उत्तररामचरित / Uttaramcharit PDF Download Free Hindi Book by Mahakavi Bhavbhuti

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आकार 2.7 MB
कुल पृष्ठ101
भाषाHindi
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महाकवि भवभूति द्धारा रचित उत्तररामचरित संस्कृत साहित्य की अमूल्य निधि है । रामायण के (उत्तरकाण्ड) कथानक को लेकर भवभूति ने अपनी प्रतिभा का सृजन किया । सार्थकता और संवादों को स्वाभाविकता इस नाटक की प्रमुख विशेषता है । मानवहृदय की वेदना को भवभूति ने बडी ही खूबसूरती से व्यक्त किया है । अपने पति श्रीराम द्धारा त्यागी नई सीता का मार्मिक वर्णन पढकर पाठक बरबस भावुक हो उठता है ।


पुस्तक का कुछ अंश

संस्कृत साहित्य के सर्वप्रिय नाटककारों में भवभूति का सम्मानपूर्ण स्थान है। अपनी कृति ‘उत्तररामचरित’ के लिए ही उसकी ख्याति संसार में अनश्वर रूप से विद्यमान है।
आलोचनाशास्त्र के पण्डितों द्वारा उत्तररामचरित नाट्‌यकला की एक अद्वितीय रचना स्वीकार की गई है। इसमें सात अंक हैं, इसकी कथावस्तु रामायण के उत्तरकाण्ड पर आश्रित है।
लंका में रावण का संहार करके श्रीराम सीता-सहित अयोध्या में वापिस आते हैं और उनका राज्याभिषेक होता है। उसी समय प्रजा के लोग सीता के चरित्र के सम्बन्ध में चर्चा आरम्भ कर देते हैं। जब दुर्मुख गुप्तचर द्वारा श्रीराम को जनापवाद का यह समाचार प्राप्त होता है, वे लक्ष्मण द्वारा सीता को वन में निर्वासित कर देते हैं।
सीता उस समय गर्भवती थी। वन में उसके दो पुत्र—कुश तथा लव उत्पन्न होते हैं। माता पृथ्वी तथा भागीरथी इस अवस्था में सीता का पालन-पोषण करती हैं और बच्चों को वाल्मीकि मुनि को, शिक्षा-दीक्षा के लिए सुपुर्द कर के सीता को अपने साथ पाताल-लोक में ले जाती हैं।
बारह वर्ष बाद श्रीराम अश्वमेध यज्ञ आरम्भ करते हैं। इसी समय, यज्ञ प्रारम्भ करने से पूर्व, वे शूद्र तपस्वी शम्बूक की खोज में दण्डकारण्य में जाते हैं। वहाँ उनकी पुरानी स्मृतियाँ उद्‌बुद्ध हो जाती हैं। भागीरथी को यह ज्ञान था कि श्रीराम दण्डकारण्य आने वाले हैं और वे लौटते हुए पंचवटी से अवश्य गुजरेंगे। अतः वह सीता को साथ लेकर गोदावरी से मिलने के लिए पंचवटी में पहुँच गई थी। वहाँ उसने सीता को फूल चुनने के बहाने उस स्थान पर भेजा जहाँ श्रीराम आ चुके थे। भागीरथी ने वरदान द्वारा सीता को अदृश्य बना दिया—यद्यपि सीता स्वयं सबको देख सकती थी।
पंचवटी में श्रीराम ने सीता की उपस्थिति को ही नहीं, प्रत्युत उसके अंगस्पर्श को भी अनुभव किया, परन्तु उसके दिखाई न देने पर उसे भ्रान्तिमात्र जान कर अति क्षुब्ध तथा विषण्ण होते हैं। निराश होकर वे अयोध्या आ जाते हैं।
अश्वमेध यज्ञ को आरम्भ करने के लिए यज्ञिय अश्व को छोड़ा जाता है। लक्ष्मण का पुत्र चन्द्रकेतु सेनासहित उस अश्व की रक्षा के लिए साथ जाता है। अश्व घूमता-फिरता वाल्मीकि-आश्रम के समीप पहुँचता है। वहाँ लव तथा अन्य आश्रम के बच्चे उसे उत्सुकतावश पकड़ लेते हैं।


चन्द्रकेतु अश्व को छुड़ाने के लिए युद्ध शुरू करते हैं। परन्तु लव को देख कर अकारण ही उसका हृदय उसके प्रति आकृष्ट हो जाता है। परस्पर स्नेह-सम्बन्ध की भावना जागृत होती है। भगवान् राम उसी समय पुष्पक विमान द्वारा युद्धस्थल पर पहुँचते हैं और दोनों बच्चों को युद्ध-विराम के लिए प्रेरित करते हैं।
