। हम इसे चटखते और छितराते देखते हैं। यह ‘पानी’ है। कोई चीज धुआँ बनकर ऊपर जाती है। यह ‘हवा’ है। ‘अग्नि’ को तो हम देख सकते हैं। आग के बुझ जाने के बाद भी कोई चीज शेष रह जाती है। यह राख है–या ‘पृथ्वी’।
एम्पीडोक्लीज द्वारा प्रकृति के रूपान्तरणों का ‘जड़ों’ के मेल–मिश्रण और विच्छेदन के रूप में सफाई देने के बाद भी कुछ शेष था जिसका स्पष्टीकरण किया जाना आवश्यक था। यह तत्त्व किस प्रक्रिया से मिलते हैं ताकि नए जीवन का प्रादुर्भाव हो सके? और उदाहरण के लिए, फूल का ‘मिश्रण’ फिर किस कारण विखंडित हो जाता है?
एम्पीडोक्लीज ने माना कि प्रकृति में दो भिन्न शक्तियाँ कार्यरत हैं। वह उन्हें प्रेम और संघर्ष कहता है। प्रेम चीजों को जोड़कर इकट्ठा करता है और संघर्ष उन्हें अलग–अलग कर देता है।
वह ‘सार–तत्व’ और ‘शक्ति’ के बीच भेद करता है। यह ध्यान देने योग्य है। आज भी वैज्ञानिक तत्त्वों और प्राकृतिक शक्तियों के बीच विभेद करते हैं। आधुनिक विज्ञान यह मानता है कि सारी प्राकृतिक प्रक्रियाओं को विभिन्न तत्त्वों और अनेक प्राकृतिक शक्तियों के बीच अन्तर्क्रिया के रूप में स्पष्ट किया जा सकता है।
एम्पीडोक्लीज ने यह प्रश्न भी उठाया कि जब हम किसी चीज का ज्ञानानुभव करते हैं तो क्या होता है। मैं फूल को कैसे ‘देख’ सकता हूँ, उदाहरण के लिए–वह क्या है जो होता है? क्या तुमने कभी इस विषय में सोचा है, सोफी?
एम्पीडोक्लीज का मानना था कि प्रकृति में अन्य चीजों के समान ही, आँखें भी पृथ्वी, हवा, अग्नि और पानी की बनी होती हैं। अत: मेरी आँख में ‘पृथ्वी,’ मेरे चारों ओर वातावरण में समाहित पृथ्वी को महसूस करती है, ‘हवा’ उसे महसूस करती है जो हवा का बना है, ‘अग्नि’ उसे महसूस करती है जो (मेरे वातावरण में) अग्नि का बना है, और ‘पानी’ उसे महसूस करता है जो पानी का बना है। यदि मेरी आँखों में इन चार सार–पदार्थों में से किसी एक की भी कमी होती तो मैं सारी प्रकृति नहीं देख सकता था।
हर चीज में हर चीज का कुछ
एनेक्सागोरस (500–428 ई.पू.) एक अन्य दार्शनिक था जो इस बात से सहमत नहीं था कि किसी विशेष मूल सार–तत्व को–(उदाहरणार्थ, पानी)–हम हर उस चीज में रूपान्तरित कर सकते हैं जिसे हम प्राकृतिक जगत में देखते हैं। न ही वह यह स्वीकार करता था कि पृथ्वी, हवा, अग्नि और पानी को रक्त और हड्डी में रूपान्तरित किया जा सकता है।
एनेक्सागोरस मानता था कि प्रकृति समूर्त सूक्ष्म कणों की अनन्त संख्या से बनी है, जो आँखों के लिए अदृश्य हैं। इसके अतिरिक्त हर पदार्थ को और भी सूक्ष्म भागों में विभक्त किया जा सकता है, किन्तु छोटे–से–छोटे भागों में भी दूसरी सारी चीजों के कण होते हैं। वह सोचता था कि यदि त्वचा और हड्डी किसी अन्य चीज का रूपान्तरण नहीं है तो जो दूध हम पीते हैं और जो खाना हम खाते हैं उनमें भी आवश्यक रूप से त्वचा और हड्डी होनी चाहिए।
