द 80/20 प्रिंसिपल / The 80/20 Principle PDF Download Free Hindi Books by Richard Coach

पुस्तक का विवरण (Description of Book) :-

नाम / Name 📥80/20 सिद्धांत PDF / रिचर्ड कोच हिंदी PDF | The 80/20 Prinsiple Richard Coach
लेखक / Author 🖊️
आकार / Size 5.3 MB
कुल पृष्ठ / Pages 📖373
Last UpdatedApril 30, 2022
भाषा / Language Hindi
श्रेणी / Category

कम से ज़्यादा हासिल करें

अपने पहले प्रकाशन के बीस वर्षों बाद, 80/20 सिद्धांत दुनिया की सर्वाधिक बिकनेवाली पुस्तकों में शामिल है, जिसे पूरे विश्व में फैले लाखों प्रभावी लोग प़ढते हैं। अब यह पहले से कहीं अधिक प्रभावशाली और अनिवार्य हो गई है।

पहले इसे जिसने भी प़ढा और इस्तेमाल किया, उसे इसका फायदा मिला। भविष्य में, यह उन सभी के लिए एक अनिवार्य साधन बन जाएगी जो सफल होना चाहते हैं। और यह प्रभावशाली है। सहज ज्ञान के विपरीत लेकिन इस व्यापक सच्चाई पर आधारित होने के कारण कि 80% परिणाम 20% कारणों से मिलते हैं, 80/20 सिद्धांत यह दिखाता है कि महज 20% सबसे ज़रूरी बातों पर ध्यान देकर आप बहुत कम समय और प्रयास के साथ बहुत कुछ हासिल कर सकते हैं।

इस विस्तृत नए संस्करण में चार ताज़ातरीन अध्याय हैं जो आपको बताते हैं कि कैसे:

*ब़ढते नेटवर्क का इस्तेमाल आप अपने फायदे के लिए कर सकते हैं। *इस सिद्धांत के अत्यधिक फायदेमंद 90/10 और 99/1 रूपों का लाभ उठा सकते हैं। *अपने अवचेतन मन की मदद से अपने जीवन पर एक परम-प्रभावी और चमत्कारिक रूप से अनुकूल प्रभाव डाल सकते हैं। *पाँच परम नियमों को अपनाकर और अधिक सफलता प्राप्त कर सकते हैं।

जीक्यू की इस सदी की 25 सर्वोत्तम व्यावसायिक पुस्तकों में से एक टेरिफिक अल रीस, पोजिशनिंग के लेखक

‘इसमें ऐसे विचार हैं जो आपकी ज़दिंगी बदल सकते हैं’ गुड बुक गाइड

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80/20 principle quotes

 

 

 

पुस्तक का कुछ अंश

भाग एक -

अधिकता 15
1 80/20 के सिद्धांत में आपका स्वागत है 17
2 80/20 कैसे सोचें 37
भाग दो - कॉर्पोरेट सफलता ज़रूरी नहीं कि एक रहस्य हो 57
3 अंडरग्राउंड की परंपरा 59
4 आपकी कार्य योजना गलत क्यों है 75
5 सरल ही सुंदर है 105
6 सही ग्राहक बनाना 125
7 80/20 सिद्धांत के 10 सर्वश्रेष्ठ व्यावसायिक उपयोग 142
8 कुछ महत्वपूर्ण चीज़ें आपको सफलता दिलाते हैं 155
भाग तीन - कम मेहनत में अधिक कमाएँ और अधिक आनंद उठाएँ 165
9 बेफिक्र रहें 167
10 समय की क्रांति 178
11 आप जो चाहें पा सकते हैं 200
12 अपने दोस्तों की थोड़ी मदद के साथ 213
13 बुद्धिमान और आलसी 226
14 पैसा, पैसा, पैसा 247
15 खुश रहने की सात आदतें 261
16 आपका छुपा दोस्त 279
भाग चार - 80/20 का भविष्य 297
17 80/20 नेटवर्क के ज़रिए सफलता 299
18 80/20 जब 90/10 बन जाता है 312
19 80/20 के भविष्य में आप कहाँ होंगे 324
भाग पाँच - सिद्धांत पर एक नज़र फिर से 333
20 सिद्धांत के दो आयाम 335

80/20 का रैप
क्या आप जानते थे कि 80/20 का एक शानदार रैप गीत है, जिसका श्रेय बेमिसाल वायट मो ‘जी जैक्सन’ को जाता है? आप चाहें तो इसे वेब पर www.richardkoch.net पर सुन सकते हैं। यह तीन मिनट का है, जितना कि किसी पॉप गीत को होना चाहिए। उसके बोल यहाँ दिए जा रहे हैं, जिनके साथ मैंने इस पुस्तक के संदेश को बीच-बीच में (इटैलिक में) डाला है:
रिचर्च कोच हैं एक कारोबारी,
सच्चाई एक उन्होंने ढूँढ़ निकाली, हाँ एक मास्टर प्लान
लिखें उस पर बुक, जो कामयाबी में छू ले आसमान,
जो ना केवल है अच्छी, एकदम है सच्ची।
नाम इसका है 80/20 का उसूल
सबक ये सिखाए कि आप सबसे कूल,
बैठकर सुनो बस इसकी आवाज़ को,
गाना खत्म होने से पहले सब समझ आएगा आपको।
80/20 का सिद्धांत, सफलता की चाबी,
80/20 का सिद्धांत, पाओ ज़्यादा या कम कामयाबी,
80/20 का सिद्धांत, सफलता का राज़,
80/20 का सिद्धांत हासिल करो बेहिसाब।
तो यह 80/20 का सिद्धांत क्या है? 80/20 का सिद्धांत कहता है कि बेहद सीमित, कम संख्या के कारणों, लागत या प्रयास से आमतौर पर ज़्यादातर नतीजे, उत्पादन या इनाम मिलते हैं, इस तरह अधिकांश परिणाम कम संख्या के कारणों या लागतों से मिलते हैं।
80/20 का सिद्धांत, सफलता की चाबी,
80/20 का सिद्धांत, पाओ ज़्यादा या कम कामयाबी,
80/20 का सिद्धांत, सफलता का राज़,
80/20 का सिद्धांत हासिल करो बेहिसाब।
इसे शब्दशः लिया जाए तो उदाहरण के तौर पर इसका मतलब है कि अपने काम में हम जो 80 प्रतिशत हासिल करते हैं, वह हमारी ओर से खर्च किए गए 20 प्रतिशत समय से संभव होता है। इस कारण हमारे प्रयास का जो अस्सी फीसदी हिस्सा है, वह काफी हद तक सार्थक नहीं होता और सामान्य रूप से हमारी जो अपेक्षा होती है, उसके विपरीत होता है।
80/20 का सिद्धांत, सफलता की चाबी,
80/20 का सिद्धांत, पाओ ज़्यादा या कम कामयाबी,
80/20 का सिद्धांत, सफलता का राज़,
80/20 का सिद्धांत हासिल करो बेहिसाब।
इसलिए 80/20 का सिद्धांत कहता है कि कारणों और परिणामों, लागत और उत्पादन, प्रयासों और इनाम के भीतर अपने आप ही एक असंतुलन रहता है। इसी असंतुलन का एक अच्छा मापदंड 80/20 के संबंध में देखने को मिलता है। एक खास पैटर्न यह दिखाता है कि 80 प्रतिशत परिणाम 20 प्रतिशत कारणों से मिलते हैं। या 80 प्रतिशत नतीजे 20 प्रतिशत प्रयास से हासिल होते हैं। कारोबार में, 80/20 सिद्धांत के सही साबित होने के कई उदाहरण हैं: आमतौर पर 20 प्रतिशत उत्पादों से और उसी तरह 20 प्रतिशत ग्राहकों से 80 प्रतिशत डॉलर कमाया जाता है। और 20 प्रतिशत उत्पादों या ग्राहकों से किसी संगठन को 80 प्रतिशत मुनाफा होता है।
80/20 का सिद्धांत, सफलता की चाबी,
80/20 का सिद्धांत, पाओ ज़्यादा या कम कामयाबी,
80/20 का सिद्धांत, सफलता का राज़,
80/20 का सिद्धांत हासिल करो बेहिसाब।