कुश भी तब वहाँ आ जाता है। इन दोनों—लव, कुश—को देख-देख कर श्रीराम विस्मित तथा चिन्तित होने लगते हैं और उन्हें, उन दोनों बच्चों में अपना तथा सीता का निकट सादृश्य दृष्टिगोचर होने लगता है।
तभी वाल्मीकि मुनि वहाँ उपस्थित हो जाते हैं और आश्चर्यचकित श्रीराम को अप्सराओं द्वारा किए गए अभिनय के लिए आमन्त्रित करते हैं। सहस्त्रों अन्य नर-नारी भी इस अभिनय को देखने के लिए उपस्थित होते हैं। नाट्‌यकला के जन्मदाता स्वयं भरत मुनि द्वारा वाल्मीकि-कृत कथावस्तु का अभिनय आरम्भ होता है। स्वर्ग से उतरी हुई उन अप्सराओं ने अपनी उत्कृष्ट कला का प्रदर्शन प्रस्तुत किया। द्रष्टा जन मन्त्रमुग्ध होकर उस अभिनय के करुण रसपूर्ण दृश्यों का अवलोकन करने लगे। सर्वप्रथम घोर वन में गर्भवती सीता का भागीरथी-तट पर लक्ष्मण द्वारा निर्वासन दिखाया गया। तदनन्तर भागीरथी माता की गोद में सीता के दो पुत्रों के जन्म तथा उसके पाताल में विलय का मर्मस्पर्शी दृश्य उपस्थित किया गया। पुनः बच्चों के वाल्मीकि-आश्रम में भरण-पोषण तथा शिक्षा-दीक्षा का चित्र भी प्रस्तुत किया गया।
इस समय रंगमंच पर से अप्सराएँ चली जाती हैं और स्वयं वाल्मीकि मुनि उपस्थित होते हैं। माता पृथ्वी तथा भागीरथी सीता को साथ लेकर पाताल-लोक से प्रकट होती हैं। वसिष्ठ-पत्नी अरुन्धती प्रजाजनों की, सीता के चरित्र पर मिथ्या लांछन लगाने के लिए, भर्त्सना करती है और राम को अपनी निर्दोष-निष्कलंक पत्नी को स्वीकार करने के लिए प्रार्थना करती है। समस्त प्रजा इस प्रार्थना में सम्मिलित होती है और अपने किए दुष्कर्म पर लज्जित होती है। तब राम और सीता का पुनर्मिलन होता है और आनन्द-विभोर प्रजाजनों के जय-जयकार के साथ अभिनय की समाप्ति होती है।
इस सुन्दर कथावस्तु के ग्रथन में भवभूति को अद्‌भुत सफलता प्राप्त हुई है। लेखक की सम्मति में यह सफलता कालिदास को अभिज्ञान शाकुन्तल की कथावस्तु के ग्रथन में प्राप्त सफलता से किसी अंश में कम नहीं है।
निःसन्देह भवभूति की अन्य दो कृतियाँ—महावीरचरित तथा मालतीमाधव—इतनी उच्चकोटि की नहीं हैं, जितनी उत्तररामचरित है। सम्भवतः इसका कारण यही है कि प्रथम दोनों रचनाएँ भवभूति की प्रारम्भिक अवस्था की हैं तथा अन्तिम रचना पूर्णावस्था की है। यही स्थिति कालिदास की अभिज्ञान शाकुन्तल के सम्बन्ध में मानी जा सकती है, जो निस्संशय अन्य दो कृतियों—मालविकाग्निमित्र तथा विक्रमोर्वशीय—से अधिक उत्कृष्ट रचना है और अवश्यमेव परिपक्वावस्था में ग्रथित हुई प्रतीत होती है।


कई विद्वानों ने उत्तररामचरित के कर्ता के नाम के बारे में संशय प्रकट किया है। नाटक की प्रस्तावना में प्रणेता ने अपना परिचय इस तरह दिया है—
अस्ति खलु तत्रभवान् काश्यपः श्रीकण्ठपदलाञ्छनः पद
वाक्यप्रमाणज्ञो भवभूतिर्नाम जतुकर्णीपुत्रः ।
—यह कवि कश्यप-गोत्र में उत्पन्न ‘श्रीकण्ठ’ पदवी से भूषित, व्याकरण, मीमांसा तथा न्यायशास्त्र का ज्ञाता, जतुकर्णी का पुत्र भवभूति नाम का है।
इस परिचय में निर्दिष्ट ‘श्रीकण्ठ’ शब्द को कुछ विद्वान् नाम रूप में स्वीकार करते हैं और ‘भवभूति’ को उसका विशेषण (भवाद्‌भूतिर्यस्य—जिसे भव अर्थात् महादेव जी से भूति—ज्ञान-सम्पत्ति प्राप्त हुई हो) बतलाते हैं। परन्तु यह धारणा युक्तिसंगत प्रतीत नहीं होती, क्योंकि ‘श्रीकण्ठ’ शब्द के साथ पदलांछन का प्रयोग यह स्पष्ट करता है कि वास्तव में ‘श्रीकण्ठ’ कवि का कोई भूषित करने वाला विरुद था, जिसका अर्थ है ‘श्रीः सरस्वती कण्ठे यस्य’ (जिसके कण्ठ में सरस्वती का निवास हो।)। ‘भवभूति’ शब्द के समीप ‘नाम’ शब्द का प्रयोग होना यही सूचित करता है कि कवि का नाम भवभूति था—जिससे वह संसार में प्रसिद्ध है।