वर्तमान समय के कुछ उदाहरण एनेक्सागोरस की चिन्तनधारा को सचित्र प्रस्तुत कर सकते हैं। आधुनिक लेसर टेक्नोलॉजी तथाकथित होलोग्राम पैदा कर सकती है। यदि इनमें से एक होलोग्राम, उदाहरण के लिए, एक कार चित्रित करता है और होलोग्राम के टुकड़े हो जाते हैं, तब भी हम पूरी कार का चित्र ही देखेंगे, भले ही हमारे पास होलोग्राम का केवल वह भाग हो जो बम्पर दिखलाता है। ऐसा इसलिए है कि सम्पूर्ण विषय इसके छोटे–से–छोटे भाग में विद्यमान है।
एक अर्थ में, हमारे शरीर भी इसी प्रकार बने होते हैं। यदि मैं अपनी उँगली से त्वचा की एक कोशिका को ढीला करता हूँ, तो केन्द्रक में न केवल मेरी त्वचा के लक्षण होंगे, अपितु वही कोशिका यह भी दर्शाएगी कि मेरी आँखें किस प्रकार की हैं, मेरे बालों का रंग कैसा है, मेरी उँगलियाँ कितनी और किस प्रकार की हैं आदि–आदि। मानव शरीर की हर कोशिका में उस तरीके का मानचित्र (ब्लूप्रिंट) है जिस तरह अन्य कोशिकाएँ बनाई गई हैं। अत: प्रत्येक कोशिका में ‘हर चीज का कुछ अंश’ है। सम्पूर्ण हर सूक्ष्म अंश में विद्यमान है।
इन अतीव छोटे कणों को, जिनमें हर चीज की कुछ चीज होती है, एनेक्सागोरस बीज कहता है।
याद रखना, एम्पीडोक्लीज सोचता था कि यह ‘प्रेम’ है जो सम्पूर्ण शरीरों में तत्त्वों को जोड़े रखता है। एनेक्सागोरस ने एक ऐसी शक्ति के रूप में ‘व्यवस्था’ की कल्पना की, जो सभी मानवों और जानवरों, फूलों और पेड़ों की रचना करती है। उसने इस शक्ति को मनस या बुद्धि (Nous) कहा।
एनेक्सागोरस इसलिए भी दिलचस्प है कि वह पहला दार्शनिक है जिसके बारे में हम एथेंस में कुछ सुनते हैं। वह एशिया माइनर का रहनेवाला था किन्तु चालीस वर्ष की आयु में वह एथेंस आ गया था। बाद में उस पर नास्तिक होने का दोषारोपण किया गया और उसे शहर छोड़ देने के लिए विवश किया गया। अन्य बातों के साथ–साथ उसने यह भी कहा था कि सूर्य एक देवता नहीं बल्कि लाल–तपता हुआ पत्थर है और वह सारे पेलोपोनेसियन प्रायद्वीप से बड़ा है।
एनेक्सागोरस खगोल विज्ञान में विशेष रुचि रखता था। उसका विश्वास था कि सारे आकाशीय ग्रह उसी सार–तत्व के बने थे जिससे पृथ्वी बनी है। एक गिरी हुई उल्का के पत्थर का अध्ययन करके वह इस निष्कर्ष पर पहुँचा था। इसी तथ्य से उसे यह विचार भी प्राप्त हुआ कि सम्भवतया अन्य ग्रहों पर भी मानव जीवन हो सकता है। उसने यह भी दावा किया था कि चन्द्रमा का अपना कोई प्रकाश नहीं है–इसका प्रकाश पृथ्वी से आता है। उसने सूर्य ग्रहण के स्पष्टीकरण के विषय में भी अपने विचार बनाए थे।
पुनश्च : सोफी, तुमने जितने ध्यान से यह सब पढ़ा है, उसके लिए धन्यवाद! इस अध्याय को तुम अच्छी तरह समझ लो, इसके लिए तुम्हें इसे दो या तीन बार पढ़ना पड़ सकता है। कुछ भी समझने के लिए तो हमेशा ही कुछ मेहनत की आवश्यकता होती है। हर विषय में दक्ष अपने मित्र की तुम सम्भवत: कभी प्रशंसा नहीं करती यदि उसे ऐसा होने के लिए कोई मेहनत नहीं करनी पड़ती।
मूल सार–तत्व और प्रकृति में रूपान्तरणों के प्रश्न के श्रेष्ठ समाधान के लिए तुम्हें कल तक प्रतीक्षा करनी पड़ेगी, जब तुम डिमॉक्रिटस से मिलोगी। अभी मैं इससे अधिक कुछ नहीं कहूँगा।
सोफी अपनी माँद में बैठी–बैठी घनी हरियाली के छोटे छेद से बाग में देख रही थी। यह सब पढ़ लेने के बाद उसे अपने विचारों को, एक–एक को अलग करके व्यवस्थित करने का प्रयास करना था।