भाग एक - अधिकता

ये दुनिया उल्टी-पुल्टी है!
क्या है 80/20 का सिद्धांत? 80/20 का सिद्धांत हमें बताता है कि कहीं भी कुछ चीज़ों का महत्त्व दूसरों से ज़्यादा होता है। एक अच्छा पैमाना या अनुमान ये है कि 20 फीसदी कारणों से 80 फीसदी नतीजे मिलते हैं और कभी-कभी तो इससे भी कम प्रयास करना पड़ता है।
सामान्य भाषा ही इसका एक अच्छा उदाहरण है। सर आइजैक पिटमैन जिन्होंने शॉर्टहैंड का आविष्कार किया था, उन्हें पता चला कि आम बोलचाल के सिर्फ 700 शब्दों के इस्तेमाल से ही हम दो-तिहाई बातचीत कर लेते हैं। इन शब्दों से जो शब्द बनते हैं, उनको शामिल करने के बाद भी पिटमैन ने देखा कि इन्हीं शब्दों से 80 फीसदी आम बोलचाल का काम चल जाता है। इस मामले में, 1 फीसदी से भी कम (न्यू शॉर्टर ऑक्सफोर्ड इंग्लिश डिक्शनरी में पाँच लाख से भी ज़्यादा शब्द हैं) शब्दों का इस्तेमाल 80 फीसदी बार किया जाता है। हम इसे 80/1 का सिद्धांत कह सकते हैं। इसी तरह, 99 फीसदी से ज़्यादा बातचीत 20 फीसदी से भी कम शब्दों में हो जाती है: हम इसे 99/20 का संबंध कह सकते हैं।
फिल्मों की मदद से 80/20 के सिद्धांत को समझा जा सकता है। हाल में किए गए एक अध्ययन ने दिखाया कि 1.3 प्रतिशत फिल्में बॉक्स ऑफिस पर 80 प्रतिशत से ज़्यादा की कमाई करती हैं, जो साफ तौर पर 80/1 का नियम सामने लेकर आता है।
80/20 का सिद्धांत कोई जादुई फॉर्मूला नहीं है। कभी-कभी नतीजे और उसके कारणों के बीच का संबंध 80/20 या 80/1 के मुकाबले 70/30 के करीब होता है। लेकिन ऐसा तो शायद ही कभी होता है कि 50 प्रतिशत कारणों से 50 प्रतिशत नतीजे हासिल होते हैं। दुनिया सच में संतुलित नहीं है। कुछ ही चीज़ें सच में मायने रखती हैं।
जो लोग और संगठन सही मायने में दमदार होते हैं, वे अपने-अपने क्षेत्र में कुछ चुनिंदा शक्तिशाली बलों का इस्तेमाल करते हैं और उनसे लाभ हासिल करते हैं।
पढ़ें और जानें कि आप ऐसा कैसे कर सकते हैं...।

01- 80/20 के सिद्धांत में आपका स्वागत है
प्रत्येक बुद्धिमान इंसान, प्रत्येक संगठन, प्रत्येक सामाजिक समूह और समाज का रूप, 80/20 के सिद्धांत का उपयोग अपने दैनिक जीवन में कर सकता है और करना भी चाहिए। इसकी मदद से लोग और समूह बहुत कम प्रयास से बहुत कुछ प्राप्त कर सकते हैं। 80/20 का सिद्धांत व्यक्तिगत कारगरता और प्रसन्नता को बढ़ा सकता है। यह नियमों के लाभ और किसी भी संगठन के प्रभाव को कई गुना बढ़ा सकता है। यहाँ तक कि कम मूल्य पर सरकारी सेवाओं की गुणवत्ता और मात्रा को बढ़ाने की कुंजी भी इसी के पास है। 80/20 के सिद्धांत पर अब तक लिखी गई यह पहली पुस्तक, 2 ठोस विश्वास के साथ लिखी गई है। इसकी पुष्टि व्यक्तिगत और व्यावसायिक अनुभव के आधार पर इस प्रकार से हुई है कि यह सिद्धांत आधुनिक जीवन के तनावों से निपटने और उन्हें दूर करने के सबसे अच्छे उपायों में से एक है।
क्या है 80/20 का सिद्धांत?
80/20 का सिद्धांत कहता है कि गिने-चुने कारण, मूल्य या प्रयासों का परिणाम अक्सर अधिक परिणामों, उत्पादनों या फलों के रूप में मिलता है। इसे शब्दशः लें, तो उदाहरण के तौर पर इसका अर्थ हुआ कि आप अपने काम में जो 80 प्रतिशत प्राप्त करते हैं, वह 20 प्रतिशत समय देने से मिलता है। इस प्रकार तमाम व्यावहारिक उद्देश्यों से, प्रयास का चार बटा पाँच यानी एक बड़ा हिस्सा, किसी काम का नहीं होता। सामान्य रूप से लोग जो आशा करते हैं, यह उसके विपरीत होता है।
इसलिए 80/20 का सिद्धांत कहता है कि कारणों और परिणामों, मूल्य और उत्पादन, तथा प्रयास और इनाम के बीच एक अप्रत्यक्ष असंतुलन होता है। 80/20 का संबंध इस असंतुलन का एक अच्छा मापदंड है: एक खास पैटर्न जो दिखाता है कि 20 प्रतिशत मूल्य से 80 प्रतिशत उत्पादन होता है, 80 प्रतिशत नतीजे 20 प्रतिशत कारणों से निकलते हैं या 80 प्रतिशत परिणाम 20 प्रतिशत प्रयासों से प्राप्त होते हैं। चित्र 1 इस खास पैटर्न को दिखाता है।
व्यवसाय में, 80/20 के सिद्धांत के कई उदाहरणों की पुष्टि हो चुकी है। आमतौर पर 20 प्रतिशत उत्पादों से लगभग 80 प्रतिशत डॉलर मूल्य की बिक्री होती है। इसी तरह 20 प्रतिशत ग्राहक भी मिलते हैं। आमतौर पर 20 प्रतिशत उत्पादों (प्रोडक्ट्स) या ग्राहकों से किसी संगठन को लगभग 80 प्रतिशत लाभ मिलता है।
समाज में, 20 प्रतिशत अपराधी कुल अपराध का 80 प्रतिशत अपराध करते हैं। 20 प्रतिशत मोटर चालक 80 प्रतिशत हादसे करते हैं। शादी करनेवाले 20 प्रतिशत लोग 80 प्रतिशत तलाक के आँकड़ों का हिस्सा होते हैं। (जो बार-बार शादी करते हैं और तलाक देते हैं, वे आँकड़ों को बिगाड़ देते हैं और शादी में विश्वास को लेकर एक असंतुलित निराशाजनक तस्वीर पेश करते हैं।) 20 प्रतिशत बच्चे उपलब्ध शैक्षणिक योग्यता में से 80 प्रतिशत योग्यता प्राप्त करते हैं।
घर में पड़े कारपेट के 20 प्रतिशत हिस्से में 80 प्रतिशत घिसावट होती है। आप अपने 20 प्रतिशत कपड़ों को 80 प्रतिशत बार पहनते हैं। और अगर घर में किसी अजनबी के घुस आने का खतरा महसूस होता है, तो 80 प्रतिशत बार झूठा खतरा 20 प्रतिशत संभावित कारणों से पैदा होता है।
आंतरिक दहन इंजन 80/20 सिद्धांत का बहुत बड़ा उदाहरण है। 80 प्रतिशत ऊर्जा दहन में बेकार हो जाती है जबकि केवल 20 प्रतिशत ऊर्जा ही पहियों को मिलती है। यह 20 प्रतिशत लागत 100 प्रतिशत उत्पादन करती है!