महावीरचरित की प्रस्तावना में भवभूति के पिता का नाम नीलकण्ठ तथा पितामह का नाम भट्टगोपाल कहा गया है। पिता के नाम में ‘कण्ठ’ शब्द का विन्यास देख कर ही यह भ्रम हुआ प्रतीत होता है कि कवि का नाम श्रीकण्ठ था। परन्तु यह परम्परा स्वीकार कर ली जाए तो पितामह के नाम में भी ‘कण्ठ’ पद का प्रयोग होना आवश्यक था।
राजशेखर (दशम शती) ने बालचरित में, कल्हण (द्वादश शती) ने राजतरंगिणी में तथा गोवर्धनाचार्य (चतुर्दश शती) ने आर्यासप्तशती में यशोवर्मा के समकालीन सुविख्यात कवि भवभूति का वर्णन किया है। मालतीमाधव में तो ‘भवभूति नामा’ लिखकर कवि ने सन्देह को सर्वथा मिटा दिया है कि उसका नाम ‘भवभूति’ ही था, ‘श्रीकण्ठ’ कोई उसका विभूषक पद था।
मालतीमाधव की एक पुरानी हस्तलिखित पुस्तक में ‘प्रकरणमिदं कुमारिल-शिष्यस्य उम्बेकाचार्यस्य’ (अर्थात् यह मालतीमाधव-प्रकरण कुमारिल के शिष्य उम्बेकाचार्य का लिखा हुआ है।) ऐसा निर्देश प्राप्त होता है, जिससे भवभूति का एक अन्य नाम उम्बेकाचार्य भी प्रतीत होता है। उम्बेकाचार्य कुमारिल भट्ट-कृत ‘श्लोक वार्तिक’ के टीकाकार-रूप में भी प्रसिद्ध है। वेदान्त के विख्यात ग्रन्ध ‘तत्व प्रदीपिका’ में चित्सुखाचार्य ने जहाँ ‘उम्बेक’ नाम की चर्चा की है, वहाँ भी टीकाकार ने भवभूति तथा उम्बेक का तादात्म्य प्रतिपादित किया है। ‘श्लोक वार्तिक’ की तात्पर्य टीका के रचयिता का नाम ‘भट्ट उम्बेक’ रूप में प्रदर्शित किया गया है। भवभूति के पितामह का नाम भट्टगोपाल था। विद्वत्समाज में शास्त्र चतुष्टयवेत्ता को ‘भट्ट’ उपाधि से विभूषित करने की प्रथा थी। इसीलिए पितामह के समान भवभूति के ‘उम्बेक’ नाम से पूर्व ‘भट्ट’ पद का प्रयोग किया गया, ऐसा माना जा सकता है।


इस नाम के विषय में कुछ सन्देह का भी स्थान अवश्य है, क्योंकि मालतीमाधव के उपर्युक्त उद्धरण में तो उम्बेक को कुमारिल-शिष्य कहा गया है। परन्तु महावीरचरित की प्रस्तावना में भवभूति के गुरु का नाम ज्ञाननिधि लिखा गया है—
श्रेष्ठः परमहंसानां, महर्षीणामिवाऽङ्गिराः ।
यथार्थनामा भगवान्, यस्य ज्ञाननिधिर्गुरुः ।।
परन्तु इस सन्देह का निवारण इस तरह हो सकता है कि सम्भवतः ‘ज्ञाननिधि’ ही कुमारिल भट्ट का दूसरा नाम था। अथवा ज्ञाननिधि और कुमारिल भट्ट-दोनों ही भवभूति के गुरु थे। भवभूति ने सम्भवतः कुमारिल भट्ट से पूर्वमीमांसा का तथा ज्ञाननिधि से उत्तरमीमांसा का अध्ययन किया था। उत्तरारामचरित की प्रस्तावना में भवभूति का ‘पदवाक्य प्रमाणज्ञ’ विशेषण एवं उसी नाटक के चतुर्थ अंक में दाण्डायन-सौधातकि संलाप में—
समांसो मधुपर्क इत्याम्नायं बहु मन्यमानाः श्रोत्रिया-
याभ्यागताय वत्सतरीं महोक्षं या पचन्ति गृहमेधिनः ।
तं हि धर्मं धर्मसूत्रकाराः समामनन्ति।
ऐसा उल्लेख करना भवभूति की श्रौतकर्म-विज्ञता एवं मीमांसाशास्त्र-निपुणता को प्रकट करता है।
अतः ज्ञाननिधि तथा कुमारिल भट्ट के शिष्य भवभूति का एक अन्य नाम उम्बेकाचार्य अथवा भट्टउम्बेक स्वीकार करने में विशेष विप्रतिपत्ति अवशिष्ट नहीं रह जाती।