ये तो दिन की रोशनी की तरह साफ था कि सादा पानी बर्फ या भाप के अलावा कभी किसी दूसरी चीज में नहीं बदल सकता था। पानी तो बदलकर तरबूज भी नहीं बन सकता क्योंकि तरबूजों में भी पानी के अलावा और दूसरी चीजें होती हैं। किन्तु यहाँ तक तो वह चीजों के विषय में आश्वस्त थी, क्योंकि यह उसने पढ़ लिया था, सीख लिया था। यदि उसने पढ़ा और सीखा न होता तो क्या वह उदाहरण के लिए इस विषय में आश्वस्त हो सकती थी कि बर्फ केवल पानी है। कम–से–कम उसे इसका तो बहुत बारीकी से अध्ययन करना पड़ा ही था कि कैसे पानी जमकर बर्फ बनता है और फिर पिघल जाता है।
सोफी ने एक बार फिर अपनी सामान्य सूझबूझ का प्रयोग करने का प्रयास किया और उस बारे में उसने नहीं सोचा जो उसने दूसरों से जाना था।
परमेनीडीज ने किसी भी रूप में परिवर्तन के विचार को स्वीकार करने से मना कर दिया था। और जितना भी अधिक उसने इसके विषय में सोचा, उतना ही वह आश्वस्त हुई कि एक अर्थ में, वह सही था। उसकी बुद्धि यह स्वीकार नहीं कर सकती थी कि ‘कोई चीज’ अचानक अपने आपको ‘किसी दूसरी पूरी तरह भिन्न चीज’ में रूपान्तरित कर सकती थी। उसे बाहर आने और यह कहने के लिए अच्छी मात्रा में हिम्मत भी जुटानी पड़ी होगी, क्योंकि इसका अर्थ था उन सब प्राकृतिक परिवर्तनों को मना कर देना जिन्हें लोग स्वयं देख सकते थे। दुनिया भर के लोग उस पर हँसे होंगे।
और एम्पीडोक्लीज भी खूब, चतुर होना चाहिए, जब उसने यह सिद्ध किया कि दुनिया एक से अधिक सार–तत्वों से बनी है। इसने किसी चीज को वास्तव में बदले बिना ही प्रकृति के सारे रूपान्तरणों को सम्भव बना दिया।
इस प्राचीन यूनानी दार्शनिक ने यह केवल तर्क के द्वारा ही ढूँढ़ निकाला था। निश्चय ही उसने प्रकृति का अध्ययन किया था, किन्तु उसके पास रासायनिक विश्लेषण के वे सब उपकरण नहीं थे जिनका उपयोग/इस्तेमाल आज के वैज्ञानिक करते हैं।
सोफी इस विषय में निश्चित नहीं थी कि वह वास्तव में यह विश्वास कर सकती है कि हर चीज का स्रोत–पृथ्वी, हवा, अग्नि और पानी है। किन्तु अन्ततोगत्वा, इसका महत्त्व क्या था? सिद्धान्त रूप से एम्पीडोक्लीज सही था। हम अपनी आँखों से–और बिना तर्क को छोड़े–जिन रूपान्तरणों का घटित होना देखते हैं उन्हें स्वीकार करने का एकमात्र तरीका एक से अधिक आधारभूत सार–तत्वों के अस्तित्व को स्वीकार करना है।
सोफी ने पाया कि दर्शनशास्त्र उसके लिए दुगना प्रोत्साहक और आनन्ददायी था क्योंकि वह अपनी साधारण सूझबूझ के प्रयोग से ही सभी विचार समझ सकती थी–उसे वे सब चीजें याद करने की जरूरत नहीं थी जो उसने स्कूल में सीखी थी। वह इस निष्कर्ष पर पहुँची कि दर्शनशास्त्र एक ऐसा विषय नहीं है जिसे आप सीख सकते हैं; किन्तु शायद आप दार्शनिक ढंग से सोचना सीख सकते हैं।
डिमॉक्रिटस
दुनिया का सबसे कुशल खिलौना…