चित्र 1 80/20 का सिद्धांत

पारेतो की खोज : संतुलन की व्यवस्थित और अनुमानित कमी
80/20 सिद्धांत में छिपे पैटर्न की खोज 1897 में इटली के अर्थशास्त्री विलफ्रेडो पारेतो (1848-1923) ने की थी। उसके बाद से अब तक उनकी खोज को कई नाम दिए गए हैं, जिनमें पारेतो सिद्धांत, पारेतो नियम, 80/20 का नियम, न्यूनतम प्रयास का सिद्धांत और असंतुलन का सिद्धांत ऐसे नाम शामिल हैं। इस पूरी पुस्तक में हम इसे 80/20 का सिद्धांत कहेंगे। उपलब्धि प्राप्त करनेवाले महत्वपूर्ण लोगों, विशेष रूप से व्यवसायियों, कंप्यूटर के महारथियों और बेहतरीन इंजीनियरों पर एक गुप्त प्रक्रिया से प्रभाव डालकर, 80/20 के सिद्धांत ने आधुनिक जगत को इसका स्वरूप दिया है। इसके बावजूद यह हमारे युग के सबसे बड़े रहस्यों में से एक है। यहाँ तक कि जो चुनिंदा जानकार लोग हैं, जो 80/20 के सिद्धांत को जानते हैं और उसका प्रयोग करते हैं, वे भी इसकी शक्ति के बहुत छोटे से हिस्से का ही लाभ उठा पाते हैं।
तो फिर विलफ्रेडो पारेतो ने ऐसा क्या ढूँढ़ लिया? वे उन्नीसवीं सदी के इंग्लैंड में धन और आय के तौर-तरीकों का अध्ययन कर रहे थे। अपने अध्ययन में उन्होंने देखा कि ज़्यादातर धन-दौलत बेहद कम लोगों के ही पास थी। शायद इसमें कोई बहुत बड़े आश्चर्य की बात नहीं थी। लेकिन उन्होंने दो और तथ्यों का भी पता लगाया, जो उन्हें काफी महत्वपूर्ण लगे। उनमें से एक तथ्य यह था कि जिन लोगों के पास इतनी आय या दौलत थी, उनके (संबंधित आबादी के एक प्रतिशत के रूप में) और उस आय या धन की मात्रा के रेशो के बीच हमेशा से ही एक गणितीय संबंध था। सरल शब्दों में समझें, तो यदि 20 प्रतिशत आबादी के पास 80 प्रतिशत दौलत थी, तो आप विश्वास के साथ यह अनुमान लगा सकते हैं कि 10 प्रतिशत लोगों के पास 65 प्रतिशत दौलत होगी और 5 प्रतिशत के पास 50 प्रतिशत। यह सच है कि आबादी के बीच धन का वितरण असंतुलित था।
पारेतो ने जिस दूसरी बात का पता लगाया, वह वास्तव में उन्हें बहुत उत्साहित करती थी। जब भी वे विभिन्न कालखंडों या विभिन्न देशों के आँकड़ों पर नज़र डालते, तो यही असंतुलन बार-बार उनके सामने आ रहा था। उन्होंने प्राचीन काल के इंग्लैंड को या अपने समय के या उससे पहले के अन्य देशों के जो भी आँकड़े उपलब्ध थे, उन्हें देखा तो पाया कि वही पैटर्न अपने आपको बार-बार, गणितीय सटीकता के साथ दोहरा रहा था।
क्या यह मात्र एक संयोग था या कुछ ऐसा जो अर्थशास्त्र और समाज के लिए बहुत महत्वपूर्ण था? यदि धन या आय के अतिरिक्त अन्य आँकड़ों पर इसे लागू किया जाए तो क्या यह उतना ही कारगर होगा? पारेतो कमाल के खोजकर्ता थे क्योंकि उनसे पहले किसी ने भी आँकड़ों के दो संबंधित समूहों पर गौर नहीं किया था। इस मामले में, आय के वितरण तथा आय अर्जित करनेवाले या संपत्ति के मालिकों की संख्या के दो सेट थे, जिनके प्रतिशत की तुलना उन्होंने की थी। (आजकल यह विधि आम हो चुकी है और इसके कारण व्यवसाय एवं अर्थशास्त्र में बड़ी-बड़ी सफलता मिली है।)
पारेतो को अपनी खोज के महत्त्व और विस्तार की समझ थी लेकिन दुर्भाग्य से, वे इसे समझाने में बुरी तरह विफल रहे। वे अनेक आकर्षक लेकिन इधर-उधर के सामाजिक सिद्धांतों में उलझ गए, जिनमें अभिजात वर्ग की मुख्य भूमिका थी। उन सिद्धांतों पर उनके जीवन के अंतिम समय में मुसोलिनी के फासीवादियों ने कब्जा जमा लिया। एक पीढ़ी तक 80/20 सिद्धांत के महत्त्व की किसी को जानकारी नहीं थी। कुछ अर्थशास्त्रियों ने, विशेष रूप से अमेरिका में इसके महत्त्व को समझा, लेकिन दूसरे विश्व युद्ध के बाद ही दो समानांतर लेकिन पूरी तरह से अलग प्रचारकों ने 80/20 के इस सिद्धांत से हलचल मचाना शुरू कर दिया।


1949 : जिफ का न्यूनतम प्रयास का सिद्धांत
इनमें से एक अग्रदूत थे हार्वर्ड में भाषा-शास्त्र के प्रोफेसर, जॉर्ज के. जिफ। 1949 में जिफ ने ‘न्यूनतम प्रयास के सिद्धांत’ का पता लगाया, जो असल में पारेतो के सिद्धांत की दुबारा की गई खोज और उसका विस्तार था। जिफ के सिद्धांत ने बताया कि संसाधन (लोग, वस्तु, समय, कौशल या कुछ भी जो उत्पादक हो) अपने आपको इस प्रकार व्यवस्थित करते हैं कि काम कम से कम हो जाता है। इस प्रकार 20 से 30 प्रतिशत संसाधन से 70 से 80 प्रतिशत तक गतिविधि होती है।
प्रोफेसर जिफ ने बार-बार पैदा होनेवाले असंतुलित पैटर्न को दिखाने के लिए आबादी के आँकड़ों, पुस्तकों, भाषा-शास्त्र और औद्योगिक व्यवहार का प्रयोग किया। उदाहरण के लिए, उन्होंने फिलाडेल्फिया में 1931 में 20-ब्लॉक क्षेत्र में जारी विवाह के सभी लाइसेंसो का विश्लेषण किया, जो यह दिखा रहे थे कि 70 प्रतिशत विवाह उन लोगों के बीच हुए, जो 30 प्रतिशत दूरी के भीतर रहते थे।
संयोग से, जिफ ने भी इस उलझे हुए मामले में एक वैज्ञानिक तर्क देकर बताया कि एक अन्य नियम की जटिलता इसका कारण है, वह नियम है - बार-बार उपयोग करने से उन चीज़ों से हमारी नज़दिकी बढ़ जाती हैं, जिनका हम उपयोग करते हैं। बुद्धिमान सेक्रेटरी बहुत पहले समझ गए थे कि बार-बार इस्तेमाल में आनेवाली फाइलों को दराज में नहीं रखना चाहिए!
1951 : जुरान का कुछ महत्वपूर्ण (Vital few) का नियम और जापान का उदय
80/20 सिद्धांत के एक और अग्रदूत महान क्वालिटी गुरु, रोमानिया में जन्मे अमेरिकी इंजीनियर जोसेफ एम. जुरान (1904-2008) थे, जो 1950 से 90 की गुणवत्ता क्रांति का प्रमुख चेहरा थे। उन्होंने जो बनाया, वह ‘पारेतो सिद्धांत’ का एक विकल्प और ‘कुछ महत्वपूर्ण का नियम’ कहलाता है। उसे उन्होंने उच्च गुणवत्तावाले उत्पाद की अपनी खोज का पर्याय बना दिया।
1924 में, जुरान वेस्टर्न इलेक्ट्रिक के साथ जुड़ गए, जो बेल टेलिफोन सिस्टम की निर्माण शाखा थी, जहाँ उन्होंने कॉरपोरेट इंडस्ट्रियल इंजीनियर के पद से शुरुआत की और बाद में दुनिया के पहले क्वालिटी कंसल्टेंट में से एक की स्थापना की।
उनकी एक बड़ी खोज 80/20 सिद्धांत का उपयोग, अन्य सांख्यिकीय तरीकों के इस्तेमाल से गुणवत्ता की खामियों को दूर करने और औद्योगिक तथा उपभोक्ता वस्तुओं की विश्वसनीयता व मूल्य में सुधार को लेकर थी। जुरान की अनोखी और पहली क्वालिटी कंट्रोल हैंडबुक का प्रकाशन 1951 में किया गया था और उसने 80/20 के सिद्धांत की खूबियों को व्यापक अर्थों में बताया: अर्थशास्त्री पारेतो ने पाया कि धन का असमान वितरण उसी प्रकार है, जैसा जुरान ने क्वालिटी में कमी के विषय में पाया हुआ है। अन्य उदाहरण भी देखे जा सकते हैं - अपराधियों के बीच अपराध का वितरण, खतरनाक तौर तरीकों के बीच हादसों का वितरण आदि। पारेतो के असमान वितरण का सिद्धांत धन के वितरण और गुणवत्ता में कमी पर लागू किया जा सकता है।
जुरान के सिद्धांतों में किसी भी बड़े अमेरिकी उद्योगपति की दिलचस्पी नहीं थी। 1953 में उन्हें लेक्चर के लिए जापान आने का न्योता दिया गया और वहाँ लोगों ने उनकी बात ध्यान से सुनी। उस समय वे कई जापानी निगमों के साथ काम करने के लिए वहीं रुक गए, उन्होंने उनके उपभोक्ता उत्पादों के मूल्य और गुणवत्ता में सुधार किया। 1970 के बाद, जब जापानियों से अमेरिकी उद्योग को पैदा हुआ खतरा साफ दिखाई देने लगा, तब पश्चिमी जगत ने जुरान के विचारों को गंभीरता से लेना शुरू किया। वे जापानियों के लिए जो काम कर रहे थे, उसे अमेरिकी उद्योग के लिए करने वापस लौट आए। इस वैश्विक गुणवत्ता क्रांति के केंद्र में 80/20 का सिद्धांत था।
1960 से 1990 के दशक तक : 80/20 सिद्धांत के प्रयोग से तरक्की
आई.बी.एम. उन शुरुआती और सबसे सफल निगमों (उेीिेीरींळेप) में से एक था, जिसने 80/20 सिद्धांत को पहचाना और उसका प्रयोग किया। जो यह बताता है कि क्यों 1960 और 1970 के दशक में अधिकांश प्रशिक्षित कंप्यूटर सिस्टम स्पेशलिस्ट इस सिद्धांत से परिचित थे।
1963 में, आई.बी.एम. ने यह पता लगाया कि कंप्यूटर का लगभग 80 प्रतिशत समय 20 प्रतिशत ऑपरेटिंग कोड को लागू करने में खर्च होता है। कंपनी ने तुरंत अपने ऑपरेटिंग सॉफ्टवेयर को फिर से इस प्रकार तैयार किया कि सबसे अधिक उपयोग में आनेवाला उसका 20 प्रतिशत हिस्सा सुलभ और उपयोग में आसान हो। जिससे अधिकांश एप्लिकेशंस के मामले में आई.बी.एम. के कंप्यूटर उसके प्रतिद्वंद्वियों की मशीनों की तुलना में अधिक दक्ष और तेज़ बन गए।
आगे चलकर जब ऍपल, लोटस और माइक्रोसॉफ्ट जैसी कंपनियों ने पर्सनल कंप्यूटर और इसकी अगली पीढ़ी के सॉफ्टवेयर तैयार किए, तो उन्होंने 80/20 के सिद्धांत का प्रयोग और भी उत्साह से किया। जिससे उनकी मशीनें सस्ती और नए किस्म के ग्राहकों के लिए उपयोग में आसान हो गईं। उनमें नई मशहूर ‘डमी’ भी शामिल थी, जिसकी मदद से पहले ही कंप्यूटर बहुत आगे निकल सकते थे।