भवभूति का जन्मस्थान कौन-सा था—इस सम्बन्ध में महावीरचरित तथा मालतीमाधव से कुछ संकेत प्राप्त होता है। ‘अस्ति दक्षिणापथे पद्मपुरं नाम नगरम्‌’ तथा ‘दक्षिणापथे विदर्भेषु’ निर्देश क्रमशः दोनों नाटकों में उपलब्ध होते हैं। इनसे स्पष्ट है कि दक्षिणापथ में विदर्भ प्रान्त के पद्मपुर नामक नगर में कवि का जन्म हुआ। दक्षिणापथ भारत का कौन-सा भाग था, इसका परिचय महाभारत के निम्नलिखित उद्धरण से स्पष्ट होता है—
एते गच्छन्ति बहवः, पन्थानो दक्षिणापथम् ।
अवन्तिमृक्षवन्तञ्च, समतिक्रम्य पर्वतम्‌ ।।
एष पन्था विदर्भाणामसौ गच्छति कोशलान् ।
अतः परञ्च देशोऽयं, दक्षिणे दक्षिणापथः ।।
—ये अनेक मार्ग दक्षिणापथ को जा रहे हैं। यह ऋक्षवत् पर्वत को पार करके अवन्ति की तरफ जा रहा है। यह मार्ग विदर्भ को जा रहा है, और वह कोशल को। उस स्थान के दक्षिण में स्थित देश के दक्षिणापथ नाम से कहा जाता है।
इस कथन में सम्भवतः अशुद्धि न होगी कि दक्षिणापथ वर्तमान दक्कन है, जो दक्षिण का ही अपभ्रंश है। विदर्भ वर्तमान बरार रूप में विद्वानों द्वारा प्रायः स्वीकार किया जाता है। इसी बरार प्रान्त में पद्मपुर नाम के नगर में कवि का जन्म हुआ। यह पद्मपुर वर्तमान कौन-सा नगर है, यह अभी तक निश्चय नहीं किया जा सका।


यद्यपि भवभूति का जन्मस्थान बरार (पद्मपुर) था, तथापि उसने अपने जीवन का बड़ा भाग कान्यकुब्ज में व्यतीत किया, जहाँ वह महाराज यशोवर्मा के दरबार में राजकवि-रूप में था। सुप्रसिद्ध इतिहासकार कल्हण ने राजतरंगिणी में महाराज मुक्तापीड ललितादित्य (कश्मीर-नरेश) द्वारा कान्यकुब्ज के राजा यशोवर्मा के पराजित होने का वर्णन किया है। “जिसने स्वयं कवि होने के कारण अपने विजेता का, कविता करके, यशोगान किया।” कल्हण ने यशोवर्मा के सम्बन्ध में यह भी लिखा है कि उसके दरबार में वाक्‌पति, राजश्री, भवभूति आदि कवि उसकी सेवा करते थे—
कविर्वाक्‌पति-राजश्री-भवभू त्यादिसे वितः ।
जितो ययौ यशोवर्मा, तद्‌गुणस्तुतिवन्दिताम् ।।
इतिहासकारों द्वारा यशोवर्मा का काल सप्तम शती का उत्तरार्ध माना जाता है। अतः भवभूति कवि का काल भी यही स्वीकार किया जाना उचित है।
ऐसा प्रतीत होता है कि भवभूति को अपने जीवन-काल में कीर्ति-लाभ नहीं हो सका। कालिदास, बाणभट्ट आदि ने जो ख्याति जीवित अवस्था में प्राप्त कर ली, वह भवभूति के भाग्य में न आ सकी। अतएव निराशा से क्षुब्ध होकर उसने मालतीमाधव नाटक में लिख दिया (निम्नलिखित श्लोक भट्टउम्बेक-कृत ‘श्लोकवार्तिक’ की तात्पर्य टीका में भी मिलता है—जो भवभूति तथा भट्टउम्बेक के तादात्म्य को प्रमाणित करता है)—
ये नाम केचिदिह न प्रथयन्त्यवज्ञां
जानन्ति ते किमपि तान् प्रति नैष यत्नः ।
उत्पत्स्यते तु मम कोऽपि समानधर्मा
कालो ह्मयं निरवधिः विपुला च पृथ्वी ।।
भवभूति ने निराशा में भी इस आशा को प्रकट किया कि अवश्य कोई ऐसा समय आएगा, जब उसकी कविता का संसार में आदर होगा। उसे विश्वास था कि गुणग्राही लोग उत्पन्न होंगे और उसकी रचनाओं का उचित मूल्यांकन करेंगे।
वस्तुतः ऐसा ही हुआ। भवभूति की मृत्यु के बहुत वर्षों बाद ही, लगभग दशम शताब्दी से, उसके कवित्व का मूल्य पहचाना गया। भवभूति की साहित्य-क्षेत्र में प्रशंसा इतनी बढ़ गई कि कुछ विद्वानों ने तो यहाँ तक कह दिया—
कवयः कालिदासाद्याः भवभूतिर्महाकविः ।
—कालिदास आदि तो साधारण कवि हैं, भवभूति ही एकतम महाकवि है।
वर्तमान समय में भवभूति विश्व-विश्रुत कवि हैं। उसकी ख्याति न केवल संस्कृत साहित्य के क्षेत्र में सीमित है, परन्तु नाट्यकला के व्यापक क्षेत्र में भी यह विस्तृत हो चुकी है। पाश्चात्य देशों में इस कवि का अध्ययन किया गया है और इसे उत्कृष्ट कलाकार-रूप में स्वीकार किया गया है। प्रोफेसर विल्सन का मत है कि कला का सौन्दर्य तथा विचारों की उच्चता में संसार का अन्य कोई कवि भवभूति की तुलना नहीं कर सकता।