सोफी ने अज्ञात दार्शनिक से प्राप्त सारे टाइप किए हुए पन्ने अपने बिस्किटवाले डिब्बे में वापस रख दिए और उसका ढक्कन बन्द कर दिया। वह रेंगती हुई अपनी माँद से बाहर आई और थोड़ी देर खड़ी रह कर बाग में दूर दूसरे छोर तक देखा। उसने थोड़ी देर इस पर विचार किया कि कल क्या हुआ था। उसकी माँ ने सबेरे नाश्ता लेते समय फिर ‘प्रेम–पत्र’ की बात कहकर उसे चिढ़ाया था। वह जल्दी से चलकर मेल–बॉक्स तक पहुँची ताकि उस दुर्घटना से बच सके जो उसके साथ कल हुई थी। यदि दो दिन बराबर प्रेम–पत्र प्राप्त होते रहे तो असमंजस दुगुना हो जाएगा।
मेल–बॉक्स में एक और छोटा सफेद लिफाफा था। इन पत्रों के पहुँचाए जाने में सोफी ने एक क्रम और देखना शुरू कर दिया : हर दिन तीसरे पहर उसे एक बड़ा ब्राउन लिफाफा मिलता था। जब वह इसमें लिखी सामग्री को पढ़ती होती, तो दार्शनिक दबे पाँव मेल–बॉक्स तक आता और एक नया छोटा सफेद लिफाफा उसमें डाल देता।
तो अब सोफी यह पता लगा सकेगी कि वह कौन था यदि यह एक पुरुष था। वह अपने कमरे से मेल–बॉक्स पर अच्छी तरह से नजर रख सकती थी। यदि वह खिड़की पर खड़ी रहे तो वह इस रहस्यमय दार्शनिक को देख लेगी। सफेद लिफाफे भी कहीं हवा में ऐसे ही नहीं प्रकट हो जाते।
सोफी ने तय किया कि अगले दिन वह पूरी सावधानी से निगरानी रखेगी। अगला दिन शुक्रवार था और इसके बाद सप्ताहान्त का पूरा समय उसके पास था।
वह अपने कमरे में गई और उसने लिफाफा खोला। आज केवल एक ही प्रश्न था, किन्तु यह पिछले तीन प्रश्नों की तुलना में अधिक अवाक् कर देनेवाला था।
‘लेगो’ (Lego) दुनिया में सबसे कुशल खिलौना क्यों है?
शुरुआत में तो सोफी यही स्वीकार नहीं कर रही थी कि ‘लेगो’ एक कुशल खिलौना है। यह वर्षों पहले की बात है जब वह प्लास्टिक के छोटे ब्लॉक्स से खेला करती थी। इसके अतिरिक्त, उसके लिए यह कल्पनातीत था कि लेगो का दर्शनशास्त्र से कोई लेना–देना हो सकता है।
किन्तु वह एक कर्तव्यनिष्ठ विद्यार्थी थी। अच्छी तरह खोजते हुए उसने अपनी अलमारी के सबसे ऊपर के खाने में वह थैला ढूँढ़ निकाला जिसमें अलग–अलग शक्लों और आकारों के लेगो भरे पड़े थे।
उसने वर्षों बाद फिर से पहली बार उन्हें खेल–खेल में बनाना शुरू कर दिया। जैसे ही उसने बनाना शुरू किया, उसके दिमाग में ब्लॉक्स के बारे में कुछ विचार उभरने लगे।
इन्हें इकट्ठा करके जोड़ना आसान है। उसने सोचा। हालाँकि वे सब भिन्न हैं, वे सब आपस में फिट हो जाते हैं। वे तोड़े भी नहीं जा सकते। वह किसी टूटे हुए लेगो को देखने को याद नहीं कर सकी। कई वर्षों पहले खरीदे, यह ब्लॉक्स आज भी उतने ही नए और चमकीले दिखते थे जितने वे खरीदने के समय थे। लेगो के साथ सबसे बढ़िया बात यह थी कि वह उनसे कोई भी चीज बना सकती थी। और फिर वह उन ब्लॉक्स को अलग–अलग कर सकती थी, और फिर से कोई और नई चीज बना सकती थी।
एक खिलौने से इससे अधिक और क्या आशा की जा सकती है? सोफी ने महसूस किया कि लेगो वास्तव में दुनिया का सबसे कुशल खिलौना कहा जा सकता है। किन्तु इसका दर्शनशास्त्र से क्या लेना–देना था, यह अभी भी उसकी समझ से बाहर था।
उसने एक बड़ा गुड़िया–घर बनाने का काम लगभग पूरा कर लिया था। भले ही यह मान लेना उसे बेहद नापसन्द हो, उसे ऐसा आनन्द युगों–युगों से कभी नहीं आया था।
लोग बड़े होकर खेल खेलना क्यों छोड़ देते हैं?