जीतनेवाले की सफलता

पारेतो के एक सदी बाद, हाल ही में 80/20 सिद्धांत के परिणाम, सुपरस्टार्स और सर्वोच्च पदों पर बैठे गिनती के व्यावसायिक लोगों की दिन दूगनी रात चौगुनी बढ़ती कमाई को लेकर जारी चर्चा के बीच सामने आए हैं। 1994 में फिल्म निर्देशक स्टीवन स्पीलबर्ग ने 165 मिलियन डॉलर कमाए। सबसे अधिक फीसवाले बचाव पक्ष के वकील, जोसेफ जामियाल को 90 मिलियन डॉलर चुकाया गया। बेशक, सीमित योग्यता रखनेवाले फिल्म निर्देशक या वकील, इतनी रकम का एक बेहद छोटा हिस्सा ही कमा पाते हैं।
बीसवीं सदी में आय के अंतर को भरने के जबरदस्त प्रयास हुए, लेकिन असमानता कभी इस क्षेत्र में तो कभी उस क्षेत्र में सामने आ रही थी। अमेरिका में 1973 से 1995 के बीच, औसत सामान्य आय 36 प्रतिशत तक बढ़ गई, फिर भी सुपरवाइजर स्तर से बाहर के कामगारों की तुलनात्मक आय में 14 प्रतिशत तक गिरावट आई। 1980 के दशक के दौरान, पूरा लाभ सर्वाधिक आय अर्जित करनेवाले 20 प्रतिशत लोगों को मिला और सबसे अधिक कमाई करनेवाले 1 प्रतिशत लोगों के हिस्से में कुल बढ़ोत्तरी का होश उड़ा देनेवाला 64 प्रतिशत हिस्सा आ गया। अमेरिका में शेयरों का स्वामित्व भी पूरी तरह से कुछ सीमित घरानों के पास है: अमेरिका के 5 प्रतिशत घरों के पास घरेलू क्षेत्र की 75 प्रतिशत न्यायसंगतता है। ऐसा ही प्रभाव डॉलर के मामले में देखा जा सकता है: विश्व का लगभग 50 प्रतिशत व्यापार डॉलर में होता है, जो विश्व को निर्यात होनेवाले अमेरिका के 13 प्रतिशत हिस्से से बहुत ज़्यादा है। यही नहीं, विदेशी मुद्रा भंडार में डॉलर का हिस्सा जहाँ 64 प्रतिशत है, वहीं वैश्विक उत्पादन में अमेरिकी जीडीपी का अनुपात (रेशो) मात्र 20 प्रतिशत से कुछ अधिक है। जब तक 80/20 के सिद्धांत पर विजय पाने के सचेत, सतत और जोरदार प्रयास नहीं किए जाते और उन्हें जारी नहीं रखा जाता तब तक 80/20 का सिद्धांत हमेशा अपना प्रभाव दिखाता रहेगा।
80/20 का सिद्धांत इतना महत्वपूर्ण क्यों है
80/20 सिद्धांत के इतना महत्वपूर्ण होने का कारण यह है कि यह सहज ज्ञान के विपरीत होता है। हम यह मानकर चलते हैं कि सभी कारणों के लगभग एक जैसे ही परिणाम होंगे। सभी ग्राहक समान रूप से महत्वपूर्ण होते हैं। व्यवसाय का हर हिस्सा, हर उत्पाद (प्रोडक्ट) और बिक्री से प्राप्त हर डॉलर किसी दूसरे हिस्से के जितना ही अहम होता है। किसी खास वर्ग के सभी कर्मचारियों का लगभग समान महत्त्व होता है। हम जो हर दिन या सप्ताह या वर्ष बिताते हैं, उनका महत्त्व समान होता है। हमारे सारे दोस्त हमारे लिए समान महत्त्व रखते हैं। सभी जानकारियों या फोन कॉल को समान महत्त्व देना चाहिए। हर यूनिवर्सिटी दूसरी के जैसी ही अच्छी होती है। सभी समस्याओं के अनेक कारण होते हैं इसलिए कुछ एक महत्वपूर्ण कारणों को अलग से नहीं देखना चाहिए। सारे अवसरों का लगभग समान महत्त्व होता है इसलिए हमें उन सभी को एक नज़र से देखना चाहिए।


हम यह मानते हैं कि 50 प्रतिशत कारणों या प्रयासों से 50 प्रतिशत परिणाम या उत्पादन प्राप्त होगा। स्वाभाविक रूप से, लगभग लोकतांत्रिक तरीके से यह आशा रहती है कि कारण और परिणाम आमतौर पर समान रूप से संतुलित रहते हैं और कभी-कभी ऐसा होता भी है। लेकिन यह ‘50/50 का भ्रम’ हमारे मन में बैठा सबसे गलत और हानिकारक, साथ ही साथ जड़ें जमा चुका भ्रम है। 80/20 का सिद्धांत कहता है कि जब कारणों और परिणामों से संबंधित दो अलग-अलग आँकड़ों की जाँच और विश्लेषण की जा सकती है, तब सबसे संभावित परिणाम असंतुलन के एक पैटर्न के रूप में आएगा। यह असंतुलन 65/35, 70/30, 75/25, 80/20, 95/5 या 99.9/0.1 या बीच के किसी भी अंकों के समूह में हो सकता है। हालाँकि यह ज़रूरी नहीं कि तुलना के दोनों अंकों का जोड़ 100 हो जाए।
80/20 का सिद्धांत यह भी कहता है कि जब हमें असली संबंध का पता चलता है, तब हम हैरान रह जाते हैं कि यह कितना असंतुलित है। असंतुलन का स्तर चाहे जो भी हो, यह हमारे पहले के अनुमान से अधिक हो सकता है। कर्मचारी भले ही यह अनुमान लगाएँ कि कुछ ग्राहक और उत्पाद दूसरों से अधिक लाभ दिला सकते हैं, लेकिन जब अंतर उनके सामने आता है, तो वे हैरान और कभी-कभी स्तब्ध रह जाते हैं। शिक्षकों को भले ही जानकारी हो कि अनुशासनहीनता की अधिकांश समस्याएँ या स्कूल से भागने की ज़्यादातर घटनाएँ कुछ एक छात्रों के कारण ही होती है, लेकिन रिकॉर्ड का विश्लेषण किया जाए तो असंतुलन का स्तर संभवतः उम्मीद से कहीं अधिक होगा। भले ही हमें यह लगता है कि हमारा कुछ समय बाकी समय से अधिक मूल्यवान है, लेकिन हम प्रयासों और परिणामों को मापते हैं, तो हो सकता है कि उनके बीच का अंतर हमें सन्न कर दे।
आपको 80/20 सिद्धांत का ध्यान क्यों रखना चाहिए? चाहे आप इसका अहसास करें या नहीं, यह सिद्धांत आपके जीवन, आपकी सामाजिक दुनिया और आपके काम की जगह पर लागू होता है। 80/20 के सिद्धांत को समझ लेने से आपकी आँखें खुल जाएँगी कि सचमुच आपके आसपास की दुनिया में क्या हो रहा है।
इस पुस्तक का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यह है कि 80/20 के सिद्धांत के उपयोग से हमारे दैनिक जीवन में बहुत बड़ा सुधार किया जा सकता है। हर इंसान अधिक दक्ष और खुश हो सकता है। मुनाफे की इच्छा रखनेवाली हर कंपनी बहुत अधिक मुनाफा कमा सकती है। प्रत्येक गैर लाभकारी संगठन और भी अधिक उपयोगी कार्य कर सकता है। प्रत्येक सरकार सुनिश्चित कर सकती है कि उसके कारण उसके नागरिकों को अधिक से अधिक लाभ मिले। हर किसी के लिए और हर संस्थान के लिए, बहुत कम प्रयास, खर्च या निवेश से मूल्यवान चीज़ों को प्राप्त करना और नकारात्मक चीज़ों से बचना संभव होगा।

