सामने देखो / Samne Dekho

‘सामने देखो’ उपन्यास की पृष्ठभूमि भी वास्तविकता के धरातल पर टिकी हुई है, जिसमें सुरनाथ, शिवनाथ, सुनीपा और अमित जैसे पात्र जीवन की सच्चाई को उजागर करते हुए अपनी-अपनी व्यथा कहते प्रतीत होते हैं। उपन्यास की कथा इन पात्रों के इर्द-गिर्द घूमते हुए पारिवारिक सत्यता को उजागर करती है।

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जन्म यदि तब / Janm Yadi Tav

वह कविता कहाँ गयी, बिटिया शर्मिष्ठा? अरे, वह कविता, जो मैंने लिखी थी और फेंक दी थी? हाँ, बिटिया, तूने उठाकर सहेज लिया था? वर्ना, चल फिर से लिख ले, बेटू! बँगला में न लिख सके, तो चल अंग्रेजी में ही लिख ले। तू ना लिख पाये, तो अपने गौर काका को बुला! वह बिल्कुल ठीक-ठीक लिख लेगा। सुन, बिटिया,

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जटायु / Jatayu

महाश्वेता देवी के उपन्यास का मतलब ही है, कोई भिन्नतर स्वाद! किसी भिन्न जीवन की कथा! उनकी कथा-बयानी में न कोई ऊपरी-ऊपरी घटना होती है, न कोई हल्की-फुल्की घटना या कहानी। ज़िन्दगी के बिल्कुल जड़ तक पहुँच जाने की कथा ही वे सुनाती हैं। वह कहानी मानो कोई विशाल वृक्ष है। कहानी के नीचे बिछी पर्त-दर-पर्त मिट्टी को उकेरकर, बिल्कुल

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झांसी की रानी / Jhansi Ki Rani

‘झाँसी की रानी’ महाश्वेता देवी की प्रथम रचना है। स्वयं उन्हीं के शब्दों में, ‘इसी को लिखने के बाद मैं समझ पाई कि मैं एक कथाकार बनूँगी।’ इस उपन्यास को लिखने के लिए महाश्वेता जी ने अथक अध्ययन किया और झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई के विषय में व्याप्त तरह-तरह की किंवदन्तियों के घटाटोप को पार कर तथ्यों और प्रामाणिक सूचनाओं

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