जब उसकी माँ घर पहुँची और उसने सोफी को यह सब करते देखा तो वह तत्काल बोलीं, ‘क्या मज़ा है। मुझे यह देखकर बड़ी खुशी हुई कि तुम अभी इतनी बड़ी नहीं हुई कि खेलना छोड़ दो।’
‘मैं खेल नहीं रही हूँ,’ सोफी ने गुस्से में भर कर पलटवार किया। ‘मैं एक बेहद पेचीदा दार्शनिक प्रयोग कर रही हूँ।’
उसकी माँ ने एक गहरी साँस ली। सम्भवत: वह सफेद खरगोश और जादुई टोपी के बारे में सोच रही थी।
अगले दिन जब सोफी स्कूल से घर आई तो एक बड़े ब्राउन लिफाफे में उसके लिए कई और पन्ने थे। वह उन्हें अपने कमरे में ऊपर ले गई। उन्हें पढ़ने के लिए वह प्रतीक्षा नहीं कर सकती थी, किन्तु साथ ही साथ उसे अपने मेल–बॉक्स पर भी नजर टिकाए रखनी थी।
अणु सिद्धान्त
लो मैं फिर आ गया सोफी। आज तुम्हें महान प्राकृतिक दार्शनिकों में से आखिरी दार्शनिक के बारे में कुछ बतलाऊँगा। उसका नाम डिमॉक्रिटस (460–370) था। और वह उत्तरी एजियन के समुद्र तट के पास के एक छोटे से कस्बे एबडेरा का रहनेवाला था।
यदि तुम्हें लेगो ब्लॉक्स से सम्बन्धित प्रश्न का उत्तर बिना किसी कठिनाई के आता है तो तुमको इस दार्शनिक के जिज्ञासा को समझने में कोई कठिनाई नहीं होगी।
डिमॉक्रिटस अपने पूर्ववर्ती विचारकों से सहमत था कि प्रकृति में रूपान्तरण इस कारण होते हैं कि कोई चीज वास्तव में ‘बदली है।’ इसलिए उसने यह परिकल्पना की कि हर चीज बहुत सूक्ष्म, अदृश्य ब्लॉक्स से बनी है और इनमें से प्रत्येक शाश्वत है और अपरिवर्तनशील है। डिमॉक्रिटस इन में सबसे छोटी इकाइयों को अणु कहता था।
‘a-tom’ (एटम, अणु) शब्द का अर्थ है, ‘un-cuttable’ अविभाज्य, यानी काटा न जा सकनेवाला। डिमॉक्रिटस के लिए सबसे महत्त्वपूर्ण यह स्थापित करना था कि हर चीज के विधायी अंग (भाग), जिनसे यह बनी है, ऐसे हैं कि उन्हें अनन्त रूप से विभक्त करते हुए उनसे और छोटे भाग नहीं बनाये जा सकते। यदि यह सम्भव है, तब उन्हें ब्लॉक्स की भाँति प्रयोग नहीं किया जा सकता। यदि अणुओं को निरन्तर तोड़ते हुए और भी छोटे और छोटे भागों में बदला जा सकता है तो प्रकृति घुलते–घुलते निरन्तर पतले हो रहे सूप जैसी हो जाएगी।
इसके अतिरिक्त, प्रकृति के ब्लॉक्स शाश्वत होने चाहिए–क्योंकि शून्य से शून्य के अतिरिक्त और कुछ नहीं प्रकट हो सकता। इस विषय में वह परमेनीडीज और ईलियावासियों से सहमत था। साथ ही, वह यह विश्वास भी करता था कि सारे अणु मजबूत और ठोस हैं। किन्तु वे सब एक जैसे नहीं हो सकते। यदि सारे अणु एक जैसे होते तो इस बात का कोई सन्तोषप्रद स्पष्टीकरण नहीं मिल सकता था कि वे कैसे इकट्ठे होकर मिलते हैं और पॉपीज तथा जैतून के पेड़ों से लेकर बकरी की खाल और मानवीय बाल तक भी बनाते हैं।
डिमॉक्रिटस का मानना था कि प्रकृति अणुओं की असीमता और विविधता से बनी हुई है। उनमें कुछ गोल और चिकने थे, अन्य ऊबड़–खाबड़ और विषम थे। और उनके इस प्रकार एक–दूसरे से भिन्न होने के कारण ही वे आपस में मिलकर विभिन्न प्रकार की चीजें एवं रूपाकार बनाते थे। किन्तु संख्या और रूप में वे कितने ही असीम क्यों न हों, वे सब शाश्वत, अपरिवर्तनशील और अविभाज्य है।