इस प्रगति के केंद्र में प्रतिस्थापन (ठशश्रिरलशाशपीं) की प्रक्रिया है। इसमें उन संसाधनों का उपयोग नहीं किया जाता, जिनका किसी प्रयोग में कमजोर प्रभाव होता है या ना के बराबर किया जाता है। ऐसे संसाधन जिनका जबरदस्त प्रभाव पड़ता है, उनका अधिक से अधिक प्रयोग किया जाता है। जहाँ भी संभव हो, कमजोर संसाधनों को विकसित किया जाता है ताकि वे प्रभावशाली संसाधनों के व्यवहार की नकल कर सकें।
व्यवसायों और बाज़ारों ने इस प्रक्रिया का उपयोग सैकड़ों वर्षों तक प्रभावशाली ढंग से किया है। फ्रांस के अर्थशास्त्री जे.बी. से ने ‘एंटरप्रेन्योर’ यानी उद्योजक शब्द को वर्ष 1800 के आसपास गढ़ा था, जब उन्होंने कहा था कि ‘उद्योजक आर्थिक संसाधनों को निम्न उत्पादकता के क्षेत्र से उच्च उत्पादकता और उपज के क्षेत्र में ले जाता है।’ लेकिन 80/20 सिद्धांत का एक दिलचस्प पहलू यह है कि आज भी व्यवसाय और बाजार सर्वोत्तम समाधानों से कितने दूर हैं। उदाहरण के लिए, 80/20 का सिद्धांत कहता है कि वास्तव में लगभग 80 प्रतिशत मुनाफे के लिए 20 प्रतिशत उत्पाद, ग्राहक या कर्मचारी ही ज़िम्मेदार होते हैं। यदि यह सच है और विस्तृत जाँच से अक्सर इसकी पुष्टि हुई है कि इस प्रकार के कुछ बेहद असंतुलित तरीके होते हैं, तो कामकाज की स्थिति कार्यकुशल या सर्वोत्तम होने से कोसों दूर होती है। परिणाम यह होता है कि 80 प्रतिशत उत्पाद, ग्राहक या कर्मचारी मात्र 20 प्रतिशत मुनाफा देते हैं यानी यह बहुत अधिक बर्बादी की स्थिति होती है। कंपनी के सबसे शक्तिशाली संसाधनों के प्रयोग को निष्प्रभावी संसाधनों ने रोक रखा है। यदि सबसे अच्छे उत्पादों को बेचा जाए, कर्मचारियों को नियुक्त किया जाए या ग्राहक आकर्षित किए जाएँ (या कंपनी से अधिक खरीदारी के लिए राज़ी किए जाएँ), तो मुनाफा कई गुना बढ़ाया जा सकता है।

ऐसी स्थिति में कोई यह पूछ सकता है: 80 प्रतिशत ऐसे उत्पादों को क्यों बनाते रहना है, जब उनसे केवल 20 प्रतिशत मुनाफा मिलता है? कंपनियाँ ऐसे सवाल शायद ही पूछती हैं, संभवतः इस कारण क्योंकि ऐसा पूछने से उन्हें काफी परिवर्तनकारी कदम उठाने पड़ेंगे: आप जो कर रहे हैं उसका अस्सी प्रतिशत बंद कर देना कोई मामूली परिवर्तन नहीं होता।
जे.बी. से ने जिसे उद्योजकों का काम कहा था, उसे आधुनिक वित्त व्यवस्थापक की मध्यस्थता (आर्बिट्रेज) कहते हैं। आंतरराष्ट्रीय वित्त बाज़ार बड़ी तेजी से मूल्यांकन की गड़बड़ियों को सुधार लेते हैं। जैसे विनिमय दरों के बीच की गड़बड़ी। लेकिन व्यावसायिक संगठन और लोग सामान्य रूप से इस प्रकार की उद्योजकता या मध्यस्थता में इतने कमज़ोर होते हैं कि उन क्षेत्रों से संसाधनों को हटाकर ऐसे क्षेत्रों में लगा सकें, जहाँ वे प्रभावशाली परिणाम दे रहे हैं या निम्न मूल्यवाले संसाधनों को कम करके अधिक मूल्यवाले संसाधनों को खरीदें। अक्सर, हमें यह समझ में नहीं आता कि कम संख्यावाले कुछ संसाधन, किस हद तक जबरदस्त उत्पादक होते हैं, जिसे जोसेफ जुरान ने ‘महत्वपूर्ण कुछ’ कहा, जबकि अधिकांश ‘तुच्छ कई’ बेहद कम उत्पादकता दिखाते हैं या फिर उनका मूल्य लगभग ना के बराबर होता है। यदि हमें महत्वपूर्ण कुछ और तुच्छ कई के बीच का अंतर अपने जीवन के सभी पहलुओं में समझ में आ जाता और हम यदि इसके विषय में कुछ कर लेते, तो हम उसे कई गुना बढ़ा सकते थे, जिसे हम मूल्यवान समझते थे।


80/20 सिद्धांत और अराजकता (अव्यवस्था) का सिद्धांत

संभावना का सिद्धांत हमें बताता है कि यह लगभग असंभव है कि 80/20 सिद्धांत वैसे ही किसी संयोग से लागू होता है। हम इस सिद्धांत को इसमें छिपे गहरे अर्थ या इसके साथ-साथ चलनेवाले कारण के साथ ही बता सकते हैं।
स्वयं पारेतो के सामने यह संकट था, जब वे समाज के अध्ययन के लिए एक स्थायी विधि को लागू करने का प्रयास कर रहे थे। वे उन नियमित तरीकों, सामाजिक नियमों या ‘एकरूपताओं’ के लिए ऐसे ‘सिद्धांतों’ की खोज कर रहे थे, जो अनुभव और अवलोकन की सच्चाई को दिखाते हैं, जो इंसानों और समाज के व्यवहार की व्याख्या करते हैं।
पारेतो का समाजशास्त्र ठोस सूत्र का पता लगाने में विफल रहा। अराजकता के सिद्धांत के सामने आने से बहुत पहले ही उनकी मृत्यु हो गई, जो 80/20 सिद्धांत के काफी करीब है और वे उसे समझाने में सहायक है।
ब्रह्माण्ड के विषय में वैज्ञानिकों के सोचने के तरीके में बीसवीं सदी के अंतिम तिहाई हिस्से में एक क्रांति हुई, जिसने पिछले 350 वर्षों से चले आ रहे ज्ञान को बदल दिया। यह मौजूदा ज्ञान मशीन आधारित और तर्कसंगत था, जो अपने आपमें ही विश्व को लेकर मध्ययुगीन रहस्यमयी और अस्पष्ट दृष्टिकोण से काफी उन्नत था। मशीन आधारित दृष्टिकोण ने भगवान को अतार्किक और अनिश्चित से उपयोगकर्ता के अनुकूल घड़ी बनानेवाला इंजीनियर बना दिया।
सत्रहवीं सदी से पूरी दुनिया की जो सोच चली आ रही थी और जो आज भी विद्यमान है, वह आधुनिक वैज्ञानिक दायरों के अलावा, मन को शांति देनेवाली और उपयोगी है। सारी घटनाएँ एक नियमित, उम्मीद के मुताबिक और रेखीय संबंध तक सीमित कर दी गईं। उदाहरण के लिए, ए से बी होता है, बी से सी होता है और ए+सी के कारण डी होता है। इस वैश्विक दृष्टिकोण ने ब्रह्माण्ड के किसी एक हिस्से का विश्लेषण अलग-अलग तरीके से करना संभव बनाया। क्योंकि जो संपूर्ण था वह अलग-अलग हिस्सों का कुल जोड़ था और अलग-अलग हिस्सों से मिलकर संपूर्ण बनता था।
लेकिन इक्कीसवीं सदी के उत्तरार्ध में विश्व को एक विकसीत जीव के रूप में देखने का नज़रिया अधिक सटीक लगने लगा, जहाँ संपूर्ण व्यवस्था अपने हिस्सों के जोड़ से अधिक थी, और जहाँ हिस्सों के बीच संबंध अरेखीय था। कारणों को ठीक-ठीक बताना कठिन होता है, कारणों के बीच जटिल घटक होते हैं और कारण तथा परिणाम अस्पष्ट हो जाते हैं। रेखीय सोच में दोष यह है कि यह हमेशा काम नहीं करता, यह वास्तविकता का अतिसरलीकरण है। संतुलन भ्रामक या क्षणिक होता है। यह संसार अस्थिर है।
अपने नाम के बावजूद, अराजकता का सिद्धांत यह नहीं बताता कि सबकुछ निराशाजनक और समझ से बाहर है। इसकी बजाय, इस अव्यवस्था के पीछे एक आत्म-व्यवस्थित तर्क है, एक अनुमानित गैर-रैखिकता, जिसे अर्थशास्त्री पॉल क्रुगमैन ने ‘डरावना’, ‘भयानक’ और ‘भयंकर रूप से सटीक’ बताया था। इस तर्क को समझना आसान है लेकिन समझाना कठिन और यह संगीत के किसी ऐसे हिस्से से बहुत अलग नहीं है, जिसका कथानक बार-बार दोहराया जाता है। कुछ विशेष तरीके बार-बार सामने आते हैं, लेकिन उनका प्रकार अनिश्चित और अप्रत्याशित होता है।