पण्डित विद्यासागर का कथन है, “भवभूति की रचनाओं में जिस उदात्त एवं उत्कृष्ट रूप में विभिन्न रसों का परिपाक हुआ है, वैसा अन्यत्र कहीं दृष्टिगोचर नहीं होता।”
डाक्टर भण्डारकर भी भवभूति की आलोचना करते हुए निम्न शब्दों में उसका मूल्यांकन करते हैं, “सघन वनों की एकान्त रम्यता, उत्तुंग शृंखलाओं की मनोरम भव्यता एवं संगीतमय जलप्रपातों की स्वर्गीय सुन्दरता के चित्रण में भवभूति अति निपुण है। वह प्रकृति का उपासक है। मानव-हृदय की अन्तर्हित वेदनाओं के चित्रण में भी वह सिद्धहस्त है। अन्तस्तल की कोमलता तथा गम्भीरता को समझने की क्षमता तो उसमें अद्‌भुत है। वह सामान्य पदार्थों में भी सौन्दर्य की खोज करता है। अनुभूति के सूक्ष्म तत्त्व का वह परिशीलन करता है। शैली पर उसका पूर्ण अधिकार है। शब्दों को अर्थ के अनुसार सजीव बोलता हुआ बनाने की भवभूति में अनुपम सामर्थ्य है।


सर्वसम्मति से उत्तररामचरित भवभूति की सुन्दरतम रचना है। इस सम्बन्ध में प्रसिद्ध उक्ति है, ‘उत्तरे रामचरिते भवभूतिर्विशिष्यते’, अर्थात् अन्य कृतियों की अपेक्षा भवभूति को उत्तररामचरित में विशिष्ट सफलता प्राप्त हुई है। जैसे ऊपर कहा जा चुका है, यह कृति कवि की परिपक्वावस्था की है। डाक्टर भण्डारकर, डाक्टर बलवेल्कर तथा डाक्टर लेनमन का भी यही मत है। उत्तररामचरित के भरत वाक्य से इसी मत की पुष्टि होती है—
शब्दब्रह्मविदः कवैः परिणतप्रज्ञस्य वाणीमिमाम् ।
—शब्द-ब्रह्मवेत्ता, परिपक्व बुद्धि वाले कवि की इस वाणी (उत्तररामचरित) का विद्वान् लोग उचित सम्मान करें।
कुछ विचारकों ने मालतीमाधव को कवि की अन्तिम रचना सिद्ध करने का यत्न किया है। उनके अनुसार मालतीमाधव की शैली कल्पना के उच्च स्तर पर अवस्थित है। उत्तररामचरित तो केवल रामायण की छायामात्र है।
उनका कथन है कि उत्तररामचरित में, प्रस्तावना में, अभिनय की दृष्टि से कुछ अशुद्धियाँ रह गई हैं, जिन्हें कवि ने मालतीमाधव में दूर कर दिया है। उत्तररामचरित में सूत्रधार के ‘एषोऽस्मि कार्यवशाद्‌ आयोध्यकस्तदानीतनश्च संवृत्तः’ के बाद प्रस्तावना की समाप्ति को बिना सूचित किए ही, कथावस्तु का आरम्भ कर दिया गया है। परन्तु मालतीमाधव में प्रस्तावना को समाप्त करके ही नाटकीय विषय का प्रवेश किया गया है।
पुनः उनका तर्क है कि मालतीमाधव में ‘ये नाम केचिदिह न प्रथयन्त्यवज्ञां, उत्पत्स्यते तु मम कोऽपि समानधर्मा’ इत्यादि रोष के वचन तभी कहे जा सकते हैं, जब कवि की पूर्व कृतियों का सम्मान न हुआ हो और अन्त में क्षुब्ध होकर उसे कहना पड़ा हो कि मेरी रचनाओं का आदर कभी संसार में पीछे आने वालों द्वारा अवश्य होगा। इन वचनों से मालतीमाधव का ही भवभूती की अन्तिम कृति होना सिद्ध होता है।
परन्तु मालतीमाधव की श्रृंगार-रस-प्रधानता उपर्युक्त सब युक्तियों का परिहार करती है। युवावस्था के उन्माद में ही कवि प्रेम की सरल कल्पना कर सकता था। उत्तररामचरित का करुण रस एवं सत्त्वप्रधान धीरोदात्त नायक का चित्रण कवि की परिणत प्रज्ञा का ही परिचायक है और यही स्वीकार करना उचित प्रतीत होता है कि यही कृति उसकी अन्तिम कृति थी। मालती-माधव तथा महावीरचरित का लोकप्रिय न बन सकना भी इसी तथ्य का पोषण करता है।