जब एक देह, उदाहरण के लिए एक जानवर या एक पेड़, मर जाती है और विखंडित हो जाती है तो अणु अलग–अलग हो जाते हैं और उनका उपयोग नई देह बनाने के लिए किया जा सकता है। अणु (रिक्त) स्थान में घूमते रहते हैं, किन्तु उनमें ‘हुक’ और ‘काँटे’ होने के कारण वे आपस में मिलकर एक होकर उन सब चीजों को बनाते हैं जिन्हें हम अपने चारों ओर देखते हैं।
अब तुमने देख लिया होगा कि मेरा लेगो ब्लॉक्स से क्या अभिप्राय था। उनमें लगभग वे सारे गुण–लक्षण हैं जिन्हें डिमॉक्रिटस अणुओं में देखता था। और इसी कारण उनसे चीजें बनाने में मजा आता है। सर्वप्रथम तो वे अविभाज्य हैं। फिर उनकी शक्लें और कद अलग–अलग हैं। वे ठोस और अविभेद्य हैं। उनमें ‘हुक’ और ‘काँटे’ होते हैं ताकि उन्हें जोड़ा जा सके और उनसे हर सम्भव चीज बनाई जा सके। इन जोड़ों को बाद में तोड़ा भी जा सकता है ताकि फिर उन्हीं ब्लॉक्स से नई आकृतियाँ बनाई जा सकें।
लेगो की लोकप्रियता का मुख्य कारण यह है कि इन्हें बार–बार प्रयोग किया जा सकता है। कोई भी एक लेगो ब्लॉक आज एक ट्रक का भाग, और कल एक महल का भाग हो सकता है। हम यह भी कह सकते हैं कि लेगो ब्लॉक्स ‘शाश्वत’ हैं। बच्चे आज उन्हीं ब्लॉक्स से खेल सकते हैं जिनसे कल उनके माता–पिता अपनी छोटी उम्र में खेलते थे।
हम चीजें मिट्टी से भी बना सकते हैं किन्तु मिट्टी को बार–बार प्रयोग नहीं किया जा सकता, क्योंकि इसे तोड़कर इसके छोटे–छोटे टुकड़े बनाए जा सकते हैं। इन छोटे–छोटे टुकड़ों को कोई दूसरी चीज बनाने के लिए फिर कभी जोड़ा नहीं जा सकता।
आज हम यह सिद्ध कर सकते हैं कि डिमॉक्रिटस का अणु सिद्धान्त मोटा–मोटी ठीक था। प्रकृति वास्तव में विभिन्न ‘अणुओं’ से बनी है जो मिलकर एक हो जाते हैं और फिर अलग हो जाते हैं। सम्भवतया मेरी नाक के एक किनारे पर कोशिका में एक उद्जन अणु एक समय एक हाथी की सूँड़ का भाग था। मेरे हृदय की मांसपेशी में एक कार्बन अणु किसी समय शायद एक दिनासौर की पूँछ में था।
किन्तु हमारे समय में वैज्ञानिकों ने यह खोज निकाला है कि अणुओं को तोड़ा जा सकता है और इस प्रकार उन्हें और भी छोटे ‘तात्त्विक कणों’ का रूप दिया जा सकता है। इन तात्त्विक कणों को हम प्रोटोन, न्यूट्रोन और इलेक्ट्रोन कहते हैं। शायद किसी दिन इन्हें तोड़कर और भी छोटे कण बनाए जा सकें। किन्तु भौतिकशास्त्री इस बारे में सहमत हैं कि इस श्रृंखला की अन्तत: कहीं न कहीं कोई एक सीमा होगी। एक ‘न्यूनातिन्यून भाग’ होना चाहिए जिससे प्रकृति बनी है।
डिमॉक्रिटस के समय आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक उपकरण उपलब्ध नहीं थे। उसका सबसे उचित उपकरण उसका अपना दिमाग था। किन्तु तर्क ने उसके पास कोई वास्तविक विकल्प नहीं छोड़ा। यदि एक बार यह स्वीकार कर लिया जाए कि कोई चीज बदल नहीं सकती कि शून्य से शून्य के अतिरिक्त कोई चीज प्रकट नहीं हो सकती कि कभी कोई चीज खोती नहीं है, तब प्रकृति उन अतीव छोटे ब्लॉक्स की बनी होनी चाहिए, जो जुड़ते रहते हैं और फिर अलग हो जाते हैं।