अराजकता का सिद्धांत और 80/20 का सिद्धांत एक दूसरे को उजागर करते हैं
अराजकता के सिद्धांत और संबंधित वैज्ञानिक अवधारणों का 80/20 के सिद्धांत से क्या संबंध है? भले ही अन्य किसी ने कोई संबंध नहीं जोड़ा, लेकिन मुझे लगता है कि इसका उत्तर है : बहुत बड़ा संबंध है।
* असंतुलन का सिद्धांत
अराजकता के सिद्धांत और 80/20 सिद्धांत को जो सूत्र आपस में जोड़ता है, वह है संतुलन का विषय या अधिक सटीक तौर पर कहें तो असंतुलन का विषय। अराजकता का सिद्धांत और 80/20 सिद्धांत, दोनों कहते हैं कि यह संसार असंतुलित है। उनके अनुसार यह संसार रेखीय नहीं है, कारण और परिणाम शायद ही कभी एक-दूसरे से समान रूप से जुड़े होते हैं। दोनों ही आत्म-संगठन पर काफी विश्वास करते हैं: कुछ बल हमेशा ही अन्य बलों से अधिक ताकतवर होते हैं और वे संसाधनों के उचित हिस्से से अधिक पर कब्जा जमाना चाहते हैं। अराजकता का सिद्धांत समय के साथ होनेवाले परिवर्तनों के आधार पर बताता है कि यह संतुलन क्यों और कैसे होता है।

* यह संसार एक सीधी रेखा नहीं

अराजकता के सिद्धांत की तरह ही 80/20 अरैखिकता के विचार पर आधारित है। काफी कुछ होता है, जो महत्वपूर्ण नहीं होता और उन्हें अनदेखा किया जा सकता है। फिर भी कुछ ताकतें ऐसी होती हैं, जिनका प्रभाव उनकी संख्या से बहुत अधिक होता है। ये ऐसी ताकतें होती हैं, जिनकी पहचान और निगरानी होनी चाहिए। यदि वे सकारात्मक ताकतें हैं, तो हमें उन्हें कई गुना बढ़ाना चाहिए। यदि वे ऐसी ताकतें हैं, जो हमें अच्छी नहीं लगतीं, तो हमें उन्हें समाप्त करने पर ध्यानपूर्वक विचार करना चाहिए। 80/20 सिद्धांत किसी भी व्यवस्था में अरैखिकता का एक प्रभावशाली अनुभवजन्य परीक्षण उपलब्ध कराता है: हम पूछ सकते हैं, क्या 20 प्रतिशत कारणों से 80 प्रतिशत परिणाम मिलते हैं? क्या किसी भी घटना का 80 प्रतिशत मात्र 20 प्रतिशत घटना से संबंधित होता है? यह अरैखिकता को समाप्त करने की एक उपयोगी विधि है, लेकिन यह इससे भी अधिक उपयोगी है क्योंकि यह हमें असाधारण रूप से प्रभावशाली सक्रिय शक्तियों की पहचान करने की दिशा में प्रेरित करती है।

* फीडबैक लूप संतुलन को बिगाड़ती और भंग करती है
80/20 सिद्धांत फीडबैक लूप यानी प्रणाली का ऐसा हिस्सा है, जिसमें परिणाम के किसी हिस्से का प्रयोग भविष्य में निवेश के लिए किया जा सकता है। जिसकी पहचान अराजकता का सिद्धांत भी करता है और जिनके संदर्भ से उसकी व्याख्या की जा सकती है। इससे छोटे शुरुआती प्रभाव कई गुना बढ़ सकते हैं और अत्यधिक अप्रत्याशित परिणाम दे सकते हैं, उन्हें वैसे भी पिछली घटनाओं के अनुसार स्पष्ट किया जा सकता है। फीडबैक लूप के बिना, घटना का स्वाभाविक वितरण 50/50 होगा, जिसमें एक निश्चित निवेश से उसके अनुरूप परिणाम मिलेंगे। सिर्फ सकारात्मक और नकारात्मक फीडबैक लूप के कारण ही कार्य और परिणाम समान नहीं होते। इसके बावजूद यह भी सच लगता है कि शक्तिशाली सकारात्मक फीडबैक लूप गिनती के निवेशों पर भी प्रभाव डालते हैं। इससे ही यह समझा जा सकता है कि उन गिने-चुने निवेशों का इतना अधिक प्रभाव क्यों होता है।
हम सकारात्मक फीडबैक लूप को अनेक क्षेत्रों में सक्रिय देख सकते हैं, जो यह बताते हैं कि क्यों आबादियों के बीच हम 50/50 के स्थान पर 80/20 का प्रभाव देखते हैं। उदाहरण के लिए अमीर और अमीर हो जाते हैं, केवल अपनी बेहतर योग्यता के कारण ही नहीं बल्कि इस कारण भी कि पैसों से ही पैसा बनता है। ऐसा ही किसी तालाब में गोल्डफिश के साथ होता है। भले ही आप शुरुआत में लगभग समान आकार की गोल्डफिश डालें, लेकिन जो थोड़ी भी बड़ी होती हैं, वे और भी बड़ी होती जाती हैं क्योंकि तेजी से आगे बढ़ने की थोड़ी सी भी अधिक ताकत और बड़े मुँह के कारण, वे भोजन के बड़े हिस्से को अपने कब्जे में लेकर गटक जाती हैं।
* उत्कर्ष बिंदु
फीडबैक लूप के जैसी ही अवधारणा उत्कर्ष बिंदु की भी है। एक निश्चित बिंदु तक, एक नई शक्ति को आगे बढ़ने में कठिनाई होती है, चाहे वह शक्ति कोई नया उत्पाद (प्रोडक्ट) हो, कोई बीमारी, कोई नया रॉक ग्रुप या जॉगिंग या रोलर ब्लेडिंग जैसी खेल-कूद की आदत हो। काफी प्रयास करने के बाद भी बहुत थोड़ा परिणाम मिलता है। इस बिंदु तक आकर शुरुआत करनेवाले कई लोग हार मान लेते हैं। लेकिन एक नई ताकत बनी रहती है और एक अदृश्य रेखा को पार कर लेती है, तो थोड़ासा अधिक प्रयास करने से भारी लाभ कमाया जा सकता है। यह अदृश्य रेखा ही उत्कर्ष बिंदु है।
यह अवधारणा महामारी सिद्धांत के नियमों से निकली है। उत्कर्ष बिंदु ‘वह बिंदु है, जिस पर कोई सामान्य और स्थिर घटना होती है, जैसे - छोटे पैमाने के फ्लू का प्रकोप,’ बड़ी संख्या में लोगों के संक्रमित होने के कारण, ‘सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट बन सकता है,’ जो दूसरों को भी संक्रमित कर सकता है। महामारियों की प्रकृति चूँकि अरेखीय होती है और उनके विषय में हम अनुमान नहीं लगा सकते इसलिए ‘नए संक्रमणों को चालीस हज़ार से कम करके तीस हज़ार पर लाने जैसे छोटे परिवर्तनों का बहुत बड़ा असर हो सकता है... यह सब इस पर निर्भर करता है कि परिवर्तन कब और कैसे किए गए।’