तीनों नाटकों के अनुशीलन से यह स्पष्टतया सूचित होता है कि इनके रचयिता की हिन्दू धर्म में दृढ़ आस्था थी। महावीरचरित के नान्दी-वचन में कवि चेतन ज्योतिःस्वरूप निर्गुण ब्रह्म की स्तुति इस प्रकार करता है—
अथ स्वस्थाय देवाय, नित्याय हतपाप्मने ।
व्यक्तक्रमविभागाय, चैतन्यज्योतिषे नमः ।।
—सचिदानन्द परब्रह्म को नमस्कार है, जो स्वयं प्रकाश है, नित्य एवं निर्लेप है, जो अव्यक्त होकर भी नाम तथा रूप में अभिव्यक्त होता है, जो चेतनस्वरूप परम ज्योति है।


इसी महावीरचरित में यह भी स्पष्ट होता है कि कवि भगवान् राम को उस ब्रह्म का मूर्त रूप स्वीकार करता है और इसी व्यक्त ब्रह्म में उसकी असीम श्रद्धा एवं भक्ति है। वसिष्ठ के मुख से भगवान् राम का कवि ने इस प्रकार वर्णन किया है।
क्षमायाः स क्षेत्रं गुणमणिगणानामपि खनिः
प्रपन्नानां मूर्त्तः सुकृतपरिपाको जनिमताम् ।
कृपारामो रामो वहिरिह दृशोपास्यत इति
प्रमोदाद् वै तस्याप्युपरि परिवर्तामह इति ।।
—वह राम क्षमा के क्षेत्र हैं, गुणमणियों की खान हैं। शरण में आए हुए मनुष्यों के लिए, वे उनके पुण्यों का मूर्तिमान परिपाक हैं। वे राम कृपानिधान हैं। उन्हें आँखों से भी उपासना का विषय बनाया जा सकता है। उस भक्तिरस में डूबकर ऐसा अनुभव होता है कि हम किसी अनिर्वचनीय आनन्द में निमग्न हो गए हैं।
श्रीराम के प्रति भवभूति की भक्ति, केवल उदात्त नायक के रूप में ही नहीं है, अपितु आराध्य देव के रूप में है। इसका अधिक स्पष्टीकरण निम्न उद्धरण (महावीरचरित) से होता है—
इदं हि तत्त्व परमार्थभाजां, अयं हि साक्षात् पुरुषः पुराणः ।
त्रिधा विभक्ता प्रकृतिः किलैषा, त्रातुं भुवि स्वेन सतोऽवतीर्णा ।।
—यह श्रीराम परमार्थ-जिज्ञासुओं के लिए परमवेदितव्य तत्त्व हैं। यह पुराणपुरुष हैं, जिनका साक्षात्कार परमवांछनीय है। यही विश्व की मूल प्रकृति हैं जिसकी त्रिविध रूप—ब्रह्मा, विष्णु, महेश्वर—में अभिव्यक्ति होती है और जो जगत् के परित्राण के लिए पृथ्वी पर अवतरित होती है।
महावीरचरित की प्रस्तावना में भी कवि ने अपने पूर्व-पुरुषों का परिचय देते हुए, अपने वंश-क्रमागत धर्म का इस तरह प्रकाशन किया है—
“तत्र केचित् तैत्तिरीयाः काश्यपाश्चरणगुरवः पंक्ति-पावनाः
पञ्चाग्नयो धृतव्रताः सोपपीथिनः उदुम्बराः ब्रह्मवादिनः
प्रतिवसन्ति। तदामुष्यायणस्य तत्रभवतो वाजपेययाजिनो
महाकवेः पञ्चमः सुगृहीतनाम्नो भट्टगोपालस्य पौत्रः पवित्रकीर्तेः
नीलकण्ठस्यात्मसम्भवः श्रीकण्ठपदलाञ्छनो भवभूतिर्नाम जतुकर्णीपुत्रः ।”
इस उद्धरण में कवि के पूर्व पुरुषों का वैदिक सोमपायी, याज्ञिक, ब्रह्मवादी ब्राह्मण होना सिद्ध होता है। उसके पितामह भट्टगोपाल विशेषरूप से वाजपेययाग के कर्मकाण्ड में निष्णात ब्राह्मण थे।
इस प्रकार भवभूति परम्परा-अनुसार वैदिक धर्म के अनुयायी तथा विशेष रूप से रामभक्त दृष्टिगोचार होते हैं। यह ठीक है कि मालतीमाधव में कवि ने शिव जी को एवं गणेश जी को भी नमस्कार किया है। परन्तु इतने से उसका शैव होना सिद्ध नहीं हो जाता है। विघ्न-शान्ति के लिए हिन्दूमात्र गणेश जी की वन्दना करता है। नटराज शिव जी की भी नाट्‌यकला-प्रवर्तक के रूप में वन्दना वैष्णव धर्म से विरोध उत्पन्न नहीं करती। भवभूति के तीनों नाटकों की प्रस्तावनाओं में ऐसा ज्ञात होता है कि इन नाटकों का अभिनय कालप्रियानाथ के यात्रा-उत्सव के समय किया जाता था। कालप्रिया अथवा दुर्गा के नाथ शिव जी का नाट्‌यकला के साथ अटूट सम्बन्ध था। इसी कारण शिव जी का स्मरण नाट्‌यवस्तु के अभिनय में प्रायः आवश्यक माना जाता था। ऐसा केवल धर्म की दृष्टि से नहीं, प्रत्युत नाटकीय दृष्टि से किया जाता था।