डिमॉक्रिटस का किसी ‘ऐसी शक्ति’ अथवा ‘आत्मा’ में विश्वास नहीं था, जो प्राकृतिक प्रक्रियाओं में किसी तरह का हस्तक्षेप कर सकती थी। उसका विश्वास था कि अस्तित्ववान केवल अणु और शून्यता अथवा खालीपन हैं। चूँकि उसका विश्वास भौतिक वस्तुओं के अतिरिक्त और किसी चीज में नहीं था, हम उसे भौतिकतावादी कहते हैं।
डिमॉक्रिटस के अनुसार, अणुओं की गतिशीलता में कोई सचेतन ‘डिजाइन’ (योजना) नहीं है। प्रकृति में, हर चीज बिलकुल यन्त्रवत् होती रहती है। इसका यह अर्थ नहीं है कि हर चीज बेतरतीब या अनियमित ढंग से होती रहती है, क्योंकि हर चीज अवश्यम्भावी रूप से आवश्यकता के नियम का पालन करती है। हर चीज, जो होती है उसका कोई प्राकृतिक कारण होता है, एक ऐसा कारण जो स्वयं उस चीज में निहित है। डिमॉक्रिटस ने एक बार कहा था कि वह फारस का राजा बनने के बजाय प्रकृति का कोई नया कारण खोजना पसन्द करेगा।
डिमॉक्रिटस का सोचना था कि अणु सिद्धान्त हमारे इन्द्रियजन्य बोध को भी स्पष्ट करता है। हमें जब भी कोई ऐन्द्रिक अनुभव होता है तो ऐसा स्थान में घूमते अणुओं के कारण होता है। जब मैं चाँद देखता हूँ तो ऐसा इसलिए होता है कि ‘चाँद अणु’ मेरी आँख में आ जाते हैं।
किन्तु फिर ‘आत्मा’ के बारे में क्या कहा जा सकता है? निश्चय ही वह भौतिक अणुओं की नहीं बनी है। वास्तव में यह कुछ ऐसी हो सकती थी। डिमॉक्रिटस का विश्वास था कि आत्मा विशिष्ट गोल, चिकने ‘आत्म अणुओं’ की बनी थी। जब एक मनुष्य की मृत्यु होती है, आत्म अणु विभिन्न दिशाओं में उड़ जाते हैं और फिर से एक नए आत्मा निर्माण का भाग बन सकते हैं।
इसका अर्थ यह हुआ कि मनुष्यों की आत्मा अमर नहीं है, यह एक अन्य विश्वास है जिसे आज बहुत से लोग मानते हैं। यह लोग भी डिमॉक्रिटस की तरह यह मानते हैं कि ‘आत्मा’ मस्तिष्क से जुड़ी हुई है, और यह कि एक बार मस्तिष्क का विघटन होने पर हमारे अन्दर किसी प्रकार की चेतना नहीं रहती।
फिलहाल के लिए डिमॉक्रिटस का अणु सिद्धान्त यूनानी प्राकृतिक दार्शनिकों के अन्त का चिह्न है। हिरेक्लिटस की तरह उसका भी यह विश्वास था कि प्रकृति में हर चीज ‘बहती जा रही है’, क्योंकि रूप–आकार आते और जाते रहते हैं। किन्तु हर बहनेवाली चीज के पीछे कुछ शाश्वत एवं अपरिवर्तनशील चीजें थीं, जो बहती नहीं हैं। डिमॉक्रिटस उन्हें अणु कहता था।
पढ़ने के दौरान सोफी ने कई बार खिड़की के बाहर यह देखने के लिए निगाह डाली कि रहस्यमय पत्राचार–संचालक मेल–बॉक्स में कुछ डालने के लिए तो नहीं आया है। अब वह सड़क पर टकटकी लगाए बैठी हुई थी, और जो पढ़ा था उस पर विचार कर रही थी।
उसने महसूस किया कि डिमॉक्रिटस के विचार कितने सरल, किन्तु फिर भी कितने बढ़िया थे। उसने ‘मूल सार–तत्व’ और ‘रूपान्तरण’ की समस्या का वास्तविक समाधान खोज लिया था। यह समस्या इतनी पेचीदा थी कि दार्शनिकों की कई पीढ़ियाँ इस समस्या के इर्द–गिर्द उलझन से भरी हुई घूमती रही थीं। और अन्त में डिमॉक्रिटस ने इसे अपने आप केवल अपनी साधारण सूझबूझ का सहारा लेकर हल कर डाला था।