* पहले आओ, पहले पाओ
अराजकता का सिद्धांत ‘शुरुआती परिस्थितियों पर संवेदनशील निर्भरता’ की हिमायत करता है यानी जो पहले होता है, चाहे वह स्पष्ट रूप से एकदम छोटा ही क्यों न हो, असमान प्रभाव डाल सकता है। यह 80/20 सिद्धांत के जैसा लगता है और उसे समझने में भी सहायता करता है। 80/20 का सिद्धांत कहता है कि गिने-चुने कारणों से अधिकांश परिणाम मिलते हैं। 80/20 के सिद्धांत को सबसे अलग कर देखते हुए इस प्रकार से सीमित किया जाता है कि यह हमेशा ही जो अभी सच है उसकी झलक दिखाता है। यहीं आरंभिक स्थितियों पर अराजकता के सिद्धांत के संवेदनशील निर्भरता का मत सहायक होता है। शुरुआत में मिला छोटा सा संकेत आगे चलकर बड़ी जानकारी या प्रभावशाली स्थिति तक ले जा सकता है, जब तक कि संतुलन बिगड़ न जाए और फिर एक छोटा बल एक और असमान प्रभाव न पैदा कर दे।
एक ऐसी कंपनी, जो बाज़ार में आते ही ऐसा उत्पाद (प्रोडक्ट) पेश करती है, जो उसके प्रतिद्वंद्वियों से 10 प्रतिशत बेहतर है, तो बाज़ार में वह 100 या 200 प्रतिशत हिस्सेदारी पर कब्जा जमा सकती है। फिर चाहे प्रतिद्वंद्वी कंपनियाँ बाद में उससे बेहतर उत्पाद ही लेकर क्यों न आएँ। मोटर कार बनाने के शुरुआती समय में, यदि 51 प्रतिशत चालकों या देशों ने तय कर लिया कि वे सड़क के बाईं ओर की बजाय दाहिनी ओर चलेंगे, तो सड़क पर चलनेवाले लगभग 100 प्रतिशत लोगों के लिए यही मानक (डींरपवरीव) बन जाएगा। पुराने जमाने में जब गोलाकार घड़ी का इस्तेमाल होता था, तब 51 प्रतिशत घड़ियाँ ‘क्लॉकवाइज’ चलती थीं न कि ‘काउंटर-क्लॉकवाइज’, तो यही चलन प्रभावी हो गया, भले ही घड़ियाँ उसी तर्क से बाईं ओर भी घूम सकती थीं। वास्तव में, फ्लोरेंस गिरिजाघर पर लगी घड़ी काउंटर-क्लॉकवाइज घूमती है और 24 घंटे का समय दिखाती है। 1442 में जब इस गिरिजाघर का निर्माण हुआ था, उसके कुछ समय बाद ही अधिकारियों और घड़ी निर्माता के बीच 12 घंटे दिखानेवाली घड़ी पर सहमति बनी थी, जो ‘क्लॉकवाइज’ घड़ी थी क्योंकि अधिकांश घड़ियाँ उसी तरह की थीं। फिर भी यदि 51 प्रतिशत घड़ियाँ फ्लोरेंस गिरिजाघर की घड़ी के जैसी होतीं, तो आज हम 24 घंटेवाली घड़ी को उल्टी दिशा में चलता देख रहे होते।
शुरुआती परिस्थितियों पर संवेदनशील निर्भरता के संबंध में इस प्रकार के अवलोकन 80/20 के सिद्धांत की व्याख्या नहीं करते। जो उदाहरण दिए जाते हैं, उनमें समय के साथ परिवर्तन की बात होती है, जबकि 80/20 के सिद्धांत में किसी एक समय पर कारणों का एक स्थिर विश्लेषण शामिल रहता है। इसके बावजूद दोनों के बीच एक महत्वपूर्ण संबंध है। दोनों ही घटनाएँ दिखाती हैं कि कैसे यह संसार संतुलन से घृणा करता है। पहले के मामले में, हम प्रतिस्पर्धी घटना में 50/50 के बँटवारे से स्वाभाविक रूप से दूरी को देखते हैं। 51/49 का बँटवारा अपने आपमें ही अस्थिर है और वह 95/5, 99/1, यहाँ तक कि 100/0 के बँटवारे की तरफ ही डोलता है। समानता प्रभुत्व पर आकर समाप्त हो जाती है: यह अराजकता के सिद्धांत के संदेशों में से एक है। 80/20 के सिद्धांत का संदेश अलग, फिर भी पूरक है। यह हमें बताता है कि किसी एक बिंदु पर, किसी भी घटना की अधिकांश बातों को, उस घटना में शामिल कम संख्या के किरदारों से बताया जा सकता है। 80 प्रतिशत परिणाम 20 प्रतिशत कारणों से प्राप्त होते हैं। अधिकांश नहीं, लेकिन कुछ चीज़ें महत्वपूर्ण होती हैं।

80/20 का सिद्धांत खराब फिल्मों से अच्छी फिल्मों को छाँटता है
80/20 सिद्धांत के लागू होने का एक सबसे नाटकीय उदाहरण है फिल्म। दो अर्थशास्त्रियों ने 18 महीने की अवधि के दौरान रिलीज होनेवाली 300 फिल्मों के राजस्व (मिलनेवाली आय) और जीवनकाल पर एक अध्ययन किया। उन्होंने पाया कि चार फिल्मों ने यानी कुल फिल्मों के मात्र 1.3 प्रतिशत ने बॉक्स ऑफिस पर 80 प्रतिशत कमाई की। बाकी बची 296 यानी 98.7 प्रतिशत फिल्मों ने कुल राजस्व का मात्र 20 प्रतिशत कमाया। इसलिए, मुक्त बाज़ार के कार्य करने के एक अच्छे उदाहरण के रूप में फिल्में 80/1 का नियम पेश करती हैं, जो असंतुलन के सिद्धांत को स्पष्ट रूप से दिखाता है।
इससे भी चौंकानेवाली बात यह है कि क्यों फिल्म देखनेवाले ऐसा व्यवहार करते हैं जैसे कि वे अनियमित गति में घूमते गैस के कण हों। जैसा कि अराजकता के सिद्धांत ने पता लगाया कि गैस के कण और पिंग पॉन्ग गेंद, सभी अनियमित व्यवहार करते हैं, लेकिन आशा के अनुरूप असंतुलित परिणाम भी देते हैं। सुनी सुनाई बातों, समीक्षा और पहला शो देखनेवाले दर्शकों से तय होता है कि दर्शकों का दूसरा समूह कितना बड़ा या छोटा होगा, जो उसके बाद के और फिर इसी तरह आगे के समूह का निर्धारण करता है।

इंडिपेंडेंस डे या मिशन इम्पॉसिबल जैसी फिल्मों को देखने के लिए आज भी दर्शक उमड़ते हैं, जबकि वाटरवर्ल्ड या डेलाइट जैसी सितारों से भरपूर और महंगी फिल्मों को जल्दी ही दर्शकों के लिए तरसना पड़ जाता है। फिर एक दिन पूरा हॉल सूना पड़ जाता है। इसी तरह 80/20 का सिद्धांत प्रतिशोध के साथ काम करता है।
इस गाइडबुक की गाइड
अध्याय 2 आपको 80/20 सिद्धांत को व्यवहार में लाने के विषय में बताता है और 80/20 विश्लेषण व 80/20 विचार के बीच अंतर का पता लगाता है। दोनों ही 80/20 सिद्धांत से निकली उपयोगी विधियाँ हैं। 80/20 विचार एक व्यापक, कम संक्षिप्त और अधिक सहज ज्ञान की प्रक्रिया है, जिसमें ऐसे मानसिक मॉडल और आदतें होती हैं, जिनके कारण हम यह अनुमान लगाते हैं कि हमारे जीवन में जो भी महत्वपूर्ण है उसका कारण क्या है। हम उन कारणों का पता लगाते हैं और अपने संसाधनों को फिर से उपयोग में लाते हुए अपनी स्थिति में तेजी से सुधार करते हैं।
भाग दो, ज़रूरी नहीं कि कॉरपोरेट सफलता के पीछे कोई रहस्य हो, लेकिन यह व्यवसाय में 80/20 सिद्धांत के सबसे प्रभावशाली उपयोग को संक्षेप में बताता है। इन उपायों को जाँचा-परखा गया और बेहद मूल्यवान पाया गया, इसके बावजूद अधिकांश व्यावयासिक समुदायों ने इसका उपयोग पूरी तरह से नहीं किया। मेरे सारांश में कुछ भी मौलिक नहीं, लेकिन जो भी लाभ में बड़ा सुधार करना चाहता है, चाहे उसका व्यवसाय छोटा हो या बड़ा, उसके लिए यह काफी उपयोगी हो सकता है और पहली बार किसी पुस्तक में यह लिखा गया है।
भाग तीन, ‘काम कम, कमाई और मजा ज़्यादा करो’ यह दिखाता है कि 80/20 के सिद्धांत का उपयोग आपके काम और व्यक्तिगत जीवन में मौजूदा स्तर को बढ़ाने के लिए किया जा सकता है। एक नए धरातल पर 80/20 के सिद्धांत को लागू करने का यह अग्रणी प्रयास है और मुझे विश्वास है कि यह प्रयास कई प्रकार से दोषपूर्ण और अधूरा है, जो कुछ आश्चर्यजनक ज्ञान कराता है। उदाहरण के लिए, किसी विशेष व्यक्ति की 80 प्रतिशत प्रसन्नता या जीवन में उपलब्धि उसके जीवन की सीमित अवधि में मिलती है। महान व्यक्तिगत मूल्य के शिखर का सामान्य रूप से विस्तार किया जा सकता है। आम भावना यह है कि हमारे पास समय कम होता है। 80/20 के मेरे सिद्धांत का उपयोग कुछ और ही बताता है: जैसे कि हमारे पास बेहिसाब समय होता है और हम दिल खोलकर इसका दुरुपयोग करते हैं।
भाग चार, 80/20 का भविष्य, जिसका यह नया संस्करण है, चर्चा करता है कि किस प्रकार नेटवर्क तेजी से व्यापक हो गए हैं, जिनके कारण यह सिद्धांत और अधिक प्रभावशाली, तथा अधिक चरम हो गया है, जिससे यह मापदंड 80/20 की बजाय 90/10 या 99/1 की ओर जा रहा है। भाग चार यह भी दिखाता है कि नेटवर्क और इस सिद्धांत की सर्वोच्चता के नए चलन की दिशा में बढ़ते हुए आप अधिक सफल बन सकते हैं।
भाग पाँच, सिद्धांत का पुनरावलोकन मुझे मिली हुई प्रतिक्रियाओं पर विचार करता है और किस प्रकार 80/20 सिद्धांत को लेकर मेरे विचार इस पुस्तक के पहले संस्करण के बाद विकसित हुए हैं।
80/20 का सिद्धांत अच्छी खबर लेकर क्यों आया है