मालतीमाधव में भवभूति ने स्वयं अपने वेदों, उपनिषदों, सांख्य, योग आदि हिन्दू शास्त्रों के ज्ञान की तरफ संकेत किया है, यद्यपि वह उसे नाटक-कला के लिए अत्यन्त आवश्यक नहीं मानता—
यद्‌ वेदाध्ययनं तथोपनिषदां सांख्यस्य योगस्य च
ज्ञानं तत्कथनेन किं? नहि ततः कश्चिद् गुणो नाटके ।
अपने शास्त्रीय पाण्डित्य का परिचय कवि ने कई अन्य स्थानों पर दिया है। महावीरचरित में ‘राष्ट्रगोपः पुरोहितः’ कह कर उसने ऐतरेय ब्राह्मण का ज्ञान प्रकट किया है। इसी प्रकार उत्तररामचरित में ‘असुर्या नाम ते लोकाः’ इत्यादि वाक्यों द्वारा उपनिषदों का बोध प्रदर्शन किया है। वहीं पर—
विद्याकल्पेन मरुता, मेघानां भूयसामपि ।
ब्रह्मणीव विवर्तानां, क्वापि प्रविलयः कृतः ।।
इस श्लोक से कविवर ने वेदान्त के अद्वैत सिद्धान्त का उद्‌भासन किया है। मालतीमाधव में भी महाकवि ने योग तथा तन्त्र में अपनी सरल गति का प्रकाशन किया है। इन सबसे भवभूति के कवित्व के अतिरिक्त असाधारण वैदुष्य का भी परिचय मिलता है।
भवभूति के सम्बन्ध में इतना लिखने के बाद अब उत्तररामचरित नाटक के विषय में भी कुछ आलोचना करनी आवश्यक है।
जैसे ऊपर कहा जा चुका है, उत्तररामचरित भवभूति की सर्वोत्कृष्ट रचना है। उत्तररामचरित की कथावस्तु वाल्मीकि रामायण से ली गई है। इस कथावस्तु के ग्रथन में कवि ने अद्‌भुत कला का प्रदर्शन किया है। वाल्मीकि के राम और सीता, नाटक में दिव्य-उदात्त नायक तथा नायिका-रूप में उपस्थित किए गए हैं। कवि की ग्रथन-चातुरी में कोई भी आलोचक सन्देह नहीं कर सकता।
इस कथन में भी असत्य नहीं है कि भवभूति की रचना पर कालिदास तथा भास की कृतियों का अवश्य प्रभाव पड़ा है। इन दोनों पुरातन नाटककारों की परम्परा की उपेक्षा भी कैसे की जा सकती थी? भवभूति इन दोनों के प्रति अवश्य ऋणी हैं, परन्तु फिर भी उसकी अपनी मौलिकता को अस्वीकार नहीं किया जा सकता।
कालिदास के अभिज्ञान शाकुन्तल तथा भास की स्वप्नवासवदत्ता की छाया भवभूति के उत्तररामचरित पर कहीं-कहीं अवश्य दिखाई देती है। उदाहरण-रूप में, सीता तथा शकुन्तला—दोनों का अपने पतियों द्वारा परित्याग किया जाता है और वह भी तब जब कि दोनों के गर्भ में सन्तान है। राम और दुष्यन्त समान रूप से पत्नी-परित्याग के बाद विषाद-ग्रस्त हो जाते हैं। दोनों का अपनी पत्नियों के साथ सुदूर आश्रमों में पुनर्मिलन होता है और वह भी अपने अपरिचित पुत्रों के द्वारा।


शाकुन्तल (अंक 7) में दुष्यन्त सर्वदमन को देख कर कहता है—
अस्य बालकस्य रूपसंवादिनी आकृतिः ।
इस वाक्य की उत्तररामचरित (अंक 6) के निम्न वाक्य से सदृशता स्पष्ट है। इसे राम ने लव को देखने के बाद कहा—
अये! न केवलमस्मत् संवादिनी आकृतिः ।
दोनों वियुक्ता पत्नियाँ पति-वियोग से निरन्तर पीड़ित रहती हैं और अकस्मात् पतियों को मिल कर, उनकी दुर्बलता को देख कर अति दुःखित होती हैं। कालिदास की शकुन्तला दुष्यन्त को पहचान भी नहीं सकती है और कहती है, “यह तो आर्यपुत्र के सदृश नहीं हैं”—न खलु आर्यपुत्र इव। इसी प्रकार भवभूति की सीता भी राम को देखकर विषाद से कहती है, “हाय इनकी आकृति किस प्रकार प्रभातकालीन चन्द्र-मण्डल के समान क्षीण एवं पाण्डुर वर्ण हो गई हैं”—हा कथं प्रभातचन्द्र-मण्डलपाण्डुराकृतिः।