सोफी मुस्कुराए बिना न रह पाई। यह बात सच होनी ही चाहिए कि प्रकृति कुछ ऐसे छोटे–छोटे अत्यन्त सूक्ष्म अविभाज्य कणों की बनी हुई है जो कभी नहीं बदलते। किन्तु इसके साथ ही साथ यह भी साफ था कि हिरेक्लिटस यह सोचने में सही था कि प्रकृति में सब रूप–आकार ‘बहते रहते हैं’, क्योंकि हर चीज नष्ट होती है, जानवर मरते हैं, यहाँ तक कि पर्वतों की श्रेणियाँ भी धीरे–धीरे क्षरित होती रहती हैं। खास बात या बिन्दु यह था कि पर्वत श्रेणियाँ बहुत छोटे, अविभाज्य अंशों की बनी होती हैं, जो कभी और खंडित नहीं होते।
इसके साथ ही साथ डिमॉक्रिटस ने कुछ प्रश्न भी उठाए थे। उदाहरण के लिए, उसने कहा था कि हर चीज यन्त्रवत् घटित हो रही है। एम्पीडोक्लीज और एनेक्सागोरस के विपरीत, उसने यह स्वीकार नहीं किया कि जीवन में कोई आध्यात्मिक शक्ति होती है। डिमॉक्रिटस का यह भी विश्वास था कि मनुष्य की आत्मा अमर नहीं होती।
क्या सोफी इस विषय में निश्चित हो सकती थी?
उसे मालूम नहीं था। दर्शनशास्त्र का कोर्स तो उसने बस अभी ही शुरू किया था।
नियति
‘भविष्यवक्ता’ किसी ऐसी चीज का पूर्व–दर्शन करने का प्रयास कर रहा है
जो वास्तव में बिलकुल पूर्व–दर्शनीय नहीं है…
डिमॉक्रिटस के विषय में पढ़ते समय सोफी की आँख मेल–बॉक्स पर ही लगी हुई थी। फिर भी उसने यूँ ही बाग के गेट तक चहलकदमी करने का फैसला किया।
जब उसने सामने का दरवाजा खोला, तो पहली पैड़ी पर ही उसने एक छोटा लिफाफा देखा। बिलकुल स्पष्ट दिखाई देता था–यह सोफी एमंडसन को सम्बोधित था।
इसके मायने वह आज फिर चाल चल गया। और दिनों की बात छोड़िए, आज जब वह मेल–बॉक्स पर बड़ी सावधानी से निगरानी रख रही थी, यह रहस्यमय आदमी किसी दूसरी तरफ से चलकर घर के अन्दर तक आ गया और पैड़ियों पर चिट्ठी डालकर फिर जंगल में गायब हो गया। धत् तेरे की!

हमने सोफी का संसार | Sophie Ka Sansar PDF Download PDF Book Free में डाउनलोड करने के लिए Google Drive की link नीचे दिया है , जहाँ से आप आसानी से PDF अपने मोबाइल और कंप्यूटर में Save कर सकते है। इस क़िताब का साइज 2.16 MB है और कुल पेजों की संख्या 519 है। इस PDF की भाषा हिंदी है। इस पुस्तक के लेखक हैं। यह बिलकुल मुफ्त है और आपको इसे डाउनलोड करने के लिए कोई भी चार्ज नहीं देना होगा। यह किताब PDF में अच्छी quality में है जिससे आपको पढ़ने में कोई दिक्कत नहीं आएगी। आशा करते है कि आपको हमारी यह कोशिश पसंद आएगी और आप अपने परिवार और दोस्तों के साथ सोफी का संसार | Sophie Ka Sansar PDF Download की PDF को जरूर शेयर करेंगे।

Q. सोफी का संसार | Sophie Ka Sansar PDF Download किताब के लेखक कौन है?
Answer. जॉस्टिन गार्डर | Jostein Gaarder


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