इस परिचय का समापन मैं प्रक्रियात्मक की बजाय व्यक्तिगत टिप्पणी से करना चाहता हूँ। मेरा मानना है कि 80/20 का सिद्धांत काफी आशावादी है। निश्चित रूप से, यह सिद्धांत जो कहता है वह वैसे भी स्पष्ट है। जैसे कि प्रकृति जिस प्रकार से व्यवसाय में, समाज में और हमारे जीवन में काम करती है, उसमें हर तरफ भारी बर्बादी दिखती है। यदि 20 प्रतिशत प्रयास से 80 प्रतिशत परिणाम का विशेष पैटर्न है, तो यह भी उतना ही विशिष्ट है कि 80 प्रतिशत यानी बहुत अधिक प्रयास से बेहद कम, 20 प्रतिशत प्रभाव पड़ता है।
विडंबना यह है कि इस प्रकार की बर्बादी बहुत अच्छी खबर हो सकती है, यदि हम 80/20 के सिद्धांत का उपयोग रचनात्मकता के साथ करें और कम उत्पादकता को मात्र देखने और कोसने के स्थान पर कुछ सकारात्मक करने का प्रयास करें। प्रकृति और अपने जीवन को फिर से व्यवस्थित और निर्देशित करने से सुधार की व्यापक संभावना होती है। विकास संबंधी, वैज्ञानिक, सामाजिक और व्यक्तिगत, सभी प्रकार की प्रगति का रास्ता है - प्रकृति को बेहतर बनाना और वर्तमान स्थिति को स्वीकार करना। जॉर्ज बर्नार्ड शॉ ने इसे बखूबी कहा था: ‘उचित व्यक्ति खुद को संसार के अनुसार ढाल लेता है। अनुचित व्यक्ति अड़ा रहता है कि संसार खुद को उसके अनुसार ढाल ले। इस कारण सारी प्रगति उस अनुचित व्यक्ति पर निर्भर करती है।’
80/20 के सिद्धांत का परिणाम यह है कि इससे न केवल उत्पादन को बढ़ाया जा सकता है बल्कि कई गुना किया जा सकता है, यदि हम कम उत्पादकतावाले निवेश को उच्च-उत्पादकतावाले निवेश के लगभग बराबर ले आएँ। व्यवसाय के क्षेत्र में 80/20 सिद्धांत के सफल प्रयोग दिखाते हैं कि रचनात्मकता और दृढ़ निश्चय के साथ, आमतौर पर मूल्य में बड़ी छलाँग लगाई जा सकती है।

इसे प्राप्त करने के दो रास्ते हैं। एक है संसाधनों का अनुत्पादक से उत्पादक प्रयोग में फिर से निर्धारण करना, जो बरसों से सभी व्यवसायियों का मंत्र रहा है। गोल टुकड़े के लिए गोल छिद्र ढूँढ़ना, वर्गाकार छिद्र के लिए वर्गाकार टुकड़ा और इन दोनों के बीच के किसी भी आकार के लिए कुछ ऐसा जो पूरी तरह फिट हो जाए। अनुभव बताता है कि प्रत्येक संसाधन का एक आदर्श क्षेत्र होता है, जहाँ वह संसाधन अन्य सभी क्षेत्रों की तुलना में दस या सौ गुना अधिक प्रभावी होता है।
प्रगति का दूसरा रास्ता यह है - वैज्ञानिकों, डॉक्टरों, प्रचारकों, कंप्यूटर प्रणाली के डिजाइनरों, शिक्षाविदों और प्रशिक्षकों की पद्धति, जिसमें अनुत्पादक संसाधनों को उनके मौजूदा प्रयोग में भी अधिक प्रभावी बनाने के तरीके ढूँढ़े जाते हैं। कमज़ोर संसाधनों से ऐसा काम लिया जाता है, मानो वे अपने अधिक उत्पादक संसाधनों का ही दूसरा रूप हैं। यदि आवश्यक हो तो अधिक उत्पादक संसाधनों की नकल रटकर याद करने की प्रक्रिया की तरह ही की जाए।
कुछ चीज़ें जो कमाल का काम करती हैं, उन्हें पहचानने, विकसित करने और उनकी देखभाल के साथ ही कई गुना बढ़ाया जाना चाहिए। साथ ही साथ, जो बर्बाद हो जाता है - यानी अधिकांश चीज़ें जो हमेशा ही इंसान और जानवर के लिए कम महत्त्व की साबित होती हैं, उन्हें छोड़ देना चाहिए या कम कर देना चाहिए।
मैं चूँकि इस पुस्तक को लिख रहा था और 80/20 सिद्धांत के हज़ारों उदाहरणों को देख चुका था, इस कारण मेरा विश्वास सुदृढ़ हुआ। विश्वास प्रगति में, लंबी छलाँग लगाने में और मनुष्य की व्यक्तिगत तथा सामूहिक क्षमता में होता है, जिससे कि प्रकृति ने जो दिया है, उसे बेहतर बनाया जा सकता है। जोसेफ फोर्ट कहते हैं: ‘भगवान इस संसार के साथ पासे का खेल खेलते हैं। लेकिन पासा किस करवट गिरेगा, यह पहले से तय होता है। मुख्य उद्देश्य यह पता लगाना होता है कि किन नियमों से उन्हें अपनी इच्छा के अनुसार अंक लाने के लिए तैयार किया जाता है और उनका इस्तेमाल हम अपने हित में कर सकते हैं।’
80/20 सिद्धांत की सहायता से हम बिलकुल इसे ही प्राप्त कर सकते है

हमने 80/20 सिद्धांत PDF / रिचर्ड कोच हिंदी PDF | The 80/20 Prinsiple Richard Coach PDF Book Free में डाउनलोड करने के लिए लिंक निचे दिया है , जहाँ से आप आसानी से PDF अपने मोबाइल और कंप्यूटर में Save कर सकते है। इस क़िताब का साइज 5.3 MB है और कुल पेजों की संख्या 373 है। इस PDF की भाषा हिंदी है। इस पुस्तक के लेखक   रिचर्ड कोच / Richard Coach   हैं। यह बिलकुल मुफ्त है और आपको इसे डाउनलोड करने के लिए कोई भी चार्ज नहीं देना होगा। यह किताब PDF में अच्छी quality में है जिससे आपको पढ़ने में कोई दिक्कत नहीं आएगी। आशा करते है कि आपको हमारी यह कोशिश पसंद आएगी और आप अपने परिवार और दोस्तों के साथ 80/20 सिद्धांत PDF / रिचर्ड कोच हिंदी PDF | The 80/20 Prinsiple Richard Coach को जरूर शेयर करेंगे। धन्यवाद।।
Q. 80/20 सिद्धांत PDF / रिचर्ड कोच हिंदी PDF | The 80/20 Prinsiple Richard Coach किताब के लेखक कौन है?
Answer.   रिचर्ड कोच / Richard Coach  
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