दुष्यन्त दीर्घ विरह के बाद आश्रम में शकुन्तला को मिलते हुए मर्मस्पर्शी शब्दों में कहता है—
वसने परिधूसरे दधाना, नियमक्षाममुखी धृतैकवेणिः ।
अतिनिष्करुणस्य शुद्धशीला, मम दीर्घ विरहव्रतं विभर्ति ।।
शकुन्तला के इस वर्णन का तमसा द्वारा किए गए विरहिणी सीता के वर्णन के साथ कितना सादृश्य है—
परिपाण्डुदुर्बलकपोलसुन्दरं, दधती विलोलकबरीकमाननम् ।
करुणस्य मूर्तिरिव वा शरीरिणी, विरहव्यथेव वनमेति जानकी ।।
कालिदास तथा भवभूति—दोनों को ही, विरहिणियों के यथार्थ चित्रण में समान सफलता प्राप्त हुई है। विरहिणियों का अपने प्रिय पतियों के साथ संयोग समान सौन्दर्य से दिव्य ब्रह्मर्षियों की उपस्थिति में, रमणीय तपोवन-भूमियों में कराया गया है।
महाकवि भास के स्वप्नवासवदत्ता नाटक (अंक 5) में महाराजा उदयन अपनी प्रेयसी वासवदत्ता को (जिसकी मृत्यु मन्त्री यौगन्धरायण ने आग में जल जाने के कारण घोषित कर दी थी—परन्तु जो वस्तुतः जीवित थी) स्वप्न में देखते हैं और नींद में ही रोना आरम्भ करते हैं। उस समय वासवदत्ता आती है, महाराज के अंगों का स्पर्श करती है और लौट जाती है। उदयन-स्पर्श-सुख का अनुभव करने के साथ ही उठ बैठते हैं—परन्तु वासवदत्ता को न देख कर अधिक विलाप करते हैं।
उत्तररामचरित में लगभग ऐसा ही दृश्य सीता-स्पर्श से राम के सम्बन्ध में दिखाया गया है। राम उन्मत्त होकर वासन्ती से कहते हैं, मैंने अभी सीता को देखा है।
स्वप्नवासवदत्ता में उद्धरण इस प्रकार है—
उदयन—मित्र (विदूषक)! तुम्हारे लिए एक अच्छा समाचार है, वासवदत्ता जीवित है।
विदूषक—हाय, वासवदत्ता, कहाँ है वासवदत्ता? वह तो कब की मर चुकी।
उदयन—नहीं, मित्र नहीं। मैं आधा जाग रहा था, जब वह आई। अपने मधुर स्पर्श से उसने मुझे उठाया और फिर चली गई। रुमण्वत् ने मुझे यह कह कर धोखा दिया है कि वह मर चुकी है।


उत्तरारामचरित में एतत्सदृश ही प्रकरण है—
राम—सखि वासन्ती, तुम्हारा सौभाग्य उदय हुआ आज।
वासन्ती—वह कैसे महाराज!
राम—सीता मुझे मिल गई है।
वासन्ती—महाराज, वह कहाँ है?
राम—वह देखो, तुम्हारे सामने खड़ी है।
निस्सन्देह भास, कालिदास तथा भवभूति भरत की नाट्यकला-परम्परा के परस्पर गुँथे हुए एक ही हार के मोती हैं। उत्तरकालीन कवियों पर इन्हीं तीनों की अमिट छाप स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होती है। निस्संशय भवभूति पर अपने पूर्ववर्ती दोनों महाकवियों की भी छाप है।
कालिदास को बाह्मजगत् के चित्रण में जहाँ विशेष सफलता प्राप्त हुई है, वहाँ भवभूति को अन्तर्जगत् के आलेख्य-लेखन में विशेष सफलता मिली है। भवभूति मानव-हृदय की अनुभूतियों को समझने तथा उन्हें सरस-सान्द्र शैली द्वारा प्रस्तुत करने में अधिक दक्ष है। वैसे दोनों ही कवि-मूर्धन्य अपनी-अपनी कृतियों में अनुपम हैं—उनकी परस्पर तुलना ही सुकर नहीं है।
‘एक एव भवेदंगी शृंगारो वीर एव वा’—साहित्यदर्पण के इस पुरातन सिद्धान्त के अनुसार कालिदास ने अपने तीनों नाटकों का प्रधान रस शृंगार रखा है। ऐसा करते हुए कालिदास ने रूढ़ि की दासता ही प्रकाशित की है। अन्यथा तीनों नाटकों में किसी एक में तो अन्य रस का भी प्रधानतया समावेश किया जाता।

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Q. उत्तररामचरित / Uttaramcharit किताब के लेखक कौन है?
Answer.   महाकवि भवभूति / Mahakavi Bhavbhuti  
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