ज़िंदगी जो आप बनाए / Zindagi Jo Aap Banaye / Life Is What You Make It

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अगर भाग्य ने आपके द्वारा ली गई सड़क को मोड़ दिया तो आप क्या करेंगे? क्या होगा अगर यह आपको उस जगह पर फेंक देता है जहां आप जाना नहीं चाहते हैं? क्या आप लड़ेंगे, आप दौड़ेंगे या आप इसे स्वीकार करेंगे? अस्सी के दशक के शुरुआती दिनों में भारत के दो शहरों में सेट, ‘लाइफ इज व्हाट यू मेक इट’ अंकिता के जीवन के कुछ महत्वपूर्ण वर्षों का एक मनोरंजक खाता है।
अंकिता शर्मा के पैरों में दुनिया है। वह युवा, अच्छी दिखने वाली, स्मार्ट है और उसके ऊपर दोस्तों और लड़कों के झुंड हैं। उसका कॉलेज जीवन वही है जो हर युवा का सपना होता है और वह अपने एमबीए के लिए एक प्रीमियर मैनेजमेंट स्कूल में दाखिला लेता है। छह महीने बाद, वह एक मानसिक स्वास्थ्य अस्पताल में एक मरीज है। अंकिता यहां कैसे पहुंची? वे कौन सी घटनाएं थीं जिनके कारण यह हुआ? क्या वह कभी अपनी जिंदगी दोबारा पा सकेगी?
जीवन ने क्रूरता और ठंडी छीन ली है, जिसका अर्थ उसके लिए सबसे अधिक था और उसे अब इसे वापस पाने के लिए संघर्ष करना चाहिए।
विश्वास की शक्ति और कैसे दृढ़ संकल्प और अदम्य भावना है, की बढ़ती गहराई से एक प्रेरणादायक चलती और प्रेरक खाता यहां तक ​​कि भाग्य आपके ऊपर फेंकता है। एक कहानी, जिसके मूल में एक प्रेम-कहानी है, जो हमें अपने बारे में और हमारी पवित्रता की अवधारणा के बारे में हमारी मान्यताओं पर सवाल उठाती है, और हमें यह मानने के लिए मजबूर करती है कि जीवन वास्तव में वही है जो इसे बनाता है।

जिन चीज़ों को हम बदल नहीं सकते, हमें उन्हें स्वीकार करना ही पड़ता है। मुझे तुम्हारी
बहुत याद आती है।
मुझे तुम्हारी चिट्ठी अभी मिली और मैं तुरंत ही जवाब देने बैठ गया हूं।
मेरा ओरियंटेशन कल है। मैं बहुत उत्साहित हूं! मुझे यकीन ही नहीं हो रहा है कि अब मैं
एक आईआईटियन हूं! मुझे कैंपस, होस्टल, सब कुछ अच्छा लग रहा है।
मैंने तुम्हें फ़ोन करने की कोशिश की थी। लेकिन तुम्हारी मां ने फ़ोन काट दिया। लगता
है मुझे तुम्हारी चिट्ठियों का ही इंतज़ार करना पड़ेगा। चिट्ठियां तुम्हारे पोस्ट करने के पांचवें
दिन मेरे पास पहुंच पाती हैं। पांच दिन बहुत लंबे लगते है; लेकिन फिर भी कुछ नहीं से तो
यह बेहतर ही है।
मुझे बताना तुम्हें अपना कॉलेज कैसा लग रहा है। मेरा ख़त पहुंचने तक शायद कॉलेज
शुरू हो चुका होगा।
लव
वैभव
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इंटरनेट या कंप्यूटर के आने से पहले हम हाथ से चिट्ठियां लिखते थे और डाकिए द्वारा उनके
पहुंचाए जाने का बड़ी बेचैनी से इंतजार करते थे। ये बुनियाद जैसे मशहूर टीवी ड्रामों और
चित्रहार जैसे कार्यक्रमों के दिन थे, जब टीवी का मतलब बस एक राष्ट्रीय चैनल हुआ करता
था और जब वीडियो कैसेट रिकॉर्डर अभी भी प्रचलन में थे।
अब सोचने पर मुझे आश्चर्य होता है। यह देखते हुए कि मेरे माता-पिता कितने
रूढ़िवादी, सख़्त और भारतीय थे, वे मुझे एक लड़के को चिट्ठियां लिखने देते थे जबकि मुझे
घर पर लड़कों को बुलाने की या किसी लड़के के घर जाने की इजाजत नहीं थी चाहे मैं दूसरी
लड़कियों के साथ ही क्यों न होऊं। जब बारहवीं कक्षा की बोर्ड परीक्षाओं के बाद चार
लड़कों और तीन लड़कियों का मेरा ग्रुप फिल्म देखने और बाद में आइसक्रीम खाने के लिए
जाने वाला था, तो मैं अकेली थी जिसे जाने की अनुमति नहीं मिली थी। शायद वे मुझे
चिट्ठियां इसलिए लिखने देते थे कि कोई देखेगा नहीं, जबकि फिल्म या आइसक्रीम के लिए
जाने का मतलब होता कि लोग देखते और बातें बनाते।
कॉलेज के गेट पर पहुंचने पर मुझे सबसे पहला जो अहसास हुआ वह था हांफने का
अहसास। कॉलेज के पहले दिन समय से पहुंचने के लिए मैं जल्दी करती हुई आई थी।

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